पृथ्वी एक तंत्र है जिसके पाँच मंडल हैं
तंत्र (सिस्टम) यानी ऐसे हिस्से जो मिलकर काम करते हैं। पृथ्वी भी एक तंत्र है। इसे हम पाँच हिस्सों में बाँटते हैं, जिन्हें मंडल कहते हैं।
- भूमंडल (जियोस्फियर): ठोस पृथ्वी। चट्टानें, मिट्टी, रेत, पहाड़ और पृथ्वी का गर्म अंदरूनी भाग।
- जलमंडल (हाइड्रोस्फियर): सारा तरल पानी। समुद्र, नदियाँ, झीलें, बारिश और ज़मीन के नीचे का पानी। इसका लगभग 97% खारा समुद्री पानी है।
- हिममंडल (क्रायोस्फियर): सारा जमा हुआ पानी। ध्रुवों की बर्फ की चादरें, हिमालय के हिमनद (ग्लेशियर), बर्फ और जमी हुई ज़मीन। पृथ्वी का ज़्यादातर मीठा पानी इसी में है।
- वायुमंडल (एटमॉस्फियर): पृथ्वी को ढकने वाली हवा की चादर। इसमें लगभग 78% नाइट्रोजन और 21% ऑक्सीजन है, थोड़ी कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प भी।
- जीवमंडल (बायोस्फियर): सारे जीव और वे जगहें जहाँ वे रहते हैं। यह गहरे समुद्र से ऊँचे आसमान तक फैला है।
मंडल आपस में जुड़े हैं
कोई भी मंडल अकेले काम नहीं करता। पेड़ (जीवमंडल) मिट्टी (भूमंडल) में उगता है, पानी (जलमंडल) पीता है और हवा (वायुमंडल) से साँस लेता है। पिघलता हिमनद (हिममंडल) नदी (जलमंडल) भरता है। एक मंडल बदले तो बाकी भी बदलते हैं।
सौर विकिरण और विद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम
पृथ्वी की सतह पर लगभग सारी ऊर्जा सूर्य से आती है। यह ऊर्जा खाली अंतरिक्ष से विकिरण के रूप में आती है। विकिरण ऐसी तरंगें हैं जिन्हें चलने के लिए हवा या पानी की ज़रूरत नहीं होती। इन्हें विद्युतचुंबकीय (EM) तरंगें कहते हैं। सब प्रकाश की चाल से चलती हैं।
इन तरंगों की तरंगदैर्ध्य (एक शिखर से अगले शिखर तक की दूरी) अलग-अलग होती है। लंबी से छोटी के क्रम में रखें तो EM स्पेक्ट्रम बनता है:
रेडियो → माइक्रोवेव → इन्फ्रारेड (अवरक्त) → दृश्य प्रकाश → पराबैंगनी (UV) → X-किरणें → गामा किरणें
- दृश्य प्रकाश ही वह हिस्सा है जो आँख देख पाती है। इसमें इंद्रधनुष के रंग हैं।
- इन्फ्रारेड को हम गर्मी के रूप में महसूस करते हैं।
- UV से त्वचा जलती है। वायुमंडल की ओज़ोन परत इसका ज़्यादातर हिस्सा रोक लेती है।
- तरंगदैर्ध्य जितनी छोटी, ऊर्जा उतनी ज़्यादा।
धूप कहाँ जाती है?
लगभग 30% धूप बादल, बर्फ और चमकीली ज़मीन से टकराकर सीधे अंतरिक्ष में लौट जाती है। बाकी लगभग 70% हवा, ज़मीन और समुद्र सोख लेते हैं और गर्म होते हैं। गर्म पृथ्वी फिर इन्फ्रारेड छोड़ती है। कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प जैसी गैसें इसका कुछ हिस्सा रोककर पृथ्वी को गर्म रखती हैं। इसे ग्रीनहाउस प्रभाव कहते हैं। इसके बिना पृथ्वी जम जाती।
असमान गर्मी: पवनें, समीर और महासागरीय धाराएँ
सूर्य पृथ्वी को बराबर गर्म नहीं करता। दो बड़े कारण हैं:
- किरणों का कोण: भूमध्य रेखा के पास सूर्य ऊँचा होता है और किरणें सीधी गिरती हैं। ध्रुवों के पास किरणें तिरछी गिरती हैं और बड़े क्षेत्र में फैल जाती हैं। इसलिए भूमध्य रेखा गर्म और ध्रुव ठंडे हैं।
- ज़मीन और पानी: ज़मीन जल्दी गर्म होती है और जल्दी ठंडी होती है। पानी धीरे गर्म होता है और धीरे ठंडा होता है (इसकी विशिष्ट ऊष्मा ज़्यादा है)।
पवन
गर्म हवा हल्की होती है, इसलिए ऊपर उठती है। नीचे कम दाब बन जाता है। ज़्यादा दाब वाली जगह से ठंडी, भारी हवा इस जगह को भरने दौड़ती है। यही चलती हवा पवन है। पवन हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है।
समुद्री समीर और स्थलीय समीर
दिन में ज़मीन समुद्र से ज़्यादा गर्म होती है। ज़मीन के ऊपर की हवा उठती है और ठंडी हवा समुद्र से ज़मीन की ओर आती है: समुद्री समीर। रात में ज़मीन जल्दी ठंडी हो जाती है और समुद्र गर्म रहता है। अब समुद्र के ऊपर की हवा उठती है और हवा ज़मीन से समुद्र की ओर चलती है: स्थलीय समीर। मानसून इसी का पूरे मौसम चलने वाला बड़ा रूप है।
महासागरीय धाराएँ
समुद्र का पानी भी बड़ी-बड़ी नदियों की तरह बहता है, इन्हें महासागरीय धाराएँ कहते हैं। पवनें सतह के पानी को धकेलती हैं। भूमध्य रेखा का गर्म पानी ध्रुवों की ओर जाता है और ठंडा पानी वापस भूमध्य रेखा की ओर आता है। ठंडा, खारा पानी भारी होता है और नीचे डूबता है। इस तरह धाराएँ गर्मी को पूरी दुनिया में बाँटती हैं और तटों को गर्म या ठंडा बनाती हैं।
जैव-भू-रासायनिक चक्र
जैव = जीवन, भू = पृथ्वी, रासायनिक = पदार्थ। जैव-भू-रासायनिक चक्र वह रास्ता है जिस पर कोई पदार्थ जीवों और पृथ्वी के निर्जीव हिस्सों के बीच बार-बार घूमता है। ऊर्जा सूर्य से आती है और गर्मी बनकर चली जाती है, पर पदार्थ बार-बार काम आता है।
जल चक्र
सूर्य समुद्र और झीलों को गर्म करता है। पानी भाप बनता है (वाष्पन)। पौधे भी पत्तियों से भाप छोड़ते हैं (वाष्पोत्सर्जन)। ऊपर जाकर भाप ठंडी होकर बादल बनाती है (संघनन)। पानी बारिश या बर्फ बनकर गिरता है (वर्षण)। फिर नदियों से समुद्र में लौटता है या ज़मीन में रिस जाता है।
कार्बन चक्र
पौधे हवा से CO₂ लेकर प्रकाश-संश्लेषण से भोजन बनाते हैं। जंतु पौधे खाते हैं, तो कार्बन जंतुओं में पहुँचता है। सभी जीव श्वसन में CO₂ छोड़ते हैं। मरे हुए जीवों को अपघटक तोड़ते हैं और वे भी CO₂ छोड़ते हैं। कुछ कार्बन लाखों साल तक कोयला, तेल और गैस बनकर दबा रहता है; इन्हें जलाने पर यह तेज़ी से हवा में लौटता है। समुद्र भी बहुत सी CO₂ घोल लेते हैं।
नाइट्रोजन चक्र
हवा में 78% नाइट्रोजन गैस (N₂) है, पर पौधे इसे सीधे नहीं ले सकते। पहले इसका स्थिरीकरण होना चाहिए, यानी इसे नाइट्रेट या अमोनिया में बदलना। यह काम बिजली (तड़ित) और ख़ास जीवाणु करते हैं; कुछ जीवाणु मटर और चने की जड़ों की गाँठों में रहते हैं। पौधे मिट्टी से नाइट्रेट लेकर प्रोटीन बनाते हैं। जंतु पौधे खाकर नाइट्रोजन पाते हैं। जीव मरते हैं तो अपघटक उनकी नाइट्रोजन को अमोनिया में बदलते हैं, दूसरे जीवाणु उसे नाइट्रेट बनाते हैं (नाइट्रीकरण) और कुछ जीवाणु नाइट्रेट को वापस N₂ गैस बना देते हैं (विनाइट्रीकरण)।
ऑक्सीजन चक्र
पौधे और शैवाल प्रकाश-संश्लेषण में ऑक्सीजन छोड़ते हैं। जंतु और पौधे श्वसन में ऑक्सीजन लेते हैं और CO₂ छोड़ते हैं। जलना और जंग लगना भी ऑक्सीजन लेते हैं। ऊपर वायुमंडल में ऑक्सीजन से ओज़ोन परत (O₃) बनती है। ऑक्सीजन और कार्बन चक्र एक सिक्के के दो पहलू जैसे जुड़े हैं।
पृथ्वी तंत्र पर मानव का प्रभाव
इंसान जीवमंडल का हिस्सा है, पर अब हम पाँचों मंडलों को बदल रहे हैं।
- जीवाश्म ईंधन जलाना वायुमंडल में अतिरिक्त CO₂ डालता है। CO₂ अब लगभग 420 ppm (दस लाख में भाग) है, जो कारख़ानों से पहले लगभग 280 ppm थी। ज़्यादा CO₂ ज़्यादा गर्मी रोकती है: वैश्विक ऊष्मन (ग्लोबल वार्मिंग)।
- बर्फ पिघलना: गर्मी से हिमनद और ध्रुवीय बर्फ (हिममंडल) घटती है और समुद्र का स्तर (जलमंडल) बढ़ता है।
- जंगल काटना: कम पेड़ कम CO₂ लेते हैं, मिट्टी बह जाती है और बारिश का ढंग बदलता है।
- ज़्यादा उर्वरक: अतिरिक्त नाइट्रेट झीलों में बहते हैं, शैवाल बहुत बढ़ जाते हैं और ऑक्सीजन की कमी से मछलियाँ मरती हैं।
- प्रदूषण: धुआँ, प्लास्टिक और रसायन हवा, पानी, मिट्टी और जीवों को नुकसान पहुँचाते हैं। CFC गैसों ने ओज़ोन परत पतली की।
हम क्या कर सकते हैं
कम ऊर्जा खर्च करें, सौर और पवन ऊर्जा ज़्यादा अपनाएँ, पेड़ लगाएँ और बचाएँ, उर्वरक सोच-समझकर डालें, प्लास्टिक कम करें, पानी बचाएँ, और पैदल, साइकिल या बस से चलें। बहुत लोगों के छोटे कदम मिलकर बड़ा असर करते हैं।
खुद करके देखो: घर पर समुद्री समीर बनाओ
सामान: दो एक जैसे कटोरे, एक में सूखी मिट्टी या रेत, दूसरे में पानी, धूप वाली खिड़की और थर्मामीटर (या सिर्फ़ अपना हाथ)।
- दोनों कटोरे 20 मिनट धूप में रखो। पहले अंदाज़ा लगाओ: कौन ज़्यादा गर्म होगा?
- छूकर या नापकर देखो। मिट्टी ज़्यादा गर्म है। ज़मीन जल्दी गर्म होती है।
- अब दोनों को 20 मिनट छाँव में रखो। फिर देखो। अब पानी ज़्यादा गर्म है। ज़मीन जल्दी ठंडी होती है।
- किसी बड़े की मदद से, धूप वाले कदम के तुरंत बाद दोनों कटोरों के बीच अगरबत्ती जलाओ। धुआँ गर्म मिट्टी की ओर खिसकता दिखेगा। यही छोटा-सा समुद्री समीर है।
ऊपर 3D में, कदम 3 में सूर्य की ऊँचाई स्लाइडर और कदम 4 में दिन/रात बटन से अपना अंदाज़ा जाँचो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पाँच मंडल: भूमंडल (चट्टान), जलमंडल (तरल पानी), हिममंडल (बर्फ), वायुमंडल (हवा), जीवमंडल (जीवन)
- EM स्पेक्ट्रम (लंबी → छोटी तरंगदैर्ध्य): रेडियो, माइक्रोवेव, इन्फ्रारेड, दृश्य, UV, X-किरण, गामा
- छोटी तरंगदैर्ध्य → ज़्यादा ऊर्जा; सभी EM तरंगें प्रकाश की चाल (3 × 10⁸ m/s) से चलती हैं
- पवन उच्च दाब (ठंडी हवा) से निम्न दाब (गर्म, उठती हवा) की ओर चलती है
- समुद्री समीर: दिन, समुद्र → ज़मीन। स्थलीय समीर: रात, ज़मीन → समुद्र
- प्रकाश-संश्लेषण: CO₂ + पानी + धूप → भोजन (ग्लूकोज़) + O₂। श्वसन: भोजन + O₂ → CO₂ + पानी + ऊर्जा
- नाइट्रोजन चक्र: स्थिरीकरण → नाइट्रीकरण → पौधों द्वारा लेना → जंतुओं द्वारा खाना → अपघटन (अमोनीकरण) → विनाइट्रीकरण
- एल्बिडो ≈ 30%: धूप का वह हिस्सा जो पृथ्वी वापस अंतरिक्ष में लौटा देती है
हल किए गए उदाहरण
1. हिमालय का एक हिमनद पिघलकर गंगा को भरता है। कौन-से दो मंडल आपस में जुड़ रहे हैं?
हिमनद हिममंडल (जमा पानी) का हिस्सा है। नदी जलमंडल (तरल पानी) का हिस्सा है। तो हिममंडल → जलमंडल। अगर किसान इस पानी से फ़सल सींचें, तो जीवमंडल भी जुड़ जाता है।
2. वायुमंडल के ऊपर 100 इकाई धूप पहुँचती है। लगभग 30% लौट जाती है। कितनी इकाई पृथ्वी और हवा को गर्म करती है?
लौटी = 100 का 30% = 30 इकाई। सोखी गई = 100 − 30 = 70 इकाई। ये 70 इकाई ज़मीन, समुद्र और हवा को गर्म करती हैं।
3. केरल के समुद्र तट पर दोपहर 3 बजे हवा किस ओर चलेगी, और क्यों?
दोपहर में ज़मीन समुद्र से ज़्यादा गर्म होती है। ज़मीन के ऊपर की गर्म हवा उठती है, निम्न दाब बनता है। समुद्र के ऊपर की ठंडी हवा (उच्च दाब) अंदर आती है। इसलिए हवा समुद्र से ज़मीन की ओर चलती है: समुद्री समीर।
4. टॉर्च सीधे नीचे चमकाने पर 1 m² हिस्सा रोशन होता है। तिरछा करने पर वही रोशनी 2 m² पर फैलती है। हर वर्ग मीटर की ऊर्जा कैसे बदली?
कुल ऊर्जा वही, पर क्षेत्र दोगुना। इसलिए हर m² की ऊर्जा आधी हो गई। इसी वजह से ध्रुवों पर तिरछी धूप भूमध्य रेखा की सीधी धूप से कम गर्मी देती है।
5. कोयला बिजलीघर से एक कार्बन परमाणु को अपने शरीर तक पहुँचाओ।
कोयला जलने पर कार्बन CO₂ बनकर हवा में जाता है। गेहूँ का पौधा प्रकाश-संश्लेषण में यह CO₂ लेता है और कार्बन को दाने (स्टार्च) में रखता है। तुम उस गेहूँ की रोटी खाते हो और कार्बन तुम्हारे शरीर का हिस्सा बन जाता है। साँस छोड़ने पर इसका कुछ हिस्सा फिर CO₂ बनकर हवा में लौटता है।
6. मटर उगाने वाले किसानों को अक्सर कम नाइट्रोजन उर्वरक चाहिए। नाइट्रोजन चक्र से समझाओ।
मटर की जड़ों की गाँठों में राइज़ोबियम जीवाणु रहते हैं। ये हवा की नाइट्रोजन गैस को अमोनिया/नाइट्रेट में बदल देते हैं, जिसे पौधा इस्तेमाल कर सकता है। इसलिए पौधा अपनी नाइट्रोजन खुद पा लेता है और अगली फ़सल के लिए मिट्टी भी उपजाऊ होती है।
आम गलतियाँ
- जलमंडल और हिममंडल को मिलाना: तरल पानी जलमंडल है; बर्फ और हिम हिममंडल है।
- कहना कि समुद्री समीर ज़मीन से समुद्र की ओर चलता है। समीर का नाम वहाँ से पड़ता है जहाँ से वह आता है: समुद्री समीर दिन में समुद्र से आता है।
- सोचना कि ऊर्जा भी पदार्थ की तरह चक्र में घूमती है। पदार्थ (कार्बन, पानी, नाइट्रोजन) घूमता है; ऊर्जा सूर्य से आती है और गर्मी बनकर निकल जाती है।
- मानना कि पौधे हवा से सीधे नाइट्रोजन गैस लेते हैं। ज़्यादातर पौधों को पहले जीवाणु या बिजली द्वारा बना नाइट्रेट चाहिए।