CBSE कक्षा 11 व्यवसाय अध्ययन
अध्याय: 11
1. व्यवसाय की प्रकृति एवं उद्देश्य
भारत में व्यापार और वाणिज्य का इतिहास · व्यवसाय, पेशा और रोज़गार · व्यावसायिक क्रियाएँ
- भारत में व्यापार और वाणिज्य का इतिहास – दो हज़ार साल से ज़्यादा समय तक भारत व्यापार से भरा देश था। व्यापारी हुंडी नाम के काग़ज़ से पैसा भेजते थे, एजेंटों के ज़रिए काम करते थे, सड़क, नदी और जहाज़ से माल ले जाते थे, मज़बूत श्रेणियों (गिल्ड) में जुड़ते थे और सूती कपड़ा व मसाले दुनिया को बेचते थे। सदियों तक दुनिया के कुल उत्पादन का बड़ा हिस्सा भारत में बनता था।
- व्यवसाय, पेशा और रोज़गार – मनुष्य की क्रियाएँ आर्थिक (पैसा कमाने के लिए) या अनार्थिक (प्रेम, कर्तव्य या आस्था से) होती हैं। आर्थिक क्रियाएँ तीन रूप में होती हैं: व्यवसाय (वस्तुएँ-सेवाएँ बनाकर या बेचकर लाभ), पेशा (विशेषज्ञ सेवा के बदले शुल्क) और रोज़गार (किसी के लिए काम करके वेतन)। व्यवसाय के कई उद्देश्य होते हैं, और टिके रहने व बढ़ने के लिए लाभ ज़रूरी है।
- व्यावसायिक क्रियाओं का वर्गीकरण – व्यावसायिक क्रियाएँ दो तरह की हैं। उद्योग माल बनाता या उसका प्रसंस्करण करता है। वाणिज्य वह माल ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचाता है। वाणिज्य के दो भाग हैं: व्यापार (ख़रीद-बिक्री) और व्यापार के सहायक (बैंकिंग, बीमा, परिवहन, भंडारण, संचार और विज्ञापन), जो बाधाएँ दूर करते हैं। हर व्यवसाय जोखिम यानी नुक़सान की संभावना उठाता है।
2. व्यावसायिक संगठन के स्वरूप
एकल स्वामित्व, साझेदारी और हिंदू अविभाजित परिवार · सहकारी समितियाँ · कंपनी
- एकल स्वामित्व, साझेदारी और संयुक्त हिंदू परिवार व्यवसाय – एकल स्वामित्व का मालिक और संचालक एक व्यक्ति होता है, जो पूरा लाभ लेता और असीमित दायित्व उठाता है। साझेदारी दो या ज़्यादा लोग समझौते के तहत चलाते हैं और लाभ बाँटते हैं; साझेदार कई तरह के होते हैं और लिखित विलेख व पंजीकरण उनकी रक्षा करते हैं। संयुक्त हिंदू परिवार व्यवसाय परिवार का सबसे बड़ा सदस्य, कर्ता, सबके लिए चलाता है; सदस्यता जन्म से मिलती है।
- सहकारी समितियाँ – सहकारी समिति उन लोगों का स्वैच्छिक समूह है, जो आम तौर पर कम साधन वाले होते हैं और अपने साझे हित की रक्षा के लिए जुड़ते हैं। इसका पंजीकरण ज़रूरी है, सदस्यों का दायित्व सीमित है, हर सदस्य का एक वोट है और मुख्य उद्देश्य सेवा है, लाभ नहीं। इसके छह मुख्य प्रकार हैं: उपभोक्ता, उत्पादक, विपणन, कृषक, साख और आवास।
- संयुक्त पूँजी कंपनी: प्रकार, निर्माण और स्वरूप का चुनाव – कंपनी क़ानून द्वारा बना कृत्रिम व्यक्ति है। यह अपने मालिकों (अंशधारियों) से अलग है, जिनका दायित्व सीमित है, और सदस्य बदलने पर भी ख़त्म नहीं होती। यह निजी, सार्वजनिक या एक व्यक्ति कंपनी हो सकती है। इसका जन्म प्रवर्तन, समामेलन, पूँजी अभिदान और व्यापार प्रारंभ से होता है, जिसमें पार्षद सीमानियम और अंतर्नियम जैसे मुख्य प्रलेख लगते हैं। सही स्वरूप लागत, दायित्व, निरंतरता, पूँजी, नियंत्रण और व्यवसाय की प्रकृति पर निर्भर है।
3. सार्वजनिक, निजी एवं वैश्विक उपक्रम
सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उपक्रम · वैश्विक उपक्रम, संयुक्त उद्यम, सार्वजनिक-निजी भागीदारी
- सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उपक्रम – भारत की अर्थव्यवस्था मिश्रित है। निजी क्षेत्र का स्वामित्व व्यक्तियों और कंपनियों के पास है; सार्वजनिक क्षेत्र का सरकार के पास। सार्वजनिक उपक्रमों के तीन रूप हैं: विभागीय उपक्रम (सरकारी विभाग की तरह चलते हैं), सांविधिक निगम (विशेष अधिनियम से बनते हैं) और सरकारी कंपनी (चुकता पूँजी का कम से कम 51% सरकार के पास)। पहले से आख़िरी की ओर जाने पर काम की आज़ादी बढ़ती है और मंत्रालय का सीधा नियंत्रण घटता है।
- वैश्विक उपक्रम, संयुक्त उद्यम और सार्वजनिक-निजी भागीदारी – वैश्विक उपक्रम (बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ) विशाल कंपनियाँ हैं जिनका मुख्य कार्यालय एक देश में और इकाइयाँ कई देशों में होती हैं, और जिन पर केंद्र से नियंत्रण रहता है। संयुक्त उद्यम तब बनता है जब दो या ज़्यादा फ़र्में साझे लक्ष्य के लिए संसाधन मिलाती हैं और नियंत्रण, लाभ व जोखिम बाँटती हैं। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) एक समझौता है जिसमें सरकार और निजी फ़र्म किसी सार्वजनिक परियोजना, जैसे टोल सड़क, का काम, पैसा और जोखिम बाँटते हैं।
4. व्यावसायिक सेवाएँ
बैंकिंग · बीमा · डाक और कूरियर सेवाएँ
- बैंकिंग: जमा, ऋण और ई-बैंकिंग – बैंक बचत करने वालों से जमा लेता है और ज़रूरतमंदों को ऋण देता है। इसके पाँच मुख्य जमा खाते हैं: बचत, चालू, आवर्ती, सावधि और बहु-विकल्प। बैंक ड्राफ़्ट से पैसा सुरक्षित भेजा जाता है, अधिविकर्ष और नकद साख से उधार मिलता है, और ई-बैंकिंग व UPI, NEFT, RTGS, IMPS जैसे डिजिटल भुगतान से बैंक ऑनलाइन सेवा देता है।
- बीमा: सिद्धांत और प्रकार – बीमा कुछ लोगों के नुकसान को उन बहुत से लोगों में बाँट देता है जो एक साझा कोष में छोटा प्रीमियम देते हैं। यह छह सिद्धांतों पर चलता है: परम सद्विश्वास, बीमा-योग्य हित, क्षतिपूर्ति, अंशदान, प्रत्यासन और निकटतम कारण (साथ में हानि कम करना)। मुख्य प्रकार हैं जीवन, स्वास्थ्य, अग्नि और समुद्री बीमा।
- डाक और कूरियर सेवाएँ – व्यवसाय को पत्र, कागज़ और सामान भेजने होते हैं। भारतीय डाक साधारण डाक (पत्र, पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र), रजिस्टर्ड डाक (रसीद और सबूत के साथ), पार्सल (वज़न के हिसाब से सामान) और स्पीड पोस्ट (तेज़ और ट्रैक होने वाली) देती है। निजी कूरियर कंपनियाँ ज़्यादा क़ीमत पर दरवाज़े से दरवाज़े तक ट्रैक होने वाली सेवा देती हैं।
5. व्यवसाय की उभरती पद्धतियाँ
ई-व्यवसाय
- ई-व्यवसाय: अर्थ, क्षेत्र और लाभ – ई-व्यवसाय का अर्थ है व्यवसाय की सारी गतिविधियाँ (ख़रीद, बिक्री, उत्पादन, वित्त, कर्मचारी, आपूर्ति) कंप्यूटर नेटवर्क और इंटरनेट से करना। ई-कॉमर्स, यानी ऑनलाइन ख़रीद-बिक्री, इसका सिर्फ़ एक हिस्सा है। इसके क्षेत्र हैं B2B, B2C, C2C और इंट्रा-B। यह शुरू करने में सस्ता, 24 × 7 खुला, तेज़ और वैश्विक है, पर इसमें मानवीय संपर्क कम है और सुरक्षा का जोखिम है।
6. व्यवसाय का सामाजिक उत्तरदायित्व एवं व्यावसायिक नैतिकता
सामाजिक उत्तरदायित्व · व्यावसायिक नैतिकता
- व्यवसाय का सामाजिक उत्तरदायित्व – सामाजिक उत्तरदायित्व का अर्थ है कि व्यवसाय ऐसे फ़ैसले ले जो सिर्फ़ उसके लाभ के लिए नहीं, समाज के लिए भी अच्छे हों, और कानून से आगे जाएँ। इसके पक्ष में मज़बूत तर्क हैं, जैसे दीर्घकालीन स्वहित और अच्छी छवि। व्यवसाय के दायित्व स्वामियों, निवेशकों, उपभोक्ताओं, कर्मचारियों, सरकार और समुदाय के प्रति हैं, और उसे प्रदूषण से पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए।
- व्यावसायिक नैतिकता: अवधारणा और तत्व – व्यावसायिक नैतिकता सही-ग़लत के वे नैतिक नियम हैं जो व्यवसाय के व्यवहार को दिशा देते हैं। ये कानून से ज़्यादा माँगते हैं: ईमानदारी, निष्पक्षता और लोगों की परवाह। फ़र्म पाँच तत्वों से नैतिकता बनाती है: शीर्ष प्रबंधन की प्रतिबद्धता, आचार संहिता का प्रकाशन, अनुपालन व्यवस्था, हर स्तर के कर्मचारियों की भागीदारी और परिणामों का मापन।
7. व्यावसायिक वित्त के स्रोत
व्यावसायिक वित्त के स्रोत
- व्यावसायिक वित्त के स्रोत – हर व्यवसाय को लंबे समय की संपत्तियों (स्थायी पूँजी) और रोज़ के काम (कार्यशील पूँजी) के लिए पैसा चाहिए। यह पैसा दो बड़े स्रोतों से आता है: स्वामित्व निधि (समता अंश, पूर्वाधिकार अंश, प्रतिधारित आय), जिसे लौटाना नहीं पड़ता, और उधार निधि (ऋणपत्र, बॉन्ड, बैंक व वित्तीय संस्थाओं के ऋण, जन जमा, व्यापार साख, अंतर-निगमीय जमा), जिसे ब्याज के साथ लौटाना पड़ता है।
8. लघु व्यवसाय एवं उद्यम
उद्यमिता विकास · लघु व्यवसाय और एमएसएमई
- उद्यमिता विकास – उद्यमिता का अर्थ है ज़रूरत पहचानकर, संसाधन जोड़कर और जोखिम उठाकर नया व्यवसाय शुरू करना। भारत को रोज़गार, नए विचारों और संतुलित विकास के लिए उद्यमी चाहिए। प्रक्रिया खुद को जानने से शुरू होकर व्यवसाय शुरू करने और बढ़ाने तक जाती है। स्टार्टअप इंडिया (2016) नई फ़र्मों की मदद करता है; पैसा बचत, एंजेल, वेंचर कैपिटल, बैंक और क्राउडफ़ंडिंग से आता है; और बौद्धिक संपदा अधिकार नए विचारों, ब्रांड और रचनाओं की रक्षा करते हैं।
- लघु व्यवसाय और MSME – लघु व्यवसाय कम पैसे, कम कर्मचारियों और मालिक के सीधे नियंत्रण से चलने वाली इकाइयाँ हैं। MSMED अधिनियम, 2006 इन्हें निवेश (और 2020 से कारोबार) के आधार पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों में बाँटता है। ये बहुत बड़े पैमाने पर रोज़गार, उत्पादन और निर्यात देते हैं और गाँव के लोगों को घर के पास काम देते हैं। इनकी पैसे, तकनीक और विपणन की समस्याओं में सरकार योजनाओं, राष्ट्रीय स्तर पर NSIC और हर ज़िले में DIC से मदद करती है।
9. आंतरिक व्यापार
आंतरिक व्यापार
- आंतरिक व्यापार – आंतरिक व्यापार एक ही देश के अंदर ख़रीद-बिक्री है। माल उत्पादक से थोक व्यापारी (बड़ी मात्रा में ख़रीदकर दोबारा बेचने वाले) और फिर फुटकर व्यापारी (अंतिम उपभोक्ता को थोड़ा-थोड़ा बेचने वाले) तक जाता है। दोनों ऊपर और नीचे सेवाएँ देते हैं। फुटकर व्यापारी छोटे (भ्रमणशील और छोटी स्थायी दुकानें) या बड़े (विभागीय भंडार, शृंखला भंडार, डाक आदेश गृह) होते हैं। GST वस्तुओं और सेवाओं पर एक कर है: राज्य के अंदर CGST और SGST, राज्यों के बीच IGST।
10. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार – देशों की सीमाओं के पार वस्तुओं और सेवाओं का ख़रीदना-बेचना अंतर्राष्ट्रीय व्यापार है। बाहर बेचना निर्यात और बाहर से ख़रीदना आयात है। इससे देश को विदेशी मुद्रा, विकास और रोज़गार मिलते हैं, और कंपनियों को लाभ और नए बाज़ार। निर्यात और आयात तय चरणों से होते हैं और इनमें साख पत्र, बिल ऑफ़ लेडिंग जैसे कई प्रलेख लगते हैं। WTO (1995) व्यापार के नियम बनाता है और बाधाएँ घटाता है।
11. परियोजना कार्य
परियोजना (एक)
जल्द आ रहा है