सामाजिक विषमता क्या है?
सामाजिक विषमता यानी पैसा, सम्मान, ताकत और संपर्क जैसी कीमती चीज़ें समूहों में बराबर नहीं बँटतीं। यह किसी एक व्यक्ति की मेहनत की बात नहीं, पूरे समूहों में बार-बार दिखने वाले ढाँचे की बात है।
तीन तरह की पूँजी
- आर्थिक पूँजी: पैसा, ज़मीन, संपत्ति।
- सांस्कृतिक पूँजी: शिक्षा, हुनर, बोलने-बरतने का 'सही' ढंग।
- सामाजिक पूँजी: मदद करने वाले दोस्तों और परिचितों का जाल।
ये एक-दूसरे को बढ़ाती हैं: पैसे से अच्छा स्कूल, स्कूल से अच्छे संपर्क, संपर्क से अच्छी नौकरी।
सामाजिक स्तरीकरण
स्तरीकरण यानी समाज का परतों में बँटा होना। इसकी खास बातें: यह समाज की विशेषता है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है, और कुछ मान्यताएँ इसे 'सही' दिखाती हैं।
पूर्वाग्रह, रूढ़िबद्ध धारणा और भेदभाव
पूर्वाग्रह: किसी समूह के बारे में तथ्य जाने बिना पहले से बनी राय, अक्सर बुरी।
रूढ़िबद्ध धारणा: पूरे समूह पर एक ही ठप्पा लगा देना, जैसे 'उस इलाके के लोग आलसी हैं'।
भेदभाव: व्यवहार में अन्याय, जैसे समूह के कारण घर किराए पर न देना या नौकरी न देना।
सामाजिक बहिष्कार
किसी समूह को स्कूल, नौकरी, इलाज, सार्वजनिक जगह और फ़ैसलों से बाहर रखना। यह अचानक नहीं होता, अपनी मर्ज़ी से नहीं होता, और लंबे समय तक चलता है। बार-बार अपमान से लोग कोशिश छोड़ दें, तो भी यह बहिष्कार का नतीजा है, उनकी पसंद नहीं।
जाति, अस्पृश्यता और दलित
जाति व्यवस्था जन्म से समूह तय करती है और उन्हें ऊँच-नीच की सीढ़ी पर रखती है। पहले जाति से पेशा भी जुड़ा था। आज भी औसतन ऊँची जातियों के पास ज़्यादा ज़मीन और अच्छी नौकरियाँ हैं।
अस्पृश्यता
सबसे नीचे की जातियों को 'अशुद्ध' मानकर तीन तरह से दबाया गया:
- अपवर्जन: कुएँ, मंदिर, स्कूल से दूर रखना।
- अपमान: जूते उतरवाना, झुकवाना।
- शोषण: हाथ से मैला ढोने जैसा काम बिना उचित मज़दूरी।
गांधीजी ने 'हरिजन' नाम दिया; बाद में लोगों ने खुद 'दलित' (दबाया हुआ) नाम चुना, गर्व और विरोध के साथ।
राज्य के कदम
- अनुच्छेद 17 ने अस्पृश्यता समाप्त की।
- अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए विधानसभा, सरकारी नौकरी और कॉलेज में आरक्षण।
- नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम (1955), अत्याचार निवारण अधिनियम (1989)।
गैर-राज्य प्रयास
ज्योतिबा फुले, पेरियार और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे नेताओं के आंदोलन, और दलित साहित्य ने समुदाय को आवाज़ दी।
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
OBC वे जातियाँ हैं जिन्हें अछूत नहीं माना गया, पर वे शिक्षा, नौकरी और सत्ता में पीछे रहीं, जैसे किसान, कुम्हार, बुनकर, नाई।
- पहला पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर, 1953) की रिपोर्ट पर अमल नहीं हुआ।
- मंडल आयोग (रिपोर्ट 1980) ने केंद्र सरकार की नौकरियों में 27% आरक्षण सुझाया; 1990 से लागू।
- दक्षिण के राज्यों में यह पहले से था।
OBC एक मिला-जुला समूह है: कुछ अमीर किसान, कुछ बहुत गरीब।
आदिवासी संघर्ष
आदिवासी यानी 'मूल निवासी'। सरकार उन्हें अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध करती है।
संघर्ष क्यों?
- वन कानूनों ने जंगल को 'सरकारी' बना दिया; रोज़ी छिन गई।
- बाँध, खदान, कारखानों ने ज़मीन ली; लोग विस्थापित हुए।
- साहूकार और ठेकेदारों ने ज़मीन हड़पी।
कैसे लड़े?
- अलग राज्य आंदोलन से झारखंड और छत्तीसगढ़ बने (2000)।
- बड़े बाँधों के विरोध में नर्मदा बचाओ आंदोलन।
- वन अधिकार अधिनियम (2006) ने वन अधिकार माने।
यह लड़ाई ज़मीन, जंगल, पहचान और स्वशासन की है।
स्त्रियों की समानता का संघर्ष
स्त्रियाँ समाज का आधा हिस्सा हैं, फिर भी घर, काम और सार्वजनिक जीवन में असमानता झेलती रहीं। यह 'प्राकृतिक' नहीं, समाज की बनाई है।
19वीं सदी के सुधारक
राजा राममोहन राय (सती के विरुद्ध), ईश्वरचंद्र विद्यासागर (विधवा विवाह), ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले (लड़कियों के स्कूल), पंडिता रमाबाई। लेखिकाएँ ताराबाई शिंदे और बेगम रोकैया ने पुरुष-प्रधानता पर सवाल उठाए।
स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद
- स्त्रियों ने आंदोलन में बड़ी संख्या में भाग लिया।
- कराची अधिवेशन (1931) ने स्त्रियों को बराबर अधिकार का वादा किया।
- संविधान ने सभी वयस्कों को बराबर वोट दिया।
1970 के बाद का महिला आंदोलन
दहेज हत्या, बलात्कार कानून, घरेलू हिंसा, असमान वेतन और घटते शिशु लिंगानुपात जैसे मुद्दे उठाए। घरेलू हिंसा अधिनियम (2005) जैसे कानून बने।
दिव्यांगजनों के अधिकार
समाज अक्सर विकलांगता को व्यक्ति की निजी समस्या मानता है। समाजशास्त्री कहते हैं इसका बड़ा हिस्सा समाज बनाता है: रैंप के बिना सीढ़ियाँ, ब्रेल के बिना किताबें, दया या मज़ाक वाली सोच।
आम धारणाएँ
- इसे केवल जैविक कमी माना जाता है।
- व्यक्ति को पीड़ित समझा जाता है।
- इसे व्यक्ति की आत्म-छवि से जोड़ा जाता है।
- मान लिया जाता है कि उसे हमेशा मदद चाहिए।
भारत में गरीबी और विकलांगता साथ चलती हैं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 बराबर पहुँच, शिक्षा और नौकरी में आरक्षण देता है। यह दया नहीं, अधिकार है।
करके देखें: अपने आस-पास का बहिष्कार
करके देखें (15 मिनट): अपने स्कूल या गली में घूमें। तीन कॉलम की तालिका बनाएँ: जगह, कौन आसानी से इस्तेमाल करता है, कौन छूट जाता है। रैंप, लड़कियों के शौचालय, एक ही भाषा के बोर्ड देखें। फिर 3D के आखिरी कदम में 'सहायता' स्लाइडर बढ़ाकर देखें कितने लोग अंदर आ पाते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सामाजिक विषमता: समूहों के बीच कीमती चीज़ों की असमान पहुँच।
- सामाजिक बहिष्कार: समाज में पूरी भागीदारी से रोका जाना; अनैच्छिक और समूह-आधारित।
- आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक पूँजी: पैसा, शिक्षा/तौर-तरीके, संपर्क।
- पूर्वाग्रह: तथ्य जाने बिना पहले से बनी राय।
- रूढ़िबद्ध धारणा: पूरे समूह पर एक ठप्पा।
- भेदभाव: समूह के कारण अन्यायपूर्ण व्यवहार।
- अस्पृश्यता: अपवर्जन, अपमान, शोषण; अनुच्छेद 17 से समाप्त।
- OBC: अन्य पिछड़ा वर्ग; मंडल आयोग, 27% आरक्षण।
- आदिवासी: मूल निवासी; ज़मीन और जंगल का संघर्ष।
- शिशु लिंगानुपात: 0-6 वर्ष के 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या।
हल किए गए उदाहरण
1. एक कंपनी एक समुदाय के हर उम्मीदवार को 'ये मेहनती नहीं होते' कहकर मना करती है। रूढ़िबद्ध धारणा और भेदभाव बताइए।
'मेहनती नहीं' पूरे समुदाय पर लगा ठप्पा = रूढ़िबद्ध धारणा। नौकरी न देना = भेदभाव। बड़े पैमाने पर हो तो यह रोज़गार से बहिष्कार है।
2. डॉक्टर के बच्चे को कोचिंग, किताबें और एक पारिवारिक मित्र से इंटर्नशिप मिलती है। तीनों पूँजी पहचानें।
कोचिंग का पैसा = आर्थिक; किताबें और अच्छी पढ़ाई = सांस्कृतिक; पारिवारिक मित्र = सामाजिक पूँजी।
3. एक बाँध से 40 आदिवासी गाँव डूबते हैं, थोड़ा नकद मिलता है, ज़मीन नहीं। विरोध क्यों?
ज़मीन और जंगल उनका भोजन, काम और पहचान हैं। नकद खत्म हो जाता है और समुदाय बिखर जाता है।
4. एक राज्य का शिशु लिंगानुपात 945 से 900 हो गया। इसका क्या अर्थ है?
हर 1000 लड़कों पर 45 लड़कियाँ कम। यह बेटे की चाह और लिंग-चयनित गर्भपात दिखाता है।
आम गलतियाँ
- बहिष्कार को अपनी मर्ज़ी समझना। यह अनैच्छिक है।
- पूर्वाग्रह (राय) और भेदभाव (व्यवहार) को एक मानना।
- OBC और अनुसूचित जाति को एक समझना।
- विकलांगता को केवल शरीर की समस्या मानना; समाज की बाधाएँ भी इसे बनाती हैं।