वायुमंडलीय दाब
वायुदाब किसी जगह के ऊपर की हवा के स्तंभ का वज़न है। इसे बैरोमीटर से मिलीबार (mb) या हेक्टोपास्कल में मापते हैं। समुद्र तल पर औसत दाब लगभग 1013.2 mb है।
- ऊर्ध्वाधर बदलाव: ऊँचाई के साथ दाब तेज़ी से घटता है, ज़मीन के पास लगभग हर 10 m पर 1 mb।
- क्षैतिज बदलाव: जगहों के बीच छोटा अंतर ही पवन चलाता है। बराबर दाब वाली जगहों को मिलाने वाली रेखाएँ समदाब रेखाएँ हैं। पास-पास समदाब रेखाएँ = तेज़ दाब प्रवणता = तेज़ पवन।
गरम हवा फैलकर ऊपर उठती है → निम्न दाब। ठंडी हवा नीचे बैठती है → उच्च दाब।
पवन की गति और दिशा पर बल
- दाब प्रवणता बल: हवा को उच्च से निम्न दाब की ओर धकेलता है। अंतर ज़्यादा = पवन तेज़।
- कोरिऑलिस बल: पृथ्वी के घूमने से। यह पवन को उत्तरी गोलार्ध में दाएँ और दक्षिणी में बाएँ मोड़ता है। विषुवत पर शून्य, ध्रुवों पर सबसे ज़्यादा। इसीलिए ठीक विषुवत पर चक्रवात नहीं बनते।
- घर्षण: सबसे नीचे 1–3 km में ज़मीन पवन को धीमा करती है। समुद्र पर घर्षण कम।
ऊपर जहाँ घर्षण नहीं, वहाँ दाब बल और कोरिऑलिस बराबर होकर पवन समदाब रेखाओं के समानांतर चलती है: भूविक्षेपी पवन। निम्न दाब के चारों ओर पवन अंदर घूमती है (उत्तर में घड़ी की उलटी दिशा): चक्रवाती परिसंचरण। उच्च दाब के चारों ओर बाहर घूमती है (उत्तर में घड़ी की दिशा): प्रतिचक्रवाती।
विश्व की दाब पेटियाँ और भूमंडलीय पवनें
- विषुवतीय निम्न दाब (0°–10°): तेज़ गर्मी, हवा ऊपर उठती; शांत क्षेत्र डोलड्रम (ITCZ)।
- उपोष्ण उच्च दाब (~30° उ./द.): हवा नीचे बैठती; शांत, सूखा; अश्व अक्षांश।
- उपध्रुवीय निम्न दाब (~60° उ./द.)।
- ध्रुवीय उच्च दाब: बहुत ठंडी, भारी हवा।
सामान्य परिसंचरण (तीन कोष्ठ)
विषुवत पर उठी हवा ऊपर-ऊपर ध्रुव की ओर जाती है, 30° पर नीचे बैठती है और ज़मीन के पास विषुवत लौटती है: हैडले कोष्ठ। 30° और 60° के बीच फेरल कोष्ठ, ध्रुवों के पास ध्रुवीय कोष्ठ।
भूमंडलीय (स्थायी) पवनें
- व्यापारिक पवनें: उपोष्ण उच्च से विषुवत की ओर; उत्तर में उत्तर-पूर्वी, दक्षिण में दक्षिण-पूर्वी।
- पछुआ पवनें: उपोष्ण उच्च से उपध्रुवीय निम्न की ओर; दक्षिण में बहुत तेज़ (गरजता चालीसा)।
- ध्रुवीय पूर्वी पवनें: ध्रुवीय उच्च से उपध्रुवीय निम्न की ओर।
समुद्र और वायुमंडल साथ काम करते हैं: कुछ वर्षों में मध्य प्रशांत असामान्य रूप से गरम होता है (एल नीनो), जिससे पवनें बदलती हैं और अक्सर भारत का मानसून कमज़ोर होता है।
मौसमी और स्थानीय पवनें
मौसमी पवनें ऋतु के साथ दिशा बदलती हैं क्योंकि पेटियाँ और ITCZ सूर्य के साथ उत्तर-दक्षिण खिसकती हैं। दक्षिण एशिया का मानसून सबसे अच्छा उदाहरण है: गर्मी में समुद्र से स्थल की ओर (नम दक्षिण-पश्चिम मानसून), सर्दी में स्थल से समुद्र की ओर (सूखा उत्तर-पूर्वी मानसून)।
स्थानीय पवनें
- स्थल और समुद्र समीर: दिन में स्थल जल्दी गरम → स्थल पर निम्न दाब → ठंडी समुद्र समीर अंदर आती है। रात में स्थल जल्दी ठंडा → स्थल समीर समुद्र की ओर।
- पर्वत और घाटी समीर: दिन में गरम हवा ढलानों पर चढ़ती है (घाटी समीर); रात में ठंडी हवा घाटी में उतरती है (पर्वत समीर / अवरोही पवन)।
- अन्य: उत्तर भारत की गरम-सूखी लू; पहाड़ों से उतरकर बर्फ़ पिघलाने वाली गरम-सूखी पवनें (जैसे चिनूक, फ़ॉन)।
वायुराशियाँ और वाताग्र
वायुराशि हवा का बहुत बड़ा भाग है जिसमें तापमान और नमी लगभग एक जैसी हो। ये गुण उसे अपने उद्गम क्षेत्र (बड़ा गरम महासागर, ठंडा महाद्वीप) से मिलते हैं। प्रकार: उष्ण कटिबंधीय महासागरीय (गरम, नम), उष्ण कटिबंधीय महाद्वीपीय (गरम, सूखी), ध्रुवीय महासागरीय (ठंडी, नम), ध्रुवीय महाद्वीपीय (ठंडी, सूखी), आर्कटिक महाद्वीपीय।
वाताग्र वह सीमा है जहाँ दो अलग वायुराशियाँ मिलती हैं (वाताग्र-जनन)। प्रकार:
- शीत वाताग्र: ठंडी हवा गरम हवा के नीचे घुसकर उसे तेज़ी से ऊपर उठाती है → ऊँचे बादल, अचानक भारी बारिश, गरज।
- उष्ण वाताग्र: गरम हवा धीरे-धीरे ठंडी हवा पर चढ़ती है → परतदार बादल, लंबी हल्की बारिश।
- अचर वाताग्र: कोई भी पक्ष नहीं खिसकता।
- अधिविष्ट वाताग्र: तेज़ शीत वाताग्र उष्ण वाताग्र को पकड़कर गरम हवा को ज़मीन से ऊपर उठा देता है।
वाताग्र मध्य अक्षांशों में मिलते हैं और मौसम में अचानक बदलाव लाते हैं।
चक्रवात: शीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय
चक्रवात निम्न दाब का तंत्र है जिसमें पवन अंदर की ओर घूमती है (उत्तर में घड़ी की उलटी दिशा, दक्षिण में घड़ी की दिशा)।
शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात
मध्य अक्षांशों में ध्रुवीय वाताग्र पर बनते हैं जहाँ गरम और ठंडी वायुराशियाँ मिलती हैं। बड़े, शीत और उष्ण वाताग्र वाले; पश्चिम से पूर्व चलते हैं। भारत में उत्तर-पश्चिम को सर्दी की बारिश देने वाले पश्चिमी विक्षोभ ऐसे ही तंत्रों से आते हैं।
उष्णकटिबंधीय चक्रवात
गरम उष्णकटिबंधीय समुद्रों पर बने प्रचंड तूफ़ान। दशाएँ: लगभग 27 °C से गरम बड़ी समुद्री सतह, कोरिऑलिस बल (इसलिए विषुवत पर नहीं), ऊँचाई के साथ पवन में कम बदलाव, और पहले से कमज़ोर निम्न दाब। गरम नम हवा उठती है, संघनित होकर गुप्त ऊष्मा छोड़ती है — यही तूफ़ान का ईंधन है। शांत केंद्र अक्षु (आँख) है, जिसके चारों ओर सबसे तेज़ पवन और बारिश वाली अक्षु भित्ति। तट पर पहुँचकर तेज़ पवन, भारी बारिश और तूफ़ानी महोर्मि (समुद्री पानी स्थल पर चढ़ना) लाते हैं; स्थल पर नमी न मिलने से कमज़ोर हो जाते हैं। नाम: चक्रवात (हिंद महासागर), हरिकेन (अटलांटिक), टाइफ़ून (पश्चिमी प्रशांत), विली-विलीज़ (उत्तर-पश्चिम ऑस्ट्रेलिया)।
तड़ितझंझा और टॉरनेडो
तड़ितझंझा तब बनता है जब गर्म दिनों में गरम, नम हवा तेज़ी से ऊपर उठती है (तेज़ संवहन)। ऊँचा कपासी-वर्षी (क्यूम्यूलोनिम्बस) बादल बनता है, जिससे बिजली, गरज, भारी बारिश और कभी ओले। यह थोड़ी देर और छोटे क्षेत्र का होता है। पश्चिम बंगाल की काल बैसाखी इसका उदाहरण है।
टॉरनेडो हवा का पतला, बहुत तेज़ घूमता स्तंभ है जो तड़ितझंझा के बादल से लटककर ज़मीन छूता है। बहुत छोटा, पर धरती की सबसे तेज़ पवनें; रास्ते में सब तोड़ देता है। समुद्र पर इसे जल स्तंभ कहते हैं। मध्य अक्षांशों, खासकर मध्य USA में आम है।
घर पर करके देखें
कागज़ की सर्पिल काटकर धागे से लैंप या गरम चाय के कप के ऊपर लटकाइए (आग से दूर)। ऊपर उठती गरम हवा इसे घुमाती है — यही संवहन है, हर निम्न दाब की शुरुआत। समुद्र तट पर देखिए: दोपहर में हवा समुद्र से आती है और देर रात स्थल से।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समुद्र तल दाब ≈ 1013.2 mb; हर 10 m ऊँचाई पर ~1 mb कम
- पवन: उच्च → निम्न दाब; पास-पास समदाब रेखाएँ = तेज़ पवन
- कोरिऑलिस: उत्तरी गोलार्ध में दाएँ, दक्षिणी में बाएँ; विषुवत पर शून्य
- पेटियाँ: निम्न (0°) – उच्च (30°) – निम्न (60°) – उच्च (90°)
- पवनें: व्यापारिक (30°→0°), पछुआ (30°→60°), ध्रुवीय पूर्वी (90°→60°)
- उष्णकटिबंधीय चक्रवात: समुद्र > ~27 °C + कोरिऑलिस + कम पवन अपरूपण
- चक्रवात: केंद्र में निम्न, पवन अंदर; प्रतिचक्रवात: केंद्र में उच्च, पवन बाहर
हल किए गए उदाहरण
1. समुद्र तल पर दाब 1013 mb है। 100 m ऊँचाई पर लगभग कितना?
हर 10 m पर ~1 mb → 10 mb कम। लगभग 1003 mb।
2. चेन्नई के समुद्र तट पर दोपहर को समुद्र समीर क्यों चलती है?
दिन में स्थल समुद्र से जल्दी गरम होता है। स्थल पर हवा उठती है, निम्न दाब बनता है। समुद्र की ठंडी, उच्च दाब वाली हवा उसे भरने आती है।
3. उत्तरी गोलार्ध में पवन उपोष्ण उच्च से दक्षिण की ओर विषुवत जाती है। वह किधर मुड़ेगी और क्या कहलाएगी?
कोरिऑलिस उसे दाएँ मोड़ता है, तो वह उत्तर-पूर्व से आती है: उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवन।
4. 5° उ. और 5° द. के बीच उष्णकटिबंधीय चक्रवात क्यों नहीं बनते?
विषुवत के पास कोरिऑलिस बल लगभग शून्य है, इसलिए हवा निम्न दाब के चारों ओर घूम नहीं पाती।
5. चक्रवात ओडिशा तट से टकराकर 200 km अंदर जाता है। उसका क्या होगा और क्यों?
वह जल्दी कमज़ोर होगा। स्थल पर गरम नम हवा (ईंधन) नहीं मिलती और घर्षण पवन को धीमा करता है।
आम गलतियाँ
- सोचना कि पवन निम्न से उच्च दाब की ओर चलती है। हमेशा उच्च → निम्न।
- कहना कि भारत में कोरिऑलिस बाएँ मोड़ता है। भारत उत्तरी गोलार्ध में है, इसलिए दाएँ।
- दोनों चक्रवातों को मिलाना: उष्णकटिबंधीय को गरम समुद्र चाहिए; शीतोष्ण वाताग्रों पर बनते हैं।
- टॉरनेडो और चक्रवात को एक आकार का समझना। टॉरनेडो कुछ सौ मीटर चौड़ा, चक्रवात सैकड़ों km।