South 고등학교 3학년 Ethics and Thought
अध्याय: 4
1. Humans and ethical thought
Views of human nature · Why study ethical thought
- मानव स्वभाव: हम जन्म से अच्छे हैं, स्वार्थी हैं या कोरे? – मानव स्वभाव यानी वे गुण जो सब इंसानों में जन्म से होते हैं। विचारकों ने तीन मुख्य जवाब दिए। जन्म से अच्छा: मेन्सियस (चीन) ने दया, लज्जा, सम्मान और सही-गलत की समझ के चार जन्मजात 'अंकुर' बताए जो देखभाल से बढ़ते हैं; रूसो (फ़्रांस) ने कहा इंसान स्वभाव से अच्छा है पर असमान समाज उसे बिगाड़ता है। जन्म से स्वार्थी: शुन्ज़ी (चीन) ने कहा स्वभाव स्वार्थी है और भलाई सोच-समझकर की गई मेहनत, नियम और पढ़ाई से आती है; हॉब्स (इंग्लैंड) ने कहा सरकार के बिना सबकी सबसे लड़ाई होगी। जन्म से कोरा: लॉक (इंग्लैंड) ने मन को कोरी पट्टी (टैबुला रासा) कहा जिस पर अनुभव लिखता है; गाओज़ी ने स्वभाव को पानी जैसा बताया जो किसी भी ओर बह सकता है। आज के कई विचार मिले-जुले हैं: हममें दया और स्वार्थ दोनों हैं और माहौल बहुत मायने रखता है। सब मानते हैं कि इंसान अपूर्ण और अधूरा है, इसलिए सीख और बढ़ सकता है। इसी से जीवन के अर्थ का सवाल आता है: सद्गुण और फलना-फूलना (अरस्तू, कन्फ़्यूशियस), प्रेम और सेवा, आस्था, या खुद बनाया अर्थ (फ्रैंकल, सार्त्र, कामू)।
- नीतिशास्त्र: कैसे तय करें कि क्या सही है – नीतिशास्त्र (नैतिक दर्शन) पूछता है कि हमें क्या करना चाहिए और क्यों। ईमानदारी, दया, न्याय और सम्मान जैसे मूल्य चुनाव में राह दिखाते हैं। तीन मुख्य सिद्धांत: परिणाम (उपयोगितावाद, बेंथम और मिल: ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का ज़्यादा भला), कर्तव्य (कांट: ऐसा नियम अपनाओ जो सब अपना सकें; लोगों को साध्य मानो, सिर्फ़ साधन नहीं) और सद्गुण (अरस्तू: अच्छा चरित्र बनाओ; सद्गुण दो अतियों का मध्य है)। अंतरात्मा सही-ग़लत की भीतरी समझ है। स्वतंत्रता ज़िम्मेदारी लाती है। अधिनीतिशास्त्र पूछता है "अच्छा" का अर्थ क्या है और मूल्य सार्वभौमिक हैं या सापेक्ष। व्यावहारिक नीतिशास्त्र पर्यावरण, पशु, काम, मित्रता और शांति पर लागू होता है।
2. Eastern and Korean thought
Roots of Korean ethics · Classical Confucianism · Yi Hwang and Yi I · Early Buddhism · Korean Buddhism · Laozi and Zhuangzi · Thought in modern upheaval
- कन्फ़्यूशियसवाद – कन्फ़्यूशियसवाद जीने का एक तरीका है, जो चीन के शिक्षक कन्फ़्यूशियस (लगभग 551–479 ई.पू.) ने सिखाया। इसके केंद्र में हैं रेन (दूसरों के प्रति दया) और ली (आदरपूर्ण व्यवहार)। इन्हें पाँच रिश्तों में निभाकर इंसान अच्छा बनता है: शासक-प्रजा, माता-पिता और संतान, पति-पत्नी, बड़े-छोटे और मित्र। मेंशियस ने कहा कि मानव स्वभाव जन्म से अच्छा है, अंकुर की तरह; ज़ुन्ज़ी ने कहा कि उसे शिक्षा और नियमों से ढालना पड़ता है। नव-कन्फ़्यूशियसवाद (लगभग 11वीं-12वीं सदी) ने इन विचारों को ब्रह्मांड की व्याख्या और आत्म-सुधार से जोड़ा।
- ताओवाद (दाओवाद) – ताओवाद प्राचीन चीन की सोच है कि हमें दाओ, यानी प्रकृति की 'राह' के साथ तालमेल में जीना चाहिए। लाओज़ी (ताओ ते चिंग) ने कोमलता, सरलता और वू वेई, यानी बिना ज़ोर लगाए कर्म, सिखाया। ज़ुआंगज़ी ने कहानियों से दिखाया कि बड़ा-छोटा, अच्छा-बुरा जैसे विचार हमारे नज़रिए पर निर्भर हैं, इसलिए हमें स्वतंत्र और लचीला होना चाहिए। यिन और यांग बताते हैं कि विपरीत चीज़ें एक-दूसरे को संतुलित करती हैं। आज वू वेई का अर्थ है प्रकृति और अपनी सीमाओं के साथ काम करना, उनसे लड़ना नहीं।
3. Western ethical thought
Origins: Sophists and Socrates · Plato · Aristotle, Epicureans, Stoics · Christian ethics · Reason and sentiment · Kant and utilitarianism · Existentialism and pragmatism
- सद्गुण नीतिशास्त्र: अच्छा इंसान कैसे बनें – सद्गुण नीतिशास्त्र पूछता है "मुझे कैसा इंसान बनना चाहिए?", सिर्फ़ "कौन-सा नियम मानूँ?" नहीं। हर कर्म में इरादा, साधन, कर्म और परिणाम होते हैं। सुकरात ने सिखाया कि सद्गुण ज्ञान है। प्लेटो ने आत्मा के तीन हिस्सों (बुद्धि, उत्साह, इच्छा) को चार मूल सद्गुणों से जोड़ा: प्रज्ञा, साहस, संयम और न्याय। अरस्तू ने कहा कि हर लक्ष्य अंत में यूडेमोनिया (अच्छा जीवन) की ओर जाता है, और हर नैतिक सद्गुण दो दोषों के बीच का स्वर्णिम मध्य है, जो आदत से बनता है और व्यावहारिक बुद्धि से पहचाना जाता है।
- नीतिशास्त्र: कैसे तय करें कि क्या सही है – नीतिशास्त्र (नैतिक दर्शन) पूछता है कि हमें क्या करना चाहिए और क्यों। ईमानदारी, दया, न्याय और सम्मान जैसे मूल्य चुनाव में राह दिखाते हैं। तीन मुख्य सिद्धांत: परिणाम (उपयोगितावाद, बेंथम और मिल: ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का ज़्यादा भला), कर्तव्य (कांट: ऐसा नियम अपनाओ जो सब अपना सकें; लोगों को साध्य मानो, सिर्फ़ साधन नहीं) और सद्गुण (अरस्तू: अच्छा चरित्र बनाओ; सद्गुण दो अतियों का मध्य है)। अंतरात्मा सही-ग़लत की भीतरी समझ है। स्वतंत्रता ज़िम्मेदारी लाती है। अधिनीतिशास्त्र पूछता है "अच्छा" का अर्थ क्या है और मूल्य सार्वभौमिक हैं या सापेक्ष। व्यावहारिक नीतिशास्त्र पर्यावरण, पशु, काम, मित्रता और शांति पर लागू होता है।
- अस्तित्ववाद: आप वही हैं जो आप चुनते हैं – अस्तित्ववाद (Existentialism) 19वीं–20वीं सदी की एक सोच है जो इंसान की ज़िंदगी को देखती है। मुख्य बात: इंसान के लिए अस्तित्व सार से पहले आता है। औज़ार का उद्देश्य पहले तय होता है; इंसान पहले पैदा होता है, फिर अपने चुनावों से खुद को बनाता है। इसलिए हम स्वतंत्र हैं, और इस आज़ादी के साथ चिंता और पूरी ज़िम्मेदारी आती है। यास्पर्स ने बताया कि सीमा-स्थितियाँ (मृत्यु, दुख, संघर्ष, अपराध-बोध) हमें जगाती हैं। भीड़ या किस्मत के पीछे छिपना बुरा विश्वास है; अपने चुनाव अपनाना प्रामाणिकता है। प्रमुख विचारक: कीर्केगार्द, नीत्शे, हाइडेगर, यास्पर्स, सार्त्र, सिमोन द बोउवार, कामू; स्पेनी विचार में उनामुनो और ओर्तेगा इ गासेत।
4. Social thought
Ideal societies · The state · Individual and community · Democracy · Capitalism and socialism · Peace thought
- राजनीतिक दर्शन: राज्य, शक्ति और न्याय – राजनीतिक दर्शन साथ रहने के बड़े सवाल पूछता है: राज्य क्यों चाहिए? कौन-सी शक्ति सही (वैध) है? न्याय क्या है? लोगों को कितनी स्वतंत्रता और समानता मिले? सामाजिक अनुबंध के विचारक (हॉब्स, लॉक, रूसो) राज्य को एक समझौता मानते हैं। प्लेटो और अरस्तू ने आदर्श राज्य और सरकार के रूप बताए; सिसरो ने गणराज्य को क़ानून के तहत जनता की साझी संपत्ति कहा। रॉल्स, मिल और कई परंपराओं के विचारक (कन्फ़्यूशियस, कौटिल्य, उबुंटू) स्वतंत्रता, समानता, संपत्ति और समुदाय को तौलने में मदद करते हैं।
- लोकतंत्र: सिद्धांत, चुनाव और सत्ता पर रोक – लोकतंत्र में आख़िरी ताक़त जनता के पास होती है। इसके मुख्य सिद्धांत हैं: राजनीतिक समानता, बहुमत का शासन पर अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित, विधि का शासन, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, और सत्ता पर सीमाएँ। लोग सीधे (जनमत संग्रह) या चुने हुए प्रतिनिधियों के ज़रिए फ़ैसला करते हैं। चुनाव का नियम (FPTP या आनुपातिक प्रणाली) तय करता है कि सीटें किसे मिलेंगी। संविधान सत्ता को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में बाँटता है ताकि हर अंग दूसरे पर नज़र रखे। चुनावों के बीच भी नागरिक मीडिया, दबाव समूह, अदालत, याचिका और शांतिपूर्ण विरोध से नीति पर असर डालते हैं।
- आर्थिक प्रणालियाँ: क्या, कैसे और किसके लिए, कौन तय करता है? – हर समाज के पास साधन सीमित हैं, इसलिए उसे तय करना पड़ता है कि क्या बनाए, कैसे बनाए और किसके लिए। पारंपरिक अर्थव्यवस्था में रीति-रिवाज, बाज़ार अर्थव्यवस्था में कीमतें और निजी फ़ैसले, और आदेश (नियोजित) अर्थव्यवस्था में सरकार की योजना यह तय करती है। पूँजीवाद निजी संपत्ति और बाज़ार पर टिका है; समाजवाद साझा या सरकारी स्वामित्व और योजना पर। असली देश मिश्रित हैं: ज़्यादातर चीज़ें बाज़ार बनाता है, और सरकार जन-सेवाएँ, नियम और सहायता देती है।
- शांति शिक्षा: लोग स्थायी शांति कैसे बनाते हैं – शांति का मतलब सिर्फ़ 'युद्ध नहीं' नहीं है। नकारात्मक शांति = लड़ाई नहीं। सकारात्मक शांति = सबके लिए न्याय, भरोसा और अच्छा जीवन। हिंसा तीन तरह की होती है: प्रत्यक्ष (मारना, युद्ध), संरचनात्मक (अन्यायी नियम जो लोगों को गरीब रखें) और सांस्कृतिक (ऐसे विचार जो नुकसान को सामान्य दिखाएँ)। विचारकों ने रास्ते दिए: मोज़ी ने सबसे बराबर प्रेम और हमलावर युद्ध का विरोध सिखाया; कांट ने कहा न्यायपूर्ण सरकारें, आज़ाद देशों का संघ और मेहमानों से अच्छा बर्ताव शांति को स्थायी बनाते हैं; गांधी ने अहिंसक विरोध दिखाया। टकराव क़दम-दर-क़दम सुलझता है: शांत हों, सुनें, ज़रूरत खोजें, उपाय सोचें, समझौता करें। बँटवारे या युद्ध के बाद मेल-मिलाप पुल की तरह बनता है: बातचीत, सच, माफ़ी, व्यापार, परिवार मिलन और साझा काम। जर्मनी (1990) और दक्षिण अफ़्रीका का सत्य आयोग इसके उदाहरण हैं; कोरियाई प्रायद्वीप जैसे बँटे लोग आज भी शांतिपूर्ण एकीकरण पर चर्चा करते हैं।