पर्यावरण राजनीतिक मुद्दा क्यों बना
खेती की ज़मीन की उर्वरता घट रही है, मीठा पानी कम है, जंगल कट रहे हैं, ओज़ोन परत पतली हुई और जलवायु गर्म हो रही है। ये समस्याएँ सीमाएँ पार करती हैं, इसलिए कोई देश अकेले इन्हें नहीं सुलझा सकता। 1960 के दशक से ये विश्व राजनीति का हिस्सा बनीं। क्लब ऑफ़ रोम की रिपोर्ट 'लिमिट्स टू ग्रोथ' (1972) ने संसाधनों के उपयोग पर चेतावनी दी। रियो डी जनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन (1992) से जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता पर समझौते और एजेंडा 21 निकला, जो टिकाऊ विकास (ऐसा विकास जो भविष्य को नुक़सान न पहुँचाए) की बात करता है।
वैश्विक साझी संपदा
साझी संपदा वे संसाधन हैं जिनका मालिक एक व्यक्ति नहीं, पूरा समुदाय होता है। वैश्विक साझी संपदा वे इलाक़े हैं जो किसी एक देश के नियंत्रण से बाहर हैं और सबके साझे हैं: पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्र-तल और खुला समुद्र, और बाहरी अंतरिक्ष।
- समझौते: अंटार्कटिका संधि (1959), ओज़ोन परत बचाने के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987), अंटार्कटिका पर्यावरण प्रोटोकॉल (1991), और बाहरी अंतरिक्ष संधि (1967)।
- समस्याएँ: कौन क्या करे, इस पर सहमति कठिन; वैज्ञानिक प्रमाणों पर कभी बहस; बेहतर तकनीक वाले अमीर देश ज़्यादा फ़ायदा उठा सकते हैं, जैसे अंतरिक्ष में।
- अगर सब साझा संसाधन इस्तेमाल करें पर कोई देखभाल न करे तो वह बर्बाद हो जाता है: 'साझी संपदा की त्रासदी'।
साझी पर अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ
उत्तर के अमीर देश चाहते हैं कि प्रदूषण घटाने का काम सब बराबर बाँटें। दक्षिण के विकासशील देश कहते हैं कि ज़्यादातर नुक़सान दो सदियों में औद्योगिक देशों ने किया, इसलिए उन्हें ज़्यादा करना चाहिए।
रियो घोषणा (1992) ने साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियों (CBDR) का सिद्धांत माना: धरती की रक्षा सब देश करें, पर विकसित देशों की ज़िम्मेदारी ज़्यादा है क्योंकि उन्होंने पहले प्रदूषण किया और उनके पास ज़्यादा पैसा व तकनीक है।
जलवायु परिवर्तन पर UN फ़्रेमवर्क कन्वेंशन (1992) और क्योटो प्रोटोकॉल (1997) ने औद्योगिक देशों के लिए उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य तय किए; क्योटो में भारत और चीन को कटौती से छूट थी। पेरिस समझौता (2015) हर देश से अपने लक्ष्य तय करने को कहता है।
पर्यावरण पर भारत का पक्ष
- भारत ने क्योटो प्रोटोकॉल (2002 में अनुमोदन) और पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- भारत कहता है कि उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अमीर देशों से बहुत कम है और कम रहेगा।
- वह CBDR का समर्थन करता है: पहले प्रदूषण करने वाले ज़्यादा करें और विकासशील देशों को पैसा और स्वच्छ तकनीक दें।
- वह विकास के अधिकार और ग़रीबी से लड़ाई का बचाव करता है।
- देश में क़दम: ऊर्जा संरक्षण अधिनियम (2001), अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने वाला बिजली अधिनियम (2003), CNG जैसे स्वच्छ ईंधन, जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (2008), और राष्ट्रीय ऑटो-ईंधन नीति।
- भारत ने अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (2015) की सह-स्थापना की और चाहता है कि सार्क देश साझा पक्ष रखें।
पर्यावरण आंदोलन
कई सबसे मज़बूत क़दम सरकारों से नहीं, जन-आंदोलनों से आए।
- वन आंदोलन: दक्षिण के देशों (मेक्सिको, चिली, ब्राज़ील, मलेशिया, इंडोनेशिया, अफ़्रीका, भारत) में लोग जंगल कटाई का विरोध करते हैं। भारत में चिपको आंदोलन (1970 का दशक) में गाँव वालों, ख़ासकर महिलाओं ने कटाई रोकने के लिए पेड़ों को गले लगाया।
- खनन विरोधी आंदोलन: खदानें ज़मीन, पानी और स्थानीय लोगों को नुक़सान पहुँचाती हैं; जैसे फ़िलीपींस और ऑस्ट्रेलिया में खनन कंपनियों के ख़िलाफ़ विरोध।
- बड़े बाँध विरोधी आंदोलन: बड़े बाँध जंगल और गाँव डुबोते और लोगों को विस्थापित करते हैं। भारत में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने नर्मदा पर बड़े बाँधों का विरोध किया। ऑस्ट्रेलिया और दूसरी जगहों पर भी ऐसे आंदोलन हुए।
ये आंदोलन विविध हैं, अक्सर स्थानीय लोग इन्हें चलाते हैं, और इन्होंने राजनीति में नए विचार और काम के नए तरीक़े जोड़े।
संसाधनों की भू-राजनीति
संसाधनों की भू-राजनीति का सवाल है: किसे, कौन-सा संसाधन, कब और कैसे मिले।
- लकड़ी और नौसेना: पहले की सदियों में यूरोपीय ताक़तें जहाज़ों के लिए लकड़ी और उपनिवेशों से कच्चा माल चाहती थीं।
- तेल: 20वीं सदी का सबसे अहम संसाधन; दोनों विश्व युद्धों में निर्णायक। तेल से भारी दौलत और संघर्ष जुड़े हैं, ख़ासकर पश्चिम एशिया में (खाड़ी क्षेत्र में ज्ञात भंडार का बड़ा हिस्सा)। बड़ी ताक़तें स्थिर आपूर्ति चाहती हैं।
- खनिज: उद्योग और तकनीक के लिए ज़रूरी।
- पानी: साझी नदियाँ देशों में विवाद पैदा कर सकती हैं; कई इलाक़ों में मीठा पानी घट रहा है और भविष्य में संघर्ष का कारण बन सकता है।
मूलवासियों के अधिकार
UN के अनुसार मूलवासी उन लोगों के वंशज हैं जो किसी जगह पर दूसरों के आकर बसने से पहले रहते थे। इनमें अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ़िलीपींस और भारत (अक्सर आदिवासी या जनजातीय लोग कहलाते हैं) के समुदाय शामिल हैं।
- वे अपनी पहचान और संस्कृति वाले बराबर लोगों की तरह माने जाना चाहते हैं।
- उनकी माँगें: अपनी ज़मीन, जंगल और संसाधनों पर अधिकार, और फ़ैसलों में आवाज़।
- भारत में खदानों और बाँधों जैसी परियोजनाओं ने बहुत से आदिवासियों को विस्थापित किया; उन्हें अक्सर बहुत कम फ़ायदा मिला।
- 1975 में मूलवासियों की विश्व परिषद बनी; UN ने 1982 में एक कार्य-समूह बनाया और 2007 में मूलवासियों के अधिकारों पर घोषणा अपनाई।
करके देखें
एक दिन की 'ऊर्जा डायरी' रखिए: हर बार जब आपने बिजली, ईंधन या प्लास्टिक इस्तेमाल किया, लिखिए। निशान लगाइए कि किन्हें घटा सकते हैं। फिर 3D में नावों का स्लाइडर खिसकाइए और अपने शब्दों में साझी संपदा की त्रासदी समझाइए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- वैश्विक साझी संपदा: वायुमंडल, अंटार्कटिका, खुला समुद्र/समुद्र-तल, बाहरी अंतरिक्ष
- पृथ्वी सम्मेलन, रियो 1992: एजेंडा 21, CBDR, टिकाऊ विकास
- क्योटो प्रोटोकॉल 1997; पेरिस समझौता 2015
- अंटार्कटिका संधि 1959; मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल 1987; बाहरी अंतरिक्ष संधि 1967
- CBDR: कर्तव्य साझा, विकसित उत्तर का हिस्सा बड़ा
- आंदोलन: चिपको, नर्मदा बचाओ आंदोलन
हल किए गए उदाहरण
1. वैश्विक साझी संपदा क्या है? दो उदाहरण दीजिए।
वे इलाक़े या संसाधन जो किसी एक देश के नियंत्रण से बाहर हैं और सबके साझे हैं, जैसे वायुमंडल और अंटार्कटिका (खुला समुद्र और बाहरी अंतरिक्ष भी)।
2. 'साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ' समझाइए।
सभी देश पर्यावरण की रक्षा करें, पर विकसित देश ज़्यादा करें क्योंकि पुराना ज़्यादातर प्रदूषण उन्होंने किया और उनके पास ज़्यादा पैसा व तकनीक है।
3. जलवायु परिवर्तन पर भारत के पक्ष के दो बिंदु बताइए।
भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बहुत कम है, इसलिए मुख्य बोझ अमीर देशों पर हो; विकासशील देशों को बढ़ने की जगह और पैसा-तकनीक मिलनी चाहिए।
4. मूलवासी कई विकास परियोजनाओं का विरोध क्यों करते हैं?
खदानें और बाँध अक्सर उनकी ज़मीन और जंगल ले लेते हैं, उन्हें विस्थापित करते और उनकी जीवन-शैली नष्ट करते हैं, जबकि उन्हें फ़ायदा कम मिलता है।
आम गलतियाँ
- किसी देश के जंगल को वैश्विक साझी संपदा बताना। वैश्विक साझी संपदा किसी एक देश के नियंत्रण से बाहर होती है।
- यह कहना कि CBDR में केवल अमीर देश क़दम उठाएँ। कर्तव्य सबका है; अमीरों का हिस्सा बड़ा है।
- क्योटो प्रोटोकॉल (1997) और पृथ्वी सम्मेलन (1992) को मिला देना।
- पर्यावरण आंदोलनों को केवल विकास-विरोधी मानना। वे न्यायपूर्ण और टिकाऊ विकास माँगते हैं।