सांस्कृतिक विविधता और सामुदायिक पहचान
सांस्कृतिक विविधता यानी भाषा, धर्म, पंथ, प्रजाति या जाति पर आधारित अनेक समूहों का साथ रहना। इसका अर्थ अंतर है, ऊँच-नीच नहीं।
सामुदायिक पहचान मज़बूत क्यों?
- यह प्रदत्त है: जन्म से मिलती है, चुनाव से नहीं।
- यह अपनापन और 'हम' की भावना देती है।
- स्वाभाविक लगती है, इसलिए खतरे पर लोग तीखी प्रतिक्रिया देते हैं।
'हम' और 'वे'
हर समुदाय 'हम' और 'वे' की रेखा खींचता है। पुराने घाव या नौकरी, ज़मीन, पानी की होड़ इस रेखा को कठोर बना सकते हैं। समस्या विविधता नहीं, उससे बरतने का ढंग है।
समुदाय, राष्ट्र और राष्ट्र-राज्य
राष्ट्र एक बड़ा समुदाय है जो साझा इतिहास और भविष्य महसूस करता है। राष्ट्र-राज्य वह राष्ट्र है जिसकी अपनी सरकार और क्षेत्र हो।
विविधता से बरतने के तीन तरीके
- आत्मसातकरणवादी: सब पर प्रभावी समूह की संस्कृति थोपना।
- एकीकरणवादी: संस्कृति निजी है; सार्वजनिक जीवन में सब एक जैसे दिखें।
- समायोजनवादी (भारत का रास्ता): अंतर मानना, अल्पसंख्यक संस्कृति की रक्षा करना।
पहचान दबाने से गुस्सा बढ़ता है; मान्यता देने से राष्ट्र के प्रति निष्ठा बढ़ती है।
अल्पसंख्यक अधिकार
अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि, संस्कृति बचाने और अपने शिक्षा संस्थान चलाने का अधिकार देते हैं।
भारत में क्षेत्रवाद
क्षेत्रवाद यानी एक क्षेत्र के प्रति गहरी निष्ठा, अक्सर भाषा पर आधारित, कभी जनजाति, धर्म या विकास में उपेक्षा की भावना पर।
भारत ने कैसे संभाला
- भाषाई राज्य: आंध्र राज्य के लिए पोट्टि श्रीरामुलु के अनशन जैसे आंदोलनों के बाद राज्य पुनर्गठन आयोग से 1956 में राज्य मुख्यतः भाषा के आधार पर बने।
- बाद में नए राज्य बने: झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड (2000), तेलंगाना (2014)।
- संघवाद: संघ और राज्यों में सत्ता का बँटवारा; राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है।
शुरू में डर था कि भाषाई राज्य एकता तोड़ेंगे, पर उन्होंने एकता मज़बूत की।
धर्म और पहचान
धर्म बहुत लोगों की पहचान का गहरा हिस्सा है। भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं; मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी आदि अल्पसंख्यक हैं। यहाँ अल्पसंख्यक का अर्थ ऐसा छोटा समूह है जो वंचित या असुरक्षित महसूस कर सकता है।
अल्पसंख्यक दोहरा खिंचाव महसूस करते हैं: वे राष्ट्र का हिस्सा हैं, पर डरते हैं कि उनकी पहचान बहुसंख्यक में खो न जाए। संवैधानिक सुरक्षा उन्हें भरोसा देती है।
सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता
सांप्रदायिकता
भारत में सांप्रदायिकता का अर्थ है धर्म से जुड़ी आक्रामक राजनीतिक विचारधारा। यह धर्म को एकमात्र पहचान मानती है, दूसरे धर्मों को शत्रु समझती है, सत्ता के लिए धर्म का उपयोग करती है और दंगों तक ले जा सकती है। हर समुदाय के लोग कभी पीड़ित तो कभी हमलावर रहे हैं; कोई समुदाय स्वभाव से हिंसक नहीं।
धर्मनिरपेक्षता
- पश्चिमी अर्थ: धर्म और राज्य का पूरा अलगाव।
- भारतीय अर्थ: राज्य सब धर्मों का बराबर सम्मान करता है और सैद्धांतिक दूरी रखता है; ज़रूरत हो तो छुआछूत जैसी कुरीतियाँ सुधारने और अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए दखल देता है।
राज्य और नागरिक समाज
सत्तावादी राज्य लोकतंत्र का उल्टा है: लोगों की असली आवाज़ नहीं, सत्ता जवाबदेह नहीं। बोलने, प्रेस और अदालतों की आज़ादी सीमित होती है।
भारत में आपातकाल (1975-77) में चुनाव टले, प्रेस पर सेंसर लगा और बहुत लोग बिना मुकदमे जेल गए। 1977 के चुनाव में जनता ने इसे नकार दिया।
नागरिक समाज
नागरिक समाज परिवार से आगे, पर राज्य और बाज़ार से बाहर की जगह है: स्वैच्छिक संगठन, NGO, मज़दूर संघ, मीडिया। यह महिलाओं, पर्यावरण, आदिवासी ज़मीन और मानवाधिकार के मुद्दे उठाता है और राज्य को जवाबदेह रखता है। बड़ा उदाहरण: राजस्थान के MKSS जैसे अभियानों से मिला सूचना का अधिकार अधिनियम (2005)।
करके देखें: अपने आस-पास की विविधता
करके देखें (10 मिनट): घर या पड़ोस के पाँच लोगों से पूछें: कौन-सी भाषाएँ बोलते हैं, कौन-से त्योहार मनाते हैं, परिवार किस क्षेत्र से है। एक-दूसरे पर चढ़े घेरे बनाएँ। देखें कि एक व्यक्ति कई घेरों में है। फिर 3D में 'विविधता का सम्मान' स्लाइडर घटा-बढ़ाकर देखें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सांस्कृतिक विविधता: भाषा, धर्म, क्षेत्र, जाति आदि पर आधारित अनेक समूहों का साथ रहना।
- सामुदायिक पहचान: प्रदत्त (जन्म से); अपनापन देती है।
- राष्ट्र-राज्य: अपनी सरकार और क्षेत्र वाला राष्ट्र।
- आत्मसातकरण / एकीकरण / समायोजन: विविधता पर तीन नीतियाँ।
- क्षेत्रवाद: क्षेत्र के प्रति निष्ठा; 1956 से भाषाई राज्य।
- अल्पसंख्यक अधिकार: अनुच्छेद 29 और 30।
- सांप्रदायिकता: धार्मिक पहचान पर आधारित आक्रामक राजनीतिक विचारधारा।
- भारतीय धर्मनिरपेक्षता: सब धर्मों का बराबर सम्मान, सैद्धांतिक दूरी।
- सत्तावादी राज्य: जनता के प्रति जवाबदेह न होने वाली सत्ता।
- नागरिक समाज: परिवार से आगे, राज्य और बाज़ार से बाहर; जैसे RTI 2005।
हल किए गए उदाहरण
1. एक देश स्कूल और दफ़्तरों में एक ही भाषा की अनुमति देता है। यह कौन-सी नीति है?
आत्मसातकरणवादी नीति। जिनकी भाषा रोकी गई, वे अलग-थलग महसूस कर विरोध कर सकते हैं।
2. एक नेता एक धर्म के लोगों से कहता है कि दूसरा धर्म उनका दुश्मन है और वोट माँगता है। विचारधारा?
सांप्रदायिकता।
3. राज्य मंदिरों में छुआछूत पर रोक लगाता है। क्या यह धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध है?
नहीं। भारतीय धर्मनिरपेक्षता सैद्धांतिक दूरी रखती है, इसलिए भेदभाव खत्म करने के लिए दखल दे सकती है।
4. गाँव वालों ने RTI से पता लगाया कि सड़क का पैसा चोरी हुआ। यह किसके कारण संभव हुआ?
नागरिक समाज, जिसके अभियानों से RTI कानून (2005) बना।
आम गलतियाँ
- विविधता को असमानता समझना।
- 'सांप्रदायिक' को केवल 'समुदाय का' मानना; यहाँ इसका अर्थ आक्रामक धार्मिक राजनीति है।
- भारतीय धर्मनिरपेक्षता को पश्चिमी अलगाव जैसा ही मानना।
- सरकार या मुनाफ़ा कमाने वाली कंपनियों को नागरिक समाज में गिनना।