Ukraine 11 клас Economics (profile level)
अध्याय: 3
1. Enterprise and entrepreneurship
Entrepreneurship and the firm (8 h) · Organisation and performance indicators (8 h) · Financial activity of the enterprise (8 h) · Management of the enterprise (8 h)
- उद्यमिता विकास – उद्यमिता का अर्थ है ज़रूरत पहचानकर, संसाधन जोड़कर और जोखिम उठाकर नया व्यवसाय शुरू करना। भारत को रोज़गार, नए विचारों और संतुलित विकास के लिए उद्यमी चाहिए। प्रक्रिया खुद को जानने से शुरू होकर व्यवसाय शुरू करने और बढ़ाने तक जाती है। स्टार्टअप इंडिया (2016) नई फ़र्मों की मदद करता है; पैसा बचत, एंजेल, वेंचर कैपिटल, बैंक और क्राउडफ़ंडिंग से आता है; और बौद्धिक संपदा अधिकार नए विचारों, ब्रांड और रचनाओं की रक्षा करते हैं।
- लागत और आगम: TC, AC, MC और TR, AR, MR – लागत वह खर्च है जो फ़र्म आगतों पर करती है। कुल लागत (TC) = कुल स्थिर लागत (TFC) + कुल परिवर्ती लागत (TVC)। उत्पादन से भाग देने पर AFC, AVC और AC मिलते हैं; सीमांत लागत (MC) एक और इकाई की अतिरिक्त लागत है। AFC लगातार घटती है; AVC, AC और MC U-आकार की हैं, और MC, AVC व AC को उनके न्यूनतम पर काटती है। आगम = बिक्री से मिला पैसा: TR = P × q, AR = TR/q = कीमत, MR = एक और इकाई से TR में वृद्धि। कीमत स्थिर हो तो AR = MR; कीमत घटे तो MR, AR से नीचे और MR = 0 पर TR अधिकतम।
- वित्तीय प्रबंध: धन समझदारी से जुटाना और लगाना – वित्तीय प्रबंध का अर्थ है कम लागत पर धन जुटाना और उसे सबसे अच्छे ढंग से लगाना। इसका मुख्य उद्देश्य अंशधारकों की संपत्ति अधिकतम करना है, जो शेयर का बाज़ार मूल्य बढ़ने में दिखता है। यह तीन निर्णय लेता है: निवेश (धन कहाँ लगाएँ), वित्तीयन (कहाँ से लाएँ) और लाभांश (कितना लाभ बाँटें)। वित्तीय नियोजन पहले से धन का बजट बनाता है। पूँजी संरचना ऋण और समता का मिश्रण है; समता पर व्यापार सस्ते ऋण से EPS बढ़ाता है। स्थायी पूँजी लंबी चलने वाली संपत्ति ख़रीदती है; कार्यशील पूँजी रोज़ का काम चलाती है।
- प्रबंध की प्रकृति एवं महत्व – प्रबंध का मतलब है लोगों के साथ और उनके ज़रिए काम करवाना, ताकि लक्ष्य समय पर (प्रभावपूर्णता) और कम लागत में (कुशलता) पूरे हों। इसके संगठनात्मक, सामाजिक और व्यक्तिगत उद्देश्य होते हैं। यह कुछ हद तक विज्ञान, पूरी तरह कला और अभी पूरा पेशा नहीं है। यह तीन स्तरों पर पाँच कार्यों से चलता है, और समन्वय सबको जोड़ता है।
2. National economy and the role of government
Integrity of the national economy (8 h) · Unemployment (4 h) · Inflation (4 h) · Role of government (6 h) · Public finance and state budget (9 h) · Monetary regulation (9 h)
- समष्टि अर्थशास्त्र की मूल अवधारणाएँ: वस्तुएँ, स्टॉक, प्रवाह और निवेश – समष्टि अर्थशास्त्र पूरी अर्थव्यवस्था को देखता है। राष्ट्रीय आय मापने से पहले कुछ शब्द समझने हैं। अंतिम वस्तुएँ अंतिम इस्तेमाल के लिए खरीदी जाती हैं; मध्यवर्ती वस्तुएँ फर्में उसी साल दूसरी चीज़ें बनाने में खपा देती हैं। अंतिम वस्तुएँ उपभोग वस्तुएँ (परिवार इस्तेमाल करता) या पूंजीगत वस्तुएँ (बार-बार उत्पादन में लगतीं) होती हैं। स्टॉक किसी समय-बिंदु पर, प्रवाह किसी अवधि में मापा जाता है। सकल निवेश = सारी नई पूंजी; मूल्यह्रास = सामान्य घिसावट; शुद्ध निवेश = सकल निवेश − मूल्यह्रास।
- बेरोज़गारी: अर्थ, दर, प्रकार, नुकसान और उपाय – कोई व्यक्ति बेरोज़गार तब है जब उसके पास नौकरी नहीं, वह काम कर सकता है, और सक्रिय रूप से काम ढूँढ रहा है। श्रम बल यानी सभी रोज़गार वाले और सभी बेरोज़गार। बेरोज़गारी दर = बेरोज़गार ÷ श्रम बल × 100। अर्थशास्त्री कारण के हिसाब से इसे बाँटते हैं: घर्षणात्मक (नौकरियों के बीच), संरचनात्मक (कौशल या जगह नौकरियों से मेल नहीं खाती), चक्रीय (कुल माँग में मंदी) और मौसमी (कुछ ही महीने काम)। बेरोज़गारी से व्यक्ति की आय जाती है, देश का उत्पादन और कर घटता है, और सेहत व समाज को नुकसान होता है। चक्रीय के लिए सरकार ख़र्च और ब्याज दर का सहारा लेती है; बाक़ी के लिए प्रशिक्षण, जानकारी और आवागमन। कुछ बेरोज़गारी हमेशा रहती है; सबसे कम टिकाऊ स्तर को प्राकृतिक दर कहते हैं।
- मुद्रास्फीति: कीमतें क्यों बढ़ती रहती हैं – मुद्रास्फीति कीमतों के सामान्य स्तर में लगातार वृद्धि है, जिससे पैसे की क्रय शक्ति घटती है। इसे CPI जैसे मूल्य सूचकांक से मापते हैं: दर = (नया सूचकांक − पुराना) ÷ पुराना × 100। कारण: माँग-जनित, लागत-जनित और अपेक्षाएँ। इसका असर बचत करने वालों, स्थिर आय और निर्यात पर पड़ता है। अपस्फीति में कीमतें गिरती हैं। केंद्रीय बैंक ब्याज दर से कम, स्थिर मुद्रास्फीति का लक्ष्य रखते हैं।
- बाज़ार में सरकारी हस्तक्षेप – बाज़ार अक्सर अच्छा काम करते हैं, पर विफल भी हो सकते हैं: हानिकारक चीज़ें ज़्यादा इस्तेमाल होती हैं, उपयोगी चीज़ें कम, सार्वजनिक वस्तुएँ बनती ही नहीं, फ़र्मों को एकाधिकार मिल जाता है और आय में बहुत असमानता आती है। सरकार दख़ल देती है: अप्रत्यक्ष कर (कीमत बढ़ाते, मात्रा घटाते हैं), सब्सिडी (कीमत घटाती, मात्रा बढ़ाती है), अधिकतम और न्यूनतम कीमत, नियमन, सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं की व्यवस्था, सरकारी स्वामित्व या निजीकरण, प्रतिस्पर्धा नीति, और कर व लाभों से पुनर्वितरण। वह आर्थिक चक्र को संभालने के लिए राजकोषीय और मौद्रिक नीति भी अपनाती है। हस्तक्षेप ख़ुद भी ग़लत हो सकता है – इसे सरकारी विफलता कहते हैं।
- सरकारी बजट और अर्थव्यवस्था – सरकारी बजट एक साल की योजना है जिसमें अनुमानित आय (प्राप्तियाँ) और योजनाबद्ध खर्च (व्यय) लिखे होते हैं। प्राप्तियाँ राजस्व (कर, गैर-कर) या पूँजीगत (उधार, कर्ज़ वसूली, विनिवेश) होती हैं। व्यय राजस्व (कोई संपत्ति नहीं) या पूँजीगत (संपत्ति बने या कर्ज़ घटे) होता है। बजट संतुलित, अधिशेष या घाटे का हो सकता है, और घाटा राजस्व, राजकोषीय और प्राथमिक घाटे से नापा जाता है।
- बैंकों द्वारा मुद्रा सृजन और केंद्रीय बैंक (RBI) – बैंक जमा का केवल एक हिस्सा रिज़र्व (वैधानिक आरक्षित अनुपात, LRR) रखते हैं और बाकी उधार देते हैं। हर कर्ज़ खर्च होकर नई जमा बनकर बैंकों में लौटता है, तो कुल जमा पहली जमा का कई गुना हो जाती है: कुल जमा = प्रारंभिक जमा × 1/LRR। RBI भारत का केंद्रीय बैंक है: करेंसी जारी करता है, सरकार और बैंकों का बैंकर है, अंतिम ऋणदाता है, साख का नियंत्रण करता है और विदेशी मुद्रा भंडार रखता है। साख नियंत्रण के उपकरण: रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, बैंक दर, CRR, SLR, खुले बाज़ार की क्रियाएँ और सीमांत आवश्यकता।
3. World economy and integration
World economy and national economy (5 h) · World trade and monetary system (5 h) · International labour migration (4 h) · International capital flows (4 h)
- वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था – वैश्वीकरण यानी व्यापार, निवेश, तकनीक और लोगों की आवाजाही से देशों की अर्थव्यवस्थाओं का तेज़ी से जुड़ना। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कई देशों में उत्पादन फैलाती हैं। नई तकनीक और उदारीकरण (व्यापार अवरोध हटाना, भारत में 1991 से) ने इसे संभव बनाया। WTO व्यापार के नियम बनाता है। वैश्वीकरण से कुछ को फ़ायदा, कुछ को नुकसान हुआ, इसलिए न्यायसंगत वैश्वीकरण चाहिए।
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार – देशों की सीमाओं के पार वस्तुओं और सेवाओं का ख़रीदना-बेचना अंतर्राष्ट्रीय व्यापार है। बाहर बेचना निर्यात और बाहर से ख़रीदना आयात है। इससे देश को विदेशी मुद्रा, विकास और रोज़गार मिलते हैं, और कंपनियों को लाभ और नए बाज़ार। निर्यात और आयात तय चरणों से होते हैं और इनमें साख पत्र, बिल ऑफ़ लेडिंग जैसे कई प्रलेख लगते हैं। WTO (1995) व्यापार के नियम बनाता है और बाधाएँ घटाता है।
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार: आधार, संतुलन, WTO और पत्तन – अंतर्राष्ट्रीय व्यापार देशों के बीच सामान और सेवाओं का आदान-प्रदान है। यह वस्तु-विनिमय से शुरू हुआ, रेशम मार्ग जैसे रास्तों पर बढ़ा, क्रूर दास व्यापार और औपनिवेशिक व्यापार से गुज़रा, और उद्योगों के साथ फैला। देश इसलिए व्यापार करते हैं क्योंकि वे संसाधन, जनसंख्या, विकास, विदेशी निवेश और परिवहन में अलग हैं। व्यापार संतुलन निर्यात और आयात की तुलना है। व्यापार द्विपक्षीय या बहुपक्षीय हो सकता है; मुक्त व्यापार रुकावटें घटाता है, जबकि राशिपातन विदेश में लागत से कम पर माल बेचता है। WTO विश्व नियम बनाता है, प्रादेशिक समूह पड़ोसियों को जोड़ते हैं, और कई तरह के पत्तन व्यापार के द्वार हैं।
- प्रवास (Migration) – प्रवास लोगों का एक जगह से दूसरी जगह कुछ समय या हमेशा के लिए रहने जाना है। छोड़ी गई जगह उद्गम है; पहुँचने की जगह गंतव्य। लोग प्रतिकर्ष कारकों (घर की समस्याएँ) और अपकर्ष कारकों (दूसरी जगह का आकर्षण) से जाते हैं, पर खर्च, दूरी और कानून जैसी बाधाएँ कुछ को रोकती हैं। प्रवास आंतरिक या अंतरराष्ट्रीय, अस्थायी या स्थायी, स्वैच्छिक या बलात हो सकता है, और यह उद्गम व गंतव्य दोनों को बदलता है।