South 고등학교 2학년 Climate Change and Environmental Ecology
अध्याय: 3
1. Climate and the climate system
Weather versus climate · Feedbacks in the climate system · Effects on ecosystems and life
- विश्व के जलवायु प्रदेश – किसी जगह के लगभग 30 साल के मौसम का औसत उसकी जलवायु है। यह मुख्य रूप से अक्षांश (सूरज कितना ऊँचा चढ़ता है), ऊँचाई (हर 1 km पर लगभग 6.5 °C ठंडा), समुद्र से दूरी, पवनों और महासागरीय धाराओं पर निर्भर करती है। कोपेन ने दुनिया को पाँच समूहों में बाँटा: A उष्णकटिबंधीय, B शुष्क, C शीतोष्ण, D महाद्वीपीय और E ध्रुवीय, साथ में ऊँचे पहाड़ों पर पर्वतीय (H) जलवायु। मानसून जलवायु में पवनें मौसम के साथ दिशा बदलती हैं।
- जलवायु परिवर्तन और हरितगृह प्रभाव – जलवायु किसी जगह का लगभग 30 साल का औसत मौसम है। कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी हरितगृह गैसें पृथ्वी से निकलने वाली कुछ ऊष्मा रोक लेती हैं। मनुष्यों ने ईंधन जलाकर और जंगल काटकर ये गैसें बहुत बढ़ा दी हैं, इसलिए पृथ्वी गर्म हो रही है। इससे बर्फ़ पिघलती है, समुद्र तल बढ़ता है और मौसम उग्र होता है। हम गैसें घटा सकते हैं (शमन) और बदलाव के लिए तैयार हो सकते हैं (अनुकूलन)।
2. Climate crisis and ecological change
Main causes of the climate crisis · Sea-level rise · Extreme weather · Future scenarios · Changing flowering times · Insect declines and pollinators · Algal blooms · Vector-borne diseases
- जलवायु परिवर्तन और हरितगृह प्रभाव – जलवायु किसी जगह का लगभग 30 साल का औसत मौसम है। कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी हरितगृह गैसें पृथ्वी से निकलने वाली कुछ ऊष्मा रोक लेती हैं। मनुष्यों ने ईंधन जलाकर और जंगल काटकर ये गैसें बहुत बढ़ा दी हैं, इसलिए पृथ्वी गर्म हो रही है। इससे बर्फ़ पिघलती है, समुद्र तल बढ़ता है और मौसम उग्र होता है। हम गैसें घटा सकते हैं (शमन) और बदलाव के लिए तैयार हो सकते हैं (अनुकूलन)।
- चरम मौसम – चरम मौसम वह है जो सामान्य से बहुत अलग हो: लू, शीत लहर, भारी बारिश और बाढ़, सूखा, चक्रवात, आँधी-तूफ़ान, ओले, भारी बर्फ़बारी और धूल भरी आँधी। गर्म होती दुनिया मौसम के पूरे ढेर को खिसका देती है, इसलिए बहुत गरम दिन और भारी बारिश ज़्यादा होने लगती हैं।
- जलवायु मॉडल और भविष्य के परिदृश्य – जलवायु मॉडल एक कंप्यूटर प्रोग्राम है जो पृथ्वी को डिब्बों की जाली में काटकर हवा, समुद्र, बर्फ़ और ज़मीन के भौतिकी नियमों को समय के साथ दोहराता है। वैज्ञानिक उसे अलग-अलग "अगर ऐसा हुआ तो" उत्सर्जन कहानियों, यानी परिदृश्यों, के साथ चलाते हैं ताकि संभावित भविष्य दिखें। मॉडल को अतीत पर परखा जाता है, और अलग-अलग रनों का फैलाव अनिश्चितता बताता है।
- जैव विविधता और पारितंत्र पर मानव गतिविधियों का प्रभाव – जैव विविधता यानी धरती पर या एक पारितंत्र में अलग-अलग प्रजातियों की विविधता। ज़्यादा जैव विविधता पारितंत्र को स्थिर बनाती है, क्योंकि जीव भोजन, आश्रय और स्थिर पर्यावरण के लिए एक-दूसरे पर निर्भर हैं, और हमें भोजन, दवाएँ, साफ़ हवा-पानी देती है। बढ़ती आबादी ज़्यादा संसाधन लेती है और ज़्यादा कचरा बनाती है। पानी, ज़मीन और हवा का प्रदूषण, निर्माण-खेती-खदान-कचरा स्थल के लिए ज़मीन, पीट खुदाई, वनों की कटाई और वैश्विक तापन जैव विविधता घटाते हैं। प्रजनन कार्यक्रम, आवास की बहाली, खेतों की बाड़ और किनारे, कम कटाई व कम CO₂, और रीसाइक्लिंग से इसे बचा सकते हैं।
- संक्रामक रोग: रोगाणु कैसे फैलते हैं और हम उन्हें कैसे रोकें – संक्रामक (संचारी) रोग एक बहुत छोटे जीव से होता है, जिसे रोगाणु (pathogen) कहते हैं: बैक्टीरिया, वायरस, कवक या प्रोटिस्ट। यह हवा, पानी-खाना, छूने या मच्छर जैसे वाहक से एक व्यक्ति से दूसरे में जाता है। शरीर त्वचा, बलगम, पेट के अम्ल और श्वेत रक्त कोशिकाओं से लड़ता है। टीका प्रतिरक्षा तंत्र को पहले से तैयार कर देता है। हाथ धोना, साफ पानी, अच्छी तरह पका खाना, मच्छरदानी और बीमार होने पर घर रहना फैलाव कम करते हैं।
3. Responding to the climate crisis
Coral bleaching · Desertification · Carbon neutrality · Individual and community action
- मरुस्थलीकरण (Desertification) – मरुस्थलीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें सूखे इलाकों की अच्छी ज़मीन धीरे-धीरे अपने पौधे और मिट्टी खो देती है और मरुस्थल जैसी हो जाती है। इसके कारण इंसानी (अतिचारण, पेड़ काटना, ज़्यादा खेती, गलत सिंचाई) और प्राकृतिक (सूखा, बढ़ती गर्मी) दोनों हैं। इसका मतलब मरुस्थल का "खिसकना" नहीं है। इससे भूख, धूल भरी आँधियाँ और पलायन होता है। पेड़-घास लगाकर, कम पशु चराकर, पानी बचाकर और भूसे की जालियों से रेत रोककर इसे धीमा किया जा सकता है।
- संधारणीयता (Sustainability) – संधारणीयता यानी आज अपनी ज़रूरतें ऐसे पूरी करना कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें। यह तीन स्तंभों पर टिकी है — पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था। कोई संसाधन तभी टिकाऊ ढंग से इस्तेमाल होता है जब हम उसे उसके नवीकरण से तेज़ न लें। आज मानवता हर साल लगभग 1.7 पृथ्वी जितना इस्तेमाल करती है, और यह इस्तेमाल बहुत असमान है। देखभाल (stewardship), समझदार योजना और GIS जैसे औज़ार हमें संधारणीयता की ओर ले जाते हैं।