द्विध्रुवीयता क्या थी?
द्विध्रुवीयता का मतलब है दुनिया में दो ध्रुव, यानी दो बड़े शक्ति-केंद्र। दूसरे विश्व युद्ध के बाद ये थे अमेरिका (पूँजीवादी, बाज़ार वाली अर्थव्यवस्था) और सोवियत संघ (साम्यवादी, सरकार द्वारा चलाई जाने वाली अर्थव्यवस्था)। दोनों की लंबी होड़, बिना आमने-सामने युद्ध के, शीत युद्ध कहलाई। सोवियत संघ दूसरी दुनिया का नेता था: पूर्वी यूरोप के समाजवादी देश, जो वारसा संधि में जुड़े थे।
सोवियत प्रणाली
विशेषताएँ
- कम्युनिस्ट पार्टी ही अकेला दल था। सरकार उसी के हाथ में थी।
- ज़मीन, कारख़ाने और बैंक सरकार के थे; क्या बने, यह योजना से तय होता था।
- हर नागरिक को न्यूनतम जीवन-स्तर मिलता था: नौकरी, घर, इलाज, पढ़ाई सस्ती या मुफ़्त।
- उन्नत उद्योग, मज़बूत सेना, अंतरिक्ष विज्ञान और परमाणु हथियार थे।
कमज़ोरियाँ
- भारी नौकरशाही (अफ़सर और नियम) और बोलने की आज़ादी कम।
- लोग असली चुनाव से नेता नहीं चुन सकते थे।
- अर्थव्यवस्था ठहर गई; चीज़ों की कमी और राशन की लंबी कतारें।
- रूस का दबदबा था, दूसरे गणराज्यों के लोग ख़ुद को उपेक्षित मानते थे।
- हथियारों और पूर्वी यूरोप पर भारी ख़र्च, और अफ़ग़ानिस्तान में महँगा युद्ध (1979-89)।
गोर्बाचेव और विघटन
मिखाइल गोर्बाचेव 1985 में महासचिव बने। वे व्यवस्था को सुधारना चाहते थे, ख़त्म नहीं करना।
- पेरेस्त्रोइका = अर्थव्यवस्था का पुनर्गठन।
- ग्लासनोस्त = खुलापन; लोग बोल सकें, अख़बार आलोचना कर सकें।
- पश्चिम से रिश्ते सुधारे और अफ़ग़ानिस्तान से सेना वापस बुलाई।
1989 में पूर्वी यूरोप के देशों ने साम्यवादी सरकारें हटा दीं और बर्लिन की दीवार गिरी। अगस्त 1991 में कट्टरपंथियों ने तख़्तापलट की कोशिश की; बोरिस येल्तसिन के नेतृत्व में लोगों ने इसे रोका। रूस, यूक्रेन और बेलारूस ने सोवियत संघ के अंत की घोषणा की और स्वतंत्र राज्यों का राष्ट्रकुल (CIS) बना। दिसंबर 1991 में सोवियत संघ ख़त्म होकर 15 स्वतंत्र देशों में बँट गया। रूस उसका उत्तराधिकारी बना और सुरक्षा परिषद की सीट उसे मिली।
सोवियत संघ क्यों टूटा? (कारण)
- आर्थिक कमज़ोरी: पैसा हथियारों और दूसरे देशों पर लगा; लोगों की ज़रूरतें पूरी नहीं हुईं।
- राजनीतिक कमज़ोरी: एक दल, कोई जवाबदेही नहीं, धीमी नौकरशाही।
- सुधारों से उम्मीदें बढ़ीं: बोलने की छूट मिली तो लोग तेज़ बदलाव चाहने लगे।
- राष्ट्रवाद: एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, यूक्रेन, जॉर्जिया जैसे गणराज्य अपना देश चाहते थे। कई विद्वान इसे सबसे बड़ा कारण मानते हैं।
- जानकारी: लोगों को पता चला कि पश्चिम ज़्यादा अमीर और आज़ाद है।
विघटन के परिणाम
- शीत युद्ध और हथियारों की होड़ ख़त्म।
- दुनिया एकध्रुवीय हुई: अमेरिका अकेली महाशक्ति।
- पूँजीवाद और उदार लोकतंत्र मुख्य मॉडल बने; IMF और विश्व बैंक ताक़तवर हुए।
- नए देश बने: बाल्टिक देश, मध्य एशिया के देश आदि। कुछ यूरोपीय संघ और नाटो में शामिल हुए।
- कुछ नए देशों में संघर्ष हुए (जैसे रूस में चेचन्या, ताजिकिस्तान में गृहयुद्ध), और यूगोस्लाविया हिंसा के साथ टूटा।
शॉक थेरेपी
शॉक थेरेपी यानी 1990 के दशक में रूस, मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप में साम्यवादी अर्थव्यवस्था से पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में अचानक बदलाव। इसे विश्व बैंक और IMF ने दिशा दी।
क्या हुआ
- सरकारी मालिकाना हक़ की जगह निजी मालिकाना हक़ (निजीकरण)।
- सामूहिक खेत निजी खेत बने।
- पश्चिम से व्यापार खोला गया, पुराने सोवियत साथियों से संबंध टूटे।
नतीजे
- लगभग 90% उद्योग बहुत कम दाम पर अमीरों को बिके: 'इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल'।
- रूसी मुद्रा रूबल गिरा, महँगाई बहुत बढ़ी।
- कल्याण व्यवस्था टूटी; नौकरियाँ गईं, खाने की कमी हुई।
- माफ़िया और छोटा अमीर वर्ग उभरा; असमानता बढ़ी।
- जल्दबाज़ी में संविधान बने; ताक़तवर राष्ट्रपतियों का शासन रहा।
2000 के बाद रूस की अर्थव्यवस्था सुधरी, मुख्यतः तेल और गैस बेचकर।
नए देश और तनाव
15 नए देशों में रूस, यूक्रेन, बेलारूस, बाल्टिक देश, कॉकेशस के देश (जॉर्जिया, आर्मेनिया, अज़रबैजान) और मध्य एशिया के पाँच देश (कज़ाख़स्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान) शामिल हैं। कई देशों में जातीय तनाव, कमज़ोर लोकतंत्र और नदियों-तेल पर विवाद रहे। तेल और गैस के कारण मध्य एशिया अहम बना, और बाहरी ताक़तें वहाँ असर बढ़ाना चाहती थीं।
भारत के रूस और सोवियत-बाद के देशों से संबंध
- भारत और रूस दोनों बहुध्रुवीय दुनिया चाहते हैं: कई शक्ति-केंद्र, सहयोग और मज़बूत UN।
- रक्षा: भारत का ज़्यादातर सैन्य सामान रूस से आया; दोनों मिलकर हथियार बनाते हैं।
- ऊर्जा: रूस तेल-गैस देता है; परमाणु बिजलीघर बनाने में मदद की।
- कूटनीति: रूस ने कश्मीर और सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट पर भारत का साथ दिया।
- विज्ञान और अंतरिक्ष: साझा परियोजनाएँ।
- मध्य एशिया (जैसे कज़ाख़स्तान, तुर्कमेनिस्तान) के साथ ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा में सहयोग।
करके देखें
15 सिक्कों का ढेर बनाइए, यह एक 'संघ' है। एक-एक सिक्का निकालिए और हर बार एक नए देश का नाम बोलिए। फिर ढेर बिखरने का एक कारण और एक परिणाम लिखिए। अब 3D में शॉक थेरेपी का स्लाइडर खिसकाइए और बताइए कौन-सा खंभा बढ़ा और कौन-से घटे।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- द्विध्रुवीयता: दो शक्ति-केंद्र (अमेरिका और सोवियत संघ)
- एकध्रुवीयता: एक शक्ति-केंद्र (1991 के बाद अमेरिका)
- ग्लासनोस्त = खुलापन; पेरेस्त्रोइका = पुनर्गठन
- शॉक थेरेपी = पूँजीवाद की ओर अचानक बदलाव (1990 का दशक)
- CIS = स्वतंत्र राज्यों का राष्ट्रकुल
- सोवियत संघ का अंत: दिसंबर 1991, 15 नए देश
हल किए गए उदाहरण
1. सोवियत प्रणाली की दो विशेषताएँ बताइए।
(1) अर्थव्यवस्था सरकार के हाथ में थी और योजना से चलती थी। (2) केवल कम्युनिस्ट पार्टी का शासन था; नागरिकों को नौकरी, घर और इलाज मिलता था, पर आज़ादी कम थी।
2. सोवियत संघ के विघटन के कोई तीन कारण समझाइए।
(1) पैसा हथियारों पर लगने से अर्थव्यवस्था ठहर गई। (2) गोर्बाचेव के खुलेपन से उम्मीदें तेज़ी से बढ़ीं। (3) बाल्टिक जैसे गणराज्यों में राष्ट्रवाद ने अलग देश की माँग की।
3. शॉक थेरेपी क्या थी? इसके दो प्रभाव बताइए।
IMF और विश्व बैंक की सलाह से साम्यवाद से पूँजीवाद की ओर अचानक बदलाव। प्रभाव: रूबल गिरा और महँगाई बढ़ी; कल्याण व्यवस्था टूटी और असमानता बढ़ी।
4. भारत रूस से अपने रिश्ते को क्यों महत्त्व देता है?
रूस रक्षा सामान और ऊर्जा देता है, UN और कश्मीर पर भारत का साथ देता है, और दोनों बहुध्रुवीय दुनिया चाहते हैं।
आम गलतियाँ
- यह लिखना कि गोर्बाचेव साम्यवाद ख़त्म करना चाहते थे। वे सुधार चाहते थे; विघटन उनकी योजना से आगे चला गया।
- 15 की जगह 12 या 16 देश लिखना। सही संख्या 15 है।
- ग्लासनोस्त (खुलापन) और पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) को उलट देना।
- शॉक थेरेपी को सफल बताना। इससे भारी तकलीफ़ हुई; सुधार बाद में तेल-गैस से आया।