CBSE कक्षा 11 समाजशास्त्र
अध्याय: 7
1. समाजशास्त्र, समाज और अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंध
समाज और समाजशास्त्र का परिचय
- समाज और समाजशास्त्र का परिचय – समाज उन समूहों और रिश्तों का जाल है जिनमें हम जीते हैं। हर व्यक्ति अलग है, फिर भी हमेशा परिवार, कक्षा, गाँव जैसे समूहों का हिस्सा है। समाज एक नहीं, अनेक हैं, और हर समाज के अंदर लोगों को पैसा, सत्ता और सम्मान बराबर नहीं मिलता। समाज का वैज्ञानिक अध्ययन यानी समाजशास्त्र 19वीं सदी के यूरोप में जन्मा, जब तर्क, क्रांति और कारखानों ने जीवन तेज़ी से बदला। यह सामाजिक जीवन के लगभग हर हिस्से को पढ़ता है और अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, मनोविज्ञान और मानवविज्ञान से जुड़ा है।
2. समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग
मूल समाजशास्त्रीय संकल्पनाएँ
- समाजशास्त्र की मूल संकल्पनाएँ: समूह, स्तरीकरण, प्रस्थिति, नियंत्रण – समाजशास्त्र कुछ खास शब्द बार-बार इस्तेमाल करता है। सामाजिक समूह वे लोग हैं जो बार-बार मिलते हैं, साझा लक्ष्य रखते हैं और "हम" महसूस करते हैं; बस स्टॉप की भीड़ केवल अर्ध-समूह है। समूह प्राथमिक (छोटे, करीबी) या द्वितीयक (बड़े, औपचारिक), अंतः समूह ("हम") या बाह्य समूह ("वे"), और संदर्भ समूह (जिनकी हम नकल करें) होते हैं। स्तरीकरण समाज का जाति, वर्ग या लिंग के आधार पर असमान परतों में बँटना है। प्रस्थिति व्यक्ति का स्थान है; भूमिका उस स्थान से अपेक्षित व्यवहार। सामाजिक नियंत्रण वह तरीका है जिससे समाज अपने मानदंड मनवाता है, औपचारिक (कानून, पुलिस) और अनौपचारिक (परिवार, ताने, तारीफ़)।
3. सामाजिक संस्थाओं को समझना
सामाजिक संस्थाएँ
- सामाजिक संस्थाओं को समझना – सामाजिक संस्था नियमों और भूमिकाओं का वह स्थायी ढाँचा है जो समाज की किसी बुनियादी ज़रूरत को पूरा करता है। परिवार, विवाह और नातेदारी जन्म, देखभाल और रिश्तेदारी को सँभालते हैं। काम और आर्थिक संस्थाएँ चीज़ें बनाने और बाँटने को सँभालती हैं, आज श्रम विभाजन, कारखानों और अनौपचारिक कामों के साथ। राजनीतिक संस्थाएँ तय करती हैं कि सत्ता किसके पास हो और उसे प्राधिकार, राज्य और कानून से वैध बनाती हैं। धर्म पवित्र के बारे में साझा विश्वास और अनुष्ठान देता है। शिक्षा अगली पीढ़ी को ज्ञान और मूल्य देती है, और रास्ते भी खोलती है और असमानता भी बनाए रख सकती है।
4. संस्कृति और समाजीकरण
संस्कृति और समाजीकरण
- संस्कृति और समाजीकरण: हम साथ रहना कैसे सीखते हैं – संस्कृति किसी समूह के जीने का पूरा तरीका है, जिसे लोग सीखते हैं और आपस में बाँटते हैं: उनके विचार, नियम और चीज़ें। यह जन्म से नहीं आती, सीखी जाती है। संस्कृति के तीन आयाम हैं: संज्ञानात्मक (हम क्या जानते और मानते हैं), मानकीय (व्यवहार के नियम) और भौतिक (औज़ार और वस्तुएँ)। समाजीकरण वह जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है जिससे एक बच्चा संस्कृति सीखकर समाज का सदस्य बनता है। यह परिवार, मित्र-समूह, विद्यालय, जनसंचार माध्यम और कार्यस्थल, धर्म, समुदाय जैसे अभिकरणों से होता है।
5. ग्रामीण और नगरीय समाज में सामाजिक परिवर्तन और व्यवस्था
सामाजिक परिवर्तन और व्यवस्था
- गाँव और नगर में सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक व्यवस्था – सामाजिक परिवर्तन यानी समाज के ढाँचे में बड़ा और टिकाऊ बदलाव। यह धीमा (उद्विकासीय) या अचानक (क्रांतिकारी) हो सकता है, और ढाँचे, विचार या मूल्य बदल सकता है। इसके कारण हैं पर्यावरण, तकनीक और अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति। सामाजिक व्यवस्था दूसरा पहलू है: समाज साझा मूल्यों, प्रभुत्व, सत्ता और कानून से स्थिर रहता है। व्यवस्था को प्रतिरोध, अपराध और हिंसा चुनौती देते हैं। गाँव, कस्बा और नगर आकार, घनत्व और काम में अलग हैं, और सब अपने ढंग से बदलते हैं।
6. पाश्चात्य समाजशास्त्री: एक परिचय
पाश्चात्य समाजशास्त्री
- पाश्चात्य समाजशास्त्री: मार्क्स, दुर्खाइम और वेबर – समाजशास्त्र यूरोप में तीन बड़े बदलावों से जन्मा: ज्ञानोदय (तर्क पर भरोसा), फ्रांसीसी क्रांति (स्वतंत्रता, समानता) और औद्योगिक क्रांति (कारख़ाने, शहर, मज़दूरी)। कार्ल मार्क्स ने कहा कि उत्पादन का ढंग समाज को आकार देता है और इतिहास वर्गों के संघर्ष से आगे बढ़ता है, जैसे पूँजीपति और मज़दूर। एमिल दुर्खाइम ने कहा कि समाज एकता से जुड़ा रहता है: सरल समाजों में यांत्रिक (लोग एक जैसे) और आधुनिक समाजों में सावयवी (लोग अलग काम करते और एक-दूसरे पर निर्भर)। मैक्स वेबर ने कहा कि समाजशास्त्र को लोगों के कामों का अर्थ समझना चाहिए (व्याख्यात्मक समाजशास्त्र), आदर्श प्रारूप को मापने का औज़ार बनाया, और नौकरशाही को नियमों पर चलने वाला आधुनिक संगठन बताया।
7. भारतीय समाजशास्त्री
भारतीय समाजशास्त्री
- भारतीय समाजशास्त्री: घुरये, मुखर्जी, देसाई और श्रीनिवास – चार भारतीय विचारकों ने भारतीय समाज को समझने का ढंग बनाया। जी.एस. घुरये ने जाति के छह लक्षण बताए और अंग्रेज़ों के इस विचार पर सवाल उठाया कि जाति प्रजाति से बनी। डी.पी. मुखर्जी ने कहा कि भारत में बदलाव परंपरा से ही उगना चाहिए; इसके तीन स्रोत हैं श्रुति, स्मृति और अनुभव, और अनुभव सबसे ताक़तवर है। मार्क्सवादी ए.आर. देसाई ने कल्याणकारी राज्य को परखा और पाया कि वह गरीबी और असमानता नहीं मिटा पाया। एम.एन. श्रीनिवास गाँव में रहे, दिखाया कि गाँव एक असली और बदलती सामाजिक इकाई है, और प्रबल जाति जैसी अवधारणा दी।