व्यक्ति और समूह
हम सब खुद को अलग इंसान मानते हैं, अपनी इच्छाओं वाला। पर ध्यान से देखिए।
- हम एक परिवार में जन्म लेते हैं, वह भाषा बोलते हैं जो हमने नहीं बनाई, और वे रीति-रिवाज मानते हैं जो दूसरों से सीखे।
- हमारी "निजी" परेशानियाँ अक्सर बहुत लोगों की होती हैं। अगर लाखों युवाओं को नौकरी न मिले, तो यह सिर्फ़ हर एक की गलती नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था की समस्या है।
- निजी परेशानी को सार्वजनिक मुद्दे से जोड़ने की क्षमता को समाजशास्त्रीय कल्पना कहते हैं (विचारक सी. राइट मिल्स का विचार)।
समाज लोगों का वह बड़ा समूह है जो एक जगह, नियम और जीवन-ढंग साझा करता है और कई रिश्तों से बंधा है।
समाजों में बहुलता और असमानता
बहुलता: अनेक समाज
बहुलता यानी "अनेकता"। समाज खाने, भाषा, काम, परिवार और विश्वास में अलग होते हैं। भारत में एक साथ गाँव, महानगर, जनजातीय समुदाय, कई धर्म और सैकड़ों भाषाएँ हैं।
असमानता: असमान हिस्से
असमानता यानी लोगों को धन, सत्ता, पढ़ाई या सम्मान बराबर न मिलना। शहर के अमीर परिवार का बच्चा और भूमिहीन मज़दूर का बच्चा एक ही समाज में हैं, पर उनका जीवन बहुत अलग है।
समाजशास्त्र पूछता है: ये अंतर क्यों हैं, माता-पिता से बच्चों तक कैसे पहुँचते हैं, और कैसे बदल सकते हैं? यह दूसरे समाजों को "अपना ही सबसे अच्छा" सोचे बिना देखना सिखाता है।
समाजशास्त्र का उदय
समाजशास्त्र 19वीं सदी में यूरोप में पनपा। तीन बड़े बदलाव साथ आए:
- प्रबोधन (1700 का दशक): विचारकों ने कहा कि दुनिया को परंपरा से नहीं, तर्क और प्रमाण से समझो। मनुष्य अध्ययन का केंद्र बना।
- फ्रांसीसी क्रांति (1789): आम लोगों ने अधिकार और समानता माँगी। राजा, चर्च और सामंतों के पुराने दर्जों पर सवाल उठे।
- औद्योगिक क्रांति: कारखानों ने लोगों को गाँवों से भीड़ भरे शहरों में खींचा। काम, समय, परिवार और रहने का ढंग सब बदला।
विचारक इस तेज़ बदलाव को समझना चाहते थे। ऑगस्ट कॉम्ट ने 1830 के दशक में "समाजशास्त्र" नाम दिया। भारत में समाजशास्त्र औपनिवेशिक दौर में बढ़ा; अंग्रेज़ अफ़सरों ने शासन के लिए जातियों और जनजातियों का अध्ययन किया, बाद में भारतीय विद्वानों ने अपने समाज को अपने ढंग से पढ़ा।
समाजशास्त्र की प्रकृति और क्षेत्र
प्रकृति: समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है। यह समाज को व्यवस्थित ढंग से पढ़ता है, प्रमाण (सर्वे, साक्षात्कार, अवलोकन) लेता है और फ़ैसला सुनाने के बजाय सब पक्षों को समझने की कोशिश करता है।
क्षेत्र: बहुत बड़ा है:
- दो लोगों की छोटी मुलाकात (दुकानदार और ग्राहक),
- समूह और संस्थाएँ (परिवार, स्कूल, धर्म, बाज़ार, राज्य),
- बड़ी प्रक्रियाएँ (जाति, वर्ग, प्रवास, वैश्वीकरण, सामाजिक परिवर्तन)।
समाजशास्त्र सामान्य बुद्धि (कॉमन सेंस) से अलग है। कॉमन सेंस कहता है "गरीब आलसी होते हैं"। समाजशास्त्र तथ्य जाँचता है और ज़मीन, पढ़ाई या नौकरी की कमी जैसे कारण पाता है।
अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंध
- अर्थशास्त्र चीज़ें बनाना और बाँटना पढ़ता है। समाजशास्त्र जोड़ता है कि जाति, परिवार या लिंग नौकरी और खर्च पर कैसे असर डालते हैं।
- राजनीति विज्ञान सरकार और सत्ता पढ़ता है। समाजशास्त्र देखता है कि सामाजिक समूह कैसे वोट देते और सत्ता में हिस्सा लेते हैं।
- इतिहास बीते समय को विस्तार से पढ़ता है। समाजशास्त्र अतीत से आज के पैटर्न समझता है।
- मनोविज्ञान व्यक्ति का मन पढ़ता है। समाजशास्त्र समूह में व्यवहार पढ़ता है। (सामाजिक मनोविज्ञान दोनों के बीच है।)
- सामाजिक मानवविज्ञान ने छोटे, सरल समाजों से शुरुआत की। समाजशास्त्र ने आधुनिक जटिल समाजों से। आज दोनों बहुत पास हैं, खासकर भारत में।
सबका लक्ष्य एक है: मानव जीवन समझना। समाजशास्त्र देखता है कि सारे टुकड़े कैसे जुड़ते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समाज: लोगों का बड़ा समूह जो जगह, नियम, रिश्ते और जीवन-ढंग साझा करता है।
- समाजशास्त्र: समाज, सामाजिक समूहों और सामाजिक संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन।
- समाजशास्त्रीय कल्पना: निजी परेशानी को सार्वजनिक मुद्दे से जोड़कर देखना।
- बहुलता: अनेक अलग-अलग समाजों और संस्कृतियों का होना।
- असमानता: धन, सत्ता, पढ़ाई और सम्मान तक असमान पहुँच।
- सामान्य बुद्धि: रोज़ के विश्वास जिन्हें प्रमाण से परखा नहीं गया।
हल किए गए उदाहरण
1. रवि को कॉलेज के बाद नौकरी नहीं मिली। चाचा कहते हैं उसने मेहनत नहीं की। समाजशास्त्री इसे कैसे देखेगा?
समाजशास्त्री देखेगा कि क्या बहुत से स्नातक यही झेल रहे हैं। अगर हज़ारों बेरोज़गार हैं, तो कारण सार्वजनिक भी है: कम नौकरियाँ, पढ़ाई और ज़रूरत का मेल न होना, धीमी अर्थव्यवस्था। रवि की निजी परेशानी सार्वजनिक मुद्दे से जुड़ी है। यही समाजशास्त्रीय कल्पना है।
2. भारत से बहुलता और असमानता का एक-एक उदाहरण दीजिए।
बहुलता: नागा गाँव, पंजाब का खेती वाला गाँव और मुंबई की कॉलोनी खाने, भाषा और रिवाज़ में अलग हैं। असमानता: एक ही शहर में एक बच्चा एसी वाले निजी स्कूल में पढ़ता है, दूसरा चाय की दुकान पर काम करता है।
3. समाजशास्त्र 19वीं सदी के यूरोप में ही क्यों आया, पहले क्यों नहीं?
क्योंकि तीन बदलाव एक साथ हुए: प्रबोधन ने तर्क को दुनिया समझने का औज़ार बनाया; फ्रांसीसी क्रांति ने पुराने दर्जों पर सवाल उठाए; औद्योगिक क्रांति ने कारखाने और नई समस्याओं वाले बड़े शहर बनाए। तेज़ बदलाव समझने के लिए नए विज्ञान की ज़रूरत पड़ी।
4. प्याज़ के दाम बढ़े: अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री क्या-क्या पूछेंगे?
अर्थशास्त्री: आपूर्ति, माँग और भंडारण को क्या हुआ? समाजशास्त्री: किन परिवारों ने खाना घटाया, गरीब घर कैसे निपटे, क्या विरोध हुए, व्यापारियों का नेटवर्क कैसे चलता है? दोनों एक ही घटना को अलग पहलू से देखते हैं।
आम गलतियाँ
- समाजशास्त्र को सिर्फ़ कॉमन सेंस मानना। समाजशास्त्र विश्वासों को प्रमाण से परखता है और अक्सर उन्हें गलत पाता है।
- हर परेशानी को सिर्फ़ निजी मानना। बहुत सी निजी परेशानियाँ सार्वजनिक मुद्दों से आती हैं।
- "अलग" को "पिछड़ा" समझना। बहुलता का मतलब अंतर है, ऊँच-नीच की सीढ़ी नहीं।
- मनोविज्ञान और समाजशास्त्र को एक मानना। मनोविज्ञान एक मन पढ़ता है; समाजशास्त्र समूह और रिश्ते।