संघवाद क्या है?
संघवाद वह व्यवस्था है जिसमें शक्ति दो (या ज़्यादा) स्तरों की सरकारों में बँटी होती है: एक पूरे देश के लिए और बाक़ी क्षेत्रों (राज्यों या प्रांतों) के लिए। मुख्य विशेषताएँ:
- हर स्तर की अपनी शक्तियाँ संविधान में लिखी हैं; कोई एक अकेले दूसरे की शक्ति नहीं छीन सकता।
- लोग दोनों स्तरों के शासन में रहते और दोनों के लिए वोट देते हैं।
- संविधान सर्वोच्च है और दोनों स्तरों के बिना इसे बदलना कठिन है।
- एक स्वतंत्र न्यायपालिका स्तरों के बीच विवाद सुलझाती है।
कुछ संघ तब बने जब स्वतंत्र राज्य साथ आए (अमेरिका)। भारत जैसे दूसरे संघ एक बड़े, विविध देश को साथ रखने के लिए बने। संविधान भारत को 'राज्यों का संघ' कहता है। शक्तियाँ संघ, राज्य और समवर्ती सूचियों में बँटी हैं।
शक्तिशाली केंद्र के साथ संघवाद
आज़ादी के समय देश का बँटवारा हुआ था, रियासतें जोड़नी थीं और ग़रीबी से लड़ना था। निर्माता एकता और नियोजित विकास चाहते थे, इसलिए केंद्र को मज़बूत बनाया:
- अवशिष्ट शक्तियाँ (जो विषय किसी सूची में नहीं) संघ के पास हैं।
- अनुच्छेद 3: संसद नए राज्य बना सकती है, सीमा या नाम बदल सकती है; राज्य से केवल राय ली जाती है।
- आपातकालीन शक्तियाँ केंद्र को राज्यों की कमान सँभालने देती हैं।
- वित्तीय शक्ति: सबसे बड़े कर संघ वसूलता है; राज्य अनुदान और वित्त आयोग द्वारा तय हिस्से पर निर्भर हैं।
- केंद्र (राष्ट्रपति) द्वारा नियुक्त राज्यपाल राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश कर सकते हैं।
- अखिल भारतीय सेवाएँ (IAS, IPS) राज्यों में काम करती हैं पर नियंत्रण केंद्र का है।
- कुछ हालात में संसद राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकती है (राज्यसभा का प्रस्ताव, अंतरराष्ट्रीय संधि)।
इसलिए विद्वान भारत को अर्ध-संघीय कहते हैं: रूप में संघीय, पर एकात्मक विशेषताओं के साथ।
भारत की संघीय व्यवस्था में टकराव
केंद्र-राज्य संबंध
1960 के दशक तक केंद्र और ज़्यादातर राज्यों में एक ही पार्टी थी, इसलिए टकराव कम थे। 1967 के बाद कई राज्यों में दूसरी पार्टियाँ जीतीं और तनाव बढ़ा।
- स्वायत्तता की माँग: राज्यों ने ज़्यादा शक्तियाँ, ज़्यादा वित्तीय संसाधन, प्रशासन में आज़ादी, और अपनी भाषा-संस्कृति का सम्मान माँगा (जैसे हिंदी को अनिवार्य बनाने का विरोध)।
- राज्यपाल की भूमिका: राज्यपालों पर केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में काम करने के आरोप लगे, जैसे सरकार बनाने के लिए दलों को बुलाने में।
- राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356): अगर राज्यपाल रिपोर्ट दें कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार नहीं चल सकती, तो केंद्र उसे बर्ख़ास्त कर सकता है। इसका कई बार दुरुपयोग हुआ। एस.आर. बोम्मई मामले (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि बर्ख़ास्तगी की अदालत जाँच कर सकती है और बहुमत सदन में परखा जाना चाहिए।
- नए राज्य: नए राज्यों (तेलंगाना, उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़) की माँगों पर आंदोलन हुए।
अंतर्राज्यीय टकराव
राज्य सीमा (जैसे महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच बेलगावी) और नदी जल (जैसे कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी) पर झगड़ते हैं। न्यायाधिकरण और अदालतें इन्हें सुलझाने की कोशिश करती हैं।
विशेष प्रावधान
भारत असममित संघवाद अपनाता है: सभी राज्यों से बिल्कुल एक जैसा व्यवहार नहीं होता। इतिहास, जनजातीय आबादी, पहाड़ी इलाक़ों या पिछड़े क्षेत्रों के कारण कुछ को विशेष प्रावधान मिलते हैं:
- अनुच्छेद 371A-371J: नागालैंड, मिज़ोरम, मणिपुर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों के रिवाज, ज़मीन और स्थानीय क़ानूनों की रक्षा, और महाराष्ट्र, गुजरात व कर्नाटक के क्षेत्रों के लिए विशेष विकास बोर्ड। जैसे, नागालैंड में धार्मिक-सामाजिक प्रथाओं या प्रथागत क़ानून पर संसद का कोई कानून तभी लागू होगा जब राज्य विधानसभा सहमत हो।
- पाँचवीं और छठी अनुसूची: जनजातीय इलाक़ों के लिए विशेष प्रशासन और स्वायत्त परिषदें।
- जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा और अपना संविधान था। 2019 में यह दर्जा हटाया गया और राज्य को दो केंद्र-शासित प्रदेशों में बाँटा गया।
ऐसे प्रावधान विविध क्षेत्रों को जुड़ाव का एहसास देते हैं, जबकि आलोचक पूछते हैं कि असमान व्यवहार उचित है या नहीं।
करके देखें: शक्तियाँ छाँटिए
तीन डिब्बे बनाइए: संघ, राज्य और समवर्ती। 10 पर्चियाँ लिखिए: रक्षा, पुलिस, शिक्षा, रेलवे, कृषि, वन, मुद्रा, जन स्वास्थ्य, विवाह, साइबर अपराध (नया विषय)। इन्हें छाँटिए। 'साइबर अपराध' कहाँ जाएगा, और क्यों? (संकेत: अवशिष्ट शक्तियाँ।) फिर 3D के आख़िरी चरण में हालात बदलकर देखिए कि आपातकाल तस्वीर कैसे बदलता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- संघवाद = 2 स्तर + संविधान में शक्तियाँ + सर्वोच्च संविधान + स्वतंत्र अदालत
- भारत = 'राज्यों का संघ' (साथ रखने वाला संघ)
- तीन सूचियाँ: संघ, राज्य, समवर्ती; अवशिष्ट शक्तियाँ → संघ
- अनुच्छेद 3: संसद राज्य बना/बदल सकती है; अनुच्छेद 356: राष्ट्रपति शासन
- एस.आर. बोम्मई मामला (1994): राज्य सरकार बर्ख़ास्त करने पर सीमाएँ
- विशेष प्रावधान: अनुच्छेद 371A-371J; अनुच्छेद 370 (जम्मू-कश्मीर) 2019 में हटाया
हल किए गए उदाहरण
1. साइबर सुरक्षा जैसा नया विषय किसी सूची में नहीं है। इस पर कानून कौन बना सकता है?
संसद, क्योंकि अवशिष्ट शक्तियाँ संघ के पास हैं।
2. राज्यपाल रिपोर्ट देते हैं कि राज्य सरकार का बहुमत चला गया, और केंद्र विधानसभा में मतदान के बिना उसे बर्ख़ास्त कर देता है। बोम्मई फ़ैसला क्या कहता है?
बहुमत विधानसभा के सदन में परखा जाना चाहिए, और बर्ख़ास्तगी की अदालत जाँच कर सकती है। इसलिए ऐसी बर्ख़ास्तगी रद्द हो सकती है।
3. भारत को 'साथ रखने वाला' संघ क्यों कहते हैं?
क्योंकि यह संघ अमेरिका की तरह स्वतंत्र राज्यों के साथ आने से नहीं, बल्कि पहले से एक बड़े देश के भीतर शक्तियाँ बाँटकर उसे जोड़े रखने के लिए बना।
4. केंद्र-राज्य टकराव और अंतर्राज्यीय टकराव का एक-एक उदाहरण दीजिए।
केंद्र-राज्य: अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग या राज्यपाल की भूमिका पर विवाद। अंतर्राज्यीय: कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल विवाद।
आम गलतियाँ
- सोचना कि भारत का संविधान 'फ़ेडरेशन' शब्द का प्रयोग करता है। यह 'राज्यों का संघ' कहता है।
- कहना कि अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों के पास हैं (जैसे अमेरिका में)। भारत में संघ के पास हैं।
- सोचना कि राष्ट्रपति राज्य सरकार को मनमर्ज़ी से बर्ख़ास्त कर सकते हैं। अब अदालतें इसकी जाँच करती हैं (बोम्मई मामला)।
- कहना कि हर राज्य से बिल्कुल एक जैसा व्यवहार होता है। विशेष प्रावधान असमानता बनाते हैं।