अंतर्राष्ट्रीय व्यापार क्या है?
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का मतलब है अलग-अलग देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का लेन-देन। भारत जब दूसरे देश को माल बेचता है तो यह निर्यात है। जब भारत दूसरे देश से माल ख़रीदता है तो यह आयात है। माल मँगाकर किसी तीसरे देश को भेज देना पुनर्निर्यात (एंट्रेपोट व्यापार) कहलाता है।
हर देश की ज़मीन, जलवायु, कौशल और मशीनें अलग हैं। इसलिए कोई देश सब कुछ सस्ते में नहीं बना सकता। हर देश वह बनाता है जिसमें वह अच्छा है, और बाक़ी ख़रीद लेता है।
यह घरेलू व्यापार से कठिन क्यों है?
- लंबी दूरी: माल भेजने में समय और ख़र्च ज़्यादा।
- अलग मुद्रा: विनिमय दर बदलने से दाम बदलते हैं।
- अलग क़ानून, सीमा शुल्क, भाषा और रीति-रिवाज।
- ज़्यादा जोखिम: ख़रीदार दूर है, उसकी जाँच कठिन।
- बहुत से सरकारी नियम और काग़ज़।
विदेशी बाज़ार में उतरने के तरीक़े (संक्षेप में)
कंपनी सीधे निर्यात-आयात कर सकती है, या आगे बढ़कर ठेके पर उत्पादन, लाइसेंसिंग/फ़्रैंचाइज़िंग, स्थानीय कंपनी के साथ संयुक्त उपक्रम, या पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी बना सकती है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लाभ
देश को लाभ
- विदेशी मुद्रा: निर्यात से डॉलर जैसी मुद्रा आती है, जिससे तेल और मशीनें आयात होती हैं।
- संसाधनों का अच्छा उपयोग: हर देश वह बनाता है जिसमें वह सबसे अच्छा है।
- विकास और रोज़गार: माँग बढ़ती है तो कारख़ाने और काम बढ़ते हैं।
- ऊँचा जीवन स्तर: लोगों को ज़्यादा तरह का सामान ठीक दाम पर मिलता है।
कंपनियों को लाभ
- ज़्यादा लाभ: विदेश में दाम ऊँचे मिल सकते हैं।
- अतिरिक्त क्षमता का उपयोग: देश की ज़रूरत से ज़्यादा बना माल बाहर बिकता है।
- विकास की संभावना: घरेलू बाज़ार भर जाए तो नए बाज़ार।
- बेहतर व्यापारिक सोच: कंपनी सीखती है और लंबी योजना बनाती है।
निर्यात प्रक्रिया: चरण-दर-चरण
- पूछताछ और ऑर्डर: ख़रीदार दाम पूछता है; निर्यातक प्रोफ़ॉर्मा बीजक (दाम और शर्तों वाला पत्र) भेजता है; ख़रीदार ऑर्डर (इंडेंट) देता है।
- ख़रीदार की साख जाँचना: निर्यातक आमतौर पर ख़रीदार के बैंक से साख पत्र माँगता है। यह बैंक का भुगतान का वादा है।
- लाइसेंस और IEC: निर्यात परिषद में पंजीकरण और DGFT से आयात-निर्यात कोड (IEC) लेना।
- लदान-पूर्व वित्त: कच्चा माल ख़रीदने और माल बनाने के लिए बैंक से कर्ज़।
- माल बनाना और निरीक्षण: ऑर्डर के हिसाब से माल बनाना; कुछ माल की गुणवत्ता जाँच और निरीक्षण प्रमाण पत्र।
- सीमा शुल्क निकासी: जहाज़ी बिल भरना; सीमा शुल्क विभाग जाँचकर अनुमति देता है।
- लदान: माल जहाज़ पर चढ़ता है; जहाज़ का अधिकारी मेट की रसीद देता है; जहाज़ी कंपनी बिल ऑफ़ लेडिंग देती है। माल का बीमा होता है।
- भुगतान पाना: निर्यातक बैंक के ज़रिए प्रलेख भेजता है; ख़रीदार का बैंक भुगतान करता है और ख़रीदार काग़ज़ लेकर माल छुड़ाता है।
आयात प्रक्रिया: चरण-दर-चरण
- व्यापारिक पूछताछ: विक्रेता ढूँढना और दाम व शर्तें पूछना।
- आयात लाइसेंस और IEC: देखना कि माल मँगाने की अनुमति है और IEC लेना।
- विदेशी मुद्रा की व्यवस्था: बैंक से ज़रूरी विदेशी मुद्रा लेने की अर्ज़ी।
- इंडेंट (ऑर्डर) भेजना: मात्रा, गुणवत्ता, दाम और डिलीवरी की शर्तें लिखकर।
- साख पत्र: आयातक का बैंक इसे निर्यातक को भुगतान के वादे के रूप में भेजता है।
- वित्त की व्यवस्था: माल पहुँचने पर भुगतान के लिए पैसा तैयार रखना।
- लदान सूचना और प्रलेख लेना: भुगतान करके (या विनिमय बिल स्वीकार करके) बैंक से काग़ज़ लेना।
- सीमा शुल्क निकासी: प्रवेश बिल भरना, आयात शुल्क चुकाना और बंदरगाह से माल छुड़ाना।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रयुक्त प्रलेख
माल से जुड़े
- वाणिज्यिक बीजक: विक्रेता का बिल, मात्रा, दाम और कुल रकम के साथ।
- पैकिंग सूची: हर डिब्बे में क्या है।
- उद्गम प्रमाण पत्र: माल किस देश में बना (कम शुल्क पाने में मदद)।
- निरीक्षण प्रमाण पत्र: माल गुणवत्ता जाँच में पास हुआ।
लदान से जुड़े
- जहाज़ी बिल: निर्यात के लिए सीमा शुल्क की अनुमति का मुख्य काग़ज़।
- लदान आदेश: जहाज़ के कप्तान को माल लेने का आदेश।
- मेट की रसीद: माल लदने पर जहाज़ का अधिकारी देता है।
- बिल ऑफ़ लेडिंग: जहाज़ी कंपनी देती है; यह रसीद, माल ले जाने का अनुबंध और स्वामित्व का प्रमाण है। हवाई मार्ग में इसे एयरवे बिल कहते हैं।
- समुद्री बीमा पॉलिसी: समुद्र में नुकसान से सुरक्षा।
भुगतान से जुड़े
- साख पत्र: आयातक का बैंक निर्यातक को भुगतान का वादा करता है।
- विनिमय बिल: आयातक को तय रकम चुकाने का आदेश।
- बैंक का भुगतान प्रमाण पत्र: भुगतान मिल जाने का सबूत।
आयात पक्ष
- प्रवेश बिल: आयातित माल की सीमा शुल्क निकासी के लिए।
- आयात सामान्य घोषणा-पत्र और डॉक चालान: माल की सूची और गोदी शुल्क।
WTO: अर्थ और उद्देश्य
विश्व व्यापार संगठन (WTO) एक विश्व संस्था है जो देशों के बीच व्यापार के नियम बनाती और लागू करती है। यह 1 जनवरी 1995 को शुरू हुआ और इसने GATT (1948) की जगह ली। इसका मुख्यालय जिनेवा में है। भारत इसका संस्थापक सदस्य है।
WTO के उद्देश्य
- आयात शुल्क और दूसरी व्यापार बाधाएँ घटाना।
- भेदभाव नहीं: सब सदस्यों से एक जैसा व्यवहार।
- सदस्यों के व्यापार विवाद निष्पक्ष सुलझाना।
- जीवन स्तर, रोज़गार और आय बढ़ाना।
- विकासशील और ग़रीब देशों को व्यापार में उचित हिस्सा दिलाना।
- संसाधनों का टिकाऊ उपयोग और पर्यावरण की रक्षा।
- सिर्फ़ वस्तुएँ नहीं, सेवाएँ और बौद्धिक संपदा भी शामिल करना।
घर पर करके देखें
रसोई या बस्ते से पाँच चीज़ें उठाइए। लेबल पढ़कर देखिए कि हर चीज़ कहाँ बनी। कौन-सी चीज़ें आयात हुईं, निशान लगाइए। फिर अंदाज़ा लगाइए कि भारत कौन-सी चीज़ निर्यात करता है जो आप भी इस्तेमाल करते हैं (जैसे चाय या चावल)।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- निर्यात = दूसरे देश को माल/सेवा बेचना
- आयात = दूसरे देश से माल/सेवा ख़रीदना
- पुनर्निर्यात = माल मँगाकर तीसरे देश को भेजना
- साख पत्र = निर्यातक को बैंक का भुगतान का वादा
- बिल ऑफ़ लेडिंग = रसीद + अनुबंध + माल का स्वामित्व (समुद्री मार्ग)
- WTO = 1 जनवरी 1995, GATT (1948) की जगह
हल किए गए उदाहरण
1. तिरुपुर की कपड़ा कंपनी को जर्मनी से ऑर्डर मिला। भुगतान पक्का करने के लिए वह पहले क्या माँगे?
जर्मन ख़रीदार के बैंक से साख पत्र। यह बैंक का वादा है कि सही प्रलेख दिखाने पर भुगतान होगा, इसलिए पैसा डूबने का डर घटता है।
2. भारत कच्चा तेल आयात करता है और सॉफ़्टवेयर सेवाएँ निर्यात करता है। व्यापार से भारत को क्या फ़ायदा है?
सॉफ़्टवेयर निर्यात से डॉलर (विदेशी मुद्रा) आते हैं। इन्हीं डॉलर से वह कच्चा तेल आता है जो भारत में काफ़ी नहीं बनता। हर पक्ष वह करता है जिसमें वह अच्छा है।
3. मुंबई में माल जहाज़ पर लद गया। इसके ठीक बाद कौन-से दो प्रलेख मिलते हैं और कौन देता है?
पहले मेट की रसीद, जो जहाज़ का अधिकारी देता है। फिर उसके बदले जहाज़ी कंपनी बिल ऑफ़ लेडिंग देती है।
4. दिल्ली की कंपनी मशीनें आयात करती है। क्रम में लगाइए: प्रवेश बिल, इंडेंट, साख पत्र, व्यापारिक पूछताछ।
व्यापारिक पूछताछ → इंडेंट (ऑर्डर) → साख पत्र → प्रवेश बिल (माल पहुँचने पर सीमा शुल्क में)।
आम गलतियाँ
- मेट की रसीद और बिल ऑफ़ लेडिंग को एक समझना: मेट की रसीद पहले मिलती है, बिल ऑफ़ लेडिंग बाद में जहाज़ी कंपनी देती है।
- जहाज़ी बिल को आयात का प्रलेख समझना। जहाज़ी बिल निर्यात के लिए है; आयात के लिए प्रवेश बिल है।
- यह कहना कि WTO 1948 में बना। 1948 में GATT बना था; WTO 1995 में शुरू हुआ।
- यह सोचना कि साख पत्र आयातक ख़ुद लिखता है। इसे आयातक का बैंक जारी करता है।