विदेशी विनिमय दर क्या है?
विदेशी विनिमय दर एक मुद्रा की दूसरी मुद्रा में कीमत है। जैसे $1 = ₹80। जहाँ मुद्राएँ ख़रीदी-बेची जाती हैं उसे विदेशी विनिमय बाज़ार कहते हैं।
- मूल्यह्रास: बाज़ार में रुपये का मूल्य घटना (₹80 → ₹85 प्रति $)।
- मूल्यवृद्धि: बाज़ार में रुपये का मूल्य बढ़ना (₹80 → ₹75 प्रति $)।
स्थिर, लचीली और प्रबंधित तिरती विनिमय दर
1. स्थिर विनिमय दर
सरकार या केंद्रीय बैंक दर तय करता है। पुराने स्वर्ण मान में हर मुद्रा सोने से बँधी थी। बाद में कई मुद्राएँ अमेरिकी डॉलर से बँधीं। केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा ख़रीद-बेचकर दर बनाए रखता है। सरकार जान-बूझकर विदेशी मुद्रा की कीमत बढ़ाए तो अवमूल्यन, घटाए तो पुनर्मूल्यन।
2. लचीली (तिरती) विनिमय दर
दर बाज़ार में माँग और पूर्ति से तय होती है, सरकार दख़ल नहीं देती। बदलाव को मूल्यह्रास और मूल्यवृद्धि कहते हैं।
3. प्रबंधित तिरती दर
दोनों का मेल। बाज़ार दर तय करता है, पर केंद्रीय बैंक तेज़ उतार-चढ़ाव रोकने को विदेशी मुद्रा ख़रीदता-बेचता है। भारत 1990 के दशक से यही अपनाता है।
घर पर करके देखें
पाँच दिन अख़बार में ₹ प्रति $ दर लिखिए। रुपये की मूल्यवृद्धि हुई या मूल्यह्रास?
खुले बाज़ार में दर का निर्धारण
विदेशी मुद्रा की माँग (हमें डॉलर क्यों चाहिए)
- वस्तुएँ और सेवाएँ आयात करने।
- विदेश में यात्रा, पढ़ाई, इलाज।
- विदेश में निवेश या संपत्ति ख़रीदने।
- विदेशी कर्ज़ चुकाने या उपहार भेजने।
माँग वक्र नीचे की ओर ढलता है: डॉलर महँगा हो तो आयात रुपयों में महँगा, इसलिए कम डॉलर माँगे जाते हैं।
विदेशी मुद्रा की पूर्ति (डॉलर कहाँ से आते हैं)
- हमारा वस्तु और सेवा निर्यात।
- भारत आए विदेशी पर्यटक।
- भारत में विदेशी निवेश (FDI, FPI)।
- विदेश में काम करने वाले भारतीयों का प्रेषण।
पूर्ति वक्र ऊपर की ओर जाता है: डॉलर महँगा हो तो हमारा माल विदेश में सस्ता, निर्यात बढ़ता, ज़्यादा डॉलर आते हैं।
संतुलन
जहाँ डॉलर की माँग = पूर्ति, वही संतुलन दर। माँग बढ़े तो दर बढ़े (मूल्यह्रास)। पूर्ति बढ़े तो दर घटे (मूल्यवृद्धि)।
गुण और दोष
| स्थिर दर | लचीली दर | |
|---|---|---|
| गुण | स्थिरता और निश्चितता; व्यापार और लंबे सौदों के लिए अच्छा; सट्टेबाज़ी रुकती है | बड़े भंडार की ज़रूरत नहीं; भुगतान संतुलन अपने आप ठीक; पूँजी का मुक्त प्रवाह |
| दोष | बड़े भंडार चाहिए; मुद्रा का मूल्य ज़्यादा या कम आँका जा सकता है; भुगतान संतुलन की समस्या जमा होती है | अनिश्चितता; व्यापारियों के लिए जोखिम; सट्टे से भारी उतार-चढ़ाव |
प्रबंधित तिरती दर दोनों के अच्छे पहलू रखने की कोशिश है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- विनिमय दर = एक विदेशी मुद्रा इकाई के लिए चाहिए रुपये (₹ प्रति $)
- दर ↑ (₹80 → ₹85) = रुपये का मूल्यह्रास; दर ↓ = मूल्यवृद्धि
- स्थिर प्रणाली: सरकार दर बढ़ाए = अवमूल्यन; घटाए = पुनर्मूल्यन
- संतुलन दर: विदेशी मुद्रा की माँग = पूर्ति
- % मूल्यह्रास = (नई दर − पुरानी दर) ÷ पुरानी दर × 100
हल किए गए उदाहरण
1. $1 = ₹80। $250 के लिए कितने रुपये?
250 × 80 = ₹20,000।
2. दर ₹80 से ₹84 प्रति $ हुई। रुपया मज़बूत हुआ या कमज़ोर? कितने %?
प्रति डॉलर ज़्यादा रुपये, तो मूल्यह्रास। (84 − 80) ÷ 80 × 100 = 5%।
3. $ की माँग Q = 200 − 2R, पूर्ति Q = 2R − 120। संतुलन दर?
4R = 320 → R = ₹80; Q = 40 मिलियन डॉलर।
4. माँग बढ़कर Q = 220 − 2R। नई दर?
220 − 2R = 2R − 120 → R = ₹85। रुपये का मूल्यह्रास।
5. मूल बाज़ार में स्थिर दर ₹75 हो तो RBI को कितनी डॉलर कमी पूरी करनी होगी?
माँग 50, पूर्ति 30, कमी 20 मिलियन डॉलर।
6. ₹1,600 की भारतीय कमीज़ ₹80 और ₹100 प्रति $ पर कितने डॉलर की?
₹80 पर $20; ₹100 पर $16। कमज़ोर रुपया निर्यात को सस्ता करता है।
आम गलतियाँ
- सोचना कि ₹ प्रति $ बढ़ना रुपये का मज़बूत होना है। असल में रुपया कमज़ोर (मूल्यह्रास) हुआ।
- बाज़ार की गिरावट को 'अवमूल्यन' कहना। अवमूल्यन सरकार का फ़ैसला है; बाज़ार का बदलाव मूल्यह्रास।
- निर्यात को विदेशी मुद्रा की माँग में रखना। निर्यात डॉलर लाता है: पूर्ति पक्ष।
- कहना कि भारत की दर पूरी तरह स्थिर या पूरी तरह मुक्त है। भारत प्रबंधित तिरती दर अपनाता है।