स्वदेशी बैंकिंग प्रणाली
आधुनिक बैंकों से बहुत पहले भारत के अपने बैंकर थे: सेठ, सर्राफ़ और महाजन। ये जमा रखते, क़र्ज़ देते और सिक्के बदलते थे।
- हुंडी: पैसा चुकाने का लिखित आदेश, जो विनिमय-पत्र जैसा काम करता था। व्यापारी एक शहर में पैसा देता और दूसरे शहर में ले लेता। रास्ते में सोना ले जाने से यह ज़्यादा सुरक्षित था।
- चिट्ठी: जान-पहचान वाले व्यापारियों के बीच भरोसे का पत्र या साख-पत्र।
- हुंडी के प्रकार: धनी-जोग (जिसके पास हो उसे भुगतान), शाह-जोग (सिर्फ़ जाने-माने सम्मानित व्यक्ति को), फ़रमान-जोग (आदेश पर नामित व्यक्ति को), जोखमी (भेजे गए माल से जुड़ी; माल सही पहुँचे तभी भुगतान, कुछ-कुछ बीमा जैसी)।
मध्यस्थ
मध्यस्थ वह व्यक्ति है जो बनाने वाले और ख़रीदने वाले के बीच खड़ा होता है। पुराने भारत में ये एजेंट, दलाल, कमीशन एजेंट और थोक व्यापारी थे। ये ख़रीदार ढूँढते, उधार देते, माल रखते और कुछ जोखिम उठाते थे। इसके बदले इन्हें कमीशन मिलता था। इन्हीं से छोटे कारीगरों का माल दूर तक बिक पाता था।
परिवहन
ज़मीनी रास्ते उत्तर और दक्षिण को जोड़ते थे: उत्तरापथ और दक्षिणापथ। इन पर बैलगाड़ियाँ, लद्दू पशु और कारवाँ चलते थे। नदियाँ नावों से माल अंदर तक ले जाती थीं। समुद्र में नाविकों ने मानसूनी हवाओं का सहारा लेकर हर साल पश्चिम एशिया, पूर्वी अफ़्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक आना-जाना सीखा। अच्छे परिवहन से बाज़ार बड़े हुए।
व्यापारी समुदाय और व्यापारिक निगम
कई समुदाय व्यापार के लिए मशहूर थे: दक्षिण के चेट्टियार, पश्चिम-उत्तर के बनिया और मारवाड़ी, और गुजरात के समुद्री व्यापारी। व्यापारी और कारीगर श्रेणी (गिल्ड) बनाते थे। श्रेणी:
- दाम, तौल और गुणवत्ता के नियम तय करती थी,
- सदस्यों के झगड़े सुलझाती थी,
- क़र्ज़ देती और जमा रखती थी,
- मुसीबत में सदस्यों की मदद करती और मंदिर, पाठशाला, कुएँ के लिए दान देती थी।
राजा भी श्रेणी के नियमों का सम्मान करते थे। बड़े व्यापारी समूह मिलकर शुरुआती व्यापारिक निगमों की तरह काम करते थे।
प्रमुख व्यापार केंद्र
व्यापार केंद्र दो तरह के थे: अंदरूनी नगर (जैसे पाटलिपुत्र, उज्जैन, वाराणसी, मथुरा) और बंदरगाह (जैसे पूर्व में ताम्रलिप्ति, पश्चिम में भरूच, दक्षिण में मुज़िरिस और कावेरीपट्टिनम, बाद में सूरत और कालीकट)। इनके आसपास बाज़ार, मेले और गोदाम बसे।
आयात और निर्यात
निर्यात (बाहर भेजा): सूती और रेशमी कपड़ा, काली मिर्च जैसे मसाले, नील, चीनी, क़ीमती पत्थर, हाथीदाँत और हस्तशिल्प। आयात (अंदर लाया): सोना-चाँदी, घोड़े, शराब, कुछ धातुएँ और विलासिता का सामान। भारत ख़रीदता कम, बेचता ज़्यादा था, इसलिए सोना-चाँदी अंदर आता रहा। इसे अनुकूल व्यापार संतुलन कहते हैं।
विश्व अर्थव्यवस्था में भारतीय उपमहाद्वीप का स्थान
आर्थिक इतिहासकारों का अनुमान है कि लगभग 1 ई. से 1700 ई. तक ज़्यादातर समय दुनिया के कुल उत्पादन का करीब एक-चौथाई से एक-तिहाई हिस्सा इस उपमहाद्वीप में बनता था। इसे "सोने की चिड़िया" कहा गया। औपनिवेशिक शासन में ब्रिटेन के सस्ते मशीनी कपड़े ने हथकरघे की जगह ले ली, कच्चा माल बाहर गया और मुनाफ़ा विदेश गया। 1950 तक हिस्सा लगभग 4% रह गया। आज़ादी के बाद भारत ने उद्योग फिर से खड़े किए और 1991 के सुधारों के बाद दुनिया के व्यापार के लिए फिर से दरवाज़े खोले।
करके देखिए
3D के आख़िरी चरण में साल वाला स्लाइडर खिसकाइए। किस साल बार सबसे ऊँचा है और किस साल सबसे छोटा, लिखिए। गिरावट का एक कारण बताइए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- हुंडी = दूसरी जगह पैसा चुकाने का लिखित आदेश (विनिमय-पत्र जैसा)
- श्रेणी (गिल्ड) = व्यापारियों या कारीगरों का संघ जो नियम बनाता और सदस्यों की मदद करता है
- अनुकूल व्यापार संतुलन = निर्यात > आयात
हल किए गए उदाहरण
1. सूरत के एक कपड़ा व्यापारी को वाराणसी के सप्लायर को ₹10,000 देने हैं। हुंडी से वह यह कैसे करेगा और यह सिक्के भेजने से बेहतर क्यों है?
वह सूरत के सेठ को ₹10,000 देता है। सेठ वाराणसी के अपने साथी सेठ के नाम हुंडी लिखता है। व्यापारी हुंडी सप्लायर को भेज देता है, जो वाराणसी में दिखाकर नकद ले लेता है। सिक्के सफ़र नहीं करते, इसलिए रास्ते में चोरी का डर नहीं।
2. एक हुंडी पर लिखा है "केवल जाने-माने व्यापारी शाह रामदास को भुगतान करें"। यह किस प्रकार की है?
शाह-जोग हुंडी: इसका भुगतान सिर्फ़ जाने-माने, सम्मानित व्यक्ति को होता है।
3. एक साल में एक बंदरगाह से 900 सोने के सिक्कों का निर्यात और 600 का आयात होता है। व्यापार संतुलन क्या है?
संतुलन = निर्यात − आयात = 900 − 600 = +300 सिक्के। यह अनुकूल है, यानी 300 सिक्कों जितना सोना-चाँदी अंदर आया।
4. एक बुनकर श्रेणी को पता चलता है कि एक सदस्य कम लंबाई का कपड़ा बेच रहा है। श्रेणी क्या कर सकती है?
वह गुणवत्ता नियमों के तहत चेतावनी या जुर्माना दे सकती है, ख़रीदारों को पैसे लौटवा सकती है और सभी सदस्यों का नाम बचा सकती है।
आम गलतियाँ
- हुंडी को ख़ुद पैसा समझना। यह पैसा चुकाने का लिखित आदेश है; सेठ इसके बदले भुगतान करता है।
- शाह-जोग और धनी-जोग में गड़बड़: शाह-जोग सिर्फ़ जाने-माने व्यक्ति को; धनी-जोग जिसके पास हो उसे।
- सोने को भारत का निर्यात लिखना। सोना-चाँदी ज़्यादातर भारतीय माल के भुगतान के रूप में अंदर आता था।
- यह कहना कि भारत हमेशा ग़रीब था। सदियों तक विश्व उत्पादन में इसका हिस्सा सबसे बड़े में था; बड़ी गिरावट औपनिवेशिक काल में आई।