संसद की ज़रूरत क्यों?
विधायिका वह चुनी हुई संस्था है जो कानून बनाती है। भारत में राष्ट्रीय विधायिका संसद है (राष्ट्रपति + लोकसभा + राज्यसभा); राज्यों में राज्य विधानमंडल हैं। संसद लोकतंत्र का दिल है क्योंकि यह:
- कानून बनाती और बदलती है, और संविधान में संशोधन करती है;
- कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है और उसे जवाबदेह बनाती है;
- धन पर नियंत्रण रखती है: कर और ख़र्च के लिए इसकी मंज़ूरी चाहिए;
- बहस का मंच है जहाँ हर क्षेत्र और समूह की बात सुनी जा सके;
- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव करती है और विशेष प्रक्रिया से न्यायाधीशों व राष्ट्रपति को हटा सकती है।
दो सदन क्यों?
दो सदनों वाली विधायिका द्विसदनीय कहलाती है। भारत ने इसे इसलिए चुना क्योंकि देश बड़ा और विविध है: एक सदन सीधे जनता का और दूसरा राज्यों का प्रतिनिधित्व करे। इससे हर फ़ैसले पर दोबारा नज़र पड़ती है, जिससे जल्दबाज़ी के कानून रुक सकते हैं। केवल छह राज्यों में दो सदन (विधानसभा के साथ विधान परिषद) हैं।
लोकसभा (लोगों का सदन)
- 543 सदस्य, FPTP से 5 वर्ष के लिए सीधे चुने जाते हैं; पहले भी भंग हो सकती है।
- धन विधेयक यहीं शुरू होते हैं; राज्यसभा उन्हें सिर्फ़ 14 दिन रोक सकती है।
- केवल लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पास करके सरकार हटा सकती है।
राज्यसभा (राज्यों की परिषद)
- अधिकतम 250 सदस्य: राज्यों के विधायक चुनते हैं (सीटें लगभग आबादी के अनुसार, इसलिए बड़े राज्यों की ज़्यादा) और कला, विज्ञान, साहित्य या समाज सेवा में योगदान के लिए 12 मनोनीत।
- स्थायी सदन: हर 2 साल में एक-तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं; हर सदस्य 6 वर्ष रहता है।
- विशेष शक्ति: दो-तिहाई मत से संसद को राज्य सूची के विषय पर कानून बनाने की अनुमति दे सकती है और नई अखिल भारतीय सेवाएँ बनवा सकती है।
संसद कानून कैसे बनाती है
विधेयक प्रस्तावित कानून का मसौदा है। मंत्री द्वारा रखा गया विधेयक सरकारी विधेयक; किसी और सांसद का निजी सदस्य विधेयक। धन विधेयक केवल कर और ख़र्च से जुड़ा होता है और केवल लोकसभा में पेश हो सकता है।
- पेश करना / पहला वाचन: विधेयक किसी एक सदन में रखा जाता है।
- समिति चरण: अक्सर इसे समिति को भेजा जाता है, जो इसकी जाँच करती और विशेषज्ञों को सुनती है।
- दूसरा वाचन: सदन हर धारा पर बहस करता और मतदान करता है।
- दूसरा सदन: दूसरे सदन में यही प्रक्रिया। सामान्य विधेयक पर दोनों असहमत हों तो राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुला सकते हैं, जहाँ बड़ी लोकसभा आम तौर पर जीतती है।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति: राष्ट्रपति हस्ताक्षर करते हैं (या एक बार लौटाते हैं), और यह अधिनियम बन जाता है।
कानून बनाने का बहुत-सा असली काम सदन के बाहर भी होता है: पार्टियों, मंत्रालयों, हित समूहों और मीडिया से बातचीत।
संसद कार्यपालिका पर नियंत्रण कैसे रखती है
- विचार-विमर्श और चर्चा: प्रश्नकाल (मंत्रियों को सांसदों के सवालों के जवाब देने होते हैं), शून्यकाल (ज़रूरी मुद्दे), स्थगन प्रस्ताव और बहस।
- कानूनों की मंज़ूरी: संसद के बिना सरकार कानून नहीं बना सकती।
- वित्तीय नियंत्रण: बजट पास होना ज़रूरी है; नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ख़र्च रिपोर्टें समितियाँ जाँचती हैं।
- अविश्वास प्रस्ताव: लोकसभा सरकार को हटा सकती है।
यह नियंत्रण तब सबसे अच्छा काम करता है जब संसद पर्याप्त दिन चले और सांसद हाज़िर रहकर बहस करें; बार-बार हंगामा और बहुत बड़ा बहुमत इसे कमज़ोर कर सकता है।
समितियाँ और स्व-नियंत्रण
समितियाँ
पूरा सदन हर चीज़ की जाँच नहीं कर सकता, इसलिए संसद अलग-अलग पार्टियों के सांसदों की समितियाँ बनाती है। स्थायी समितियाँ हमेशा रहती हैं: जैसे लोक लेखा समिति सरकारी ख़र्च जाँचती है, और विभाग से जुड़ी स्थायी समितियाँ हर मंत्रालय के विधेयक और बजट देखती हैं। ख़ास मामलों या घोटालों की जाँच के लिए दोनों सदनों की संयुक्त संसदीय समितियाँ बनाई जा सकती हैं।
स्व-नियंत्रण
संसद अपनी प्रक्रिया के नियम ख़ुद बनाती है। लोकसभा के अध्यक्ष (और राज्यसभा के सभापति) सदन चलाते हैं, तय करते हैं कौन बोलेगा, और बाधा डालने वाले सदस्यों को निलंबित कर सकते हैं। दल-बदल विरोधी कानून (52वाँ संशोधन, 1985) कहता है कि जो सदस्य अपनी पार्टी छोड़े या पार्टी के निर्देश के ख़िलाफ़ वोट दे, वह अयोग्य ठहराया जा सकता है; फ़ैसला अध्यक्ष करते हैं। यह पैसे या पद के लिए पार्टी बदलने से रोकने के लिए बना।
करके देखें: एक असली विधेयक का पीछा करें
ख़बरों में हाल ही में संसद से पास हुआ कोई एक विधेयक खोजें। लिखें: वह किस सदन में शुरू हुआ, क्या वह समिति को गया, कितना समय लगा, और राष्ट्रपति ने कब हस्ताक्षर किए। फिर 3D का आख़िरी चरण खेलें और अपने विधेयक को सभी 7 चरणों से आगे बढ़ाएँ।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- संसद = राष्ट्रपति + लोकसभा + राज्यसभा
- लोकसभा: 543 निर्वाचित, 5 वर्ष; राज्यसभा: अधिकतम 250 (238 निर्वाचित + 12 मनोनीत), 6 वर्ष, हर 2 साल में 1/3 रिटायर
- धन विधेयक: केवल लोकसभा में; राज्यसभा 14 दिन रोक सकती है
- विधेयक के चरण: पेश → समिति → दूसरा वाचन व मतदान → दूसरा सदन → राष्ट्रपति → अधिनियम
- संयुक्त बैठक: सदनों में असहमति पर सामान्य विधेयकों के लिए (धन विधेयक या संशोधन के लिए नहीं)
- दल-बदल विरोधी कानून: 52वाँ संशोधन, 1985 (दसवीं अनुसूची)
हल किए गए उदाहरण
1. राज्यसभा में अभी 245 सदस्य हैं। हर दो साल में लगभग कितने रिटायर होते हैं?
लगभग 245 का एक-तिहाई करीब 82 है, यानी हर दो साल में लगभग 80 सदस्य रिटायर होते हैं (चुनाव राज्यवार बँटे होते हैं)।
2. लोकसभा 1 मार्च को धन विधेयक पास करती है। राज्यसभा कुछ नहीं करती। दोनों सदनों से पास कब माना जाएगा?
14 दिन बाद विधेयक उसी रूप में दोनों सदनों से पास माना जाएगा जिस रूप में लोकसभा ने पास किया।
3. लोकसभा एक सामान्य विधेयक पास करती है, पर राज्यसभा उसे ठुकरा देती है। क्या हो सकता है?
राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकते हैं। लोकसभा में 543 और राज्यसभा में लगभग 245 सदस्य हैं, इसलिए आम तौर पर लोकसभा की राय जीतती है।
4. पार्टी A के टिकट पर जीता सांसद पार्टी B में चला जाता है। क्या हो सकता है?
दल-बदल विरोधी कानून के तहत पीठासीन अधिकारी उसे अयोग्य ठहरा सकते हैं और उसकी सदस्यता चली जाती है।
आम गलतियाँ
- कहना कि राज्यसभा सदस्यों को जनता सीधे चुनती है। उन्हें राज्यों के विधायक चुनते हैं।
- सोचना कि राज्यसभा धन विधेयक ठुकरा सकती है। वह सिर्फ़ सुझाव दे सकती है और 14 दिन रोक सकती है।
- सोचना कि धन विधेयक या संविधान संशोधन के लिए संयुक्त बैठक हो सकती है। नहीं हो सकती।
- कहना कि राज्यसभा हर 5 साल में भंग होती है। यह स्थायी सदन है।