वैश्वीकरण की अवधारणा
वैश्वीकरण का अर्थ है दुनिया भर में बढ़ते प्रवाह। प्रवाह चार तरह के हैं:
- विचार: ख़बरें, ज्ञान, फ़िल्में और मूल्य दुनिया के एक हिस्से से दूसरे तक।
- पूँजी: देशों के बीच लगाया या उधार दिया गया पैसा।
- वस्तुएँ: सीमाओं के पार बिकने वाला सामान।
- लोग: काम, पढ़ाई या बेहतर जीवन की तलाश में जाने वाले लोग।
मुख्य बात है विश्वव्यापी जुड़ाव: ये प्रवाह लगातार चलते हैं, और एक जगह की घटना दूर के लोगों पर असर डालती है। वैश्वीकरण बहुआयामी है: इसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलू हैं, और इसका असर हर जगह अलग होता है। यह केवल अर्थव्यवस्था की बात नहीं है।
वैश्वीकरण के कारण
- तकनीक सबसे अहम कारण है: टेलीग्राफ़, टेलीफ़ोन, माइक्रोचिप और अब इंटरनेट ने संचार और यात्रा को तेज़ और सस्ता बनाया। पहले छपाई ने विचारों को दूर तक फैलाया था।
- जुड़ाव की समझ: लोग जानते हैं कि दूसरी जगह की घटनाएँ (बर्ड फ़्लू, वित्तीय संकट) उन पर असर डालती हैं।
- शीत युद्ध का अंत और बाज़ार आधारित नीतियों का फैलाव।
- IMF और WTO जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने खुले व्यापार को बढ़ावा दिया।
वैश्वीकरण नया नहीं है: व्यापार और प्रवास बहुत पुराने हैं। नई है इसकी रफ़्तार और पैमाना।
राजनीतिक परिणाम
- राज्य की क्षमता घटना: कल्याणकारी राज्य की जगह 'न्यूनतम' राज्य आता है जो क़ानून-व्यवस्था जैसे मूल काम करता है; आर्थिक प्राथमिकताएँ बाज़ार तय करता है; बहुराष्ट्रीय कंपनियों का असर बढ़ता है।
- राज्य मज़बूत रहता है: क़ानून, व्यवस्था, सुरक्षा और सीमाएँ अब भी उसके हाथ में हैं, और वह तय करता है कौन-से नियम माने।
- राज्य और मज़बूत हो सकता है: नई तकनीक से वह जानकारी जुटाकर बेहतर शासन कर सकता है, या नागरिकों पर ज़्यादा नज़र रख सकता है।
आर्थिक परिणाम
- ज़्यादा व्यापार, ज़्यादा विदेशी निवेश और आयात पर कम रोक; आर्थिक वैश्वीकरण को IMF, WTO और बड़े देश दिशा देते हैं।
- पूँजी लोगों से ज़्यादा आज़ादी से घूमती है: अमीर देश वीज़ा पर रोक रखते हैं, इसलिए मज़दूर पैसे जितनी आसानी से नहीं जा पाते।
- आलोचक कहते हैं इससे अमीर-ग़रीब और देशों के बीच खाई बढ़ती है; ग़रीबों की सुरक्षा घटती है, इसलिए 'सामाजिक सुरक्षा-जाल' चाहिए; कुछ इसे नव-उपनिवेशवाद कहते हैं।
- समर्थक कहते हैं इससे विकास, नौकरियाँ और ख़ुशहाली आती है; आपसी निर्भरता युद्ध घटा सकती है।
सांस्कृतिक परिणाम
- एकरूपता का डर: एक प्रभुत्वशाली (अक्सर पश्चिमी, अमेरिकी) संस्कृति स्थानीय संस्कृतियों की जगह ले सकती है। इसे दुनिया का मैकडोनॉल्डीकरण कहते हैं।
- सांस्कृतिक विभिन्नीकरण: बाहरी असर विकल्प भी बढ़ाते हैं और स्थानीय संस्कृति से मिलकर नए रूप बनाते हैं, जैसे हथकरघा कुर्ते के साथ नीली जींस।
- हर संस्कृति ने हमेशा दूसरों से कुछ लिया है; सवाल यह है कि मेल बराबरी का है या नहीं।
भारत और वैश्वीकरण
- भारत में प्रवाह पुराने हैं: रेशम मार्ग और समुद्री व्यापार ने इसे एशिया, अफ़्रीका और यूरोप से जोड़ा; विचार और धर्म दोनों ओर फैले।
- औपनिवेशिक शासन में भारत कच्चे माल का सप्लायर और ब्रिटिश सामान का बाज़ार बना।
- आज़ादी के बाद भारत ने संरक्षणवाद चुना: अपने उद्योग बनाना, आयात और विदेशी कंपनियों पर रोक।
- 1991 में वित्तीय संकट के बाद भारत ने आर्थिक सुधार (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) शुरू किए: कम शुल्क, विदेशी निवेश के लिए खुले दरवाज़े और निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका।
- नतीजे: तेज़ विकास, IT और सेवा क्षेत्र का फैलाव, उपभोक्ताओं के लिए ज़्यादा विकल्प; पर किसानों, छोटे उद्योगों, रोज़गार और असमानता को लेकर चिंताएँ।
वैश्वीकरण का प्रतिरोध
- वामपंथी आलोचक: वैश्वीकरण वैश्विक पूँजीवाद का एक दौर है जो अमीरों को और अमीर बनाता और ग़रीबों की रक्षा करने की राज्य की क्षमता घटाता है।
- दक्षिणपंथी आलोचक: राज्य के राजनीतिक रूप से कमज़ोर होने और पारंपरिक संस्कृति व मूल्यों के खोने से डरते हैं।
- लगभग कोई पूरी तरह बंद दुनिया नहीं चाहता; बहुत लोग कमज़ोरों की रक्षा करने वाला न्यायपूर्ण वैश्वीकरण माँगते हैं।
- विश्वव्यापी विरोध: 1999 में WTO बैठक के समय 'सिएटल की लड़ाई'।
- विश्व सामाजिक मंच (WSF) नव-उदारवादी वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पर्यावरणवादियों, मज़दूर और युवा संगठनों का खुला मंच है। पहली बैठक 2001 में ब्राज़ील के पोर्टो अलेग्रे में; चौथी 2004 में मुंबई में। इसका नारा: 'दूसरी दुनिया संभव है'।
- भारत में प्रतिरोध: मज़दूर संघ और किसान संगठन (जैसे नीम आदि पौधों पर विदेशी कंपनियों के पेटेंट के ख़िलाफ़); वामपंथी दल; और कुछ सांस्कृतिक समूह जो विदेशी टीवी चैनलों या वैलेंटाइन डे जैसे उत्सवों का विरोध करते हैं।
करके देखें
घर की पाँच चीज़ें देखिए: फ़ोन, खिलौना, खाने का पैकेट, कोई देखी हुई फ़िल्म, कोई पसंदीदा गाना। हर एक के आगे लिखिए कि चारों में से कौन-सा प्रवाह (सामान, पूँजी, विचार, लोग) इसे आप तक लाया। फिर 3D में एक-एक प्रवाह बंद कीजिए और लिखिए आप क्या खो देंगे।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- वैश्वीकरण = विचारों, पूँजी, वस्तुओं और लोगों के विश्वव्यापी प्रवाह
- मुख्य कारण: तकनीक (टेलीग्राफ़, टेलीफ़ोन, माइक्रोचिप, इंटरनेट)
- परिणाम: राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक
- मैकडोनॉल्डीकरण = सांस्कृतिक एकरूपता; विभिन्नीकरण = सांस्कृतिक मेल
- भारत: 1947 के बाद संरक्षणवाद; 1991 में सुधार
- प्रतिरोध: सिएटल 1999; विश्व सामाजिक मंच 2001, मुंबई 2004
हल किए गए उदाहरण
1. वैश्वीकरण के चार प्रवाह कौन-से हैं?
विचार, पूँजी (पैसा), वस्तुएँ (सामान) और लोग।
2. तकनीक को वैश्वीकरण का सबसे अहम कारण क्यों कहते हैं?
टेलीग्राफ़, टेलीफ़ोन, माइक्रोचिप और इंटरनेट जैसी खोजों ने विचारों, पैसे और सामान को दुनिया भर में तेज़ी और सस्ते में पहुँचाना संभव किया।
3. आर्थिक वैश्वीकरण के पक्ष और विपक्ष में एक-एक तर्क दीजिए।
पक्ष: इससे विकास, निवेश और नौकरियाँ आती हैं। विपक्ष: इससे अमीर-ग़रीब की खाई बढ़ सकती है और कमज़ोरों की सुरक्षा हट सकती है।
4. विश्व सामाजिक मंच क्या है?
नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध में कार्यकर्ताओं, मज़दूरों, पर्यावरणवादियों और युवा संगठनों का खुला विश्व मंच; पहली बैठक 2001 में और 2004 में मुंबई में हुई।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि वैश्वीकरण केवल आर्थिक है। इसके राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलू भी हैं।
- यह कहना कि वैश्वीकरण 1991 में शुरू हुआ। यह पुराना है; भारत के आर्थिक सुधार 1991 में शुरू हुए।
- यह दावा करना कि वैश्वीकरण हमेशा संस्कृतियों को एक-सा बनाता है। संस्कृतियाँ मिलकर नए रूप भी बनाती हैं।
- यह कहना कि सभी आलोचक वैश्वीकरण बिल्कुल नहीं चाहते। बहुत लोग न्यायपूर्ण वैश्वीकरण माँगते हैं।