निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र
निजी क्षेत्र में व्यक्तियों या समूहों के व्यवसाय आते हैं: एकल स्वामी, साझेदारी, सहकारी समितियाँ और कंपनियाँ। सार्वजनिक क्षेत्र में केंद्र या राज्य सरकार के स्वामित्व और संचालन वाले उपक्रम आते हैं, जो लाभ के साथ जनकल्याण के लिए भी हैं। भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था चुनी जिसमें दोनों साथ-साथ चलते हैं। सरकारी नीति तय करती है कि कौन-सा क्षेत्र किसके लिए खुला है। सार्वजनिक उपक्रम तीन रूपों में संगठित होते हैं।
विभागीय उपक्रम
विभागीय उपक्रम किसी मंत्रालय के विभाग के रूप में बनता है और किसी भी सरकारी दफ़्तर की तरह चलता है। उदाहरण: रेलवे, डाक-तार, रक्षा उत्पादन इकाइयाँ।
विशेषताएँ
- पैसा सरकारी बजट से आता है; कमाई राजकोष में जाती है।
- लेखा और अंकेक्षण बाकी सरकारी विभागों की तरह।
- कर्मचारी सिविल सेवा नियमों वाले सरकारी कर्मचारी।
- अलग वैधानिक अस्तित्व नहीं: सरकार का ही हिस्सा।
- मंत्रालय का सीधा नियंत्रण और संसद के प्रति जवाबदेह।
गुण
- संसद का प्रभावी नियंत्रण।
- जनता के प्रति उच्च जवाबदेही।
- आय राजकोष में जाती है।
- रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम क्षेत्रों के लिए सबसे अच्छा।
सीमाएँ
- लचीलेपन की कमी: कड़े नियम।
- लालफ़ीताशाही और मंत्री की मंज़ूरी से देरी।
- राजनीतिक हस्तक्षेप।
- अधिकारी व्यवसाय में प्रशिक्षित नहीं और ग्राहकों की परवाह कम कर सकते हैं।
सांविधिक निगम
सांविधिक निगम संसद या राज्य विधानमंडल के विशेष अधिनियम से बना सार्वजनिक उपक्रम है। अधिनियम इसके अधिकार, कर्तव्य और सरकार से संबंध तय करता है। उदाहरण: भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC), भारतीय खाद्य निगम, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण, भारतीय रिज़र्व बैंक।
विशेषताएँ
- विशेष अधिनियम से बनता है; अलग वैधानिक इकाई है।
- पूरी तरह राज्य का स्वामित्व; उधार और अपनी कमाई से पैसा जुटा सकता है।
- वित्तीय रूप से स्वतंत्र; सामान्य तरीक़े से सालाना बजट से पैसा नहीं मिलता।
- कर्मचारी सरकारी सेवक नहीं; निगम अपने सेवा नियम बनाता है।
- विभागों के सामान्य बजट, अंकेक्षण और लेखा नियम लागू नहीं।
गुण
- रोज़ के काम में स्वतंत्रता और लचीलापन।
- लालफ़ीताशाही से मुक्त, जल्दी निर्णय।
- अधिकार अधिनियम से साफ़; सरकार अधिनियम की अनुमति के बिना वित्तीय मामलों में दख़ल नहीं दे सकती।
- जनसेवा के लक्ष्य के साथ पेशेवर, व्यावसायिक सोच।
सीमाएँ
- असल में आज़ादी अक्सर कम: मंत्री फिर भी दख़ल देते हैं।
- कठोरता: अधिकारों में बदलाव के लिए संसद को अधिनियम में संशोधन करना पड़ता है।
- अपने क्षेत्र में एकाधिकार से लापरवाही आ सकती है।
- व्यावसायिक लक्ष्य और जनता के प्रति कर्तव्य में टकराव हो सकता है।
सरकारी कंपनियाँ
कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत सरकारी कंपनी वह कंपनी है जिसकी चुकता शेयर पूँजी का कम से कम 51% केंद्र सरकार, राज्य सरकार या दोनों के पास हो। उदाहरण: स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (SAIL), भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स (BHEL), कोल इंडिया, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स।
विशेषताएँ
- किसी भी कंपनी की तरह कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत; अलग वैधानिक इकाई।
- प्रबंध कंपनी अधिनियम और उसके अपने सीमानियम-अंतर्नियम से।
- कर्मचारी उसके अपने, सरकारी सेवक नहीं।
- सरकार के बजट, अंकेक्षण और लेखा नियमों से मुक्त (अपने अंकेक्षक होते हैं, CAG भी जाँच कर सकता है)।
- पैसा सरकार और निजी अंशधारियों से; पूँजी बाज़ार से भी जुटा सकती है।
गुण
- बनाना आसान: सिर्फ़ कंपनी अधिनियम की प्रक्रिया; विशेष क़ानून नहीं।
- अपने सीमानियम और अंतर्नियम आसानी से बदल सकती है।
- स्वायत्तता मिलती है और व्यावसायिक निर्णय जल्दी ले सकती है।
- निजी भागीदार ला सकती है और बाज़ार में दाम नियंत्रित कर सकती है।
सीमाएँ
- कंपनी होने के कारण संसद की जाँच से बचने के लिए इसका दुरुपयोग हो सकता है।
- सरकार मुख्य या अकेली अंशधारी है, तो निदेशक राजनीतिक आदेश मान सकते हैं।
- प्रबंध में अक्सर प्रतिनियुक्ति पर आए सरकारी अधिकारी होते हैं।
करके देखिए
पाँच सार्वजनिक उपक्रमों की सूची बनाइए (रेलवे, डाक, LIC, राज्य बस निगम, कोई तेल कंपनी)। हर एक का स्वरूप अंदाज़ा लगाइए, फिर उसकी वेबसाइट देखिए: "…मंत्रालय" (विभाग), "…अधिनियम द्वारा स्थापित" (सांविधिक निगम) या "लिमिटेड" (सरकारी कंपनी)।
तीनों रूपों की तुलना
| आधार | विभागीय उपक्रम | सांविधिक निगम | सरकारी कंपनी |
|---|---|---|---|
| निर्माण | सरकारी आदेश से, मंत्रालय के अधीन | विशेष अधिनियम से | कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत |
| अलग वैधानिक इकाई | नहीं | हाँ | हाँ |
| पूँजी | सरकारी बजट | अपनी; उधार ले सकता है | सरकार + निजी अंशधारी |
| कर्मचारी | सरकारी सेवक | अपने नियम, सरकारी सेवक नहीं | अपने कर्मचारी |
| स्वायत्तता | सबसे कम | ज़्यादा | सबसे ज़्यादा |
| संसद के प्रति जवाबदेही | सीधी, मंत्री के ज़रिए | संसद में रखी रिपोर्ट से | संसद/विधानमंडल में रखी वार्षिक रिपोर्ट |
| उदाहरण | भारतीय रेल | LIC | SAIL |
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सरकारी कंपनी: चुकता शेयर पूँजी में सरकार का हिस्सा ≥ 51%
- स्वायत्तता: विभागीय < सांविधिक निगम < सरकारी कंपनी
- सांविधिक निगम = विशेष अधिनियम से बना
हल किए गए उदाहरण
1. एक कंपनी की चुकता पूँजी ₹500 करोड़ है। केंद्र सरकार के पास ₹200 करोड़ और राज्य सरकार के पास ₹80 करोड़ है। क्या यह सरकारी कंपनी है?
सरकार का कुल हिस्सा = 280 ÷ 500 = 56%। यह कम से कम 51% है (केंद्र और राज्य जोड़े जा सकते हैं), इसलिए यह सरकारी कंपनी है।
2. सरकार पूरी गोपनीयता और सीधे नियंत्रण के साथ रक्षा उत्पादन के लिए एक संस्था चाहती है। कौन-सा रूप ठीक है?
विभागीय उपक्रम: मंत्रालय का सीधा नियंत्रण और जवाबदेही रक्षा जैसे अहम क्षेत्रों के लिए ठीक है।
3. संसद सभी हवाई अड्डे चलाने वाली संस्था बनाने के लिए अधिनियम पारित करती है। यह कौन-सा रूप है?
सांविधिक निगम (जैसे भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण)।
4. सरकार शेयर बेचती है जिससे किसी सरकारी कंपनी में उसका हिस्सा 60% से घटकर 45% रह जाता है। क्या होगा?
यह सरकारी कंपनी नहीं रहेगी और निजी क्षेत्र की कंपनी बन जाएगी, क्योंकि हिस्सा 51% से कम है।
आम गलतियाँ
- विभागीय उपक्रम को अलग वैधानिक इकाई कहना। वह नहीं है; सरकार का हिस्सा है।
- लिखना कि सरकारी कंपनी का 100% स्वामित्व सरकार के पास होना चाहिए। सिर्फ़ 51% या ज़्यादा चाहिए।
- LIC को सरकारी कंपनी कहना। यह विशेष अधिनियम से बना, इसलिए सांविधिक निगम है।
- यह सोचना कि सार्वजनिक उपक्रम सिर्फ़ लाभ चाहते हैं। वे जनकल्याण और संतुलित विकास भी चाहते हैं।