जनजाति क्या है?
जनजाति उन समुदायों के लिए आधुनिक शब्द है जो बहुत पुराने हैं और भारत के सबसे पहले निवासियों में थे। बहुत से लोग खुद को आदिवासी ('मूल निवासी') कहते हैं।
- पारंपरिक रूप से इनमें कड़ी जातिगत ऊँच-नीच नहीं थी और समुदाय के अंदर संगठित राज्य नहीं था।
- ज़मीन और जंगल अक्सर पूरे समुदाय के होते थे, किसी एक व्यक्ति के नहीं।
- इन्हें ज़्यादातर इस बात से परिभाषित किया गया कि वे क्या नहीं हैं (न जाति वाले हिंदू, न ज़मींदार के किसान); समाजशास्त्री इसे परिभाषा की कमज़ोरी मानते हैं।
अनुसूचित जनजातियाँ भारत की जनसंख्या का लगभग 8.6% हैं (जनगणना 2011)। ज़्यादा जनजातियाँ मध्य भारत और पूर्वोत्तर में रहती हैं।
जनजातीय समाजों का वर्गीकरण
स्थायी विशेषक (आसानी से नहीं बदलते)
- क्षेत्र: ज़्यादातर मध्य भारत (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र) और पूर्वोत्तर में।
- भाषा: चार परिवार: भारतीय-आर्य (जैसे भीली), द्रविड़ (जैसे गोंडी), आस्ट्रिक (जैसे संथाली, मुंडारी) और तिब्बती-बर्मी (पूर्वोत्तर की बहुत सी भाषाएँ)।
- शारीरिक/प्रजातीय बँटवारा पहले होता था, पर अब इसे भरोसेमंद नहीं माना जाता।
- आकार: गोंड, भील और संथाल जैसी बहुत बड़ी जनजातियों (लाखों लोग) से लेकर कुछ सौ लोगों के छोटे समूह तक।
अर्जित विशेषक (समय के साथ बदलते हैं)
- जीविका: मछुआरे, संग्राहक और शिकारी, झूम खेती करने वाले, किसान, बागान और औद्योगिक मज़दूर।
- हिंदू समाज में समावेश: हिंदू रिवाज़ अपनाने वालों से लेकर अपना धर्म रखने वाले या ईसाई बने समूहों तक।
जनजाति और जाति: बहसें
क्या जनजातियाँ जातियों से अलग हैं?
कुछ विद्वानों ने कहा जनजातियाँ बस जाति व्यवस्था के नीचे के 'पिछड़े हिंदू' हैं। दूसरों ने कहा जनजातियाँ कभी जाति व्यवस्था का हिस्सा नहीं थीं और उनका अपना सामाजिक जीवन है। आज हम देखते हैं कि जनजातियाँ पूरी तरह अलग-थलग नहीं थीं: वे व्यापार करती थीं, लड़ती थीं और राज्य बनाती थीं (जैसे गोंड राज्य), और बहुत सी धीरे-धीरे जाति समाज में खिंच आईं।
अलगाव या एकीकरण?
- अलगाववादी (जैसे वेरियर एल्विन) कहते थे कि जनजातियों को व्यापारियों, सूदखोरों और बाहरी लोगों से बचाना ज़रूरी है जो उनकी ज़मीन हड़पते हैं।
- एकीकरणवादी कहते थे कि जनजातियाँ मुख्यधारा से जुड़ें और विकास का लाभ लें।
- संविधान ने बीच का रास्ता लिया: विशेष सुरक्षा (पाँचवीं और छठी अनुसूची, आरक्षित सीटें) और एकीकरण।
असली सवाल बना: एकीकरण किसकी शर्तों पर? जनजातियाँ अपनी ज़मीन और जंगल पर अपनी बात चाहती थीं।
राष्ट्रीय विकास बनाम जनजातीय विकास
- आज़ादी के बाद बाँध, खदान, कारखाने और वन कानून 'राष्ट्रीय' विकास के लिए बने।
- जनजातियों ने बहुत कम या बिना मुआवज़े के ज़मीन और जंगल खोए। नर्मदा जैसे बड़े बाँधों ने बहुत से आदिवासियों को विस्थापित किया।
- वन कानूनों ने पीढ़ियों से जंगल में रहने वालों को 'अतिक्रमणकारी' बना दिया।
- बाहरी लोग जनजातीय इलाकों में आकर बसे (जैसे पूर्वोत्तर और झारखंड में), और कुछ जनजातियाँ अपने ही इलाके में अल्पसंख्यक बन गईं।
यानी राष्ट्रीय विकास की कीमत जनजातियों ने भारी चुकाई, जबकि ज़्यादातर फ़ायदा कहीं और गया।
आज की जनजातीय पहचान
- जनजातीय पहचान ज़मीन और जंगल खोने के विरोध से बनी है।
- लंबे आंदोलनों से अलग राज्य बने: झारखंड और छत्तीसगढ़ (2000)।
- शिक्षा और आरक्षित नौकरियों से एक जनजातीय मध्यम वर्ग बना है। इससे जनजातियों के अंदर नए वर्गीय अंतर बने।
- आज के मुख्य मुद्दे: ज़मीन और जंगल पर नियंत्रण (जैसे वन अधिकार अधिनियम 2006) और सांस्कृतिक पहचान की मान्यता।
- पूर्वोत्तर में 'अशांत क्षेत्रों' के विशेष कानूनों की आलोचना हुई है कि वे नागरिकों के अधिकार सीमित करते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- जनजाति (आदिवासी): पारंपरिक रूप से कड़ी जातिगत ऊँच-नीच के बिना, साझा ज़मीन वाला समुदाय।
- स्थायी विशेषक: क्षेत्र, भाषा परिवार, शारीरिक लक्षण, आकार।
- अर्जित विशेषक: जीविका का तरीका; हिंदू (या अन्य) समाज में समावेश की मात्रा।
- चार भाषा परिवार: भारतीय-आर्य, द्रविड़, आस्ट्रिक, तिब्बती-बर्मी।
- अलगाव मत: जनजातियों को बाहरी लोगों से बचाओ। एकीकरण मत: मुख्यधारा से जोड़ो।
- विस्थापन: बाँध या खदान जैसी परियोजनाओं के लिए लोगों को ज़मीन से हटाना।
- अनुसूचित जनजातियाँ ≈ भारत की जनसंख्या का 8.6% (जनगणना 2011)।
हल किए गए उदाहरण
1. ओडिशा की एक जनजाति संथाली बोलती है और स्थायी खेती करती है। एक स्थायी और एक अर्जित विशेषक बताइए।
स्थायी: भाषा परिवार (आस्ट्रिक, संथाली) या क्षेत्र। अर्जित: जीविका, यानी स्थायी खेती।
2. एक खनन कंपनी को वह जंगल मिलता है जहाँ से एक आदिवासी गाँव फल और लकड़ी लेता है। इस अध्याय से टकराव समझाइए।
राष्ट्रीय विकास (उद्योग के लिए खनन) बनाम जनजातीय विकास (जंगल वाली जीविका)। गाँव विस्थापित हो सकता है और साझा ज़मीन खो सकता है, जबकि ज़्यादातर फ़ायदा बाहर के लोगों को जाता है।
3. संविधान ने पूरा अलगाव या पूरा एकीकरण क्यों नहीं चुना?
पूरा अलगाव जनजातियों को स्कूल, स्वास्थ्य और अधिकारों से दूर रखता; ज़बरदस्ती एकीकरण बाहरी लोगों को ज़मीन हड़पने देता। इसलिए विकास के साथ विशेष सुरक्षा (अनुसूचियाँ, आरक्षित सीटें) दी गई।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि जनजातियाँ हमेशा पूरी तरह अलग-थलग थीं। वे व्यापार करती, युद्ध लड़ती और राज्य भी बनाती थीं।
- स्थायी और अर्जित विशेषकों को मिलाना। जीविका और धर्म अर्जित हैं; क्षेत्र, भाषा और आकार स्थायी।
- मान लेना कि हर विकास जनजातियों की मदद करता है। बहुत सी परियोजनाओं ने उनकी ज़मीन और जंगल लिए।
- सोचना कि सब आदिवासी एक ही वर्ग के हैं। एक जनजातीय मध्यम वर्ग बना है और अंदर असमानता है।