अंतर-धार्मिक और अंतः-धार्मिक वर्चस्व
धर्मनिरपेक्षता सबसे पहले धर्म के नाम पर वर्चस्व के विरुद्ध विचार है। यह दो तरह का है:
- अंतर-धार्मिक वर्चस्व: एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों को नीचा मानते हैं, उन्हें नौकरी, घर या सुरक्षा नहीं देते, या हमला करते हैं। सांप्रदायिक दंगे और अल्पसंख्यकों से भेदभाव इसके उदाहरण हैं।
- अंतः-धार्मिक वर्चस्व: एक ही धर्म के अंदर कुछ सदस्य दूसरों पर हावी होते हैं। जैसे जाति के नियम जो कुछ लोगों को पूजा-स्थल से बाहर रखें; ऐसे नियम जो धर्म में महिलाओं को बराबर अधिकार न दें।
धर्मनिरपेक्ष समाज धर्मों के भीतर आज़ादी और धर्मों के बीच समानता बढ़ाता है। यह धर्म का नहीं, वर्चस्व का विरोध करता है।
धर्मनिरपेक्ष राज्य
धर्मनिरपेक्ष राज्य:
- किसी धार्मिक नेता या संस्था से नहीं चलता;
- उसका कोई राजकीय धर्म नहीं होता;
- किसी धर्म को दूसरे पर तरजीह नहीं देता;
- हर धर्म के और बिना धर्म वाले लोगों की शांति, आज़ादी और समानता के लिए काम करता है।
पश्चिमी मॉडल (जैसे अमेरिका): कड़ी अलगाव की दीवार। राज्य धर्म की न मदद करता, न उसमें दख़ल देता, और धर्म राज्य के कामों से दूर रहता है। ध्यान व्यक्ति की आज़ादी पर है; अल्पसंख्यकों के सामुदायिक अधिकारों पर कम।
भारतीय मॉडल: सैद्धांतिक दूरी।
- राज्य का कोई धर्म नहीं और वह सबका बराबर सम्मान करता है।
- अन्याय ख़त्म करने के लिए वह धर्म में दख़ल दे सकता है: उसने छुआछूत ख़त्म की और व्यक्तिगत कानूनों में सुधार किए।
- वह सब धर्मों की बराबर मदद कर सकता है, जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के स्कूलों को दूसरों जैसे नियमों पर अनुदान।
- यह व्यक्ति की आज़ादी और अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकार, जैसे अपनी शिक्षण संस्थाएँ चलाने का अधिकार, दोनों की रक्षा करता है।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचनाएँ और उत्तर
| आलोचना | उत्तर |
|---|---|
| धर्म-विरोधी: यह धर्म को कमज़ोर करती है। | यह वर्चस्व और संस्थागत धार्मिक सत्ता का विरोध करती है, आस्था का नहीं। यह धर्म की आज़ादी की रक्षा करती है। |
| पश्चिम से आयात: ईसाई प्रभाव वाले पश्चिमी विचारों की नकल। | यह भारत की अपनी ज़रूरत से बनी, कई धर्मों की रक्षा और जाति के अन्याय को ख़त्म करने के लिए; यह पश्चिमी मॉडल से अलग है। |
| अल्पसंख्यकवाद: यह अल्पसंख्यकों का पक्ष लेती है। | अल्पसंख्यक अधिकार कमज़ोर को बहुसंख्यक वर्चस्व से बचाते हैं; ये सुरक्षा देते हैं, विशेषाधिकार नहीं। |
| हस्तक्षेपकारी: राज्य धर्म में बहुत दख़ल देता है। | दख़ल का लक्ष्य अन्याय (जैसे छुआछूत) ख़त्म करना है, और यह अक्सर समुदायों के अंदर के समर्थन से होता है। |
| वोट बैंक राजनीति: दल समुदायों के वोट पाने के लिए इसका उपयोग करते हैं। | लोकतंत्र में समूहों के वोट माँगना सामान्य है; दुरुपयोग नेताओं की गलती है, धर्मनिरपेक्षता की नहीं। मतदाता उन्हें जवाबदेह बना सकते हैं। |
| असंभव परियोजना: बहुत गहरे मतभेद हैं। | साथ रहने का भारत का लंबा इतिहास दिखाता है कि यह कठिन है पर संभव है। |
परीक्षा टिप्स
यह अध्याय लगभग 6 अंक का है। आम सवाल: अंतर और अंतः-धार्मिक वर्चस्व, धर्मनिरपेक्ष राज्य की विशेषताएँ, पश्चिमी बनाम भारतीय धर्मनिरपेक्षता (तालिका बनाएँ), सैद्धांतिक दूरी का अर्थ, और दो-तीन आलोचनाएँ उत्तर सहित।
घर पर करके देखें
इस हफ़्ते धर्म और राज्य से जुड़ी एक ख़बर पढ़ें। पूछें: क्या किसी पर वर्चस्व हो रहा है? धर्मों के बीच या एक धर्म के भीतर? राज्य दूर रहा, सबकी बराबर मदद की, या अन्याय रोकने को दख़ल दिया? फिर 3D के आख़िरी चरण में चार कदम परखें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- धर्मनिरपेक्षता: हर तरह के धार्मिक वर्चस्व का विरोध; धर्मों के भीतर आज़ादी और धर्मों के बीच समानता।
- अंतर-धार्मिक वर्चस्व: एक धार्मिक समूह का दूसरे पर वर्चस्व।
- अंतः-धार्मिक वर्चस्व: एक ही धर्म के अंदर वर्चस्व।
- धर्मनिरपेक्ष राज्य: कोई राजकीय धर्म नहीं; किसी धर्म का पक्ष नहीं।
- पश्चिमी मॉडल: कड़ा अलगाव; व्यक्ति पर ध्यान।
- भारतीय मॉडल: सैद्धांतिक दूरी; अन्याय पर दख़ल और सब धर्मों की बराबर मदद।
हल किए गए उदाहरण
1. एक समूह दलितों को मंदिर में जाने से रोकता है। यह कौन सा वर्चस्व है और धर्मनिरपेक्ष राज्य क्या कर सकता है?
अंतः-धार्मिक वर्चस्व (एक धर्म के अंदर, जाति के आधार पर)। सैद्धांतिक दूरी के तहत भारतीय राज्य दख़ल दे सकता है: छुआछूत ख़त्म की गई है और कानून में दंडनीय है।
2. एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों को मकान किराए पर देने से मना करते हैं। यह कौन सा वर्चस्व है?
अंतर-धार्मिक वर्चस्व: एक धार्मिक समूह का दूसरे को नीचा मानना।
3. पश्चिमी और भारतीय धर्मनिरपेक्षता के दो अंतर बताइए।
पश्चिमी: कड़ा अलगाव, राज्य न मदद करे न दख़ल दे; व्यक्ति के अधिकारों पर ध्यान। भारतीय: सैद्धांतिक दूरी, राज्य अन्याय पर दख़ल दे सकता और सब धर्मों की बराबर मदद कर सकता है; व्यक्ति और अल्पसंख्यक समुदाय दोनों के अधिकारों की रक्षा।
4. एक दल केवल वोट के लिए एक समुदाय को विशेष लाभ का वादा करता है। क्या यह धर्मनिरपेक्षता की गलती है?
नहीं। यह नेताओं का दुरुपयोग (वोट बैंक राजनीति) है। धर्मनिरपेक्षता सबके लिए बराबर सम्मान और सुरक्षा माँगती है; मतदाता और संस्थाएँ ऐसे दुरुपयोग पर रोक लगा सकते हैं।
5. भारत अल्पसंख्यकों को अपने स्कूल चलाने का अधिकार क्यों देता है?
बहुसंख्यक वर्चस्व से उनकी संस्कृति और पहचान बचाने के लिए। यह सामुदायिक अधिकार है जिसकी भारतीय धर्मनिरपेक्षता रक्षा करती है, और यह विशेषाधिकार नहीं, सुरक्षा देता है।
आम गलतियाँ
- धर्मनिरपेक्षता को धर्म-विरोधी समझना। यह वर्चस्व के विरुद्ध है।
- अंतः-धार्मिक वर्चस्व (धर्म के भीतर जाति, लिंग) भूल जाना।
- भारतीय धर्मनिरपेक्षता को पश्चिमी अलगाव की दीवार जैसा बताना।
- परीक्षा में आलोचनाएँ लिखना पर उनके उत्तर न देना।