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पारितंत्र, आहार श्रृंखला और ऊर्जा प्रवाह

किसी जगह के सभी जीव और उनके आस-पास की निर्जीव चीज़ें मिलकर पारितंत्र बनाते हैं। ऊर्जा सूर्य से आती है, आहार श्रृंखला में एक ही दिशा में ऊपर जाती है, और हर अगले स्तर तक सिर्फ़ लगभग 10% पहुँचती है।

🎬 कदम-दर-कदम कहानी

  1. यह तालाब एक पारितंत्र है। पौधे, मछलियाँ और मेंढक सजीव हैं, यानी जैविक घटक। धूप, पानी, मिट्टी, हवा और पत्थर निर्जीव हैं, यानी अजैविक घटक। गिनिए, ये सब मिलकर काम करते हैं।
  2. हर जीव का एक काम है। हरे पौधे धूप से भोजन बनाते हैं, ये उत्पादक हैं। जानवर दूसरों को खाते हैं, ये उपभोक्ता हैं। कवक (मशरूम) और जीवाणु मरी चीज़ों को तोड़ते हैं, ये अपघटक हैं।
  3. अब आहार श्रृंखला बनते देखिए: घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → गरुड़। हर तीर का मतलब है 'इसे खाया जाता है'। श्रृंखला की हर सीढ़ी एक पोषी स्तर है।
  4. ऊर्जा पूरी आगे नहीं जाती। अगले स्तर तक सिर्फ़ लगभग 10% पहुँचती है, बाकी ऊष्मा बनकर खो जाती है। पिरामिड देखिए: 10,000 J → 1,000 J → 100 J → 10 J। इसीलिए श्रृंखला 3-4 स्तर पर रुक जाती है।
  5. अब लाल बिंदु देखिए: यह DDT जैसा कीटनाशक है। घास में थोड़ा है। हर जीव नीचे वाले कई जीव खाता है और यह रसायन टूटता नहीं। इसलिए सबसे ऊपर गरुड़ में सबसे ज़्यादा जमा होता है। इसे जैव आवर्धन कहते हैं।
  6. अब आपकी बारी। शुरुआती ऊर्जा का स्लाइडर खिसकाइए और नीचे हर स्तर की ऊर्जा पढ़िए। 'कीटनाशक दिखाओ' पर टिक करके देखिए ज़हर कहाँ जमा होता है। दृश्य को उँगली से घुमाइए।

टिप: 3D दृश्य को घुमाने के लिए खींचें। ज़ूम के लिए दो उंगलियाँ इस्तेमाल करें।

🤔 आम शंकाएँ और उनके जवाब

बगीचा या मछलीघर इंसान ने बनाया है, तो क्या वह सच में पारितंत्र है?

हाँ। उसमें भी सजीव (पौधे, मछली) और निर्जीव (पानी, प्रकाश, मिट्टी) घटक मिलकर काम करते हैं। इंसान इसे बनाता और सँभालता है, इसलिए इसे कृत्रिम पारितंत्र कहते हैं।

अपघटक आहार श्रृंखला में कहाँ आते हैं?

वे श्रृंखला की एक कड़ी नहीं हैं; वे हर स्तर के मृत पदार्थ पर काम करके खनिज मिट्टी में लौटाते हैं। तालाब के किनारे मशरूम देखिए, वे कतार में नहीं हैं।

आहार श्रृंखला में तीर किस ओर बनाएँ?

भोजन से खाने वाले की ओर, जिधर ऊर्जा जाती है: घास → टिड्डा। श्रृंखला को एक-एक ब्लॉक बनते देखिए।

बाकी 90% ऊर्जा कहाँ जाती है?

ज़्यादातर जीव के अपने कामों (साँस लेना, चलना, शरीर गरम रखना) में खर्च होकर ऊष्मा बन जाती है; कुछ हड्डी, बाल या बिना पचे मल में रह जाती है। पिरामिड से निकलते नारंगी ऊष्मा के गोले देखिए।

खनिजों की तरह ऊर्जा पौधों तक वापस क्यों नहीं जाती?

ऊष्मा बनकर निकली ऊर्जा चारों ओर फैल जाती है, और पौधे ऊष्मा से भोजन नहीं बना सकते, उन्हें सूर्य का प्रकाश चाहिए। इसलिए पिरामिड ऊपर से कभी नहीं भरता।

ऊपर जाने पर ऊर्जा घटती है, तो DDT क्यों बढ़ता है?

ऊर्जा खर्च होकर खो जाती है, पर DDT न टूटता है न बाहर निकलता है। हर जीव कई बार के भोजन से DDT इकट्ठा करता है, इसलिए यह जमा होता जाता है। हर ब्लॉक पर लाल बिंदु गिनिए।

पारितंत्र क्या है?

पारितंत्र (Ecosystem) प्रकृति की वह इकाई है जहाँ जीव आपस में और अपने आस-पास की निर्जीव चीज़ों के साथ लगातार लेन-देन करते हैं। जंगल, तालाब, झील, घास का मैदान और रेगिस्तान प्राकृतिक पारितंत्र हैं। बगीचा, खेत और मछलीघर कृत्रिम (मानव-निर्मित) पारितंत्र हैं, क्योंकि इन्हें इंसान बनाता और सँभालता है।

जैविक और अजैविक घटक

जैविक घटक सजीव हिस्से हैं: पौधे, जंतु, कवक और जीवाणु। अजैविक घटक निर्जीव हिस्से हैं: धूप, तापमान, पानी, हवा, मिट्टी और खनिज। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। धूप हटा दें तो पौधे मर जाएँगे, पौधे हटा दें तो जानवर भूखे रहेंगे।

उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक

उत्पादक हरे पौधे और कुछ जीवाणु (जैसे नील-हरित शैवाल) हैं, जो प्रकाश संश्लेषण से भोजन बनाते हैं। इन्हें स्वपोषी कहते हैं।

उपभोक्ता खुद भोजन नहीं बना सकते, इसलिए दूसरों को खाते हैं। ये शाकाहारी (पौधे खाने वाले, जैसे बकरी), मांसाहारी (जानवर खाने वाले, जैसे शेर), सर्वाहारी (दोनों खाने वाले, जैसे कौआ, मनुष्य) और परजीवी (जैसे जूँ) होते हैं।

अपघटक जीवाणु और कवक हैं जो मरे पौधों-जानवरों को सरल पदार्थों में तोड़ देते हैं। इससे खनिज फिर मिट्टी में लौट आते हैं और पौधे उन्हें दोबारा ले पाते हैं। अपघटक न हों तो मरी चीज़ों के ढेर लग जाएँ और मिट्टी के पोषक खत्म हो जाएँ।

आहार श्रृंखला, आहार जाल और पोषी स्तर

आहार श्रृंखला जीवों की ऐसी कड़ी है जिसमें हर जीव अपने से पहले वाले को खाता है। उदाहरण: घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → गरुड़। पानी में: शैवाल → छोटी मछली → बड़ी मछली → बगुला।

श्रृंखला की हर सीढ़ी एक पोषी स्तर है: पहला स्तर उत्पादक, दूसरा प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी), तीसरा द्वितीयक उपभोक्ता, चौथा तृतीयक उपभोक्ता।

असल में ज़्यादातर जानवर एक से ज़्यादा चीज़ें खाते हैं और कई दुश्मनों का भोजन बनते हैं। इसलिए कई श्रृंखलाएँ जुड़कर एक जाल बनाती हैं, जिसे आहार जाल कहते हैं। आहार जाल पारितंत्र को ज़्यादा स्थिर बनाता है: एक भोजन कम हो तो जानवर दूसरा खा लेता है।

ऊर्जा प्रवाह और 10 प्रतिशत नियम

हरे पौधे अपनी पत्तियों पर पड़ने वाली धूप का सिर्फ़ लगभग 1% ही पकड़ पाते हैं। जब शाकाहारी जीव पौधा खाता है, तो उसे पौधे में जमा ऊर्जा का लगभग 10% ही मिलता है। बाकी पौधे के अपने कामों में खर्च होती है, ऊष्मा बनकर निकल जाती है या उन हिस्सों में रह जाती है जो खाए या पचाए नहीं जाते। यही 10 प्रतिशत नियम है (लिंडमैन ने दिया)।

ऊर्जा प्रवाह एकदिशीय क्यों है?

ऊर्जा सूर्य → उत्पादक → शाकाहारी → मांसाहारी की ओर जाती है और कभी वापस नहीं लौटती। ऊष्मा बनकर खोई ऊर्जा को पौधे दोबारा इस्तेमाल नहीं कर सकते। इसलिए ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय है। पर खनिज अपघटकों की मदद से बार-बार चक्कर लगाते रहते हैं।

आहार श्रृंखला में 3-4 स्तर ही क्यों?

हर स्तर पर ऊर्जा दसवाँ हिस्सा रह जाती है। चौथे-पाँचवें स्तर तक इतनी कम ऊर्जा बचती है कि वह किसी और जीव-समूह को नहीं पाल सकती। इसीलिए ऊपर के मांसाहारी गिनती में कम होते हैं, और शाकाहारी भोजन (दूसरे स्तर पर खाना) सूर्य की ऊर्जा कम बर्बाद करता है।

जैव आवर्धन (Biological magnification)

फ़सलों पर DDT जैसे कीटनाशक छिड़के जाते हैं। इनका कुछ हिस्सा मिट्टी और पानी में जाकर पौधों में पहुँच जाता है। ये रसायन न टूटते हैं, न शरीर से बाहर निकलते हैं; ये चर्बी में जमा हो जाते हैं। जो जानवर बहुत सारे पौधे खाता है, उसमें सबका रसायन इकट्ठा हो जाता है। अगला जीव ऐसे कई जानवर खाता है, और यह सिलसिला चलता रहता है।

इस तरह हर पोषी स्तर पर प्रति किलो शरीर में रसायन की मात्रा बढ़ती जाती है। इसे जैव आवर्धन कहते हैं। सबसे ऊपर के उपभोक्ता, यानी हम मनुष्य भी, सबसे ज़्यादा मात्रा पाते हैं। इसीलिए अनाज, सब्ज़ी, मछली, यहाँ तक कि दूध में भी कीटनाशक के अंश मिल सकते हैं।

मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ

हल किए गए उदाहरण

1. तालाब के दो जैविक और दो अजैविक घटक बताइए।

जैविक: जलीय पौधे (हाइड्रिला, शैवाल), मछली, मेंढक, जीवाणु। अजैविक: पानी, धूप, घुली हुई ऑक्सीजन, तली की मिट्टी, तापमान।

2. एक आहार श्रृंखला में उत्पादकों के पास 20,000 J ऊर्जा है। द्वितीयक उपभोक्ता तक कितनी ऊर्जा पहुँचेगी?

उत्पादक → प्राथमिक उपभोक्ता: 20,000 का 10% = 2,000 J। प्राथमिक → द्वितीयक: 2,000 का 10% = 200 J। उत्तर: 200 J।

3. एक बाज़ (चौथा पोषी स्तर) को 5 J ऊर्जा मिलती है। उसकी श्रृंखला के उत्पादकों में कितनी ऊर्जा थी?

एक स्तर नीचे जाने पर 10 से गुणा। तीसरा स्तर: 50 J, दूसरा: 500 J, पहला: 5,000 J। उत्पादकों में 5,000 J थी।

4. घास → हिरण → बाघ में घास के पास 1,00,000 kJ है। बाघ को कितनी ऊर्जा मिलेगी और यह घास की ऊर्जा का कौन-सा भाग है?

हिरण: 1,00,000 × 0.1 = 10,000 kJ। बाघ: 10,000 × 0.1 = 1,000 kJ। भाग = 1,000 / 1,00,000 = 1/100 = 1%।

5. DDT से दूषित झील की मछली खाने वाले इंसान में मछली से ज़्यादा DDT क्यों होगा?

DDT टूटता नहीं और चर्बी में जमा रहता है। इंसान समय के साथ बहुत सारी मछलियाँ खाता है, तो सबका DDT उसमें इकट्ठा होता है। ऊँचे पोषी स्तर पर होने से उसमें सांद्रता सबसे ज़्यादा होती है: यही जैव आवर्धन है।

6. आहार जाल एक अकेली आहार श्रृंखला से ज़्यादा स्थिर क्यों है?

जाल में हर जीव के पास भोजन के कई विकल्प होते हैं। एक शिकार कम हो जाए तो शिकारी दूसरा खा लेता है, इसलिए पारितंत्र बिखरता नहीं।

आम गलतियाँ

अभ्यास क्विज़

1. इनमें से अजैविक घटक कौन-सा है?
2. मछलीघर (एक्वेरियम) है:
3. उत्पादकों के पास 5,000 J हो तो प्राथमिक उपभोक्ताओं को लगभग मिलेगी:
4. घास → कीट → मेंढक → साँप में DDT की सांद्रता सबसे ज़्यादा किसमें होगी?
5. पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह होता है:

अभ्यास: खुद जवाब दो

अपना जवाब लिखो या चुनो, फिर जाँचें दबाओ। अटको तो संकेत देखो; जवाब देने के बाद पूरा हल दिखेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

10 प्रतिशत नियम आसान शब्दों में क्या है?

जब एक जीव दूसरे को खाता है, तो उसे भोजन में जमा ऊर्जा का सिर्फ़ दसवाँ हिस्सा मिलता है। बाकी 90% खर्च हो जाती है या ऊष्मा बनकर निकल जाती है।

आहार श्रृंखला में आमतौर पर 3 या 4 स्तर ही क्यों होते हैं?

क्योंकि हर स्तर पर ऊर्जा दसवाँ हिस्सा रह जाती है। 4 स्तर के बाद इतनी कम ऊर्जा बचती है कि और जीवों का पेट नहीं भर सकती।

क्या यह CBSE कक्षा 10 की परीक्षा में आता है?

हाँ। यह 'प्राकृतिक संसाधन' इकाई के अध्याय 'हमारा पर्यावरण' का हिस्सा है। आहार श्रृंखला, 10% नियम के प्रश्न और जैव आवर्धन पर 2-3 अंक के प्रश्न अक्सर आते हैं।

यह कहाँ पढ़ाया जाता है

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