Netherlands VWO 4 (bovenbouw, 2e fase) Economics
अध्याय: 2
1. Economic skills, scarcity and exchange
Economic skills and strategic insight · Scarcity and choice · Exchange, specialisation and money
- अर्थशास्त्र की मूल बातें: लोग, फ़र्में और सरकार कैसे चुनते हैं – अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो देखता है कि लोग, फ़र्में और सरकारें सीमित संसाधनों से असीमित इच्छाएँ कैसे पूरी करते हैं। आवश्यकताएँ वस्तुओं और सेवाओं से पूरी होती हैं (मुफ़्त बनाम आर्थिक वस्तुएँ, उपभोक्ता बनाम पूँजीगत वस्तुएँ, निजी बनाम सार्वजनिक वस्तुएँ)। दुर्लभता के कारण हर समाज तय करता है: क्या, कैसे और किसके लिए उत्पादन हो। तीन आर्थिक इकाइयाँ हैं: परिवार (काम, उपभोग, बचत), फ़र्में (उत्पादन और बिक्री; लाभ = आय − लागत) और सरकार (नियम, कर, सार्वजनिक सेवाएँ)। अर्थशास्त्र अवलोकन, मॉडल और सांख्यिकी का उपयोग करता है; यह व्यष्टि (एक परिवार, फ़र्म, बाज़ार) और समष्टि (पूरी अर्थव्यवस्था: GDP, बेरोज़गारी, महँगाई, चक्र) में बँटा है। सामाजिक लक्ष्य: विकास, पूर्ण रोज़गार, स्थिर कीमतें, न्यायपूर्ण बँटवारा और टिकाऊपन।
- चयन की समस्या: दुर्लभता और अवसर लागत – हमारी इच्छाएँ असीमित हैं, पर पैसा, समय, ज़मीन और मज़दूर जैसे संसाधन सीमित हैं। इसे दुर्लभता कहते हैं, और यह हमें चुनने पर मजबूर करती है। जो अगला सबसे अच्छा विकल्प छोड़ा, उसका मूल्य अवसर लागत है। अर्थशास्त्री अध्ययन करते हैं कि लोग और समाज ये चुनाव कैसे करते हैं। हर समाज को तय करना होता है कि क्या, कैसे और किसके लिए उत्पादन हो। बाज़ार, नियोजित और मिश्रित अर्थव्यवस्थाएँ इनका अलग-अलग जवाब देती हैं, और कल्याणकारी राज्य सबकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करता है।
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार: तुलनात्मक लाभ, संरक्षण और विदेशी मुद्रा बाज़ार – देश उन चीज़ों में विशेषज्ञता लेकर फ़ायदा पाते हैं जिनकी अवसर लागत उनके लिए सबसे कम हो (तुलनात्मक लाभ), और अपनी लागतों के बीच की दर पर व्यापार करते हैं। टैरिफ़, कोटा और सब्सिडी घरेलू कंपनियों को बचाते हैं पर कीमत बढ़ाते हैं और निरर्थक हानि करते हैं। व्यापार गुट और WTO नियम तय करते हैं। विदेशी मुद्रा बाज़ार में किसी देश की वास्तविक ब्याज दर बढ़े तो पूँजी अंदर आती है, उसकी मुद्रा मज़बूत होती है और शुद्ध निर्यात घटता है।
2. Market
Demand and supply · Market structure · Efficiency and economic policy
- माँग, पूर्ति और बाज़ार संतुलन – माँग का नियम कहता है कि कीमत बढ़ने पर खरीदार कम चाहते हैं; पूर्ति का नियम कहता है कि विक्रेता ज़्यादा लाते हैं। बाज़ार कीमत संतुलन पर टिकती है, जहाँ माँगी गई मात्रा = पूर्ति की गई मात्रा, और माँग या पूर्ति के खिसकने से यह बदलती है। कुछ वस्तुएँ सामान्य नियम तोड़ती हैं (गिफ़ेन, वेब्लेन, घबराहट में खरीद)। संतुलन से नीचे तय अधिकतम कीमत कमी पैदा करती है। बाज़ार विफल भी हो सकता है, जैसे प्रदूषण या स्ट्रीट लाइट जैसी सार्वजनिक वस्तुओं में, तब सरकार आगे आती है।
- बाज़ार संरचना: पूर्ण प्रतियोगिता से एकाधिकार तक – बाज़ार संरचना बताती है कि कितनी फ़र्में बेचती हैं, उनका माल कितना मिलता-जुलता है, और नई फ़र्म का आना कितना आसान है। पूर्ण प्रतियोगिता: बहुत फ़र्में, एक-जैसा माल, मुक्त प्रवेश, कीमत स्वीकारक, दीर्घकाल में सामान्य लाभ। एकाधिकारी प्रतियोगिता: बहुत फ़र्में, विभेदित माल, आसान प्रवेश, थोड़ी कीमत शक्ति। अल्पाधिकार: कुछ परस्पर निर्भर फ़र्में, ऊँची बाधाएँ, रणनीति (खेल सिद्धांत, गठजोड़, कीमत नेतृत्व)। एकाधिकार: एक फ़र्म, कोई निकट विकल्प नहीं, ऊँची बाधाएँ, कीमत निर्धारक, असामान्य लाभ और कीमत विभेद संभव। प्रतिस्पर्धा-योग्य बाज़ार दिखाते हैं कि नए आने का डर भी ताक़त को सीमित करता है।
- बाज़ार विफलता (Market Failure) – जब खुला बाज़ार अपने-आप समाज के लिए सबसे अच्छा नतीजा नहीं देता, तो उसे बाज़ार विफलता कहते हैं। कुछ चीज़ें ज़रूरत से ज़्यादा बनती हैं (प्रदूषण, सिगरेट) और कुछ कम (स्ट्रीट लाइट, टीके, शिक्षा)। मुख्य कारण: बाहरी प्रभाव, सार्वजनिक वस्तुएँ, मेरिट और डिमेरिट वस्तुएँ, अधूरी जानकारी, बाज़ार शक्ति और असमानता। सरकार कर, सब्सिडी, नियम, सीधी सेवा और जानकारी से इसे सुधारती है, पर सरकार भी चूक सकती है।