CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र
अध्याय: 11
1. भारतीय समाज: एक परिचय
भारतीय समाज: एक परिचय
- भारतीय समाज: एक परिचय – अपने ही समाज को पढ़ना खास है: हमें लगता है कि हम उसे पहले से जानते हैं, इसलिए पहले कुछ बातें 'अनसीखनी' पड़ती हैं और नई नज़र से देखना पड़ता है। इसे स्व-प्रतिबिंब (सेल्फ़-रिफ़्लेक्सिविटी) कहते हैं: खुद को वैसे देखना जैसे दूसरे देखते हैं। आधुनिक भारतीय समाज को उपनिवेशवाद (अंग्रेज़ी राज) ने बहुत बदला: अर्थव्यवस्था, कानून और विचार। उपनिवेशी राज के खिलाफ़ संघर्ष से राष्ट्रवाद बना, यानी 'हम एक राष्ट्र हैं' की भावना। साथ ही नए वर्ग (मज़दूर, पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग) बने, और पुराने समुदाय (जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा) नए रूप में बने रहे।
2. भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना
जनसांख्यिकीय संरचना
- भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना – जनसांख्यिकी यानी जनसंख्या का अध्ययन: कितने लोग हैं, कैसे बढ़ते हैं, और कौन हैं (उम्र, लिंग, जगह)। माल्थस ने कहा जनसंख्या भोजन से तेज़ बढ़ती है, इसलिए भूख उसे रोकती है। जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत बताता है कि समाज ऊँची जन्म और मृत्यु दर से, मृत्यु दर पहले घटने पर जनसंख्या विस्फोट से होते हुए, कम जन्म और मृत्यु दर तक पहुँचता है। मुख्य माप हैं: जन्म दर, मृत्यु दर, वृद्धि दर, प्रजनन दर, शिशु और मातृ मृत्यु दर, जीवन प्रत्याशा, लिंग अनुपात और निर्भरता अनुपात। भारत की जनसंख्या युवा है; युवाओं को काम और कौशल मिले तो यह जनसांख्यिकीय लाभांश बन सकती है। गाँव और शहर प्रवास, व्यापार और मीडिया से जुड़े हैं, पर काम, सुविधाओं और आय में बँटे भी हैं। भारत की जनसंख्या नीति 1952 के परिवार नियोजन से, आपातकाल की ज़बरदस्ती नसबंदी से होकर, राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 तक पहुँची, जो स्वास्थ्य, शिक्षा और अपनी पसंद पर ज़ोर देती है।
- विश्व जनसंख्या: वितरण, घनत्व और वृद्धि – धरती पर लोग बराबर नहीं फैले। ज़्यादातर लोग पानी के पास उपजाऊ मैदानों में रहते हैं; मरुस्थल, ऊँचे पर्वत और बर्फ़ीले इलाक़ों में बहुत कम। घनत्व बताता है कि हर वर्ग किमी पर कितने लोग हैं। भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक कारक यह पैटर्न समझाते हैं। हज़ारों साल जनसंख्या धीरे बढ़ी, फिर 1800 के बाद बहुत तेज़ी से। जनसंख्या जन्म, मृत्यु और प्रवास से बदलती है। जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत बताता है कि गाँव की खेती से शहरी उद्योग की ओर बढ़ते समाज में जन्म और मृत्यु दर कैसे गिरती हैं। देश परिवार नियोजन और स्वास्थ्य सेवा से वृद्धि नियंत्रित करते हैं।
3. सामाजिक संस्थाएँ: निरंतरता एवं परिवर्तन
जाति, जनजाति और परिवार
- जाति और जाति व्यवस्था – जाति वह व्यवस्था है जो लोगों को जन्म से समूहों में बाँटती है। हर समूह (जाति) अपने अंदर शादी करता है, एक पारंपरिक पेशे से जुड़ा था, और शुद्धता-अशुद्धता के विचार से ऊँचा या नीचा माना जाता था। चार वर्णों की योजना ऊँच-नीच का पुराना विचार है; असल जीवन हज़ारों स्थानीय जातियों में जिया गया। उपनिवेशी राज ने जाति को बदला: जनगणना ने जातियों को गिना और क्रम दिया, ज़मीन के कानूनों ने ऊँची जातियों की मदद की, और 'दलित वर्गों' की सूचियाँ बाद में अनुसूचित जातियाँ बनीं। आज़ादी के बाद संविधान ने छुआछूत खत्म की और आरक्षण दिया; सार्वजनिक जीवन में जाति कमज़ोर हुई, पर शादी और राजनीति में मज़बूत रही। ज़मीन और संख्या वाली प्रबल जातियाँ ताकतवर बनीं। ऊँची जातियों को जाति अक्सर 'अदृश्य' लगती है क्योंकि उनका फ़ायदा पहले से जमा है, जबकि दलितों और पिछड़ी जातियों के लिए जाति बहुत दिखती है।
- परिवार और नातेदारी – परिवार वह पहला समूह है जिसमें हम होते हैं, और नातेदारी खून और शादी से जुड़े रिश्तेदारों का जाल है। परिवार कई रूपों में होते हैं। एकल परिवार में माता-पिता और अविवाहित बच्चे होते हैं; विस्तारित (संयुक्त) परिवार में एक से ज़्यादा पीढ़ी या कई दंपति साथ रहते और खाना बनाते हैं। परिवार इसमें भी अलग होते हैं कि नया दंपति कहाँ रहे (पितृस्थानीय: पति के परिवार में; मातृस्थानीय: पत्नी के परिवार में), वंश और संपत्ति कैसे आगे जाए (पितृवंशीय: पिता से; मातृवंशीय: माँ से) और अधिकार किसका हो (पितृसत्तात्मक या मातृसत्तात्मक)। मेघालय के खासी मातृवंशीय हैं, फिर भी पुरुषों (माँ के भाई) के पास बहुत अधिकार रहता है, इसलिए मातृवंश मातृसत्ता नहीं है। प्रवास, नौकरी और कानून जैसे संरचनात्मक बदलाव परिवार बदलते हैं, पर बदलाव एक ही दिशा में नहीं होता। परिवार के अंदर लैंगिक असमानता बेटे की चाह और गिरते बाल लिंग अनुपात में दिखती है।
- भारत के जनजातीय समुदाय – जनजाति (आदिवासी समुदाय) वह समूह है जिसमें पारंपरिक रूप से कड़ी जातिगत ऊँच-नीच नहीं थी, ज़मीन पूरे समुदाय की होती थी, और लोग जंगलों-पहाड़ों के पास रहते थे। भारत की अनुसूचित जनजातियाँ जनसंख्या का लगभग 8.6% हैं। समाजशास्त्री जनजातियों को स्थायी विशेषकों (क्षेत्र, भाषा परिवार, शारीरिक लक्षण, आकार) और अर्जित विशेषकों (जीविका का तरीका, और हिंदू या दूसरी परंपराओं को कितना अपनाया) से बाँटते हैं। बहस हुई कि जनजातियाँ बस 'पिछड़ी जातियाँ' हैं या अलग समाज, और उन्हें अलग रखा जाए या मुख्यधारा से जोड़ा जाए। बाँध, खदान और कारखानों वाले राष्ट्रीय विकास ने अक्सर जनजातीय ज़मीन और जंगल लिए और लाखों लोगों को विस्थापित किया। आज जनजातीय पहचान इन्हीं संघर्षों, झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्य दिलाने वाले आंदोलनों, और जनजातियों के अंदर बने नए पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग से बनती है।
4. सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप
विषमता और बहिष्कार
- सामाजिक विषमता और बहिष्कार के स्वरूप – सामाजिक विषमता का मतलब है कि कुछ समूहों को पैसा, सम्मान और पहचान ज़्यादा मिलती है, और कुछ को कम। यह योग्यता से नहीं, जन्म वाले समूह से तय होता है। सामाजिक बहिष्कार का मतलब है लोगों को समाज के पूरे जीवन से बाहर रखना। इस पाठ में जाति और अस्पृश्यता, जनजाति और आदिवासी संघर्ष, अन्य पिछड़ा वर्ग, स्त्रियों की समानता की लड़ाई और दिव्यांगों के अधिकार आसान शब्दों में समझेंगे।
5. सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ
सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्र-राज्य
- सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ – भारत में अनेक भाषाएँ, धर्म, क्षेत्र और जनजातियाँ हैं। विविधता का अर्थ है अंतर, ऊँच-नीच नहीं। समुदाय लोगों को अपनापन देते हैं, पर जब वे टकराते हैं तो राष्ट्र-राज्य को तय करना होता है कि उनसे कैसे बरते। भारत ने भाषाई राज्यों, संघवाद, अल्पसंख्यक अधिकारों और अपनी तरह की धर्मनिरपेक्षता से विविधता को स्वीकारा। इस पाठ में सामुदायिक पहचान, क्षेत्रवाद, धर्म, सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और नागरिक समाज आसान भाषा में समझेंगे।
6. परियोजना कार्य हेतु सुझाव
परियोजना विधियाँ
- समाजशास्त्रीय शोध विधियाँ – समाजशास्त्री समाज को शोध से समझते हैं, कदम-दर-कदम: विषय चुनो, उद्देश्य या परिकल्पना लिखो, छोटा पायलट अध्ययन करो, नमूना चुनो, आँकड़े जुटाओ, विश्लेषण करो और निष्कर्ष निकालो। नमूना पूरी आबादी में से चुना गया छोटा समूह है; यह प्रतिनिधि होना चाहिए ताकि नतीजे सब पर लागू हों। मात्रात्मक आँकड़े संख्याएँ हैं (प्रश्नावली, संरचित साक्षात्कार, सरकारी आँकड़े); गुणात्मक आँकड़े शब्द और अर्थ हैं (असंरचित साक्षात्कार, अवलोकन, दस्तावेज़)। प्राथमिक आँकड़े शोधकर्ता खुद जुटाता है; द्वितीयक पहले से मौजूद होते हैं। अच्छा शोध विश्वसनीय (दोहराने पर वही नतीजा), वैध (सच्ची तस्वीर) और प्रतिनिधि होता है। विधि का चुनाव व्यावहारिक (समय, पैसा, पहुँच), नैतिक (सहमति, गोपनीयता, नुकसान न हो) और सैद्धांतिक कारणों से होता है: प्रत्यक्षवादी (positivist) संख्याएँ पसंद करते हैं, व्याख्यावादी (interpretivist) लोगों के अर्थ समझना।
7. संरचनात्मक परिवर्तन
संरचनात्मक परिवर्तन
- भारत में संरचनात्मक परिवर्तन: उपनिवेशवाद, औद्योगीकरण और नगरीकरण – संरचनात्मक परिवर्तन का अर्थ है समाज के बुनियादी ढाँचे में बदलाव: लोग कहाँ रहते हैं, क्या काम करते हैं और कैसे कमाते हैं। भारत में यह तीन बड़ी ताकतों से हुआ। उपनिवेशवाद: अंग्रेज़ों ने भारत को कच्चे माल का स्रोत और अपने माल का बाज़ार बनाया, जिससे हस्तशिल्प उजड़े (वि-औद्योगीकरण)। औद्योगीकरण: पहले कुछ औपनिवेशिक मिलें और बागान, फिर 1947 के बाद राज्य द्वारा इस्पात संयंत्र, बाँध और कारख़ाने। नगरीकरण: पुराने कारीगरी नगर सिकुड़े, अंग्रेज़ों के समय नए बंदरगाह नगर बढ़े, और आज़ादी के बाद शहर तेज़ी से बढ़े जहाँ ज़्यादातर लोग अनौपचारिक काम करते हैं।
8. सांस्कृतिक परिवर्तन
सांस्कृतिक परिवर्तन
- भारत में सांस्कृतिक परिवर्तन: समाज सुधार, संस्कृतीकरण और अन्य प्रक्रियाएँ – सांस्कृतिक परिवर्तन यानी लोगों के विचारों, रीति-रिवाज़ों और मूल्यों में बदलाव। 19वीं सदी के भारत में समाज सुधारकों ने सती, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह पर रोक और छुआछूत जैसी प्रथाओं के विरुद्ध संघर्ष किया, और छापाख़ाने व सभाओं जैसे नए साधन अपनाए। बाद के सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए समाजशास्त्री चार शब्द इस्तेमाल करते हैं: संस्कृतीकरण (निचली जाति ऊँची जाति के रिवाज़ अपनाकर ऊपर उठती है), पश्चिमीकरण (पश्चिमी संपर्क से बदलाव), आधुनिकीकरण (तर्क, विज्ञान और चुनाव की ओर) और धर्मनिरपेक्षीकरण (सार्वजनिक जीवन पर धर्म का नियंत्रण घटना)।
9. ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन
ग्रामीण परिवर्तन
- ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन: ज़मीन, जाति और वर्ग – ज़्यादातर ग्रामीण लोग ज़मीन पर निर्भर हैं, पर ज़मीन बहुत असमान रूप से बँटी है, और जाति व वर्ग आपस में जुड़े हैं: बड़े भूस्वामी ज़्यादातर ऊँची या प्रबल जातियों के, भूमिहीन मज़दूर ज़्यादातर दलित और आदिवासी। 1947 के बाद भूमि सुधारों ने ज़मींदारी ख़त्म की, काश्तकारों को सुरक्षा दी और भूमि हदबंदी लगाई, पर छेदों ने इन्हें सीमित कर दिया। हरित क्रांति ने नए बीज, उर्वरक और सिंचाई से उत्पादन बढ़ाया, पर सबसे ज़्यादा लाभ बड़े किसानों और कुछ क्षेत्रों को मिला। गाँव बदले: मशीनें, नकद मज़दूरी, पुराने संरक्षक-आश्रित संबंधों का अंत। ग़रीब मज़दूर अब काम के लिए क्षेत्रों के बीच आते-जाते हैं, महिलाएँ ज़्यादा खेती करती हैं, और वैश्वीकरण से अनुबंध खेती, महँगी लागत, दामों में उतार-चढ़ाव और किसानों का संकट आया।
- भारत में ग्रामीण विकास – ग्रामीण विकास यानी गाँव के लोगों का जीवन स्तर उठाना: सस्ता कर्ज़, सही बाज़ार, सड़क और बिजली, स्कूल और स्वास्थ्य, तरह-तरह के काम और ज़मीन की देखभाल। किसानों को साहूकार की जगह बैंक, नाबार्ड, सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों से कर्ज़ चाहिए। नियंत्रित मंडी, भंडार और सहकारिता से सही दाम मिलता है। डेयरी, मछली पालन, बागवानी और गैर-कृषि काम से आय बढ़ती है। जैविक खेती मिट्टी और भोजन को सुरक्षित रखती है।
10. औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास
औद्योगिक परिवर्तन
- औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास – भारत में उद्योग सरकार की योजनाओं से शुरू होकर 1991 के बाद उदारीकरण तक पहुँचे। इस पाठ में देखेंगे कि लोगों को काम कैसे मिलता है, काम कैसे बँटता है, घर पर काम करने वालों का जीवन कैसा है, और मज़दूर यूनियन क्यों बनाते हैं और हड़ताल क्यों करते हैं।
11. सामाजिक आंदोलन
सामाजिक आंदोलन
- सामाजिक आंदोलन – सामाजिक आंदोलन बहुत-से लोगों का एक साझा लक्ष्य के लिए लंबा और संगठित प्रयास है, जो समाज बदलना चाहता है। जानिए आंदोलन की पहचान, आंदोलन शुरू होने के तीन सिद्धांत, मुख्य प्रकार, और भारत के पर्यावरण, किसान, मज़दूर, दलित व पिछड़ा वर्ग, आदिवासी और महिला आंदोलन।