स्थानीय शासन की ज़रूरत क्यों?
स्थानीय शासन गाँव, प्रखंड, ज़िला, क़स्बे और शहर के स्तर की सरकार है। यह लोगों के सबसे क़रीब होती है।
- स्थानीय लोग स्थानीय समस्याएँ (पीने का पानी, नालियाँ, सड़कें, स्कूल) दूर बैठे अधिकारियों से बेहतर समझते हैं।
- फ़ैसले जल्दी और सस्ते होते हैं, और लोग देख सकते हैं कि पैसा कैसे ख़र्च हुआ।
- यह लोकतंत्र को गहरा करता है: आम लोग, महिलाएँ और कमज़ोर वर्ग भी फ़ैसलों में भाग लेते हैं।
- इससे केंद्र और राज्य सरकारों का बोझ हल्का होता है।
मतलब, लोकतंत्र सिर्फ़ हर पाँच साल में वोट देना नहीं; यह लोगों का अपने मामले ख़ुद चलाना भी है।
भारत में स्थानीय शासन का विकास
- प्राचीन काल: प्राचीन भारत में ग्राम सभाएँ थीं।
- 1882: लॉर्ड रिपन के समय चुने हुए स्थानीय बोर्ड बने।
- 1919 और 1935: अंग्रेज़ी क़ानूनों के तहत कई प्रांतों में ग्राम पंचायतें बनीं।
- आज़ादी: गांधीजी मज़बूत ग्राम स्वराज चाहते थे, पर संविधान में स्थानीय शासन राज्य का विषय बना, और अनुच्छेद 40 (नीति-निर्देशक तत्त्व) ने राज्यों से सिर्फ़ ग्राम पंचायतें बनाने को कहा।
- 1952: सामुदायिक विकास कार्यक्रम ने स्थानीय विकास में लोगों को जोड़ने की कोशिश की।
- 1957: बलवंतराय मेहता समिति ने त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था सुझाई। कुछ राज्यों (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र) ने चुने हुए निकाय बनाए।
- पर स्थानीय निकाय कमज़ोर रहे: राज्य के अनुदान पर निर्भर, कम शक्ति, और चुनाव अक्सर टलते रहे।
- 1989: उन्हें संवैधानिक दर्जा देने वाला विधेयक राज्यसभा में असफल रहा।
- 1992: 73वाँ और 74वाँ संशोधन पास हुआ, जो 1993 से लागू हुआ।
73वाँ संशोधन: पंचायतें
- 20 लाख से ज़्यादा आबादी वाले सभी राज्यों में त्रिस्तरीय ढाँचा: ग्राम पंचायत (गाँव), पंचायत समिति या मंडल (प्रखंड), ज़िला परिषद (ज़िला)।
- ग्राम सभा: गाँव के सभी वयस्क मतदाता; यह पंचायत के काम की समीक्षा करती और योजनाएँ मंज़ूर करती है।
- हर 5 साल में चुनाव, सीधे, राज्य चुनाव आयोग द्वारा। पंचायत पहले भंग हो जाए तो 6 महीने में चुनाव ज़रूरी।
- आरक्षण: कम से कम एक-तिहाई सीटें और अध्यक्ष पद महिलाओं के लिए; SC और ST की सीटें आबादी के अनुपात में; राज्य OBC के लिए भी आरक्षण दे सकते हैं।
- ग्यारहवीं अनुसूची: 29 विषय (कृषि, पेयजल, सड़कें, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, ग़रीबी उन्मूलन आदि) जो राज्य सौंप सकते हैं।
- हर 5 साल में राज्य वित्त आयोग वित्त की समीक्षा करता और धन बाँटने की सिफ़ारिश करता है।
- पेसा क़ानून (1996) ने स्थानीय रिवाजों का सम्मान करते हुए पंचायतों को जनजातीय (पाँचवीं अनुसूची) इलाक़ों तक फैलाया।
74वाँ संशोधन: शहरी स्थानीय निकाय
- नगर पंचायत: गाँव से शहर बनते इलाक़े के लिए।
- नगर पालिका परिषद: छोटे शहरी इलाक़े के लिए।
- नगर निगम: बड़े शहर के लिए (प्रमुख महापौर)।
नियम 73वें संशोधन जैसे: राज्य चुनाव आयोग द्वारा हर 5 साल में सीधे चुनाव, महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें, SC/ST आरक्षण, राज्य वित्त आयोग। बारहवीं अनुसूची में 18 विषय हैं, जैसे नगर नियोजन, जल आपूर्ति, जन स्वास्थ्य और सफ़ाई, अग्निशमन, झुग्गी सुधार और सड़क की बत्तियाँ। 2011 में लगभग 31% भारतीय शहरों में रहते थे, इसलिए शहरी शासन का महत्व बढ़ता जा रहा है।
संशोधनों ने कैसे काम किया?
उपलब्धियाँ: सभी राज्यों में नियमित स्थानीय चुनाव; लगभग 30 लाख चुने हुए प्रतिनिधि, जिनमें एक-तिहाई से कहीं ज़्यादा महिलाएँ (कई राज्य 50% देते हैं); दलितों और आदिवासियों को असली पद मिले; लोगों की भागीदारी बढ़ी।
समस्याएँ: कई राज्यों ने सभी 29/18 विषय नहीं सौंपे; स्थानीय निकाय अपना पैसा कम जुटाते और अनुदान पर निर्भर हैं; कहीं-कहीं महिला सरपंच का पति या रिश्तेदार काम चलाता है ('सरपंच पति'); अब भी अधिकारियों का बहुत नियंत्रण है।
करके देखें: अपने स्थानीय निकाय को जानिए
अपनी ग्राम पंचायत या नगर वार्ड का नाम और अपने स्थानीय प्रतिनिधि का नाम पता करें। उनकी तीन ज़िम्मेदारियाँ लिखें (जैसे सड़क की बत्ती, नालियाँ, पानी की टंकी)। हो सके तो किसी बड़े के साथ ग्राम सभा या वार्ड की बैठक में जाएँ, या उसकी सूचना पढ़ें। फिर 3D के आख़िरी चरण के स्लाइडर से देखें कि आपके चुने आकार की पंचायत में कितनी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- 73वाँ संशोधन (1992) = ग्रामीण: ग्राम पंचायत → पंचायत समिति → ज़िला परिषद
- 74वाँ संशोधन (1992) = शहरी: नगर पंचायत, नगर पालिका परिषद, नगर निगम
- महिलाएँ: कम से कम 1/3 सीटें और अध्यक्ष पद (आरक्षित सीटें = n ÷ 3, ऊपर की ओर पूर्णांक)
- राज्य चुनाव आयोग द्वारा हर 5 साल में चुनाव
- ग्यारहवीं अनुसूची: 29 विषय (ग्रामीण); बारहवीं अनुसूची: 18 विषय (शहरी)
- राज्य वित्त आयोग: हर 5 साल; अनुच्छेद 40 (नीति-निर्देशक तत्त्व) ने ग्राम पंचायत की बात कही
हल किए गए उदाहरण
1. एक ग्राम पंचायत में 15 सीटें हैं। कम से कम कितनी महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी?
15 का एक-तिहाई = 5 सीटें।
2. ज़िला परिषद में 40 सीटें हैं। महिलाओं के लिए न्यूनतम कितनी, और राज्य 50% दे तो कितनी?
40 का एक-तिहाई = 13.33, ऊपर की ओर 14। 50% पर 20 सीटें।
3. एक नगर क्षेत्र में 20% आबादी SC है। 50 सीटों वाली परिषद में लगभग कितनी सीटें SC के लिए आरक्षित होंगी?
SC आरक्षण आबादी के हिस्से के अनुसार: 50 का 20% = 10 सीटें (लगभग, राज्य तय करता है)।
4. एक पंचायत मार्च में भंग हो गई। नए चुनाव कब तक होने चाहिए?
6 महीने के भीतर, यानी सितंबर तक।
5. 30,000 की आबादी वाला एक क़स्बा गाँव से तेज़ी से बढ़ रहा है। कौन-सा शहरी निकाय ठीक है?
नगर पंचायत, जो गाँव से शहर बनते इलाक़े के लिए है।
6. 1993 के बाद राज्य सरकार पंचायत चुनाव बार-बार क्यों नहीं टाल सकती?
73वाँ संशोधन हर 5 साल में चुनाव अनिवार्य करता है और यह काम स्वतंत्र राज्य चुनाव आयोग को देता है।
आम गलतियाँ
- 73वाँ (ग्रामीण पंचायत) और 74वाँ (शहरी नगरपालिका) आपस में मिलाना।
- ग्राम सभा को ग्राम पंचायत समझना। सभा सभी मतदाता हैं; पंचायत चुनी हुई संस्था है।
- कहना कि भारत का चुनाव आयोग पंचायत चुनाव कराता है। राज्य चुनाव आयोग कराता है।
- कहना कि महिलाओं के लिए 50% आरक्षण संविधान में है। संविधान कम से कम एक-तिहाई कहता है; कुछ राज्य 50% देते हैं।