भारतीय समाजशास्त्रियों को क्यों पढ़ें?
समाजशास्त्र यानी समाज का अध्ययन। यह यूरोप में शुरू हुआ। भारत में पहले अंग्रेज़ अफ़सरों ने भारतीय समाज के बारे में लिखा, अक्सर शासन चलाने के लिए। बाद में भारतीय विद्वानों ने अपने सवाल पूछे: जाति क्या है? परंपरा कैसे बदलती है? राज्य असल में क्या करता है? गाँव अंदर से कैसा है?
इस अध्याय में ऐसे चार विद्वान हैं। हर एक ने भारतीय जीवन का अलग हिस्सा देखा, और अलग तरीका अपनाया: पुराने ग्रंथ पढ़ना, इतिहास पर सोचना, मार्क्सवादी विचार, या गाँव में रहकर देखना (क्षेत्र-कार्य, फ़ील्डवर्क)।
जी.एस. घुरये: जाति और प्रजाति
जी.एस. घुरये (1893–1983) ने बंबई विश्वविद्यालय में भारत के पहले समाजशास्त्र विभाग का नेतृत्व किया। उन्हें अक्सर भारतीय समाजशास्त्र का जनक कहा जाता है।
प्रजाति का सिद्धांत, जिस पर उन्होंने सवाल उठाया
अंग्रेज़ अफ़सर एच. एच. रिज़ले ने कहा कि जाति प्रजाति (नस्ल) से बनी: ऊँची जातियाँ एक प्रजाति से और नीची दूसरी से, और नाक के आकार जैसे शरीर के माप से इन्हें पहचाना जा सकता है। घुरये ने इसे जाँचा। उन्होंने पाया कि यह केवल उत्तर भारत (मुख्यतः पंजाब और गंगा का मैदान) में थोड़ा-सा ठीक बैठता है। बाकी इलाकों में अलग-अलग जातियों के लोग शरीर से लगभग एक जैसे थे। इसलिए प्रजाति पूरे भारत की जाति को नहीं समझा सकती। जाति मुख्य रूप से एक सामाजिक व्यवस्था है।
जाति के छह लक्षण
- खंडात्मक विभाजन: समाज बंद समूहों में बँटा; सदस्यता जन्म से।
- संस्तरण (ऊँच-नीच): समूह ऊपर से नीचे क्रम में।
- खान-पान और सामाजिक मेलजोल पर रोक: कौन किसके साथ खाए या छुए।
- नागरिक और धार्मिक निर्योग्यताएँ: कुछ जातियों को कुएँ, मंदिर, रास्ते से रोका जाता था।
- पेशा चुनने की आज़ादी नहीं: काम जन्म से बँधा।
- विवाह पर रोक: जाति के भीतर ही विवाह (अंतर्विवाह)।
डी.पी. मुखर्जी: परंपरा और परिवर्तन
डी.पी. मुखर्जी (1894–1961) लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए पहले भारतीय परंपरा समझनी होगी। परंपरा यानी पीढ़ियों से चले आ रहे जीने के तरीके।
मुख्य विचार
- भारतीय समाज समूह-आधारित है (परिवार, जाति, गाँव); पश्चिम की तरह अकेले व्यक्ति पर टिका नहीं।
- समाजशास्त्री को स्थानीय संस्कृति जाननी चाहिए: भाषा, रीति, गीत, सोच।
- बदलाव परंपरा से ही उगे, बाहर से आँख मूँदकर नकल न हो। परंपरा जमी हुई नहीं, वह ढलती है।
परंपरा में बदलाव के तीन स्रोत
- श्रुति: सुना हुआ (पवित्र ग्रंथ)।
- स्मृति: याद रखा हुआ (धर्मशास्त्र, टीकाएँ)।
- अनुभव: जिया हुआ, ख़ासकर सामूहिक अनुभव।
मुखर्जी के अनुसार अनुभव सबसे ताक़तवर स्रोत है। संतों और भक्ति आंदोलनों ने अपने अनुभव से जाति और कर्मकांड पर सवाल उठाए और समाज बदला। उन्होंने चेताया कि अंग्रेज़ी-शिक्षित मध्यम वर्ग अपनी परंपरा से कट गया है, इसलिए वह असली बदलाव की अगुवाई नहीं कर पाता।
ए.आर. देसाई: राज्य
ए.आर. देसाई (1915–1994) ने मार्क्सवादी नज़रिया अपनाया, जो समाज को वर्ग और संपत्ति के मालिकाने से देखता है।
कल्याणकारी राज्य क्या है?
वह राज्य जो सभी नागरिकों की भलाई का ज़िम्मा लेने का दावा करे। मुख्य लक्षण:
- सकारात्मक राज्य: केवल कानून-व्यवस्था नहीं, मदद के लिए कदम उठाता है।
- लोकतांत्रिक: जनता सरकार चुनती है।
- मिश्रित अर्थव्यवस्था: निजी और सरकारी दोनों कंपनियाँ।
- असमानता घटाना और रोज़गार, भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी ज़रूरतें देना।
देसाई की आलोचना
- गरीबी नहीं मिटी।
- आय और संपत्ति की असमानता ऊँची बनी रही।
- मिश्रित अर्थव्यवस्था से ज़्यादा फ़ायदा पूँजीपतियों को हुआ।
- भूमि सुधार और सबको रोज़गार असल में नहीं हुए; लोगों को वादे किए गए हक़ के लिए भी संघर्ष करना पड़ा।
निष्कर्ष: पूँजीवादी ढाँचे में काम करने के कारण कल्याणकारी राज्य के वादे उसके नतीजों से बहुत बड़े रहे।
एम.एन. श्रीनिवास: गाँव
एम.एन. श्रीनिवास (1916–1999) क्षेत्र-कार्य के लिए प्रसिद्ध हैं: लोगों के बीच लंबे समय रहकर रोज़ का जीवन देखना। वे कर्नाटक के एक गाँव में रहे जिसे उन्होंने रामपुरा कहा।
गाँव एक सामाजिक इकाई
लुई ड्यूमों जैसे विद्वानों ने कहा कि गाँव बस एक जगह है जहाँ अलग जातियाँ रहती हैं; असली चीज़ जाति है। श्रीनिवास असहमत थे। उनके अनुसार गाँव एक असली सामाजिक इकाई है, जिसकी अपनी पहचान है और लोग उससे जुड़ाव महसूस करते हैं।
'छोटे गणराज्य' नहीं
अंग्रेज़ लेखकों ने गाँवों को 'छोटे गणराज्य' कहा था: आत्मनिर्भर और कभी न बदलने वाले। श्रीनिवास ने दिखाया कि यह भ्रम है। गाँवों का शहरों से व्यापार था, दूसरे गाँवों से रिश्ते थे, और युद्ध, बाज़ार व प्रवास से वे बदलते रहे।
उनके मुख्य विचार
- प्रबल जाति: जिसके पास ज़्यादा ज़मीन, ज़्यादा सदस्य और गाँव में राजनीतिक ताक़त हो।
- संस्कृतिकरण: नीची जाति का ऊँची जातियों के रीति-रिवाज अपनाकर दर्जा बढ़ाना।
- पश्चिमीकरण: अंग्रेज़ी शासन और पश्चिमी विचारों से आए बदलाव।
परीक्षा के सुझाव
- 'जाति के छह लक्षण' में पहले छहों नाम लिखें, फिर हर एक पर एक पंक्ति।
- मुखर्जी में श्रुति, स्मृति, अनुभव ज़रूर लिखें और बताएँ कि अनुभव मुख्य है।
- देसाई में पहले कल्याणकारी राज्य के लक्षण, फिर आलोचना।
- श्रीनिवास में उनके विचार की तुलना 'छोटे गणराज्य' और ड्यूमों के विचार से करें।
घर पर करके देखें
घर के किसी बड़े से पूछें: 'आपके बचपन से अब तक कौन-सी रीति बदली, और क्यों?' जवाब लिखें। तय करें कि मुखर्जी इसे किस स्रोत से जोड़ते: श्रुति, स्मृति या अनुभव। फिर 3D का आख़िरी कदम खोलें, हर विचारक को छुएँ और देसाई का स्लाइडर चलाकर देखें कि असली प्रयास से नतीजे कैसे बदलते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समाजशास्त्र: समाज और सामाजिक जीवन का अध्ययन।
- जाति: जन्म पर आधारित समूह, जो ऊँच-नीच में बँटा हो और भीतर ही विवाह करे।
- अंतर्विवाह: अपने ही समूह में विवाह।
- श्रुति, स्मृति, अनुभव: सुने ग्रंथ, याद रखे ग्रंथ, जिया हुआ अनुभव (डी.पी. मुखर्जी)।
- कल्याणकारी राज्य: सब नागरिकों की भलाई का वादा करने वाला राज्य।
- मिश्रित अर्थव्यवस्था: निजी और सरकारी दोनों क्षेत्र साथ-साथ।
- क्षेत्र-कार्य: लोगों के बीच रहकर सीधा अध्ययन।
- प्रबल जाति: गाँव में ज़्यादा ज़मीन, संख्या और ताक़त वाली जाति (एम.एन. श्रीनिवास)।
हल किए गए उदाहरण
1. एक गाँव में एक जाति के परिवार को मुख्य कुएँ से पानी भरने की मनाही है। यह घुरये का कौन-सा लक्षण है?
नागरिक और धार्मिक निर्योग्यताएँ: कुछ जातियों को कुएँ, मंदिर, रास्ते जैसी सार्वजनिक जगहों से रोका जाता था।
2. एक संत के 'भगवान के आगे सब बराबर' सिखाने पर भक्त जाति भूलकर साथ खाने लगते हैं। मुखर्जी किस स्रोत को कारण मानेंगे?
अनुभव (सामूहिक जिया हुआ अनुभव)। उनके अनुसार यही बदलाव का सबसे बड़ा स्रोत है, जैसा भक्ति आंदोलनों में दिखा।
3. सरकार सभी गरीब परिवारों को मुफ़्त घर का वादा करती है, पर दस साल बाद थोड़े ही घर बनते हैं, वो भी ज़्यादातर पहुँच वालों के। देसाई इसे कैसे समझाएँगे?
कल्याणकारी राज्य बड़े वादे करता है, पर पूँजीवादी ढाँचे में अमीरों की रक्षा करता है, इसलिए गरीबी और असमानता बनी रहती है।
4. एक गाँव में एक जाति के पास सबसे ज़्यादा ज़मीन और सदस्य हैं; उसके नेता झगड़े सुलझाते और मुखिया चुनते हैं। श्रीनिवास इसे क्या कहते?
प्रबल जाति: उसके पास आर्थिक (ज़मीन), संख्यात्मक और राजनीतिक ताक़त है।
5. एक छात्र लिखता है: 'अंग्रेज़ों के आने तक भारतीय गाँव कभी नहीं बदले।' श्रीनिवास के आधार पर सुधारें।
श्रीनिवास ने दिखाया कि गाँव कभी जमे हुए 'छोटे गणराज्य' नहीं थे। उनका व्यापार, शहरों और दूसरे गाँवों से रिश्ता था, और वे बाज़ार, युद्ध और प्रवास से बदलते रहे।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि घुरये प्रजाति सिद्धांत से पूरी तरह सहमत थे। उन्होंने पाया कि यह उत्तर भारत के छोटे हिस्से पर ही लागू है।
- श्रुति और स्मृति में गड़बड़ी। श्रुति = सुना हुआ (पवित्र ग्रंथ); स्मृति = याद रखा हुआ (धर्मशास्त्र)।
- यह मानना कि देसाई ने कल्याणकारी राज्य की तारीफ़ की। वे उसके आलोचक थे।
- 'छोटे गणराज्य' को श्रीनिवास का विचार बताना। उन्होंने इसे औपनिवेशिक भ्रम कहकर नकारा।