राजनीति विज्ञान के पाठ
141 पाठ
- अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थव्यवस्था: पूरी तस्वीर – देश संप्रभु हैं: हर देश अपने फ़ैसले खुद लेता है। वे संधियों, अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं के साथ मिलकर रहते हैं। वे माल और पैसे का व्यापार करते हैं, जिससे विनिमय दर और भुगतान संतुलन आते हैं। पड़ोसी देश खुला व्यापार करने के लिए क्षेत्रीय समूह बनाते हैं, और अमीर तथा विकासशील देशों के बीच आय का अंतर एक बड़ा मुद्दा है।
- अंतरराष्ट्रीय संबंध: देश एक-दूसरे से कैसे व्यवहार करते हैं – अंतरराष्ट्रीय संबंध (IR) पढ़ता है कि राज्य और दूसरे कर्ता (अंतरराष्ट्रीय संगठन, कंपनियाँ, NGO) आपस में कैसे व्यवहार करते हैं। राज्य संप्रभु हैं और कोई विश्व सरकार नहीं है, इसलिए हर राज्य विदेश नीति से अपना राष्ट्रीय हित साधता है: कूटनीति, व्यापार, सहायता, गठबंधन और, सबसे बुरे हाल में, बल। ज़मीन, संसाधन, शक्ति और पहचान पर टकराव और सुरक्षा दुविधा से संघर्ष होता है। साझा फ़ायदे, संधियों, अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संगठनों से सहयोग बढ़ता है। यथार्थवाद शक्ति पर, उदारवाद सहयोग पर ज़ोर देता है। शांति बातचीत, मध्यस्थता, शांति सेना और न्याय से बनती है।
- अंतर्राष्ट्रीय कानून: राज्य नियम कैसे बनाते और निभाते हैं – अंतर्राष्ट्रीय कानून वे नियम हैं जिन्हें राज्य (और अंतर्राष्ट्रीय संगठन) आपसी व्यवहार में बाध्यकारी मानते हैं। कोई विश्व संसद या विश्व पुलिस नहीं है, इसलिए राज्य खुद नियम बनाते हैं, मुख्य रूप से संधियों और रिवाजों से, साथ में कानून के सामान्य सिद्धांत; अदालती फ़ैसले और विद्वानों के लेख नियम समझने में मदद करते हैं। यह बराबर संप्रभु राज्यों के विचार (1648) से संयुक्त राष्ट्र (1945) और मानव अधिकार कानून (1948 से) तक बढ़ा। संयुक्त राष्ट्र और उसका अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय शांति बनाए रखने और विवाद सुलझाने में मदद करते हैं। राज्य बातचीत, मध्यस्थता, पंच निर्णय या अदालत से विवाद सुलझाते हैं। हर देश तय करता है कि संधि उसके अपने (नगरपालिका/राष्ट्रीय) कानून में कैसे आए: एकवादी देश सीधे लागू करते हैं; भारत और ब्रिटेन जैसे द्वैतवादी देशों में संसद का अधिनियम चाहिए।
- अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून: युद्ध के नियम – अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL), जिसे सशस्त्र संघर्ष का कानून भी कहते हैं, वे नियम हैं जो युद्ध के नुकसान को सीमित करते हैं। यह उन लोगों की रक्षा करता है जो लड़ नहीं रहे (नागरिक, घायल और बीमार, बंदी, चिकित्सा व राहत कर्मी) और लड़ने के तरीक़ों व हथियारों पर सीमा लगाता है। मुख्य नियम हैं: भेद (केवल सैन्य लक्ष्य पर हमला), अनुपात (नागरिकों को नुकसान अत्यधिक न हो), सावधानी, आवश्यकता और मानवीयता। 1949 के चार जिनेवा अभिसमय और उनके अतिरिक्त प्रोटोकॉल मुख्य संधियाँ हैं। लाल क्रॉस, लाल अर्धचंद्र और लाल क्रिस्टल जैसे चिह्न बताते हैं कि किसे बख़्शना है। IHL सभी पक्षों पर लागू है, चाहे युद्ध किसी ने भी शुरू किया हो। युद्ध में मानव अधिकार कानून भी चलता रहता है। गंभीर उल्लंघन युद्ध अपराध हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय संगठन – अंतर्राष्ट्रीय संगठन देशों को शांति, पैसे, व्यापार और अधिकारों पर मिलकर काम करने में मदद करते हैं। राष्ट्र संघ की विफलता के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र बना; इसके छह मुख्य अंग हैं और सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों के पास वीटो है। 1945 के बाद दुनिया बदल गई है, इसलिए UN, ख़ासकर सुरक्षा परिषद में सुधार ज़रूरी है, और भारत स्थायी सीट माँगता है। IMF, विश्व बैंक, WTO, ILO और IAEA पैसे, विकास, व्यापार, मज़दूरों और परमाणु सुरक्षा को देखते हैं, और एमनेस्टी जैसे NGO मानवाधिकारों पर नज़र रखते हैं।
- अधिकार: हमारी गरिमा की रक्षा करने वाले दावे – अधिकार एक उचित दावा है: समाज इसे गरिमा के जीवन के लिए ज़रूरी मानता है और दूसरों को इसका सम्मान करना होता है। हर इच्छा अधिकार नहीं। पुराने विचारकों ने प्रकृति या ईश्वर से मिले प्राकृतिक अधिकारों (जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति) की बात की; आज हम मानवाधिकारों की बात करते हैं जो हर व्यक्ति के पास केवल इंसान होने से हैं, गरिमा के आधार पर। संविधान और कानूनों में लिखे जाने पर अधिकार कानूनी अधिकार बनते हैं जिनकी रक्षा अदालतें करती हैं; वे राज्य को सीमित करते हैं और उससे काम भी माँगते हैं, जैसे शिक्षा देना। अधिकार कई प्रकार के हैं: राजनीतिक-नागरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक। अधिकारों के साथ ज़िम्मेदारियाँ आती हैं: दूसरों के अधिकारों का सम्मान, साझा चीज़ों की रक्षा, टकराव में संतुलन, और सरकार द्वारा अधिकारों में अनुचित कटौती पर सजगता।
- अनुबंध कानून: वादा क़ानूनी रूप से बाध्यकारी कैसे बनता है – अनुबंध (contract) वह समझौता है जिसे क़ानून लागू करवाता है। इसके लिए प्रस्ताव, हूबहू स्वीकृति, प्रतिफल (दोनों कुछ देते हैं), क़ानूनी बंधन का इरादा, क्षमता वाले पक्ष, स्वतंत्र सहमति और वैध उद्देश्य चाहिए। शर्तें 'शर्त' (condition) या 'वारंटी' होती हैं। ग़लतबयानी, दबाव या ग़लती से अनुबंध शून्यकरणीय या शून्य हो सकता है। उल्लंघन पर हर्जाना जैसे उपाय मिलते हैं।
- अपकृत्य विधि: लापरवाही, उपद्रव और दायित्व – अपकृत्य (tort) एक दीवानी गलती है, जिसमें किसी का काम या लापरवाही दूसरे को नुकसान पहुँचाती है और दोनों के बीच कोई अनुबंध नहीं होता। पीड़ित (वादी) गलती करने वाले (प्रतिवादी) पर उपचार के लिए दावा कर सकता है, आम तौर पर पैसा जिसे हर्जाना कहते हैं। मुख्य अपकृत्य हैं: लापरवाही (कर्तव्य, उल्लंघन, कारण-संबंध और नुकसान चाहिए), अधिभोगी दायित्व, उपद्रव और ख़तरनाक रिसाव। नियोक्ता अपने कर्मचारियों के अपकृत्य के लिए भी ज़िम्मेदार हो सकता है (प्रतिनिधिक दायित्व)। अंशदायी लापरवाही और सहमति जैसे बचाव दायित्व घटा या खत्म कर सकते हैं।
- अमेरिकी संविधान: शक्ति कैसे बँटती और सीमित होती है – अमेरिकी संविधान (1787 में लिखा, 1789 से लागू) अमेरिका का सर्वोच्च क़ानून है। इसने कमज़ोर आर्टिकल्स ऑफ़ कॉन्फ़ेडरेशन की जगह ली। इसमें तीन अलग शाखाएँ हैं (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) जो एक-दूसरे पर नियंत्रण रखती हैं, शक्ति राष्ट्रीय और राज्य सरकारों में बँटी है (संघवाद), और बिल ऑफ़ राइट्स (1791) व बाद के संशोधन व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करते हैं। इसकी नींव है: जनता की संप्रभुता, सीमित सरकार और क़ानून का शासन।
- आधुनिक ब्रिटेन में साझा मूल्य, अधिकार, कर्तव्य और पहचान – ब्रिटेन के समाज के मुख्य साझा मूल्य आमतौर पर ये माने जाते हैं: लोकतंत्र, क़ानून का शासन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और अलग धर्म व विश्वास वालों के प्रति आपसी सम्मान और सहिष्णुता (कभी-कभी इन्हें पाँच गिना जाता है)। इनसे विविध लोग साथ रह पाते हैं। लोगों के अधिकार और स्वतंत्रताएँ हैं (जैसे बोलने की आज़ादी, निष्पक्ष सुनवाई, धर्म की आज़ादी) और इनके साथ कर्तव्य आते हैं (क़ानून मानना, दूसरों के अधिकारों का सम्मान, जूरी सेवा, कर देना)। हर व्यक्ति की पहचान कई स्तरों पर होती है: निजी, परिवार, स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक, और ये एक साथ हो सकती हैं।
- आपराधिक कानून (Criminal Law): अपराध और बचाव – आपराधिक कानून बताता है कि राज्य किन कामों को अपराध मानता है और उनकी सज़ा क्या है। ज़्यादातर अपराधों के दो हिस्से होते हैं: दोषी कार्य (actus reus) और दोषी मन (mens rea)। अपराध व्यक्ति के विरुद्ध (घातक जैसे हत्या; गैर-घातक जैसे हमला) या संपत्ति के विरुद्ध (चोरी, लूट, सेंधमारी, धोखाधड़ी, संपत्ति को नुकसान) हो सकते हैं। अपराध करने की कोशिश (प्रयास) भी अपराध है। आत्मरक्षा, दबाव, पागलपन या आपराधिक ज़िम्मेदारी की उम्र से कम होना जैसे बचाव दोष हटा या घटा सकते हैं। अभियुक्त निर्दोष माना जाता है; अभियोजन को उचित संदेह से परे दोष साबित करना होता है।
- आपराधिक प्रक्रिया: आपराधिक मामला कैसे चलता है – आपराधिक प्रक्रिया उन नियमों का समूह है जिनसे राज्य अपराध की जाँच करता है और संदिग्ध पर मुक़दमा चलाता है। इसके सिद्धांत हैं: कानूनी दायरा, दोष सिद्ध होने तक निर्दोष, बचाव का अधिकार, निष्पक्ष खुला मुक़दमा और कानून के सामने समानता। इसमें न्यायाधीश, अभियोजक, जाँच अधिकारी, संदिग्ध या अभियुक्त, बचाव वकील और पीड़ित शामिल होते हैं। पहले मुक़दमे से पहले की जाँच होती है, जो संदेह की सूचना और आरोप-पत्र तक जाती है। मामले के दौरान संदिग्ध पर निवारक उपाय लग सकता है, व्यक्तिगत वादे से हिरासत तक, कारण बताकर और सीमित समय के लिए। फिर मुक़दमा: शुरुआत, सबूत, बहस, अंतिम बात, फ़ैसला (न्यायाधीश या जूरी का) और अपील का अधिकार।
- उत्तराधिकार क़ानून: वसीयत, वारिस और बँटवारा – उत्तराधिकार क़ानून तय करता है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति, अधिकार और कर्ज़ का क्या होगा। विरासत मृत्यु के पल खुलती है, आख़िरी निवास की जगह पर। संपदा (estate) = उसकी सारी संपत्ति − कर्ज़; पेंशन जैसे निजी अधिकार आगे नहीं जाते। संपत्ति या तो वसीयत से जाती है (लिखित, हस्ताक्षरित दस्तावेज़ जिसमें वसीयतकर्ता वारिस चुनता है) या, वैध वसीयत न हो तो, क़ानून से: नज़दीकी रिश्तेदार पंक्तियों (वर्गों) में होते हैं, नज़दीकी पंक्ति दूर वाली को बाहर कर देती है, और एक पंक्ति के वारिस आमतौर पर बराबर बाँटते हैं। कई देश नाबालिग बच्चों और आश्रितों का अनिवार्य हिस्सा बचाते हैं। हर वारिस तय समय (अक्सर छह महीने) में विरासत स्वीकार या त्याग करता है; स्वीकार करने वाला कर्ज़ बस मिली संपत्ति की क़ीमत तक चुकाता है।
- एक दल के प्रभुत्व का दौर – भारत का पहला आम चुनाव (1951-52) तब तक दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव था, जिसमें लगभग 17 करोड़ मतदाता थे। कांग्रेस ने यह और अगले दो चुनाव जीते, इसलिए 1967 तक के समय को एक दल के प्रभुत्व का दौर कहते हैं। आज़ादी की लड़ाई की विरासत, हर जगह फैला संगठन और सामाजिक-वैचारिक गठबंधन होने के कारण कांग्रेस का दबदबा रहा; उसके भीतर गुटों को जगह मिलती थी। समाजवादी, कम्युनिस्ट, भारतीय जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी जैसे छोटे विपक्षी दलों ने आलोचना करके लोकतंत्र को जीवित रखा।
- कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना – 1960 के दशक में कांग्रेस प्रणाली की बड़ी परीक्षा हुई। 1964 में नेहरू के निधन के बाद सत्ता शांति से शास्त्री और फिर इंदिरा गांधी को मिली। 1967 के 'राजनीतिक भूकंप' में कांग्रेस नौ राज्यों में हारी; गठबंधन सरकारें और दल-बदल हुए। 1969 में पार्टी सिंडिकेट (कांग्रेस ओ) और इंदिरा गांधी (कांग्रेस आर) में बँट गई। 1971 में इंदिरा के 'ग़रीबी हटाओ' ने 352 सीटें जिताईं और कांग्रेस का प्रभुत्व लौटा, पर अब वह गुटों के गठबंधन के बजाय एक लोकप्रिय नेता पर टिका था।
- क़ानून का शासन (Rule of Law) – क़ानून के शासन (विधि का शासन) का अर्थ है कि सरकार और उसके नेता समेत हर व्यक्ति एक-से, पहले से ज्ञात क़ानून माने, जिन्हें निष्पक्ष और स्वतंत्र अदालतें बराबरी से लागू करें। मुख्य सिद्धांत हैं: क़ानून की सर्वोच्चता, क़ानून के सामने समानता, साफ़ और सार्वजनिक क़ानून, निष्पक्ष सुनवाई, अधिकारों की रक्षा और शक्तियों का पृथक्करण। क़ानून खुली प्रक्रिया से बनते-बदलते हैं, अदालतें उन्हें संविधान या अधिकार-पत्र पर परख सकती हैं, और देश संधियों से अंतरराष्ट्रीय क़ानून मानते हैं।
- कानून के स्रोत: हमारे नियम कहाँ से आते हैं – कानून का स्रोत वह है जहाँ से कोई कानूनी नियम आता है और बल पाता है। आज मुख्य स्रोत हैं: विधान (संसद के अधिनियम, जो विधेयक के तय चरण पार करके बनते हैं), प्रत्यायोजित या अधीनस्थ विधान (मूल अधिनियम की शक्ति से बने नियम और उपनियम), और न्यायिक पूर्व-निर्णय (ऊँची अदालतों के पुराने फ़ैसले जो निचली अदालतों पर बाध्यकारी हैं)। अन्य स्रोत हैं रीति-रिवाज, धार्मिक मानदंड (कुछ क्षेत्रों और देशों में), सामूहिक समझौते जैसे मानक अनुबंध, अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ और मार्गदर्शक के रूप में विधि-विद्वानों के लेख। अधिनियम लागू करने के लिए जज व्याख्या के नियम अपनाते हैं। सिविल-लॉ देश मुख्यतः लिखित संहिताओं पर चलते हैं; भारत और ब्रिटेन जैसे कॉमन-लॉ देशों में पूर्व-निर्णय की बड़ी भूमिका है।
- क़ानून कैसे विकसित हुआ और समाज अपराध से कैसे निपटता है – 800 वर्षों में इंग्लैंड और फिर ब्रिटेन का क़ानून शासक की मर्ज़ी से सबके अधिकारों की ओर बढ़ा: मैग्ना कार्टा (1215) ने राजा को क़ानून के नीचे रखा, हेबियस कॉर्पस (1679) ने बिना कारण क़ैद रोकी, बिल ऑफ़ राइट्स (1689) ने राजा को सीमित और संसद को मज़बूत किया, और दूसरे विश्व युद्ध के बाद मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948) और यूरोपीय मानव अधिकार कन्वेंशन (1950) ने मानव अधिकार तय किए, जिन्हें मानव अधिकार अधिनियम 1998 ने ब्रिटेन के क़ानून में लाया। दोषी पाए जाने पर अदालत सज़ा चुनती है (चेतावनी देकर छोड़ना, जुर्माना, सामुदायिक आदेश, निलंबित सज़ा या जेल) ताकि पाँच लक्ष्य पूरे हों: दंड, निवारण, सुधार, जनता की सुरक्षा और क्षतिपूर्ति। अपराध दर पुलिस रिकॉर्ड और पीड़ित सर्वेक्षण से नापी जाती है; यह सामाजिक, आर्थिक और पुलिस से जुड़े कारणों से बदलती है, और रोकथाम से घट सकती है।
- कानून क्या है? बुनियादी बातें – कानून सामान्य, बाध्यकारी नियमों का समूह है जिसे राज्य बनाता या मान्यता देता है और अदालतें लागू करती हैं। यह नैतिकता से मिलता है पर वही नहीं है। इसके स्रोत हैं संविधान, संधियाँ, अधिनियम, नियम, न्यायिक निर्णय और रीति-रिवाज, जो एक क्रम में सजे हैं। प्राकृतिक व्यक्ति और विधिक व्यक्ति (जैसे कंपनी) अधिकार और कर्तव्य रखते हैं। रोज़मर्रा के कानून में अनुबंध, उपभोक्ता संरक्षण और अदालत तक पहुँच आते हैं।
- कानून-व्यवस्था की संस्थाएँ: पुलिस, अभियोजन और अदालत – कानून-व्यवस्था की संस्थाएँ देखती हैं कि कानून माने जाएँ। पुलिस जाँच करती है और संदिग्ध को पकड़ती है। अभियोजन देखता है कि मामला कानून के अनुसार है और अदालत में आरोप रखता है। अदालतें, स्वतंत्र जजों के साथ, दोनों पक्ष सुनती हैं और फ़ैसला देती हैं। तीनों काम अलग रखना ग़लत इस्तेमाल से बचाव है।
- कानूनी ज़िम्मेदारी के प्रकार: दीवानी, अनुशासनात्मक, प्रशासनिक, आपराधिक – कानूनी ज़िम्मेदारी वह नतीजा है जो कानून का नियम तोड़ने पर भुगतना पड़ता है। चार मुख्य प्रकार हैं: दीवानी (नुकसान की भरपाई, अक्सर पैसे से), अनुशासनात्मक (काम या स्कूल में सज़ा), प्रशासनिक (छोटे सार्वजनिक अपराध पर जुर्माना) और आपराधिक (गंभीर अपराध पर अदालत की सज़ा)।
- कानूनी प्रणाली और कानून की व्यवस्था – कानूनी परिवार उन देशों का समूह है जिनका कानून एक जैसे ढंग से बना है: सिविल लॉ (पहले संहिताएँ), कॉमन लॉ (पहले अदालती फ़ैसले) और धार्मिक या रीति-रिवाज वाली व्यवस्थाएँ। किसी भी देश में कानून कानूनी नियमों से बनता है। हर नियम में परिकल्पना (कब लागू), निर्देश (क्या करना है) और मंज़ूरी (न मानने पर क्या) होती है। नियमों को विषय और तरीके के आधार पर शाखाओं में बाँटा जाता है। सार्वजनिक कानून (संवैधानिक, प्रशासनिक, आपराधिक) राज्य से जुड़ा है और आदेश से चलता है। निजी कानून (दीवानी, पारिवारिक, वाणिज्यिक, श्रम) बराबर के लोगों का है और समझौते से चलता है।
- कानूनी रिश्ते – कानूनी रिश्ता व्यक्तियों के बीच का वह जोड़ है जो कानून के नियम से बनता है और जिसकी राज्य रक्षा करता है। इसमें विषय (पक्ष), वस्तु (रिश्ता किसके बारे में) और सामग्री (अधिकार और कर्तव्य) होते हैं। कानूनी तथ्यों से रिश्ता बनता, बदलता या ख़त्म होता है, जैसे अनुबंध पर दस्तख़त, किराये का बदलना, कर्ज़ चुकाना या मृत्यु। कानूनी क्षमता अधिकार रखने की योग्यता है और जन्म से शुरू होती है। कार्य-क्षमता खुद सौदे करने की योग्यता है और उम्र के साथ बढ़ती है।
- कानूनी संस्कृति और विधिक चेतना – विधिक (कानूनी) चेतना वह सब है जो लोग कानून के बारे में जानते, महसूस करते और मानते हैं। इसके दो हिस्से हैं: कानूनी विचारधारा (कानून के बारे में सोचे-समझे विचार) और कानूनी मनोविज्ञान (कानून के प्रति भावनाएँ और आदतें)। जब यह ज्ञान और सम्मान रोज़ के कानून-पालन वाले व्यवहार में बदल जाता है, तो उसे कानूनी संस्कृति कहते हैं।
- कार्यपालिका – कार्यपालिका सरकार का वह अंग है जो कानूनों और नीतियों को लागू करता है। देशों में अध्यक्षात्मक, संसदीय या अर्ध-अध्यक्षात्मक कार्यपालिका होती है। भारत में संसदीय कार्यपालिका है: राष्ट्रपति औपचारिक प्रमुख हैं, जबकि असली शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास है, जो तभी तक रहते हैं जब तक लोकसभा का समर्थन है। सिविल सेवक (नौकरशाही) स्थायी कार्यपालिका हैं।
- कार्यपालिका शक्ति: राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उन पर सीमाएँ – कार्यपालिका वह शाखा है जो कानून लागू करती है और रोज़ का शासन चलाती है। अध्यक्षात्मक व्यवस्था (जैसे अमेरिका) में चुना हुआ राष्ट्रपति इसका प्रमुख है, जो विधायिका से अलग है। संसदीय व्यवस्था (जैसे ब्रिटेन, भारत) में प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल विधायिका से आते हैं और उसका विश्वास बनाए रखना पड़ता है। राष्ट्रपति की औपचारिक शक्तियाँ (वीटो, सेनापति, संधि, नियुक्ति, क्षमादान), निहित शक्तियाँ और अनौपचारिक शक्तियाँ (मनाना, दल नेतृत्व, जनादेश) होती हैं। विधायिका और न्यायालय इन पर नियंत्रण रखते हैं।
- किशोर न्याय: नाबालिगों की आपराधिक ज़िम्मेदारी – युवा अपराधियों से वयस्कों से अलग तरह से पेश आया जाता है, क्योंकि वे अभी बढ़ रहे हैं और बदल सकते हैं। आपराधिक ज़िम्मेदारी की उम्र से नीचे बच्चे पर मुकदमा नहीं चलता। उसके ऊपर किशोर व्यवस्था में सुधार पहले आता है: शैक्षिक उपाय, सज़ाओं की छोटी सीढ़ी जिसमें कारावास सिर्फ आख़िरी उपाय है, और प्रोबेशन सेवा जो निगरानी रखती है और किशोर को सामान्य जीवन में लौटने में मदद करती है।
- क्षेत्रीय आकांक्षाएँ – भारत अनेक क्षेत्रों का राष्ट्र है। क्षेत्रीय माँगों से डरने के बजाय भारतीय लोकतंत्र उन्हें समायोजित करने की कोशिश करता है। जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर में स्वायत्तता, अलगाव या बाहरी लोगों के ख़िलाफ़ माँगें उठीं, कभी-कभी हिंसा के साथ। इनमें से ज़्यादातर बातचीत और समझौतों से सुलझीं, जैसे राजीव-लोंगोवाल समझौता (1985), असम समझौता (1985) और मिज़ो समझौता (1986)। द्रविड़ आंदोलन, गोवा और सिक्किम दूसरे रास्ते दिखाते हैं। सबक़: क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतंत्र का हिस्सा हैं, और सत्ता की साझेदारी व न्यायपूर्ण विकास भारत को एक रखते हैं।
- खेती-ज़मीन और ग्रामीण निर्माण के कानून – गाँव में नहर, सड़क या शेड बनाने से पहले दो तरह के कानून देखने पड़ते हैं। ग्रामीण योजना कानून तय करते हैं कि कहाँ क्या बन सकता है (ज़ोन, परमिट, चकबंदी, जल अधिकार)। संरक्षण कानून जंगल, नदी, मिट्टी, वन्यजीव और साफ़ पानी को बचाते हैं और कई बार काम से पहले पर्यावरण जाँच माँगते हैं। इंजीनियर को दोनों जानने चाहिए, वरना काम रुक सकता है, जुर्माना लग सकता है या इमारत गिरानी पड़ सकती है।
- खेल क़ानून: नियम, अधिकार, डोपिंग और अनुबंध – खेल क़ानून उन नियमों का समूह है जो खेल को चलाते हैं: खेल के नियम, खेल संस्थाओं के नियम और राज्य का क़ानून। टकराव हो तो ऊँचा स्रोत जीतता है। गंभीर नुकसान, अनुबंध, स्वास्थ्य और सुरक्षा में राज्य आता है, जबकि डोपिंग में कठोर दायित्व चलता है: शरीर में जो है, उसकी ज़िम्मेदारी खिलाड़ी की है।
- चीन का नया युग, चीनी स्वप्न और मार्गदर्शक विचार – आधिकारिक विवरण में चीन 2012 से 'नए युग' में आया और 19वीं पार्टी कांग्रेस (2017) ने इसकी घोषणा की। मुख्य अंतर्विरोध अब यह कहा जाता है: बेहतर जीवन के लिए जनता की बढ़ती ज़रूरतें बनाम असंतुलित और अपर्याप्त विकास। इसका उत्तर है उच्च-गुणवत्ता विकास, जो पाँच अवधारणाओं से चलता है: नवाचार, समन्वय, हरित, खुलापन और साझा लाभ। राष्ट्रीय पुनरुत्थान का 'चीनी स्वप्न' दो शताब्दी लक्ष्यों (2021 और 2049) और बीच के पड़ाव 2035 से योजनाबद्ध है, और एक मार्गदर्शक विचार पार्टी और राज्य के संविधान में लिखा गया है।
- चीन का सुधार और खुलापन और उसके सिद्धांत का विकास – 1978 में चीन ने तय किया कि मुख्य ध्यान आर्थिक विकास पर होगा, अर्थव्यवस्था चलाने के तरीक़े में सुधार होगा और बाहरी दुनिया के लिए दरवाज़े खुलेंगे। इसके कदम थे: किसान परिवारों को ज़मीन ठेके पर देना, विशेष आर्थिक क्षेत्र, शहरों और कंपनियों में सुधार, 1992 में समाजवादी बाज़ार अर्थव्यवस्था का लक्ष्य और 2001 में WTO की सदस्यता। नतीजे थे तेज़ वृद्धि और ग़रीबी में भारी कमी, साथ में असमानता और प्रदूषण जैसी नई समस्याएँ। आधिकारिक विवरण के अनुसार सिद्धांत व्यवहार से बना: देंग शियाओफ़िंग सिद्धांत, फिर तीन प्रतिनिधित्व, वैज्ञानिक विकास दृष्टि और बाद की विचारधारा।
- चुनाव और प्रतिनिधित्व – बड़े लोकतंत्र में लोग चुनाव से प्रतिनिधि चुनते हैं। भारत 'सर्वाधिक वोट से जीत' (FPTP) प्रणाली अपनाता है: हर निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला जीतता है। कुछ सीटें SC और ST उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। स्वतंत्र चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराता है, और सुधार चुनावों को और साफ़-सुथरा बनाने की कोशिश करते हैं।
- चुनाव प्रणाली और दल प्रणाली: वोट के नियम दलों को कैसे बनाते हैं – चुनाव प्रणाली वह नियम है जो वोटों को सीटों में बदलता है। "सबसे ज़्यादा वोट वाला जीते" (FPTP) में हर इलाक़े में पहले नंबर वाला सीट जीतता है। "विजेता सब ले" निर्वाचक मंडल में राज्य जीतने वाले को उस राज्य के सारे वोट मिलते हैं। आनुपातिक (PR, STV) और मिश्रित (AMS) प्रणालियाँ सीटें वोट के हिस्से के क़रीब बाँटती हैं। ये नियम दल प्रणाली बनाते हैं: FPTP से अक्सर दो बड़े दल बनते हैं (ड्यूवर्जे का नियम), PR से कई दल और गठबंधन। "वोट बेकार जाएगा" के डर से तीसरे दल दब जाते हैं। चुनावी चंदे पर बराबरी बनाम अभिव्यक्ति की आज़ादी की बहस है।
- छात्र परिषद: चुनना, संगठित करना और चलाना – छात्र परिषद विद्यार्थियों को स्कूल चलाने में हाथ बँटाने का मौक़ा देती है। सदस्य निष्पक्ष गुप्त मतदान से चुने जाते हैं (सबसे ज़्यादा वोट वाला जीतता है; बहुमत का मतलब है आधे से ज़्यादा)। परिषद में पद होते हैं (अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष, कक्षा प्रतिनिधि) और समितियाँ होती हैं। वह साफ़ उद्देश्य, तारीख़, बजट और टीम के साथ कार्यक्रम की योजना बनाती है और फिर रिपोर्ट देती है। स्कूल की समस्या सुलझाने के लिए वह तथ्य जुटाती है, प्रस्ताव बनाती है, मतदान करती है, काम करती है और रिपोर्ट देती है।
- जमीनी शासन और सामाजिक सुरक्षा – जमीनी (ज़मीनी स्तर का) शासन का मतलब है गाँव, कस्बे या मोहल्ले के स्तर पर सार्वजनिक काम चलाना। दो साधन सबसे ज़रूरी हैं। परिवार रजिस्टर बताता है कि कौन कहाँ रहता है, ताकि सरकार सेवाएँ योजना से दे सके और जान सके कि किसे मदद चाहिए। स्थानीय परिषद, जिसे निवासी चुनते या सहयोग करते हैं, पानी, सड़क, सफ़ाई जैसी पास की समस्याएँ सुलझाती है। सामाजिक सुरक्षा उसके ऊपर का सुरक्षा-जाल है: लोग और सरकार मिलकर एक साझा कोष में पैसा डालते हैं और यह कोष बीमारी, बुढ़ापे, नौकरी जाने या बच्चों की पढ़ाई के समय मदद करता है। अलग-अलग देशों में नाम और नियम अलग हैं, पर विचार वही है।
- जाति, धर्म और लैंगिक मसले – लिंग, धर्म और जाति के सामाजिक अंतर राजनीति में दिखते हैं। राजनीति अन्याय से लड़ने में मदद कर सकती है, जैसे महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें। पर जब धर्म या जाति से लोगों को बाँटा जाता है, जैसे सांप्रदायिकता में, तो लोकतंत्र को नुकसान होता है। हमारा संविधान राज्य को धर्मनिरपेक्ष बनाता है और भेदभाव रोकता है।
- टकराव और सहमति, कुशलता और निष्पक्षता – लोग अलग-अलग इच्छाओं के साथ साथ रहते हैं, इसलिए टकराव सामान्य है। हम बातचीत, निष्पक्ष नियमों और निर्णय के तरीक़ों (जैसे मतदान) से सहमति तक पहुँचते हैं। अच्छा निर्णय कुशलता (समय और संसाधन की बचत) और निष्पक्षता (सबको बोलने और बराबर मौक़ा मिलना) का संतुलन रखता है।
- तंत्र के रूप में समाज और सामाजिक प्रगति – समाज एक तंत्र है: जुड़े हुए भागों से बना पूरा। इसके चार मुख्य भाग हैं: अर्थव्यवस्था, राजनीति, सामाजिक समूह और संस्कृति। एक भाग का बदलाव बाकी भागों तक फैलता है। समय के साथ समाज आगे बढ़ सकता है (प्रगति), पीछे जा सकता है (प्रतिगमन), धीरे-धीरे बदल सकता है (सुधार) या अचानक बदल सकता है (क्रांति)। प्रगति की अच्छी कसौटी यह है कि लोग ज्यादा आजाद, सुरक्षित और मानवीय जीवन जी रहे हैं या नहीं।
- दत्तक ग्रहण, अभिरक्षा और संरक्षकता – बच्चा बड़ों से तीन कानूनी बंधनों से जुड़ा होता है: अभिरक्षा या कस्टडी (बच्चा किसके साथ रहे, रोज़ की देखभाल), संरक्षकता (बच्चे और उसकी संपत्ति के बड़े फ़ैसले) और कानूनी माता-पिता होना। माता-पिता प्राकृतिक संरक्षक हैं। माता-पिता अलग हों तो अदालत कस्टडी तय करती है। माता-पिता न रहें या देखभाल न कर सकें, तो वसीयत या अदालत 18 वर्ष तक के लिए संरक्षक तय करती है। फ़ॉस्टर देखभाल अस्थायी घर है। दत्तक ग्रहण अदालत के आदेश से बच्चे को हमेशा के लिए नए परिवार का पूरा सदस्य बनाता है। हर फ़ैसला बच्चे के सर्वोत्तम हित में होता है।
- दबाव समूह (Pressure Groups) – दबाव समूह लोगों का संगठित समूह है जिसका एक साझा उद्देश्य होता है और जो चुनाव लड़े बिना सरकार की नीति पर असर डालना चाहता है। हित (वर्गीय) समूह अपने सदस्यों की बात करते हैं; उद्देश्य (प्रचारक) समूह पूरे समाज के लिए किसी विचार के लिए लड़ते हैं। अंदरूनी समूहों से सरकार सलाह लेती है; बाहरी समूह प्रदर्शन और मीडिया से काम करते हैं। तरीक़े: लॉबिंग, अभियान, याचिका, प्रत्यक्ष कार्रवाई और अदालत। लॉबिस्ट, थिंक टैंक, कंपनियाँ और मीडिया भी असर डालते हैं। बहुलवादी कहते हैं समूह शक्ति बाँटकर लोकतंत्र मज़बूत करते हैं; अभिजनवादी कहते हैं अमीर, पहुँच वाले समूह हावी रहते हैं।
- दीवानी (सिविल) कानून: लोगों के बीच अधिकार और कर्तव्य – दीवानी (सिविल) कानून, जिसे निजी कानून भी कहते हैं, आम व्यक्तियों के आपसी रिश्तों का कानून है: लोग, कंपनियाँ, और कभी-कभी सरकार जब वह आम पक्ष की तरह सौदा करती है। इसमें आता है: अधिकार किसके हो सकते हैं (व्यक्ति और उनकी क्षमता), वस्तुएँ और संपत्ति, दायित्व (अनुबंध से या नुकसान पहुँचाने से बने कर्तव्य), परिवार और उत्तराधिकार। जब कोई दीवानी कर्तव्य तोड़ता है, तो मकसद सज़ा नहीं, भरपाई है: पीड़ित अदालत से मुआवज़ा (वास्तविक नुकसान और खोया लाभ), अपनी चीज़ वापस, या गलत काम रोकने का आदेश माँग सकता है। अपकृत्य (टॉर्ट) अनुबंध के बाहर का दीवानी गलत काम है, जैसे लापरवाही से चोट या नुकसान। आम तौर पर गलती करने वाला भरता है; छोटे बच्चों की जगह माता-पिता या अभिभावक ज़िम्मेदार होते हैं। दावा तय समय (परिसीमा अवधि) के अंदर करना होता है। कई देश ये नियम एक सिविल संहिता में लिखते हैं; कुछ अदालती फ़ैसलों से बनाते हैं; मूल विचार एक जैसे हैं।
- दीवानी प्रक्रिया: दीवानी मामला अदालत कैसे पहुँचता है – दीवानी प्रक्रिया निजी विवाद अदालत में सुलझाने के नियम हैं। मुख्य तीन तरह की कार्यवाही हैं: दावा (वाद) कार्यवाही असली विवाद के लिए, आदेश (रिट) कार्यवाही साफ़ बिना विवाद के पैसे के लिए, और विशेष कार्यवाही जिसमें अदालत कोई तथ्य मानती है। लोगों के आपसी विवाद सामान्य अदालतों में, कारोबारियों के विवाद वाणिज्यिक (आर्बिट्रेज) अदालतों में जाते हैं; अपील ऊपर जाती है। मामला लिखित दावा-पत्र से शुरू होता है: अदालत, पक्षकार, माँग, तथ्य और कानून, सबूत और शुल्क। भाग लेने वाले हैं न्यायाधीश, वादी, प्रतिवादी, तीसरे पक्ष, प्रतिनिधि, गवाह और विशेषज्ञ। चरण: दावा दायर, स्वीकार, तैयारी, सुनवाई, फ़ैसला, फिर अपील या अमल।
- द्वंद्ववाद: संबंध, विकास और विरोध – द्वंद्ववाद सोचने का वह तरीका है जो दुनिया को जुड़ी हुई, हमेशा बदलती और विरोधी पक्षों की खींचतान (विरोध) से आगे बढ़ती हुई देखता है। छोटे-छोटे बदलाव जुड़ते-जुड़ते अचानक नया गुण बना देते हैं (मात्रा से गुण)। द्वंद्वात्मक सोच विश्लेषण (पूरे को हिस्सों में बाँटना) और संश्लेषण (हिस्सों से नया पूरा बनाना) का उपयोग करती है, और ज्ञान बार-बार के अभ्यास से बढ़ता है।
- द्विध्रुवीयता का अंत – द्विध्रुवीयता यानी दुनिया में दो शक्ति-केंद्र: अमेरिका और सोवियत संघ। सोवियत प्रणाली ने नौकरी और सुविधाएँ दीं, पर आज़ादी कम थी और अर्थव्यवस्था पिछड़ गई। गोर्बाचेव के सुधारों से व्यवस्था खुली और 1991 में सोवियत संघ 15 देशों में टूट गया। 'शॉक थेरेपी' से पूँजीवाद में जाना बहुत दर्दनाक रहा। शीत युद्ध ख़त्म हुआ, अमेरिका अकेली महाशक्ति बना, और भारत ने रूस व मध्य एशिया के नए देशों से मज़बूत रिश्ते रखे।
- धर्मनिरपेक्षता: सबका बराबर सम्मान, कोई वर्चस्व नहीं – धर्मनिरपेक्षता दो तरह के धार्मिक वर्चस्व का विरोध करती है: अंतर-धार्मिक वर्चस्व (एक धार्मिक समूह का दूसरे पर हावी होना) और अंतः-धार्मिक वर्चस्व (एक ही धर्म के अंदर कुछ सदस्यों का दूसरों पर हावी होना, जैसे जाति या लिंग के नियमों से)। धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी धर्म से नहीं चलता, उसका कोई राजकीय धर्म नहीं और वह किसी धर्म का पक्ष नहीं लेता। पश्चिमी मॉडल, ख़ासकर अमेरिका में, कड़ी अलगाव की दीवार है और ध्यान व्यक्ति की आज़ादी पर है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता सैद्धांतिक दूरी रखती है: राज्य धर्म से दूर रहता है पर छुआछूत जैसे अन्याय को ख़त्म करने के लिए दख़ल दे सकता है और सब धर्मों की बराबर मदद कर सकता है; यह व्यक्ति और अल्पसंख्यक समुदाय दोनों के अधिकार बचाती है। आलोचक इसे धर्म-विरोधी, पश्चिमी आयात, अल्पसंख्यकवाद, हस्तक्षेपकारी और वोट बैंक राजनीति कहते हैं; हर आलोचना का उत्तर है।
- नागरिक नैतिकता: सामूहिक हित, नागरिक और राज्य – नागरिक नैतिकता यह सिखाती है कि समाज के सदस्य के रूप में हमें कैसे व्यवहार करना चाहिए। साझे कुएँ की तरह मेरा हित और सबका हित टकरा सकते हैं। उचित बँटवारे से साधन सबके लिए बचा रहता है। नागरिकों के कर्तव्य हैं, अधिकारियों को ईमानदार रहना है, और अन्यायपूर्ण क़ानून का शांतिपूर्वक विरोध सविनय अवज्ञा कहलाता है।
- नागरिक भागीदारी: स्कूल और समुदाय में हिस्सा लेना – नागरिक भागीदारी का मतलब है नागरिकों का, युवाओं समेत, अपने समुदाय और देश के जीवन में हिस्सा लेना: जानकारी लेना, अपनी राय देना, मतदान करना, स्वयंसेवा करना, संगठनों से जुड़ना, याचिका पर हस्ताक्षर करना और परियोजनाओं का नेतृत्व करना। लोकतंत्र में शक्ति जनता से आती है, इसलिए भागीदारी उसे ज़िंदा रखती है। स्कूल इसका अभ्यास करने की पहली जगह है: छात्र परिषद (छात्र स्वशासन) सभी छात्रों द्वारा चुनी जाती है, बैठक करती है, प्रस्तावों पर चर्चा और मतदान करती है, और शिक्षकों व स्थानीय समुदाय से बात करती है। अच्छी भागीदारी सबके अधिकारों का सम्मान करती है, अलग लोगों को शामिल करती है (विविधता, समावेश, भेदभाव नहीं) और एकजुटता व सहयोग से काम करती है। सामाजिक परियोजना के साफ़ कदम हैं: असली समस्या चुनो, योजना बनाओ, काम करो और नतीजे दिखाओ। अधिकारों के लिए हुए पुराने संघर्षों को याद रखना (लोकतांत्रिक स्मृति) बताता है कि ये आज़ादियाँ क्यों क़ीमती हैं।
- नागरिक समाज: नागरिक मिलकर कैसे काम करते हैं – नागरिक समाज वह जगह है जहाँ लोग अपनी मर्ज़ी से मिलकर काम करते हैं, न मुनाफ़े के लिए और न सरकारी आदेश से। क्लब, दान संस्थाएँ, यूनियन, अभिभावक समूह और युवा संगठन सब इसमें आते हैं। यह राज्य (जो क़ानून बनाता और लागू करता है) और बाज़ार (जो मुनाफ़े के लिए बेचता है) के बराबर में खड़ा है। लोकतंत्र में नागरिक समाज लोगों की आवाज़ बड़ी करता है, सरकार पर नज़र रखता है, ज़रूरतमंदों की मदद करता है और युवाओं को हिस्सा लेना सिखाता है।
- नागरिक सहभागिता: नागरिक कैसे भाग लेते हैं – नागरिक सहभागिता यानी अपने समुदाय और देश के जीवन में भाग लेना। यह एक सीढ़ी जैसी है: जानकारी रखें, वोट दें, समूहों से जुड़ें, स्वेच्छा से सेवा करें, फिर आयोजन और अभियान करें। नागरिक चुनाव में प्रतिनिधि चुनते हैं और जनमत संग्रह में एक प्रश्न का सीधा उत्तर देते हैं। वे राजनीतिक दलों (जो सरकार चलाना चाहते हैं), मज़दूर संघों (जो मज़दूरों की रक्षा करते हैं) और संगठनों या NGO (जो साझा उद्देश्य के लिए काम करते हैं) से जुड़ते हैं। चुनावों के बीच वे याचिका पर हस्ताक्षर करते हैं, सेवा करते हैं, स्थानीय झगड़ों में मध्यस्थता करते हैं और तथ्य जाँचकर ऑनलाइन अभियान चलाते हैं। व्हिसलब्लोअर छिपे ग़लत काम उजागर करते हैं, और स्वतंत्र प्रेस व जनमत उसे कार्रवाई में बदलते हैं। कोई सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित करना ये सब कौशल सिखाता है: योजना, टीमवर्क और ज़िम्मेदारी।
- नागरिक स्वतंत्रताएँ और नागरिक अधिकार – नागरिक स्वतंत्रताएँ वे आज़ादियाँ हैं जिन्हें सरकार छीन नहीं सकती: बोलना, प्रेस, धर्म, शांतिपूर्ण सभा, निजता और पुलिस व अदालत से न्यायपूर्ण व्यवहार (उचित प्रक्रिया)। नागरिक अधिकार बराबर व्यवहार की गारंटी हैं, ताकि नस्ल, जाति, धर्म, लिंग या विकलांगता के कारण किसी को नौकरी, स्कूल, वोट या सेवाओं से वंचित न किया जाए। ज़्यादातर संविधान इन्हें अधिकार-पत्र में लिखते हैं और अदालतें इनकी रक्षा करती हैं। कोई आज़ादी असीमित नहीं: न्यायपूर्ण, क़ानूनी सीमाएँ सार्वजनिक सुरक्षा और दूसरों के अधिकार बचाती हैं। बराबर अधिकार जन-आंदोलनों से मिले: महिलाओं का मताधिकार, भारत में छुआछूत पर रोक, अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन, रंगभेद का अंत। फिर सरकारें भेदभाव-विरोधी क़ानून और आरक्षण जैसी नीतियाँ लाती हैं, और बहुमत के शासन तथा अल्पसंख्यक अधिकारों में संतुलन रखती हैं।
- नागरिकता: पूर्ण और समान सदस्यता – नागरिकता किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता है। नागरिकों को वोट, सुरक्षा और सार्वजनिक सेवाओं जैसे बराबर अधिकार मिलते हैं और वे कर्तव्य बाँटते हैं। इतिहास बताता है कि बराबर अधिकार मज़दूरों, महिलाओं, अश्वेत अमेरिकियों और दूसरे समूहों के संघर्ष से मिले; आज भी गरीब प्रवासी, झुग्गीवासी और आदिवासी अपने अधिकारों के पूरे उपयोग के लिए संघर्ष करते हैं। नागरिकता राष्ट्र से जुड़ी है: हर राज्य तय करता है कि नागरिक कौन है। भारत जन्म, वंश, पंजीकरण या देशीयकरण से नागरिकता देता है, धर्म, जाति या भाषा से नहीं। सार्वभौमिक नागरिकता का आदर्श है कि हर व्यक्ति कहीं का पूरा सदस्य हो, जो राज्यविहीन लोगों और शरणार्थियों के पास अभी नहीं है। विश्व नागरिकता पूरी मानवता की परवाह सिखाती है, जबकि राष्ट्रीय नागरिकता अब भी हमारे अधिकारों की रक्षा करती है।
- नागरिकशास्त्र और सरकार: नागरिक और सरकार मिलकर कैसे काम करते हैं – नागरिकशास्त्र (civics) यह सिखाता है कि लोग ख़ुद पर शासन कैसे करते हैं और नागरिक कैसे भाग लेते हैं। लोकतंत्र में शक्ति जनता की होती है, जो स्वतंत्र चुनाव में प्रतिनिधि चुनती है। सरकार के तीन अंग हैं: विधायिका क़ानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका जाँचती है कि वे संविधान के अनुसार हों। ज़्यादातर देशों में सरकार के स्तर भी होते हैं: स्थानीय, राज्य या प्रांतीय, और राष्ट्रीय। क़ानून एक विचार से शुरू होकर विधेयक बनता है, बहस और मतदान के बाद स्वीकृत होता है। नागरिकों के अधिकार भी हैं और कर्तव्य भी। सक्रिय नागरिक जानकारी रखते हैं, वोट देते हैं, सेवा करते हैं और शांतिपूर्ण ढंग से बदलाव लाते हैं।
- नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य – नागरिक किसी देश का पूरा सदस्य होता है। ज़्यादातर संविधान नागरिकों को अधिकार देते हैं: राजनीतिक और व्यक्तिगत अधिकार (वोट, बोलने की आज़ादी, आस्था, निष्पक्ष सुनवाई, निजता) और सामाजिक-आर्थिक अधिकार (शिक्षा, काम, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा)। नागरिकों के कर्तव्य भी हैं: कानून मानना, कर देना, दूसरों के अधिकारों का सम्मान, पर्यावरण की रक्षा और देश की रक्षा। अधिकार और कर्तव्य साथ चलते हैं, और अधिकारों की उचित सीमाएँ होती हैं ताकि एक की आज़ादी दूसरे को नुकसान न पहुँचाए।
- नाविक, जहाज़ और समुद्री कानून – जहाज़ कई जगहों से गुज़रता है, इसलिए उसके नियम कई स्तरों से आते हैं। IMO और संयुक्त राष्ट्र की संधियाँ आधार बनाती हैं: नाविकों के लिए STCW और MLC, सुरक्षा के लिए SOLAS और लोड लाइन, प्रदूषण के लिए MARPOL, स्वच्छता के नियम और समुद्र पर किसका अधिकार, यह UNCLOS बताता है। हर देश इन संधियों को अपना कानून बनाता है और अपने बंदरगाह में जहाज़ों की जाँच करता है।
- निजता बनाम जनहित – निजता (privacy) हर व्यक्ति का अधिकार है कि जीवन के कुछ हिस्से अपने तक रखे। जनहित (public interest) समाज का असली लाभ या सुरक्षा है। कभी-कभी दोनों उलटी दिशा में खींचते हैं। निर्णय का निष्पक्ष तरीका है: जानकारी कितनी निजी है और बताने से कितनी भलाई होगी, यह तौलो, फिर तीन सवाल पूछो: ज़रूरी है? संतुलित है? सबसे कम बताया जा रहा है?
- नियोजित विकास की राजनीति – आज़ादी के बाद भारत में बहस हुई कि विकास किस रास्ते से हो: बाज़ार का रास्ता या राज्य-नीत रास्ता। भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था चुनी और 1950 में योजना आयोग बनाया। पहली पंचवर्षीय योजना ने कृषि और सिंचाई पर ध्यान दिया; पी.सी. महालनोबिस की दूसरी योजना ने सार्वजनिक क्षेत्र से भारी उद्योग को आगे बढ़ाया। कृषि बनाम उद्योग और सार्वजनिक बनाम निजी पर बहस हुई। नतीजे: उद्योगों की नींव, आंशिक भूमि सुधार, हरित क्रांति और किसानों की नई राजनीतिक ताक़त।
- न्याय व्यवस्था: विवाद और अपराध कैसे सुलझाए जाते हैं – न्याय व्यवस्था वे नियम, लोग और अदालतें हैं जिनसे समाज विवादों को निष्पक्ष ढंग से सुलझाता है और अपराधों से निपटता है। बहुत-से विवाद अदालत के बिना बातचीत, मध्यस्थता या पंचाट (ADR) से ख़त्म होते हैं। दीवानी मामले पक्षों के बीच होते हैं और मुआवज़े पर ख़त्म होते हैं; फ़ौजदारी मामले राज्य चलाता है और सज़ा हो सकती है। सुनवाई में दोनों पक्ष सबूत रखते हैं; दीवानी में 'संभावना के संतुलन' पर और फ़ौजदारी में 'संदेह से परे' साबित करना होता है। हारा पक्ष ऊपर की अदालत में अपील कर सकता है। जज स्वतंत्र होने चाहिए। बच्चों के लिए किशोर न्यायालय होते हैं जो सुधार और सुरक्षा पर ध्यान देते हैं।
- न्यायपालिका – न्यायपालिका विवाद सुलझाती है और संविधान व हमारे अधिकारों की रक्षा करती है। निष्पक्ष रहने के लिए उसे सरकार और संसद से स्वतंत्र होना चाहिए। भारत में एक एकीकृत न्याय व्यवस्था है, जिसमें सबसे ऊपर सर्वोच्च न्यायालय है। सर्वोच्च न्यायालय के पास मूल, रिट, अपीलीय और सलाहकारी क्षेत्राधिकार हैं। न्यायिक पुनरावलोकन और जनहित याचिका से अदालतें अधिकार बचाती हैं, पर उन्हें दूसरे अंगों की भूमिका के साथ संतुलन भी रखना होता है।
- न्यायपालिका: अदालतें और न्यायिक शक्ति – न्यायपालिका अदालतों की वह व्यवस्था है जो क़ानून लागू करके विवाद सुलझाती है और अपराधों पर फ़ैसला करती है। यह विधायिका और कार्यपालिका के साथ शक्ति के तीन अंगों में से एक है, और इसे स्वतंत्र होना चाहिए ताकि न्यायाधीश सिर्फ़ क़ानून मानें। अदालतों के स्तर होते हैं: प्रथम स्तर, अपील और सर्वोच्च न्यायालय। संवैधानिक न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय संविधान तोड़ने वाले क़ानून रद्द कर सकता है (न्यायिक पुनरावलोकन)। अदालतें निष्पक्ष सुनवाई के नियम मानती हैं, जैसे क़ानून के सामने समानता और दोष सिद्ध होने तक निर्दोष।
- पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन – जलवायु परिवर्तन और ओज़ोन क्षरण जैसी समस्याएँ सीमाएँ पार करती हैं, इसलिए ये विश्व राजनीति का हिस्सा बनीं। खुला समुद्र, वायुमंडल, अंटार्कटिका और बाहरी अंतरिक्ष जैसी वैश्विक साझी संपदा किसी की नहीं है और इन्हें बचाना कठिन है। साझी पर अलग-अलग ज़िम्मेदारी का सिद्धांत कहता है कि सब देश क़दम उठाएँ, पर पहले प्रदूषण करने वाले अमीर देश ज़्यादा करें। भारत प्रति व्यक्ति कम उत्सर्जन और विकास के अधिकार पर ज़ोर देता है और स्वच्छ ऊर्जा पर काम करता है। पर्यावरण आंदोलन, तेल-खनिज-पानी पर संघर्ष और मूलवासियों के अधिकार भी इसी राजनीति का हिस्सा हैं।
- पर्यावरण नीति: समाज प्रकृति की रक्षा कैसे करता है – पर्यावरण नीति वे क़ानून, कर, नियम और समझौते हैं जिनसे समाज हवा, पानी, ज़मीन, जलवायु और जीवों की रक्षा करता है। इसकी ज़रूरत इसलिए है क्योंकि प्रदूषण एक बाहरी लागत है: प्रदूषक दूसरों को हुए नुक़सान का पैसा नहीं देता, और साझा संसाधन (हवा, नदियाँ, समुद्र) ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल होते हैं। मुख्य उपाय: विनियमन (सीमाएँ, मानक, प्रतिबंध, पर्यावरण प्रभाव आकलन), बाज़ार उपाय (प्रदूषण कर, सीमा और व्यापार परमिट, साफ़ विकल्पों पर सब्सिडी), संरक्षित क्षेत्र और जानकारी (लेबल, रिपोर्ट)। मुख्य सिद्धांत: प्रदूषक भुगतान करे, रोकथाम, एहतियात और सतत विकास। लोगों को स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार है और उसकी रक्षा का कर्तव्य भी। नीति स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर चलती है, क्योंकि प्रदूषण हर सीमा पार करता है। समाज तीन रास्तों में संतुलन बनाता है: दोहन, परिरक्षण या संरक्षण (समझदारी से उपयोग)।
- पर्यावरण विधि और सतत विकास – सतत विकास का मतलब है: आज की ज़रूरतें ऐसे पूरी करो कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें। क़ानून अर्थव्यवस्था, समाज और पर्यावरण को संतुलन में रखने में मदद करता है। दुनिया के देशों ने स्टॉकहोम (1972), रियो (1992), क्योटो (1997) और पेरिस (2015) में मिलकर लक्ष्य तय किए, और 2015 में 17 सतत विकास लक्ष्य (SDGs) अपनाए। संविधान स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार और उसकी रक्षा का कर्तव्य देते हैं; भारत में अनुच्छेद 21, 48A और 51A(g)। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 एक छतरी क़ानून है, जिससे सरकार मानक तय करती है और प्रदूषकों पर कार्रवाई करती है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड उद्योगों की जाँच करते हैं, अनुमति देते हैं और बंदी का आदेश दे सकते हैं।
- पारिवारिक क़ानून: विवाह, माता-पिता और बच्चे – पारिवारिक क़ानून दीवानी (निजी) क़ानून का हिस्सा है जो विवाह, पति-पत्नी के संबंध, माता-पिता और बच्चे, तलाक़, भरण-पोषण, संरक्षकता और गोद लेने से जुड़ा है। ज़्यादातर देशों में वैध विवाह के लिए दो वयस्क चाहिए जो अपनी मर्ज़ी से सहमत हों, पहले से विवाहित न हों, नज़दीकी रिश्तेदार न हों, और विवाह पंजीकृत हो। पति-पत्नी के अधिकार और कर्तव्य बराबर हैं। माता-पिता बच्चे की देखभाल, भरण-पोषण और पढ़ाई करते हैं, और बच्चे से जुड़ा हर फ़ैसला 'बच्चे के सर्वोत्तम हित' से होता है। बिना माता-पिता की देखभाल वाले बच्चों को संरक्षकता, पालक देखभाल और गोद लेने से सुरक्षा मिलती है।
- प्रतीक के रूप में सम्राट और संविधान में उसके कर्तव्य – जापान के 1947 के संविधान में संप्रभुता जनता के पास है। सम्राट राज्य और जनता की एकता का प्रतीक है और उसका पद जनता की इच्छा से आता है। वह केवल संविधान में गिनाए गए राज्य के काम करता है, हमेशा मंत्रिमंडल की सलाह और मंज़ूरी से, और उसके पास सरकार से जुड़ी कोई शक्ति नहीं है।
- प्रशासनिक विधि – प्रशासनिक विधि वे नियम हैं जो बताते हैं कि सार्वजनिक प्राधिकरण (मंत्रालय, नगर कार्यालय, पुलिस, कर और लाइसेंस कार्यालय) कैसे काम करें, और नागरिक उनके फ़ैसलों को कैसे चुनौती दें। इसके स्रोत हैं संविधान, क़ानून, नियम-विनियम और न्यायालय के निर्णय। प्राधिकरण नियम बनाते हैं, मामले तय करते हैं और सेवाएँ देते हैं; पहले अनुनय, फिर क़ानूनी बल-प्रयोग। लोक सेवकों के अधिकार और कर्तव्य होते हैं। छोटा ग़लत कार्य प्रशासनिक अपराध है, जिस पर प्रशासनिक दायित्व (चेतावनी, जुर्माना, लाइसेंस छिनना) बनता है। नागरिक अपील, याचिका, लोकपाल या प्रशासनिक न्यायालय तक जा सकते हैं।
- बाल अधिकार: हर बच्चे का हक़ – 18 वर्ष से कम उम्र का हर व्यक्ति बच्चा है। बच्चों के सारे मानव अधिकार हैं और उन्हें खास संरक्षण भी मिलता है, क्योंकि वे अभी बढ़ रहे हैं और बड़ों पर निर्भर हैं। मुख्य अंतरराष्ट्रीय संधि है संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC), जो 20 नवंबर 1989 को अपनाया गया, 54 अनुच्छेदों के साथ। 196 देशों ने इसे माना है, किसी भी दूसरी मानव अधिकार संधि से ज़्यादा। चार मूल सिद्धांत हर अधिकार को दिशा देते हैं: भेदभाव नहीं, बच्चे का सर्वोत्तम हित, जीवन-अस्तित्व-विकास का अधिकार, और बच्चे की राय का सम्मान। अधिकार चार समूहों में हैं: जीवन व अस्तित्व (जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, साफ़ पानी), विकास (शिक्षा, खेल, संस्कृति, जानकारी), संरक्षण (हिंसा, दुर्व्यवहार, उपेक्षा, शोषण, बाल श्रम, तस्करी और युद्ध से) और सहभागिता (सुने जाने, राय रखने, समूह बनाने का हक़)। पहली ज़िम्मेदारी माता-पिता की है; सरकार को कानून और सेवाएँ (स्कूल, स्वास्थ्य, बाल आयोग, अदालतें, हेल्पलाइन) देनी होती हैं। UN बाल अधिकार समिति देखती है कि देश वादे निभा रहे हैं या नहीं। स्कूल में छात्रों को शिक्षा, सुरक्षा, सम्मान (शारीरिक दंड नहीं), निष्पक्ष व्यवहार और अपनी बात कहने का हक़ है, और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने का कर्तव्य भी। युवा संरक्षण कानून हानिकारक काम, नाबालिगों को शराब-तंबाकू बेचने, ऑनलाइन नुकसान को सीमित करते हैं और किशोर अपराधियों के लिए अलग न्याय व्यवस्था रखते हैं।
- भारत के विदेश संबंध – भारत तब आज़ाद हुआ जब शीतयुद्ध शुरू हो रहा था। नेहरू का जवाब था गुटनिरपेक्षता: दोनों सैन्य गुटों से दूर रहना, अपने फ़ैसले ख़ुद करना और आज़ादी के लिए लड़ते उपनिवेशों का साथ देना। चीन के साथ पंचशील (1954) की दोस्ती 1962 के युद्ध में टूट गई। पाकिस्तान से 1947-48, 1965 और 1971 में युद्ध हुए, 1971 में बांग्लादेश बना; साथ ही सिंधु जल संधि, ताशकंद और शिमला जैसे समझौते भी हुए। परमाणु नीति शांतिपूर्ण उपयोग से 1974 और 1998 के परीक्षणों तक पहुँची, 'पहले प्रयोग नहीं' के वादे के साथ।
- भारत में चुनाव – चुनाव से करोड़ों लोग प्रतिनिधि चुनते हैं और शांति से सरकार बदल सकते हैं। लोकसभा और विधानसभाओं के लिए भारत में सर्वाधिक मत से जीत (FPTP) प्रणाली है, और राज्यसभा व राष्ट्रपति के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व का एक रूप। परिसीमन से निर्वाचन क्षेत्रों की आबादी लगभग बराबर रखी जाती है। स्वतंत्र निर्वाचन आयोग मतदाता सूची बनाता है और चुनाव कराता है। भारत में बहुदलीय व्यवस्था है, गठबंधन सरकारें आम हैं, और दल-बदल विरोधी कानून चुने हुए सदस्यों को पाला बदलने से रोकता है।
- भारतीय राजनीति: नए बदलाव – 1989 में कांग्रेस ने बहुमत खोया और गठबंधन का दौर शुरू हुआ। 1990 के दशक में ओबीसी आरक्षण पर मंडल का फ़ैसला, बसपा जैसे ओबीसी और दलित दलों का उदय, आर्थिक सुधार और भाजपा का उभार हुआ। 1989 से 2014 तक राष्ट्रीय मोर्चा, संयुक्त मोर्चा, राजग और संप्रग के गठबंधनों ने राज किया। आर्थिक सुधार, ओबीसी दावों, राज्य दलों की भूमिका और व्यावहारिक गठबंधनों पर सहमति बढ़ी। 2014 और 2019 में भाजपा ने अकेले बहुमत पाया; 2024 में उसने फिर राजग गठबंधन सरकार बनाई।
- भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ – संविधान देश का सर्वोच्च कानून है: यह सरकार बनाता है, उसकी शक्ति सीमित करता है और लोगों के अधिकारों की रक्षा करता है। भारत का संविधान संविधान सभा ने 1946 से 1949 में बनाया, 26 नवंबर 1949 को अपनाया और 26 जनवरी 1950 को लागू किया। इसकी मुख्य विशेषताएँ: सबसे लंबा लिखित संविधान; प्रस्तावना (संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य; न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता); मौलिक अधिकार, नीति-निदेशक तत्व और मौलिक कर्तव्य; मज़बूत केंद्र वाला संघीय ढाँचा और तीन सूचियाँ; आपातकालीन प्रावधान; स्वतंत्र और एकीकृत न्यायपालिका; संसदीय शासन; सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार; एकल नागरिकता; अनुसूचियाँ; और कुछ लचीली, कुछ कठोर संशोधन प्रक्रिया।
- भारतीय संविधान में अधिकार – अधिकार वे दावे हैं जिन्हें समाज मानता है और कानून बचाता है। भारत के संविधान में छह मौलिक अधिकार हैं जिन्हें अदालतें लागू कराती हैं, जिनमें अदालत जाने (रिट) का अधिकार भी है। नीति-निर्देशक तत्त्व सरकार के लक्ष्य हैं जिन्हें अदालत लागू नहीं कराती। अधिकार सरकार को रोकते हैं; नीति-निर्देशक तत्त्व उसे दिशा देते हैं। दोनों मिलकर स्वतंत्र और न्यायपूर्ण समाज चाहते हैं।
- भू-राजनीति में सीमाएँ: रेखाएँ खींचना और उन पर बहस – सीमा वह रेखा है जो दो राज्यों की ज़मीन और अधिकारों को अलग करती है। साम्राज्य टूटने और नए देश बनने से सीमाएँ बढ़ी हैं। कुछ सीमाएँ नदी जैसी प्राकृतिक चीज़ों पर चलती हैं, कुछ काग़ज़ पर खींची सीधी रेखाएँ होती हैं। पुराने उदाहरण अलग मक़सद दिखाते हैं: राइन के किनारे रोमन लाइम्स साम्राज्य की रक्षा करता था; 1884 से 1885 के बर्लिन सम्मेलन ने बाहरी शक्तियों के बीच अफ्रीका के बँटवारे के नियम बनाए; कोरिया की सीमा 1953 में बनी भारी निगरानी वाली पट्टी है। सीमाओं पर बहस भी होती है: जर्मन-पोलिश सीमा आख़िर में संधियों से मानी गई, और समुद्र 12 मील के प्रादेशिक सागर, 200 मील के विशेष आर्थिक क्षेत्र और खुले समुद्र में बँटा है। सीमाएँ सीमा-पार जगहें भी बनाती हैं जहाँ लोग व्यापार, काम और सहयोग करते हैं।
- भू-राजनीति: जगह से कैसे बनती है शक्ति – भू-राजनीति यह पढ़ती है कि भूगोल (स्थान, आकार, संसाधन, समुद्री मार्ग) देशों की शक्ति, उनकी होड़ और गठबंधनों को कैसे आकार देता है। शक्ति यानी दूसरों से अपनी बात मनवाने की क्षमता। हार्ड पावर बल या पैसे से काम करती है (सेना, अर्थव्यवस्था); सॉफ़्ट पावर आकर्षित करती है (संस्कृति, भाषा, विश्वविद्यालय, तकनीक)। शक्तियाँ उठती और गिरती हैं, जैसे ऑटोमन साम्राज्य, और 1991 के बाद रूस ने दोबारा खड़ा होने की कोशिश की। देश संसाधनों, क्षेत्र और रास्तों (जलडमरूमध्य, नए रेशम मार्ग) के लिए होड़ करते हैं, पर संधियों, गठबंधनों, अनन्य आर्थिक क्षेत्र, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन और खुले समुद्र की रक्षा में सहयोग भी करते हैं।
- भूमि कानून – भूमि कानून वे नियम हैं जो तय करते हैं कि ज़मीन का मालिक कौन हो सकता है, उसका इस्तेमाल, ख़रीद-बिक्री, किराया और उत्तराधिकार कैसे होगा, और विवाद में क्या होगा। मुख्य बातें: रजिस्टर में दर्ज भूखंड, ज़मीन की श्रेणियाँ, स्वामित्व के रूप (निजी, सामुदायिक, राज्य), दूसरे की ज़मीन पर सीमित अधिकार (पट्टा, सुखाधिकार), हक़ पाने और खोने के तरीके, और सार्वजनिक काम के लिए ज़मीन लेने पर उचित मुआवज़ा।
- महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की रोकथाम: घरेलू हिंसा, अंतरराष्ट्रीय नियम और भारतीय क़ानून – महिलाओं के विरुद्ध हिंसा वह हर काम है जो महिलाओं को महिला होने के कारण शारीरिक, यौन, भावनात्मक या आर्थिक नुक़सान पहुँचाता है या पहुँचा सकता है। यह घर में, काम की जगह पर और सार्वजनिक जगहों पर होती है। दुनिया ने इसे रोकने के नियम बनाए हैं, जैसे CEDAW (1979), संयुक्त राष्ट्र की 1993 की घोषणा और सतत विकास लक्ष्य 5। भारत के अपने क़ानून हैं: घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, कार्यस्थल के लिए POSH अधिनियम 2013 और आपराधिक क़ानून। रोकथाम के लिए क़ानून, सहायता सेवाएँ और सोच में बदलाव, तीनों चाहिए।
- मानव अधिकार: अर्थ, इतिहास, प्रकार और संरक्षण – मानव अधिकार वे मूल स्वतंत्रताएँ और सुरक्षाएँ हैं जो हर व्यक्ति को मनुष्य होने के कारण मिलती हैं। ये सार्वभौमिक, अविच्छेद्य, अविभाज्य और गरिमा पर आधारित हैं। मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948) ने सबके लिए एक साझा मानक बनाया, जिसे बाद में संधियों से बाध्यकारी बनाया गया। संविधान, न्यायालय, आयोग, संयुक्त राष्ट्र और नागरिक समाज इनकी रक्षा करते हैं, और केवल दूसरों की रक्षा के लिए बने उचित क़ानून ही इन्हें सीमित कर सकते हैं।
- मानवाधिकार उल्लंघन के लिए शिकायत तंत्र – किसी के मानवाधिकार टूटें तो वह अदालत जा सकता है, पर अदालतें धीमी और महँगी हो सकती हैं। इसलिए कई देश अर्ध-न्यायिक निकाय बनाते हैं: ऐसे आयोग जिनके पास अदालत जैसी कुछ शक्तियाँ हैं (गवाह बुलाना, दस्तावेज़ माँगना), पर प्रक्रिया आसान, सस्ती और तेज़ है। ज़्यादातर ये बाध्यकारी फ़ैसला नहीं, सिफ़ारिश देते हैं। भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (1993, मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम) शिकायत पर या स्वतः संज्ञान से जाँच करता है, जेलों का दौरा करता है और मुआवज़े व कार्रवाई की सिफ़ारिश करता है; राज्य आयोग राज्य स्तर पर यही करते हैं। ख़ास समूहों के लिए ख़ास आयोग हैं: महिला, अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और बच्चे। दुनिया भर में ऐसी संस्थाएँ संयुक्त राष्ट्र के पेरिस सिद्धांतों का पालन करती हैं।
- यूरोपीय संघ – यूरोपीय संघ (EU) 27 यूरोपीय देशों का समूह है जो कुछ फ़ैसले और क़ानून साझा करते हैं। इसकी शुरुआत 1951 में हुई, जब छह देशों ने कोयला और इस्पात साझा किया ताकि उनके बीच युद्ध असंभव हो जाए। धीरे-धीरे यह एकल बाज़ार बना जहाँ सामान, लोग, सेवाएँ और पैसा आज़ादी से चलते हैं। आयोग क़ानून का प्रस्ताव रखता है, संसद और परिषद उसे पारित करते हैं, और न्यायालय देखता है कि उसका पालन हो। 21 सदस्य यूरो चलाते हैं। यूनाइटेड किंगडम 2020 में बाहर हो गया।
- राजनीतिक दर्शन: राज्य, शक्ति और न्याय – राजनीतिक दर्शन साथ रहने के बड़े सवाल पूछता है: राज्य क्यों चाहिए? कौन-सी शक्ति सही (वैध) है? न्याय क्या है? लोगों को कितनी स्वतंत्रता और समानता मिले? सामाजिक अनुबंध के विचारक (हॉब्स, लॉक, रूसो) राज्य को एक समझौता मानते हैं। प्लेटो और अरस्तू ने आदर्श राज्य और सरकार के रूप बताए; सिसरो ने गणराज्य को क़ानून के तहत जनता की साझी संपत्ति कहा। रॉल्स, मिल और कई परंपराओं के विचारक (कन्फ़्यूशियस, कौटिल्य, उबुंटू) स्वतंत्रता, समानता, संपत्ति और समुदाय को तौलने में मदद करते हैं।
- राजनीतिक दल – राजनीतिक दल ऐसे लोगों का समूह है जो चुनाव लड़ने और सत्ता पाने के लिए साथ आते हैं। दल सात मुख्य काम करते हैं, चुनाव लड़ने से लेकर लोगों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने तक। भारत में राष्ट्रीय और राज्य दलों वाली बहुदलीय व्यवस्था है। दलों के सामने अंदरूनी लोकतंत्र की कमी, धनबल जैसी चुनौतियाँ हैं और कुछ सुधार हुए हैं।
- राजनीतिक दल: विचारधारा, संगठन, गुट और तीसरे दल – राजनीतिक दल ऐसे लोगों का समूह है जो एक जैसे विचार रखते हैं और चुनाव जीतकर सत्ता पाना चाहते हैं। हर दल की एक विचारधारा होती है: अर्थव्यवस्था, समाज और सरकार की भूमिका पर मूल विचार। दल का एक ढाँचा होता है, ऊपर राष्ट्रीय नेता से नीचे स्थानीय सदस्यों तक। एक ही दल में कई गुट होते हैं जो नीति और नेतृत्व पर मुक़ाबला करते हैं। दलों का समर्थन गिरता भी है (पतन) और लौटता भी है (नवीनीकरण)। बड़े दलों के सामने तीसरे दल और निर्दलीय उम्मीदवार होते हैं। "सबसे ज़्यादा वोट वाला जीते" प्रणाली में ये कम जीतते हैं, पर वोट काटकर नतीजा बदल सकते हैं।
- राजनीतिक विचारधारा: राजनीति के बड़े सवालों के अलग-अलग जवाब – राजनीतिक विचारधारा लोगों, समाज और राज्य के बारे में जुड़े हुए विचारों का सेट है, साथ में समाज को बनाए रखने या बदलने की योजना। हम राजनीतिक विचार राजनीतिक समाजीकरण से सीखते हैं (परिवार, स्कूल, दोस्त, मीडिया, घटनाएँ)। “वाम” और “दक्षिण” शब्द 1789 की फ़्रांसीसी सभा में बैठने की जगह से आए। मुख्य विचारधाराएँ हैं उदारवाद (व्यक्ति की आज़ादी और अधिकार), रूढ़िवाद (परंपरा, व्यवस्था, धीमा बदलाव) और समाजवाद (समानता, साझा धन)। इनके अलावा नारीवाद, पर्यावरणवाद, अराजकतावाद, बहुसंस्कृतिवाद और राष्ट्रवाद। दो धुरियों वाला मॉडल (अर्थव्यवस्था और आज़ादी-सत्ता) एक रेखा से बेहतर तस्वीर देता है। विचारधाराएँ दलों के घोषणापत्र और नीतियाँ तय करती हैं, और जनमत सर्वेक्षण से इन्हें नापा जाता है।
- राजनीतिक व्यवस्थाएँ: समाज खुद को कैसे चलाते हैं – राजनीतिक व्यवस्था वह तरीका है जिससे समाज सबके लिए फ़ैसले लेता और लागू करता है। राज्य (जनसंख्या, भू-भाग और संप्रभुता वाला स्थायी संगठन), शासन-व्यवस्था (कौन और कैसे सत्ता रखेगा, इसके नियम) और सरकार (अभी सत्ता में बैठे लोग) अलग चीज़ें हैं। लोकतंत्र में नागरिक नेता चुनते और हटाते हैं; सत्तावादी व्यवस्था में कुछ लोग बिना जवाबदेही सत्ता रखते हैं। जब लोग सत्ता को सही मानते हैं तो वह प्राधिकार बनती है (वैधता) – परंपरा, करिश्मा या कानूनी-तर्कसंगत नियमों से।
- राजनीतिक संस्कृति और राजनीतिक भागीदारी – राजनीतिक संस्कृति किसी देश के लोगों के राजनीति के बारे में साझा मूल्य और विश्वास हैं: सरकार पर कितना भरोसा, आज़ादी ज़्यादा ज़रूरी या व्यवस्था, और क्या उन्हें लगता है कि वे कुछ बदल सकते हैं। नागरिक समाज नागरिकों और राज्य के बीच स्वैच्छिक समूहों का क्षेत्र है। लोग वोट, प्रचार, याचिका, विरोध और समूहों से भाग लेते हैं; शिक्षा, आय, उम्र, लामबंदी और नियम (जैसे अनिवार्य मतदान) इसे बदलते हैं। नागरिक स्वतंत्रताएँ राज्य से बचाती हैं; नागरिक अधिकार बराबरी का व्यवहार पक्का करते हैं। विभाजन (भाषा, धर्म, वर्ग, क्षेत्र) एक-दूसरे पर चढ़ें तो टकराव गहरा, एक-दूसरे को काटें तो नरम।
- राजनीतिक संस्थाएँ: संसदीय, अध्यक्षीय और अर्ध-अध्यक्षीय प्रणाली – हर लोकतंत्र में सत्ता तीन हिस्सों में बँटी होती है: विधायिका क़ानून बनाती है, कार्यपालिका सरकार चलाती है और न्यायपालिका विवाद सुलझाती है। देशों में फ़र्क़ इस बात का है कि सरकार का मुखिया कैसे चुना और हटाया जाता है। संसदीय प्रणाली में लोग संसद चुनते हैं और प्रधानमंत्री को संसद का भरोसा चाहिए, इसलिए संसद उसे हटा सकती है। अध्यक्षीय प्रणाली में लोग राष्ट्रपति और संसद को अलग-अलग चुनते हैं; राष्ट्रपति का कार्यकाल तय होता है और उसे सिर्फ़ महाभियोग से हटाया जा सकता है। अर्ध-अध्यक्षीय प्रणाली दोनों का मेल है। कार्यकाल सीमा किसी एक व्यक्ति को बहुत लंबे समय तक सत्ता में रहने से रोकती है। स्वतंत्र विधायिका क़ानून, बजट, प्रश्न और समितियों से सरकार पर नज़र रखती है।
- राजनीतिक सिद्धांत: एक परिचय – राजनीति यानी लोगों का मिलकर फ़ैसले करना: किसे क्या मिले, नियम कौन बनाए और कैसे। यह घर, स्कूल और पूरे देश में होती है, केवल दलों में नहीं। राजनीतिक सिद्धांत इसके पीछे के बड़े विचारों को पढ़ता है: स्वतंत्रता, समानता, न्याय, अधिकार, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता। यह पूछता है कि हर विचार का अर्थ क्या है और वह क्यों ज़रूरी है। ये विचार संविधान और कानूनों में गए हैं और रोज़ के जीवन को बदलते हैं। हम इसे इसलिए पढ़ते हैं ताकि अपनी राय परख सकें, दूसरों को समझ सकें, तर्क से बात करें और समझदार नागरिक बनें।
- राज्य और सरकार: राज्य किससे बनता है – राज्य एक राजनीतिक समुदाय है जिसके चार तत्व हैं: स्थायी जनसंख्या, निश्चित क्षेत्र, सरकार और संप्रभुता (अंदर सबसे ऊँची शक्ति, बाहर स्वतंत्रता)। सरकार वह टीम है जो राज्य चलाती है और बदलती रहती है; राज्य बना रहता है। राज्य इसमें अलग होते हैं कि फ़ैसला कौन करता है (लोकतंत्र, राजतंत्र, तानाशाही), शक्ति कैसे बँटी है (एकात्मक या संघीय) और वे नागरिकों के लिए कितना करते हैं।
- राष्ट्र और अल्पसंख्यक: बराबरी से साथ रहना – राष्ट्र का एक अर्थ है किसी राज्य के सभी नागरिक (राजनीतिक राष्ट्र) और दूसरा अर्थ है साझा भाषा, संस्कृति और इतिहास वाला समूह (सांस्कृतिक राष्ट्र)। अल्पसंख्यक छोटे समूह हैं जिनकी अपनी भाषा, धर्म या संस्कृति होती है। उनके अधिकार संविधान और क़ानून से सुरक्षित होते हैं। इंसान की एक साथ कई पहचानें होती हैं, और हमें नस्लवाद, विदेशी-द्वेष और यहूदी-विरोध का विरोध करना चाहिए।
- राष्ट्र और राज्य: राजनीतिक बंधन – राष्ट्र लोगों का वह समूह है जो साझा भाषा, इतिहास या कहानियों से मानता है कि वे एक हैं। राज्य वह संस्था है जो नियम बनाती है और एक इलाक़े पर सत्ता रखती है। राष्ट्र-निर्माण लोगों को राज्य से जोड़ता है; सामूहिक कार्रवाई की समस्या बताती है कि राज्य सार्वजनिक वस्तुएँ क्यों देता है; वैश्वीकरण सीमाओं को ज़्यादा खुला बनाता है; और EU जैसे बड़े संघ राज्यों के बीच सत्ता बाँटते हैं।
- राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ – 1947 में भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियाँ थीं: देश को एक रखना, लोकतंत्र बनाना और सबका विकास करना। विभाजन से ज़मीन बँटी और लगभग 80 लाख लोग विस्थापित हुए, इसलिए शरणार्थियों का पुनर्वास करना पड़ा। 560 से ज़्यादा देसी रियासतों को भारत में मिलाना था, जो ज़्यादातर बातचीत और विलय-पत्र से हुआ। फिर लोगों ने भाषा के आधार पर राज्य माँगे, जिससे 1953 में आंध्र बना और 1956 में राज्य पुनर्गठन क़ानून आया।
- राष्ट्र, नागरिकता और देशभक्ति – राष्ट्र लोगों का वह समूह है जो भूमि, भाषा, इतिहास और साझा नियमों से जुड़ा होता है। नागरिकता राज्य से क़ानूनी रिश्ता है और राष्ट्रीयता अपनेपन की भावना। नागरिक के अधिकार और कर्तव्य होते हैं, और प्रतीक व देशभक्ति लोगों को जोड़ते हैं।
- राष्ट्रवाद: राष्ट्र, आत्म-निर्णय और बहुलवाद – राष्ट्रवाद एक ताक़तवर शक्ति है: इसने छोटे राज्यों को जोड़ा, भारत जैसे स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरणा दी, और साम्राज्य भी तोड़े व टकराव भी कराए। राष्ट्र कोई भौतिक चीज़ नहीं; यह ऐसा समुदाय है जो इसलिए है क्योंकि उसके सदस्य मानते हैं कि वे एक-दूसरे के हैं। राष्ट्र साझा विश्वास, इतिहास की साझी समझ, मातृभूमि से जुड़ाव, साझे राजनीतिक आदर्श और साझी राजनीतिक पहचान पर टिका है; एक धर्म या भाषा ज़रूरी नहीं। राष्ट्रीय आत्म-निर्णय किसी समूह का स्वयं शासन का दावा है; उपनिवेशवाद के बाद इससे कई नए राज्य बने, पर हर समूह का अलग राज्य असंभव है, इसलिए आज यह अक्सर लोकतांत्रिक राज्य के अंदर अधिकारों और स्वायत्तता से पूरा होता है। जब राष्ट्र सब समूहों की पहचान का सम्मान और अल्पसंख्यकों की रक्षा करता है, तो राष्ट्रवाद और बहुलवाद साथ चल सकते हैं।
- राष्ट्रीय सुरक्षा: देश अपने लोगों को कैसे सुरक्षित रखता है – राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ है देश के लोगों, भूमि, स्वतंत्रता, लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था को गंभीर नुक़सान से बचाना। ख़तरे सैन्य (सशस्त्र हमला) या ग़ैर-सैन्य (आतंकवाद, साइबर हमले, आपदाएँ, महामारी) हो सकते हैं। सुरक्षा तंत्र के तीन हिस्से हैं: सशस्त्र सेनाएँ, ग़ैर-सैन्य सेवाएँ, और निर्णय लेने वाले नेता। संकट एक चक्र में संभाले जाते हैं: रोकथाम, तैयारी, कार्रवाई, पुनर्निर्माण। तैयार नागरिक पूरे देश को मज़बूत बनाते हैं।
- लॉबिंग और भ्रष्टाचार – लॉबिंग का मतलब है किसी सार्वजनिक फ़ैसले को खुले तौर पर प्रभावित करने की कोशिश, जैसे याचिका या बैठक; पारदर्शी हो तो यह वैध है। भ्रष्टाचार सार्वजनिक शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग है, जैसे रिश्वत। यह सार्वजनिक धन बर्बाद करता है, फ़ैसले अनुचित बनाता है, भरोसा तोड़ता है और सबसे ज़्यादा गरीबों को चोट पहुँचाता है। खुले रिकॉर्ड, स्वतंत्र जाँच, निष्पक्ष सज़ा और सक्रिय नागरिक इसे घटाते हैं।
- लोक नीति: सरकार समस्याएँ कैसे सुलझाती है – लोक नीति किसी सार्वजनिक समस्या से निपटने के लिए सरकार की सोची-समझी कार्य योजना है (या कुछ न करने का निर्णय)। नीतियाँ एक चक्र में बनती हैं: समस्या दिखती है, एजेंडा पर आती है, विकल्प बनते हैं, विधायिका या कार्यपालिका निर्णय लेती है, विभाग उसे लागू करते हैं, और नतीजों का मूल्यांकन होता है। सरकार कानून और नियम, कर, ख़र्च और सब्सिडी, और जानकारी जैसे औज़ार इस्तेमाल करती है। नागरिक, दबाव समूह, मीडिया, विशेषज्ञ और अदालतें सब इस प्रक्रिया पर असर डालते हैं।
- लोकतंत्र – लोकतंत्र का मतलब है जनता का शासन। लोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में अपने शासक चुनते हैं, हर वयस्क का एक वोट होता है जिसका मूल्य बराबर है, और सरकार को कानून मानना और अधिकारों का सम्मान करना होता है। लोकतंत्र प्रत्यक्ष या प्रतिनिधि हो सकता है। भारत में लोकतंत्र की जड़ें पुरानी हैं; आज यहाँ संसदीय प्रणाली है, जबकि अमेरिका में अध्यक्षात्मक। गरीबी, निरक्षरता, भ्रष्टाचार और असमानता इसकी मुख्य चुनौतियाँ हैं।
- लोकतंत्र के परिणाम – लोकतंत्र को उसके नतीजों से परखते हैं। यह जवाबदेह, उत्तरदायी और वैध सरकार देता है और गरिमा व आज़ादी की रक्षा में सबसे अच्छा है। आर्थिक वृद्धि में यह तानाशाही जितना ही है। असमानता और गरीबी घटाने में इसने काफ़ी नहीं किया। जब बहुमत और अल्पमत बदलते रहें, तो यह सामाजिक मतभेद अच्छे से सँभालता है।
- लोकतंत्र: सिद्धांत, चुनाव और सत्ता पर रोक – लोकतंत्र में आख़िरी ताक़त जनता के पास होती है। इसके मुख्य सिद्धांत हैं: राजनीतिक समानता, बहुमत का शासन पर अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित, विधि का शासन, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, और सत्ता पर सीमाएँ। लोग सीधे (जनमत संग्रह) या चुने हुए प्रतिनिधियों के ज़रिए फ़ैसला करते हैं। चुनाव का नियम (FPTP या आनुपातिक प्रणाली) तय करता है कि सीटें किसे मिलेंगी। संविधान सत्ता को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में बाँटता है ताकि हर अंग दूसरे पर नज़र रखे। चुनावों के बीच भी नागरिक मीडिया, दबाव समूह, अदालत, याचिका और शांतिपूर्ण विरोध से नीति पर असर डालते हैं।
- लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट – 1970 के दशक की शुरुआत में बढ़ती महँगाई, गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलन, जेपी की संपूर्ण क्रांति, रेल हड़ताल और न्यायपालिका से टकराव ने सरकार पर दबाव बढ़ाया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द किया, जिसके बाद 25 जून 1975 को अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लगा। प्रेस पर सेंसर लगा, नेता जेल गए और अधिकार निलंबित हुए। 1977 में मतदाताओं ने कांग्रेस को हराया और जनता पार्टी की सरकार बनी। सबक़: भारत में लोकतंत्र ख़त्म करना कठिन है, 44वें संशोधन से आपातकाल के नियम कड़े हुए और लोग नागरिक स्वतंत्रता के प्रति जागरूक हुए।
- विधायिका – संसद वह जगह है जहाँ चुने हुए प्रतिनिधि कानून बनाते हैं, मुद्दों पर बहस करते हैं, बजट पास करते हैं और सरकार को जवाबदेह रखते हैं। भारत की संसद के दो सदन हैं: जनता द्वारा चुनी लोकसभा और राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली राज्यसभा। विधेयक वाचन, समिति की जाँच और दोनों सदनों के मतदान से गुज़रकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से कानून बनता है। समितियाँ बारीक काम करती हैं और दल-बदल विरोधी कानून जैसे नियम संसद में अनुशासन रखते हैं।
- विधि (कानून) सुधार – विधि सुधार यानी कानून को समाज के साथ चलाना: पुराने कानून में संशोधन, बेकार कानून का निरसन, और नए कानून बनाना। सुधार ज़रूरी है क्योंकि समाज, तकनीक और मूल्य बदलते हैं, और कानून अनुचित, उलझे या धीमे हो सकते हैं। कमी को अदालतें, नागरिक, मीडिया और विधि आयोग पकड़ते हैं। विशेषज्ञ संस्था अध्ययन करती है, संसद विधेयक पर बहस और वोट करती है, और कानून बदला, हटाया या नया बनाया जाता है।
- विधिक पेशा (वकालत) – वकील लोगों को कानून का इस्तेमाल करने में मदद करते हैं। वकील बनने के लिए कानून पढ़ो, फिर बार काउंसिल में नामांकन कराओ। वकील को नैतिकता माननी होती है: मुवक्किल, अदालत, सामने वाले पक्ष और समाज के प्रति कर्तव्य। वे ज़ोर-शोर से विज्ञापन नहीं कर सकते। आज कानून का काम दुनिया भर में फैला है, महिलाएँ बढ़ रही हैं, और अदालत के बाहर भी कई करियर हैं।
- विधिक सहायता: जो फ़ीस नहीं दे सकते, उनके लिए मुफ़्त कानूनी मदद – विधिक सहायता यानी उन लोगों को मुफ़्त कानूनी मदद जो वकील का ख़र्च नहीं उठा सकते। यह दान से शुरू होकर अधिकार बनी। फ़ौजदारी मामले में ग़रीब आरोपी को मुफ़्त वकील मिलना ही चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 39A और विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 ने NALSA से तालुका तक संस्थाएँ बनाईं, और लोक अदालतें जहाँ बिना फ़ीस समझौता होता है।
- विधियों (कानूनों) का वर्गीकरण – कानून हज़ारों हैं, इसलिए हम उन्हें समूहों में बाँटते हैं। विषय से: सार्वजनिक विधि (जिसमें राज्य एक पक्ष हो) और निजी विधि (लोगों के बीच)। स्वभाव से: मूल विधि (अधिकार व कर्तव्य) और प्रक्रिया विधि (उन्हें लागू करने के कदम)। उद्देश्य से: सिविल विधि (पीड़ित को राहत) और आपराधिक विधि (राज्य द्वारा सज़ा)। क्षेत्र से: अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और राज्य या स्थानीय विधि। एक ही कानून कई समूहों में आ सकता है।
- विधिशास्त्र: कानून की प्रकृति, संप्रदाय और उद्देश्य – विधिशास्त्र (न्यायशास्त्र) स्वयं कानून का अध्ययन है: कानून क्या है, लोग उसे क्यों मानते हैं और उसे क्या करना चाहिए। कानून का इतिहास बहुत लंबा है: मेसोपोटामिया की लिखित संहिताएँ, भारत के धर्मशास्त्र, रोमन कानून, मैग्ना कार्टा और आधुनिक संविधान। विचारकों ने संप्रदाय बनाए। प्राकृतिक विधि संप्रदाय कहता है कानून को सही-गलत के ऊँचे मानक से मेल खाना चाहिए। प्रत्यक्षवादी (विश्लेषणात्मक) संप्रदाय कहता है कानून वह है जो उचित सत्ता बनाती है, जैसे ऑस्टिन का "संप्रभु का आदेश जिसके पीछे दंड है"। ऐतिहासिक संप्रदाय (सैविनी) कहता है कानून लोगों के रिवाजों से बढ़ता है। समाजशास्त्रीय संप्रदाय (पाउंड) कानून को सामाजिक हितों में संतुलन का औज़ार मानता है। यथार्थवादी संप्रदाय कहता है कानून वही है जो अदालतें करती हैं। कानून व्यवस्था बनाए रखने, विवाद सुलझाने, अधिकार बचाने, न्याय देने और सामाजिक बदलाव लाने का काम करता है।
- वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR): अदालत के बाहर विवाद सुलझाना – अदालतें या तो प्रतिकूल व्यवस्था (adversarial: दोनों पक्ष बहस करते हैं, जज तटस्थ अंपायर) अपनाती हैं या जाँच-प्रधान व्यवस्था (inquisitorial: जज खुद तथ्य खोजता है)। मुकदमे धीमे और महँगे हो सकते हैं, इसलिए वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) दूसरे रास्ते देता है: बातचीत, मध्यस्थता (तटस्थ व्यक्ति पक्षों को सहमति तक पहुँचने में मदद करता है), सुलह (तटस्थ व्यक्ति समझौते का प्रस्ताव भी दे सकता है), माध्यस्थम/पंचाट (चुना हुआ पंच बाध्यकारी अवार्ड देता है) और भारत में लोक अदालत (मुफ़्त, जल्दी, समझौते से, अपील नहीं)। इनसे अलग, ओम्बड्समैन, जैसे भारत में लोकपाल (केंद्र) और लोकायुक्त (राज्य), सरकारी अधिकारियों के भ्रष्टाचार या कुप्रशासन की शिकायतों की जाँच करते हैं।
- वैश्विक न्याय: उचित व्यापार, सहायता और असमानता घटाना – वैश्विक न्याय यह पूछता है कि दुनिया के देशों और लोगों के बीच क्या उचित है। आमदनी में बहुत असमानता है। उचित व्यापार (fair trade) उत्पादकों को सही दाम देता है, और विकास सहायता (ODA) ग़रीब देशों को स्कूल, स्वास्थ्य और रोज़गार बनाने में मदद करती है। असली न्याय के लिए शांति, ईमानदार नियम और ग़रीब देशों की आवाज़ भी ज़रूरी है।
- वैश्वीकरण – वैश्वीकरण का अर्थ है दुनिया भर में सामान, पूँजी, विचारों और लोगों के बढ़ते प्रवाह, जो दुनिया को ज़्यादा जोड़ते हैं। इसका मुख्य कारण तकनीक है। यह राजनीति (राज्य की भूमिका), अर्थव्यवस्था (व्यापार, निवेश, असमानता) और संस्कृति (एकरूपता बनाम मेल) पर असर डालता है। संरक्षणवाद के बाद भारत ने 1991 में अपनी अर्थव्यवस्था खोली। वामपंथी और दक्षिणपंथी समूह तथा विश्व सामाजिक मंच जैसे आंदोलन इसका विरोध करते हैं, और बहुत से लोग न्यायपूर्ण वैश्वीकरण माँगते हैं।
- व्यक्ति की गरिमा, स्त्री-पुरुष समानता और अनुबंध – मनुष्य सामाजिक प्राणी है जो एक-दूसरे के साथ और एक-दूसरे पर निर्भर रहता है। हर व्यक्ति की गरिमा बराबर है, और स्त्री-पुरुष के अधिकार और कर्तव्य बराबर हैं, परिवार में भी। अनुबंध दो पक्षों का सहमति से किया वादा है, और उसे निभाना ज़िम्मेदारी है जिसे तोड़ने के नतीजे होते हैं।
- शक्ति हस्तांतरण: सत्ता को नीचे सौंपना – शक्ति हस्तांतरण (devolution) में केंद्रीय संसद अपनी कुछ शक्तियाँ क्षेत्रीय या स्थानीय संस्थाओं को सौंपती है, पर अंतिम क़ानूनी अधिकार (संप्रभुता) अपने पास रखती है। यह संघवाद से अलग है, जहाँ लिखित संविधान शक्ति बाँटता है और केंद्र उसे अकेले वापस नहीं ले सकता। सबसे जाना-माना उदाहरण यूनाइटेड किंगडम है: 1999 से स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की अपनी चुनी हुई संस्थाएँ हैं जिनके पास स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी शक्तियाँ हैं, जबकि रक्षा, विदेश नीति और आप्रवासन वेस्टमिंस्टर के पास आरक्षित हैं। हस्तांतरण असमान है: हर राष्ट्र को अलग शक्तियाँ मिलीं और इंग्लैंड की अपनी संसद नहीं, सिर्फ़ मेयर और परिषदें हैं। इससे नीतियों में अंतर, अंग्रेज़ी वोटों पर बहस और संघ के भविष्य पर सवाल उठे हैं।
- शक्तियों का पृथक्करण – शक्तियों के पृथक्करण का मतलब है राज्य की शक्ति को तीन अंगों में बाँटना: विधायिका क़ानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है, और न्यायपालिका क़ानून की व्याख्या करके विवाद सुलझाती है। हर अंग में अलग लोग होते हैं। नियंत्रण और संतुलन से हर अंग दूसरों को सीमित करता है, ताकि कोई सर्वशक्तिमान न बने। संसदीय व्यवस्था में विधायिका और कार्यपालिका जुड़ी रहती हैं; अध्यक्षात्मक में ज़्यादा अलग। शक्ति राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तरों में भी बँटती है।
- शांति की स्थापना: वेस्टफ़ेलिया से संयुक्त राष्ट्र तक – शांति तीन मुख्य तरीक़ों से बनाई गई है। संधि (वेस्टफ़ेलिया, 1648) युद्ध रोकती है और राज्यों के बीच नियम तय करती है। सामूहिक सुरक्षा में सभी सदस्य आक्रमणकारी के ख़िलाफ़ साथ कार्रवाई का वादा करते हैं (राष्ट्र संघ, फिर 1945 में संयुक्त राष्ट्र)। कोफ़ी अन्नान (1997 से 2006) के समय संयुक्त राष्ट्र ने रोकथाम, शांति-सेना, नागरिकों की रक्षा और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण पर काम किया।
- शांति शिक्षा: लोग स्थायी शांति कैसे बनाते हैं – शांति का मतलब सिर्फ़ 'युद्ध नहीं' नहीं है। नकारात्मक शांति = लड़ाई नहीं। सकारात्मक शांति = सबके लिए न्याय, भरोसा और अच्छा जीवन। हिंसा तीन तरह की होती है: प्रत्यक्ष (मारना, युद्ध), संरचनात्मक (अन्यायी नियम जो लोगों को गरीब रखें) और सांस्कृतिक (ऐसे विचार जो नुकसान को सामान्य दिखाएँ)। विचारकों ने रास्ते दिए: मोज़ी ने सबसे बराबर प्रेम और हमलावर युद्ध का विरोध सिखाया; कांट ने कहा न्यायपूर्ण सरकारें, आज़ाद देशों का संघ और मेहमानों से अच्छा बर्ताव शांति को स्थायी बनाते हैं; गांधी ने अहिंसक विरोध दिखाया। टकराव क़दम-दर-क़दम सुलझता है: शांत हों, सुनें, ज़रूरत खोजें, उपाय सोचें, समझौता करें। बँटवारे या युद्ध के बाद मेल-मिलाप पुल की तरह बनता है: बातचीत, सच, माफ़ी, व्यापार, परिवार मिलन और साझा काम। जर्मनी (1990) और दक्षिण अफ़्रीका का सत्य आयोग इसके उदाहरण हैं; कोरियाई प्रायद्वीप जैसे बँटे लोग आज भी शांतिपूर्ण एकीकरण पर चर्चा करते हैं।
- शासन प्रणालियाँ: सरकार के अंग, नियंत्रण और संतुलन – हर आधुनिक राज्य सत्ता को तीन अंगों में बाँटता है: विधायिका क़ानून बनाती है, कार्यपालिका लागू करती है, न्यायपालिका व्याख्या करती है। नियंत्रण और संतुलन से हर अंग दूसरे को सीमित कर सकता है। लोकतंत्र विधायिका और कार्यपालिका को अलग तरह से जोड़ते हैं। संसदीय प्रणाली में सरकार संसद से बनती है और उसके विश्वास पर टिकी रहती है (भारत, ब्रिटेन, जर्मनी)। अध्यक्षीय प्रणाली में जनता राष्ट्रपति और विधायिका को अलग-अलग तय अवधि के लिए चुनती है (अमेरिका, ब्राज़ील)। अर्ध-अध्यक्षीय प्रणाली में चुने हुए राष्ट्रपति और संसद के प्रति ज़िम्मेदार प्रधानमंत्री में सत्ता बँटी है (फ़्रांस)। राजतंत्र और स्विट्ज़रलैंड की समिति प्रणाली दूसरे रूप हैं।
- श्रम कानून: रोज़गार अनुबंध और नाबालिगों का काम – श्रम कानून वे नियम हैं जो काम करने वाले (कर्मचारी) और काम देने वाले (नियोक्ता) के रिश्ते को न्यायपूर्ण रखते हैं। दोनों रोज़गार अनुबंध पर हस्ताक्षर करते हैं, जिसमें काम, वेतन, घंटे और आराम लिखा होता है। नाबालिगों को ख़ास सुरक्षा मिलती है: वे सिर्फ़ हल्का, सुरक्षित काम कम घंटे कर सकते हैं। उम्र और घंटे देश के हिसाब से बदलते हैं।
- श्रम, प्रशासनिक और पर्यावरण कानून – कानून की कई शाखाएँ हैं। श्रम कानून श्रमिकों की रक्षा करता है और श्रमिक व नियोक्ता के बीच उचित नियम बनाता है। प्रशासनिक कानून तय करता है कि अधिकारी और कार्यालय लोगों से कैसा व्यवहार करें और अनुचित निर्णय को चुनौती देने देता है। पर्यावरण कानून भूमि, जल और हवा की रक्षा करता है और प्रदूषण फैलाने वाले को हानि का जवाबदेह बनाता है। हर शाखा के अपने पक्ष, नियम और उपाय हैं।
- संघवाद – संघवाद वह व्यवस्था है जिसमें सत्ता केंद्र सरकार और राज्य (व स्थानीय) सरकारों में बँटी होती है और हर स्तर के अधिकार संविधान तय करता है। भारत में कानून के विषय तीन सूचियों में बँटे हैं, सब भाषाओं का सम्मान है और 1992 से पंचायतों व नगरपालिकाओं को असली अधिकार मिले।
- संघवाद – संघवाद का अर्थ है कि शक्ति केंद्र सरकार और राज्य सरकारों में बँटी हो, और दोनों की शक्तियाँ संविधान में लिखी हों। भारत मज़बूत केंद्र वाला संघ है, क्योंकि निर्माता एकता और विकास चाहते थे। इससे राज्यपाल की भूमिका, राष्ट्रपति शासन, स्वायत्तता और राज्यों के आपसी विवादों पर टकराव हुए। कुछ राज्यों को उनके इतिहास, संस्कृति और ज़मीन की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान भी मिले हैं।
- संचार कानून – रेडियो तरंगें साझा संसाधन हैं, इसलिए कानून तय करते हैं कि कौन-सी आवृत्ति कौन इस्तेमाल करे। राष्ट्रीय रेडियो कानून लाइसेंस देते हैं, ITU के रेडियो नियम देशों के बीच बैंड बाँटते हैं, तार वाले संचार के कानून केबल और नेटवर्क देखते हैं, और समुद्री कानून यह पक्का करते हैं कि हर जहाज़ मदद बुला सके।
- संपत्ति क़ानून: स्वामित्व और संपत्ति के अधिकार – स्वामित्व (ownership) किसी चीज़ पर सबसे मज़बूत अधिकार है। इसमें तीन शक्तियाँ होती हैं: चीज़ को अपने पास रखना (कब्ज़ा), उसका इस्तेमाल करना और उससे कमाना, और उसे बेचना, देना या बदलना (निपटान)। संपत्ति निजी, साझा, सहकारी या सार्वजनिक हो सकती है। क़ानून मालिक की रक्षा करता है, पर सीमाएँ भी हैं: दूसरों को नुक़सान नहीं पहुँचा सकते, और सार्वजनिक ज़रूरत के लिए राज्य उचित मुआवज़ा देकर संपत्ति ले सकता है।
- संविधान का राजनीतिक दर्शन – संविधान का दर्शन यानी वे मूल्य और विचार जिन पर इसके नियम टिके हैं: स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुत्व, विविधता और अल्पसंख्यक अधिकारों का सम्मान, धर्मनिरपेक्षता, सार्वभौमिक मताधिकार, संघवाद और साझी राष्ट्रीय पहचान। खुली बहस और सहमति से बनने के कारण इसे वैधता मिली है। इसकी आलोचना भारी-भरकम, प्रतिनिधि नहीं और पराया कहकर हुई है, और इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं, पर इसकी नैतिक दृष्टि आज भी भारत को राह दिखाती है।
- संविधान के तीन सिद्धांत: मानव अधिकार, जन-संप्रभुता और शांतिवाद – कई आधुनिक संविधान कुछ बड़े विचारों पर टिके होते हैं। जापान के 1947 के संविधान के तीन हैं: मौलिक मानव अधिकारों का सम्मान, जन-संप्रभुता (अंतिम ताक़त जनता की) और शांतिवाद (युद्ध का त्याग, अनुच्छेद 9)। भारत का संविधान भी "हम, भारत के लोग" से शुरू होता है और अधिकारों की रक्षा करता है।
- संविधान क्या है? नियम, अधिकार और कर्तव्य – संविधान किसी देश का सबसे ऊँचा क़ानून है। यह बताता है कि राज्य कैसे बना है, शक्ति किसके पास और कैसे है, और नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य क्या हैं। क़ानूनी नियम दूसरे नियमों (खेल, घर, स्कूल, शिष्टाचार) से अलग हैं क्योंकि राज्य उन्हें बनाता और अदालतों व दंड से लागू करता है। सारे क़ानून एक पिरामिड बनाते हैं: सबसे ऊपर संविधान, फिर संसद के क़ानून, फिर नियम और स्थानीय नियम; ऊपर वाले से टकराने वाला नीचे का नियम रद्द हो सकता है। ज़्यादातर संविधान बदलना कठिन है (कठोर), ताकि समानता, स्वतंत्रता, एकजुटता और काम का अधिकार व कर्तव्य जैसे मूल्य सुरक्षित रहें।
- संविधान: एक जीवंत दस्तावेज़ – भारत का संविधान समय के साथ बदल सकता है और अपना मूल भी बचाए रखता है। अनुच्छेद 368 के तहत कुछ हिस्से साधारण बहुमत से, ज़्यादातर दोनों सदनों के विशेष बहुमत से, और संघीय हिस्से आधे राज्यों की मंज़ूरी से भी बदलते हैं। 100 से ज़्यादा संशोधन हुए हैं, ज़्यादातर तकनीकी सुधार या सब दलों की सहमति वाले बदलाव। सर्वोच्च न्यायालय का मूल ढाँचे का सिद्धांत संशोधनों को संविधान का मूल नष्ट करने से रोकता है।
- संविधान: क्यों और कैसे? – संविधान किसी देश की बुनियादी नियम-पुस्तिका है। यह भरोसा बनाता है, बताता है कि शक्ति किसके पास है, उस शक्ति पर सीमा लगाता है और लोगों की आकांक्षाएँ बताता है। भारत का संविधान 1946 से 1949 तक संविधान सभा ने खुली बहस से लिखा और दूसरे संविधानों से अच्छे विचार लेकर उन्हें भारत के अनुसार ढाला।
- संसदीय लोकतंत्र – संसदीय लोकतंत्र में नागरिक संसद के सदस्य (सांसद) चुनते हैं। जिस दल या गठबंधन के पास बहुमत हो, वह सरकार बनाता है; उसका नेता प्रधानमंत्री बनता है और संसद में से मंत्रिमंडल चुनता है। सरकार तभी तक रहती है जब तक उसे संसद का विश्वास हासिल है। राष्ट्र प्रमुख (राजा या राष्ट्रपति) की भूमिका ज़्यादातर औपचारिक होती है, न्यायालय स्वतंत्र होते हैं और सब कानून के शासन के अधीन हैं। यह प्रणाली इंग्लैंड में सदियों में बनी (1215, 1689, मंत्रिमंडल का उदय, सबको वोट) और भारत, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि ने इसे अपनाया।
- सत्ता की साझेदारी – सत्ता की साझेदारी का मतलब है कि सारी ताकत किसी एक व्यक्ति या समूह के पास न हो। बेल्जियम ने भाषा-समूहों में सत्ता बाँटी और देश एक रहा। श्रीलंका में बहुसंख्यक समूह ने सत्ता पर कब्ज़ा किया और गृहयुद्ध हुआ। लोकतंत्र में सत्ता सरकार के अंगों, स्तरों, सामाजिक समूहों और दलों में बँटती है।
- सत्ता के समकालीन केंद्र – 1991 के बाद अमेरिका अकेली महाशक्ति था, पर सत्ता के नए केंद्र उभरे। यूरोपीय संघ ने यूरोप के देशों को एक बाज़ार, अपनी मुद्रा और संसद से जोड़ा। आसियान ने दक्षिण-पूर्व एशिया के दस देशों को 'आसियान शैली' से जोड़ा। 1978 के सुधारों के बाद चीन विशाल अर्थव्यवस्था बना। जापान और दक्षिण कोरिया तकनीक और निर्यात से अमीर बने। ये केंद्र किसी एक देश की ताक़त पर रोक लगाते हैं।
- सत्ता: उचित शक्ति कहाँ से आती है? – शक्ति दूसरों से काम करवाने की क्षमता है; सत्ता वह शक्ति है जिसे लोग उचित (वैध) मानते हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र और शुक्रनीति जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथों ने कहा कि शासक दंड (उचित सज़ा), न्याय और बल (रक्षा की ताक़त) से सत्ता बनाए रखता है। आज भारत में सत्ता संविधान से आती है, जो न्याय और सुरक्षा का वादा करता है और हर पद की सीमा तय करता है। नागरिक चुनाव से संस्थाओं को सत्ता देते हैं, और संस्थाएँ उन्हें जवाब देती हैं। सत्ता पारंपरिक, करिश्माई या कानूनी-तार्किक हो सकती है।
- समकालीन दक्षिण एशिया – दक्षिण एशिया के आठ देश भूगोल और इतिहास साझा करते हैं। पड़ोस में लोकतंत्र के उतार-चढ़ाव रहे: पाकिस्तान और बांग्लादेश में कभी सेना-शासन, नेपाल में राजतंत्र से गणराज्य, और श्रीलंका में लगातार चुनाव पर जातीय युद्ध भी। सबसे बड़ा देश भारत हर पड़ोसी से विवाद भी रखता है और सहयोग भी। सार्क और साफ़्टा क्षेत्रीय सहयोग और व्यापार से शांति लाने की कोशिश करते हैं।
- समकालीन विश्व में सुरक्षा – सुरक्षा का मतलब है अपनी क़ीमती चीज़ों पर ख़तरे से मुक्ति। पारंपरिक सुरक्षा राज्य को बाहर के सैन्य ख़तरे और भीतर की अव्यवस्था से बचाती है, और इसके उपाय हैं अपरोध, रक्षा, शक्ति-संतुलन और गठबंधन। अपारंपरिक सुरक्षा घेरा बड़ा करके लोगों (मानव सुरक्षा) और पूरी धरती (वैश्विक सुरक्षा) की रक्षा करती है। आतंकवाद, मानवाधिकार हनन, ग़रीबी, प्रवास, महामारी और जलवायु परिवर्तन जैसे नए ख़तरे सीमाएँ पार करते हैं, इसलिए सहयोगी सुरक्षा चाहिए। भारत की रणनीति में सैन्य ताक़त, अंतर्राष्ट्रीय नियम, आंतरिक शांति और विकास चारों हैं।
- समानता: बराबर मूल्य, उचित अवसर – समानता का अर्थ है हर व्यक्ति का मूल्य बराबर है और जन्म, जाति, लिंग, धर्म या धन के कारण उसके रास्ते में अनुचित रुकावट न हो। इसका मतलब यह नहीं कि सब बिल्कुल एक जैसे हों या सबको बिल्कुल एक जैसा मिले; प्रतिभा और मेहनत के अंतर स्वीकार हैं, पर अनुचित सामाजिक व्यवस्था से बने अंतर हटाने हैं। समानता के तीन आयाम हैं: राजनीतिक (बराबर नागरिकता और वोट), सामाजिक (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार में बराबर अवसर) और आर्थिक (धन में बहुत बड़ा अंतर न हो)। नारीवाद पितृसत्ता से बनी लैंगिक असमानता से लड़ता है; समाजवाद असमानता को संपत्ति के असमान स्वामित्व से जोड़ता है। समानता औपचारिक समानता, भिन्न बर्ताव और आरक्षण जैसी सकारात्मक कार्रवाई से बढ़ती है।
- सर्वोच्च न्यायालय: न्यायिक पुनरावलोकन, सक्रियता, संयम और स्वतंत्रता – सर्वोच्च न्यायालय सबसे ऊँची अदालत है। जहाँ संविधान लिखित और सर्वोच्च है (जैसे अमेरिका, भारत), वहाँ यह संविधान तोड़ने वाले कानून और कार्य रद्द कर सकता है: न्यायिक पुनरावलोकन। सख़्त व्याख्याकार शब्दों और मूल अर्थ पर टिके रहते हैं; उदार व्याख्याकार संविधान को जीवित दस्तावेज़ मानते हैं। न्यायिक सक्रियता = शक्तियों का खुलकर उपयोग; न्यायिक संयम = फ़ैसले चुनी हुई संस्थाओं पर छोड़ना। अमेरिका में राष्ट्रपति नामित करता है, सीनेट पुष्टि करती है, न्यायाधीश जीवन भर रहते हैं। ब्रिटेन का सर्वोच्च न्यायालय (2009 से) स्वतंत्र है पर संसदीय संप्रभुता के कारण संसद के अधिनियम रद्द नहीं कर सकता।
- सांस्कृतिक नीति: सरकार संस्कृति की मदद क्यों और कैसे करती है – सांस्कृतिक नीति उन सार्वजनिक फ़ैसलों का समूह है जो विरासत की रक्षा, कलात्मक सृजन को सहारा, कला की शिक्षा और संस्कृति को सबके लिए खोलने का काम करते हैं। कई देशों ने 1940 और 1950 के दशक के बाद कला मंत्रालय और परिषदें बनाईं, जिनका उद्देश्य "संस्कृति का लोकतंत्रीकरण" था। नतीजों पर बहस है: दर्शक बढ़े, पर सांस्कृतिक स्थानों के दर्शक अब भी पूरी आबादी जितने मिले-जुले नहीं हैं, और लोग इस पर सहमत नहीं कि किस पर पैसा लगे यह कौन तय करे।
- सामाजिक न्याय: सबको उचित हिस्सा – न्याय = हर व्यक्ति को उसका उचित हक़ देना। सामाजिक न्याय समाज में चीज़ों, सेवाओं और अवसरों के उचित बँटवारे के बारे में है। तीन सिद्धांत मार्गदर्शन करते हैं: बराबर वालों से बराबर बर्ताव, मेहनत और कौशल के अनुपात में इनाम, और विशेष ज़रूरत पर अतिरिक्त मदद। इनमें संतुलन चाहिए। जॉन रॉल्स ने कहा कि समाज के नियम 'अज्ञानता के पर्दे' के पीछे से चुनें, यानी यह जाने बिना कि हमें कौन सी जगह मिलेगी; तब समझदार व्यक्ति सबसे कमज़ोर की रक्षा करेगा। सामाजिक न्याय की शुरुआत सबकी बुनियादी ज़रूरतें (भोजन, पानी, घर, स्वास्थ्य, शिक्षा, न्यूनतम मज़दूरी) पूरी करने से होती है। तरीके पर मतभेद है: मुक्त बाज़ार वाले खुली प्रतियोगिता और छोटा राज्य चाहते हैं; दूसरे राज्य से कल्याण चाहते हैं। भारत दोनों मिलाता है।
- सामाजिक समझौता सिद्धांत: लोग सरकार की बात क्यों मानते हैं? – सामाजिक समझौता सिद्धांत कहता है कि सरकार की ताक़त लोगों के आपसी समझौते से आती है, ईश्वर या बल से नहीं। विचारक एक 'प्राकृतिक अवस्था' की कल्पना करते हैं जिसमें कोई सरकार नहीं, फिर पूछते हैं कि लोग किस बात पर सहमत होंगे। हॉब्स: सुरक्षा के लिए लगभग सारी ताक़त एक शक्तिशाली शासक को। लॉक: सीमित सरकार जो जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति की रक्षा करे, वरना लोग उसे बदल सकते हैं। रूसो: पूरी जनता संप्रभु है और 'सामान्य इच्छा' से कानून बने।
- सार्वजनिक स्थान के बुनियादी सिद्धांत: लोकतंत्र, कानून का शासन, मानव अधिकार, निष्पक्षता और स्वतंत्रता – निष्पक्ष और स्वतंत्र समाज तीन खंभों पर टिका है। लोकतंत्र यानी फ़ैसलों में लोगों की हिस्सेदारी। कानून का शासन यानी वही नियम सब पर लागू, नेताओं पर भी। मानव अधिकार यानी हर इंसान की क़ीमत और बुनियादी सुरक्षा। तीनों मिलकर निष्पक्षता (बराबर और न्यायपूर्ण व्यवहार) और स्वतंत्रता (बिना अनुचित रोक के चुनने और करने की क्षमता) की ओर ले जाते हैं।
- सिविल निर्माण के कानून – हर देश में ऐसे कानून होते हैं जो तय करते हैं कि निर्माण कैसे होगा। पाँच समूह सबसे ज़रूरी हैं: अनुमति और भवन संहिता, मज़दूरों की सुरक्षा और स्वास्थ्य, पर्यावरण (शोर, धूल, कचरा), अनुबंध और लाइसेंस, तथा निरीक्षण और पूर्णता प्रमाणपत्र। ये कानून लोगों, पड़ोसियों और प्रकृति की रक्षा करते हैं और बताते हैं कि गड़बड़ी होने पर ज़िम्मेदार कौन है।
- स्थानीय शासन – स्थानीय शासन लोकतंत्र को गाँव और शहर के स्तर तक लाता है, जहाँ लोग अपनी समस्याएँ सबसे अच्छी तरह जानते हैं। भारत में स्थानीय निकाय 1882 से थे, पर दशकों तक कमज़ोर रहे। 1992 के 73वें (ग्रामीण) और 74वें (शहरी) संशोधनों ने पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा, नियमित चुनाव, महिलाओं, SC और ST के लिए आरक्षण, और विषयों की सूची व धन दिया।
- स्वतंत्रता: इसका अर्थ और इसकी सीमा – स्वतंत्रता का अर्थ है हमारे फ़ैसलों पर बाहरी रोक कम होना और अपनी क्षमता बढ़ाने का असली मौका मिलना। प्रतिबंध बल (शासक या सरकार), सामाजिक रीतियों (जाति, लिंग के नियम) और गरीबी से आते हैं। साथ रहने के लिए कुछ सीमाएँ ज़रूरी हैं, पर वे उचित हों। जे. एस. मिल का हानि सिद्धांत कहता है कि राज्य किसी की स्वतंत्रता तभी सीमित करे जब दूसरों को हानि रोकनी हो; केवल स्वयं से जुड़े काम आज़ाद रहें, और छोटी हानि पर केवल सामाजिक नाराज़गी काफ़ी है। नकारात्मक स्वतंत्रता = दख़ल से मुक्ति; सकारात्मक स्वतंत्रता = बढ़ने की आज़ादी, जिसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बुनियादी है, पर उसकी उचित सीमाएँ हैं।