व्यावसायिक वित्त की आवश्यकता
व्यावसायिक वित्त का मतलब है वह पैसा जो व्यवसाय शुरू करने, चलाने और बढ़ाने के लिए चाहिए। पैसे के बिना कोई काम शुरू नहीं होता।
पैसा क्यों चाहिए
- स्थायी पूँजी: लंबे समय तक रहने वाली चीज़ों के लिए, जैसे ज़मीन, भवन, मशीन, फ़र्नीचर। शुरू में ही चाहिए और रकम बड़ी होती है।
- कार्यशील पूँजी: रोज़ के काम के लिए, जैसे कच्चा माल, मज़दूरी, बिजली, किराया, स्टॉक। माल बिकता है, नकद लौटता है और फिर लगता है।
- विकास: नई शाखा, नई तकनीक, अनुसंधान के लिए।
- बुरा समय: बिक्री घटने या अचानक नुकसान से निपटने के लिए।
कितना पैसा चाहिए, यह व्यवसाय के आकार, प्रकार (कारख़ाने को दुकान से ज़्यादा स्थायी पूँजी) और बढ़ने की रफ़्तार पर निर्भर है।
स्वामित्व निधि
स्वामित्व निधि मालिकों का लगाया पैसा और रोका हुआ लाभ है। व्यवसाय चलते रहने तक इसे लौटाना नहीं पड़ता और तय लाभ देना ज़रूरी नहीं। जोखिम और नियंत्रण मालिकों का।
समता अंश (इक्विटी शेयर)
कंपनी अपनी पूँजी को छोटे हिस्सों (अंशों) में बाँटती है। समता अंशधारी असली मालिक हैं: सभा में वोट देते हैं, लाभ हो तभी और पूर्वाधिकार वालों के बाद लाभांश पाते हैं, कंपनी बंद हो तो सबसे आख़िर में पैसा। गुण: स्थायी पूँजी, घाटे में कोई बोझ नहीं। सीमा: नियंत्रण बँटता है, जारी करने में समय और ख़र्च।
पूर्वाधिकार अंश
पूर्वाधिकार अंशधारियों को दो प्राथमिकताएँ: तय दर से लाभांश इक्विटी से पहले, और कंपनी बंद होने पर पूँजी इक्विटी से पहले। आमतौर पर वोट नहीं। सावधान निवेशकों के लिए अच्छे। प्रकार: संचयी (न मिला लाभांश आगे जुड़ता है), शोध्य (समय बाद पैसा वापस), परिवर्तनीय (इक्विटी में बदल सकते हैं)।
प्रतिधारित आय
कंपनी सारा लाभ नहीं बाँटती। जो हिस्सा रखकर दोबारा लगाती है, वह प्रतिधारित आय (लाभ का पुनर्विनियोग) है। गुण: कोई लागत नहीं, बाहर वाला नहीं, काग़ज़ी काम नहीं, नियंत्रण वैसा ही। सीमा: लाभ घटता-बढ़ता है इसलिए रकम अनिश्चित; कम लाभांश से अंशधारी नाराज़ हो सकते हैं।
उधार निधि: लंबी अवधि
उधार निधि बाहर वालों से आती है। तय समय पर ब्याज के साथ लौटानी पड़ती है, घाटा हो तब भी। उधार देने वालों को नियंत्रण नहीं मिलता, पर वे आमतौर पर जमानत (संपत्ति की गारंटी) माँगते हैं।
ऋणपत्र और बॉन्ड
ऋणपत्र (डिबेंचर) कंपनी का लिखित वादा है कि उसने पैसा उधार लिया है और तय तारीख़ पर तय ब्याज के साथ लौटाएगी। ऋणपत्रधारी लेनदार हैं, मालिक नहीं। बॉन्ड भी ऐसे ही हैं, अक्सर सरकारी संस्थाएँ और बड़ी कंपनियाँ जारी करती हैं। गुण: ब्याज ख़र्च माना जाता है (कर बचता है), नियंत्रण मालिकों के पास। सीमा: तय ब्याज का बोझ, गिरवी संपत्ति खोने का डर।
व्यापारिक बैंकों से ऋण
बैंक छोटी, मध्यम और लंबी अवधि के ऋण और नकद साख देते हैं, आमतौर पर जमानत पर। जल्दी और गोपनीय, पर बहुत काग़ज़ और शर्तें।
वित्तीय संस्थाओं से ऋण
विशेष संस्थाएँ (IFCI, SIDBI, NABARD, राज्य वित्त निगम) नई परियोजनाओं और विस्तार के लिए लंबी अवधि का पैसा देती हैं, अक्सर सलाह भी। जब बैंक इतने लंबे समय के लिए न दें तब उपयोगी, पर प्रक्रिया धीमी।
उधार निधि: छोटी अवधि
जन जमा
कंपनी जनता से सीधे पैसा जमा करवाती है, आमतौर पर 3 साल तक। जमाकर्ता को बैंक बचत से थोड़ा ज़्यादा ब्याज मिलता है और कंपनी को बैंक ऋण से सस्ता पड़ता है। आसान, पर जनता के भरोसे और कानूनी सीमाओं पर निर्भर।
व्यापार साख
आपूर्तिकर्ता माल अभी देता है और भुगतान बाद में (जैसे 30 या 60 दिन) लेता है। खातों में लेनदार या देय बिल के रूप में दिखता है। गुण: कोई औपचारिकता नहीं, कार्यशील पूँजी में मदद। सीमा: ज़रूरत से ज़्यादा ख़रीद का लालच, सीमित रकम।
अंतर-निगमीय जमा (ICD)
फ़ालतू नकद वाली कंपनी दूसरी कंपनी के पास बिना जमानत थोड़े समय के लिए पैसा जमा करती है। अवधि एक दिन (माँग जमा), तीन महीने या छह महीने हो सकती है। जल्दी और अनौपचारिक, पर ब्याज ऊँचा हो सकता है।
स्रोत कैसे चुनें
- लागत: प्रतिधारित आय मुफ़्त; इक्विटी जारी करना महँगा।
- जोखिम: ज़्यादा उधार = घाटे में भी तय ब्याज।
- नियंत्रण: नए इक्विटी अंश नियंत्रण बाँटते हैं; उधार नहीं।
- अवधि: लंबी ज़रूरत के लिए लंबी अवधि का पैसा, छोटी के लिए छोटी।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- व्यावसायिक वित्त = स्वामित्व निधि + उधार निधि
- स्वामित्व निधि = समता अंश पूँजी + पूर्वाधिकार अंश पूँजी + प्रतिधारित आय
- लंबी अवधि: समता, पूर्वाधिकार, प्रतिधारित आय, ऋणपत्र/बॉन्ड, दीर्घकालीन ऋण
- छोटी अवधि: व्यापार साख, जन जमा (3 साल तक), ICD, बैंक नकद साख
- उधार पर ब्याज = उधार रकम × दर (घाटे में भी देना)
हल किए गए उदाहरण
1. कंपनी को ₹50 लाख चाहिए। ₹30 लाख इक्विटी से और ₹20 लाख 10% ऋणपत्रों से जुटाती है। घाटे में भी हर साल क्या देना पड़ेगा?
सिर्फ़ ऋणपत्र का ब्याज ज़रूरी है: 20 लाख × 10% = ₹2 लाख सालाना। इक्विटी लाभांश लाभ होने और घोषित होने पर ही।
2. वर्गीकरण करें: (क) ₹10 लाख की मशीन, (ख) इस महीने का कच्चा माल, (ग) मज़दूरी। स्थायी या कार्यशील पूँजी?
(क) स्थायी पूँजी (कई साल चलेगी)। (ख) और (ग) कार्यशील पूँजी (रोज़ का ख़र्च)।
3. आपूर्तिकर्ता दर्ज़ी को ₹80,000 का कपड़ा भेजता है और 45 दिन बाद पैसा माँगता है। यह कौन-सा स्रोत है?
व्यापार साख: माल अभी, भुगतान बाद में, आपूर्तिकर्ता से।
4. कंपनी ने ₹10 करोड़ लाभ कमाया, ₹4 करोड़ लाभांश दिया। प्रतिधारित आय कितनी और यह सस्ता स्रोत क्यों?
₹10 − ₹4 = ₹6 करोड़ रोका गया। सस्ता इसलिए कि न ब्याज, न जारी करने का ख़र्च, न नए मालिक।
5. बहुत स्थिर आय वाली कंपनी नए इक्विटी अंश की जगह ऋणपत्र क्यों पसंद करेगी?
स्थिर आय से तय ब्याज आसानी से दिया जा सकता है। ऋणपत्र नियंत्रण और लाभ नहीं बाँटते, और ब्याज कर-योग्य आय घटाता है, इसलिए मालिकों को ज़्यादा फ़ायदा।
आम गलतियाँ
- ऋणपत्रधारियों को मालिक कहना। वे लेनदार हैं; अंशधारी मालिक हैं।
- यह मानना कि पूर्वाधिकार अंशधारी हमेशा वोट देते हैं। आमतौर पर वे सिर्फ़ अपने अधिकारों से जुड़े मामलों पर वोट देते हैं।
- प्रतिधारित आय को उधार मानना। यह मालिकों का अपना रोका हुआ लाभ है, इसलिए स्वामित्व निधि है।
- छोटी अवधि के पैसे (व्यापार साख) से मशीन जैसी लंबी संपत्ति ख़रीदना। ज़रूरत और स्रोत की अवधि मिलाइए।