अधिकार क्यों ज़रूरी हैं?
अधिकार वह दावा है जो लोग करते हैं, समाज मानता है और कानून बचाता है। अधिकार हर व्यक्ति को सम्मान से जीने और अपनी पूरी क्षमता तक बढ़ने देते हैं।
अधिकार-पत्र संविधान में लिखी अधिकारों की सूची है। यह लोगों को दूसरों से, और सरकार से भी बचाता है। भारत में सबसे बुनियादी अधिकारों को मौलिक अधिकार कहते हैं: ये ख़ास हैं क्योंकि सरकार सामान्य कानून से इन्हें नहीं छीन सकती और अदालतें इनकी रक्षा करती हैं। सामान्य क़ानूनी अधिकार किसी दूसरे कानून से बदले जा सकते हैं।
मौलिक अधिकार असीमित नहीं हैं: सरकार सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा के लिए इन पर उचित प्रतिबंध लगा सकती है।
छह मौलिक अधिकार
- समानता का अधिकार: कानून के सामने सब बराबर; धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं; सरकारी नौकरियों में बराबर अवसर; छुआछूत का अंत; उपाधियों का अंत। असली समानता के लिए कमज़ोर वर्गों को आरक्षण की अनुमति है।
- स्वतंत्रता का अधिकार: बोलने की, शांति से इकट्ठा होने की, संगठन बनाने की, भारत में कहीं भी घूमने-बसने की और कोई भी काम करने की स्वतंत्रता। साथ में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा (अनुच्छेद 21), जिसे अदालतों ने सम्मान से जीने, शिक्षा (6 से 14 वर्ष) और मनमानी गिरफ़्तारी से सुरक्षा तक फैलाया है।
- शोषण के विरुद्ध अधिकार: मानव तस्करी नहीं, बेगार या बंधुआ मज़दूरी नहीं, ख़तरनाक कामों में बाल श्रम (14 से कम) नहीं।
- धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार: हर व्यक्ति अपना धर्म मान, पालन और प्रचार कर सकता है। राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं।
- सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार: अल्पसंख्यक (धर्म या भाषा के आधार पर) अपनी संस्कृति बचा सकते हैं और अपने स्कूल-कॉलेज खोल सकते हैं।
- संवैधानिक उपचारों का अधिकार: बाक़ी अधिकार वापस पाने के लिए अदालत जाने का अधिकार (अनुच्छेद 32 और 226)।
संपत्ति का अधिकार 1978 (44वाँ संशोधन) तक मौलिक अधिकार था। अब यह केवल क़ानूनी अधिकार है।
संवैधानिक उपचार और रिट
अधिकार तभी काम का है जब उसे लागू कराया जा सके। डॉ. आंबेडकर ने संवैधानिक उपचारों के अधिकार को संविधान का हृदय और आत्मा कहा। व्यक्ति सीधे सर्वोच्च या उच्च न्यायालय जा सकता है, जो रिट (विशेष आदेश) जारी कर सकता है:
- बंदी प्रत्यक्षीकरण: गिरफ़्तार व्यक्ति को अदालत में पेश करो, ताकि जाँचा जा सके कि गिरफ़्तारी क़ानूनी है।
- परमादेश: अधिकारी को वह कर्तव्य करने का आदेश जो वह नहीं कर रहा।
- निषेध: ऊँची अदालत निचली अदालत को अपनी सीमा से बाहर जाने से रोकती है।
- अधिकार पृच्छा: किसी से पूछना कि वह किस अधिकार से सार्वजनिक पद पर है।
- उत्प्रेषण: ऊँची अदालत निचली अदालत से मामला अपने पास मँगा लेती है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (1993) जैसी संस्थाएँ भी अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करती हैं।
राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व
राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व सरकार के लिए लक्ष्य और दिशा-निर्देश हैं। ये वाद-योग्य नहीं हैं: अदालत सरकार को इन्हें मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। फिर भी ये देश के शासन में 'मूलभूत' हैं।
- लक्ष्य: लोगों का कल्याण, सामाजिक और आर्थिक न्याय, कम असमानता।
- नीतियाँ: निर्वाह योग्य मज़दूरी और अच्छी कार्य-स्थितियाँ, पुरुष-महिला को समान काम का समान वेतन, मुफ़्त क़ानूनी सहायता, ग्राम पंचायतें, समान नागरिक संहिता, पर्यावरण, वन और वन्य जीवों की रक्षा, गाय और खेती के पशुओं का संरक्षण।
इनसे कई कानून बने: शिक्षा का अधिकार, पंचायत सुधार, मनरेगा और मिड-डे मील। मौलिक कर्तव्य (1976 में जोड़े गए) नागरिकों के कर्तव्य बताते हैं, जैसे संविधान का सम्मान और पर्यावरण की रक्षा। इन्हें भी अदालत लागू नहीं कराती।
मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्त्वों का संबंध
मौलिक अधिकार व्यक्ति की रक्षा करते हैं और सरकार पर रोक लगाते हैं। नीति-निर्देशक तत्त्व सरकार से समाज के लिए कुछ करने को कहते हैं। अधिकार अदालत से लागू होते हैं; नीति-निर्देशक तत्त्व नहीं।
कभी-कभी टकराव हुआ। भूमि सुधार (नीति-निर्देशक लक्ष्य) के लिए सरकारों ने संपत्ति के अधिकार को सीमित किया और मामले अदालत गए। आख़िर 1978 में संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकारों से हटा दिया गया। मिनर्वा मिल्स मामले (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान दोनों के बीच संतुलन पर टिका है। आज अदालतें दोनों को साथ पढ़ती हैं: नीति-निर्देशक तत्त्व अधिकारों का अर्थ समझाने में मदद करते हैं (जैसे 2002 में शिक्षा अधिकार बनी)।
करके देखें: आपके आस-पास के अधिकार
एक दिन का अख़बार या समाचार ऐप देखें। अधिकारों से जुड़ी तीन ख़बरें ढूँढें: जैसे बाल श्रम से छुड़ाना, कोई विरोध-प्रदर्शन, या स्कूल में दाख़िला। हर एक के लिए लिखें कि कौन-सा मौलिक अधिकार या नीति-निर्देशक तत्त्व जुड़ा है, और क्या अदालत उसे लागू करा सकती है। फिर 3D के आख़िरी चरण में छँटाई का खेल खेलें और अपने अंक देखें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अधिकार = दावा + समाज की स्वीकृति + कानून की सुरक्षा
- छह मौलिक अधिकार: समानता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक और शैक्षिक, संवैधानिक उपचार
- अनुच्छेद 32: सर्वोच्च न्यायालय; अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय
- पाँच रिट: बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध, अधिकार पृच्छा, उत्प्रेषण
- मौलिक अधिकार = वाद-योग्य (अदालत लागू कराए); नीति-निर्देशक तत्त्व = वाद-योग्य नहीं
- संपत्ति का अधिकार: 1978 में मौलिक अधिकारों से हटाया (44वाँ संशोधन)
हल किए गए उदाहरण
1. पुलिस एक व्यक्ति को गिरफ़्तार करती है और 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं करती। उसका परिवार क्या कर सकता है?
वे उच्च या सर्वोच्च न्यायालय से बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट माँग सकते हैं। अदालत पुलिस को उसे पेश करने का आदेश देगी और जाँचेगी कि गिरफ़्तारी क़ानूनी है या नहीं।
2. कोई राज्य कानून बनाता है कि सरकारी नौकरी सिर्फ़ एक धर्म के लोगों को मिलेगी। कौन-सा अधिकार टूटता है?
समानता का अधिकार: सरकारी नौकरी में बराबर अवसर और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं। अदालत यह कानून रद्द कर सकती है।
3. एक मज़दूर कहती है कि उसके राज्य में निर्वाह योग्य मज़दूरी नहीं मिलती। क्या वह नीति-निर्देशक तत्त्व के आधार पर अदालत जा सकती है?
नहीं। निर्वाह योग्य मज़दूरी नीति-निर्देशक तत्त्व है, जो वाद-योग्य नहीं। वह चुनाव, आंदोलन या याचिका से सरकार पर दबाव डाल सकती है। पर अगर कोई ख़ास श्रम कानून बना है, तो उस कानून का सहारा ले सकती है।
4. संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकारों से क्यों हटाया गया?
यह भूमिहीनों को ज़मीन देने वाले भूमि सुधारों में बार-बार रुकावट बनता था। कई मुक़दमों के बाद 44वें संशोधन (1978) ने इसे केवल क़ानूनी अधिकार (अनुच्छेद 300A) बना दिया।
आम गलतियाँ
- सात मौलिक अधिकार गिनना। 1978 से छह हैं; संपत्ति अब क़ानूनी अधिकार है।
- सोचना कि नीति-निर्देशक तत्त्व अदालत से लागू हो सकते हैं। नहीं हो सकते।
- सोचना कि मौलिक अधिकार असीमित हैं। सरकार उचित प्रतिबंध लगा सकती है।
- रिट मिलाना: बंदी प्रत्यक्षीकरण ग़ैरक़ानूनी हिरासत के लिए है; परमादेश कर्तव्य करने का आदेश है।