सतत विकास क्या है?
सतत विकास (sustainable development) ऐसा विकास है जो आज की ज़रूरतें पूरी करे, पर आने वाले लोगों का मौक़ा न छीने। यह विचार 1987 की एक विश्व रिपोर्ट हमारा साझा भविष्य (Our Common Future) से मशहूर हुआ।
- तीन खंभे: अर्थव्यवस्था (रोज़गार, आय), समाज (स्वास्थ्य, न्याय) और पर्यावरण (साफ़ हवा, पानी, जंगल)। क़ानून तीनों को संतुलन में रखता है।
- क़ानून क्यों ज़रूरी: फ़ैक्टरी कचरा फेंककर पैसा बचाती है, पर पूरे शहर की सेहत बिगड़ती है। क़ानून यह ख़र्च प्रदूषक पर डालता है।
अदालतों के मुख्य सिद्धांत
- प्रदूषक भुगतान करे (polluter pays): जो प्रदूषण करे, वही सफ़ाई और पीड़ितों का मुआवज़ा दे।
- एहतियाती सिद्धांत (precautionary): किसी काम से गंभीर नुकसान की आशंका हो, तो विज्ञान पूरा पक्का न हो तब भी पहले रोको।
- अंतर-पीढ़ी न्याय: आज के लोग प्रकृति को आने वाली पीढ़ियों की अमानत की तरह रखें।
- लोक न्यास (public trust): नदी, जंगल, समुद्र सबके हैं; सरकार केवल उनकी रखवाली करती है।
अंतर्राष्ट्रीय पहल
प्रदूषण सीमाएँ नहीं देखता, इसलिए देशों को मिलकर काम करना पड़ता है।
- स्टॉकहोम सम्मेलन, 1972: मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र की पहली बड़ी बैठक। इससे UNEP बना और 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस बना।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, 1987: ओज़ोन परत को नुकसान पहुँचाने वाले रसायन धीरे-धीरे बंद करने का समझौता; सबसे सफल पर्यावरण संधि मानी जाती है।
- रियो पृथ्वी सम्मेलन, 1992: रियो घोषणा, एजेंडा 21, जलवायु परिवर्तन (UNFCCC) और जैव विविधता पर संधियाँ।
- क्योटो प्रोटोकॉल, 1997: अमीर औद्योगिक देशों ने ग्रीनहाउस गैसें तय मात्रा में घटाने का वादा किया।
- पेरिस समझौता, 2015: लगभग हर देश ने अपना लक्ष्य ख़ुद तय किया ताकि तापमान वृद्धि 2 °C से काफ़ी कम रहे, 1.5 °C का प्रयास हो।
- सतत विकास लक्ष्य, 2015: 2030 तक के 17 लक्ष्य, जैसे साफ़ पानी (लक्ष्य 6), जलवायु कार्रवाई (13), थल पर जीवन (15)।
जलवायु वार्ता का एक मुख्य विचार है साझी पर अलग-अलग ज़िम्मेदारी: सब देश कदम उठाएँ, पर जिन्होंने पहले ज़्यादा प्रदूषण किया, वे ज़्यादा करें।
संवैधानिक प्रावधान
कई देशों के संविधान अब पर्यावरण की रक्षा करते हैं: कहीं लोगों के अधिकार के रूप में, कहीं राज्य के कर्तव्य के रूप में। भारत अच्छा उदाहरण है।
- अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जीवन का मतलब सम्मान वाला जीवन है, जिसमें साफ़ हवा, सुरक्षित पानी और स्वस्थ पर्यावरण शामिल हैं।
- अनुच्छेद 48A (नीति निदेशक तत्व): राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार करेगा, जंगल और वन्यजीव बचाएगा। 1976 में जोड़ा गया।
- अनुच्छेद 51A(g) (मौलिक कर्तव्य): हर नागरिक जंगल, झील, नदी और वन्यजीवों की रक्षा करे और जीवों पर दया रखे।
- अनुच्छेद 32 और 226: लोग पर्यावरण के मामले सीधे सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय ले जा सकते हैं, अक्सर जनहित याचिका (PIL) के रूप में।
इन्हीं अनुच्छेदों के आधार पर अदालतों ने शहर की बसों में साफ़ ईंधन, प्रदूषक उद्योगों को हटाने और नदियों की रक्षा के आदेश दिए हैं।
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986
दिसंबर 1984 की भोपाल गैस त्रासदी में हज़ारों लोग मरे। इसके बाद भारत ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 बनाया। यह एक छतरी क़ानून (umbrella law) है: हवा, पानी, ज़मीन सब एक साथ, और जल अधिनियम 1974 व वायु अधिनियम 1981 की कमियाँ भरता है।
- पर्यावरण में पानी, हवा, ज़मीन और इनका इंसानों, जीवों और संपत्ति से संबंध शामिल है।
- केंद्र सरकार उत्सर्जन और गंदे पानी के मानक तय कर सकती है, उद्योग कहाँ लगें यह तय कर सकती है, ख़तरनाक पदार्थों पर नियम बना सकती है।
- किसी भी उद्योग को बंद करने, रोकने या उसकी बिजली-पानी काटने का निर्देश दे सकती है।
- अधिकारी जगह में प्रवेश, निरीक्षण और नमूने ले सकते हैं।
- नियम तोड़ने पर दंड है; जुर्माने और सज़ा के नियम समय-समय पर बदले गए हैं।
- इसके नियमों में पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) भी है: बड़ी परियोजनाओं को मंज़ूरी से पहले प्रकृति पर असर का अध्ययन करना होता है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
क़ानून को रोज़ लागू करने वाला कोई चाहिए। भारत में यह काम केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) करते हैं, जो पहले जल अधिनियम 1974 के तहत बने।
- CPCB: केंद्र सरकार को सलाह, राष्ट्रीय मानक, वायु गुणवत्ता सूचकांक, राज्य बोर्डों में तालमेल और प्रशिक्षण।
- SPCB: फ़ैक्टरियों को स्थापना की अनुमति और संचालन की अनुमति देते हैं, निरीक्षण करते हैं, नमूने जाँचते हैं, नोटिस या बंदी का आदेश देते हैं।
- उद्योगों को प्रदूषण के हिसाब से श्रेणियों (लाल, नारंगी, हरा, सफ़ेद) में बाँटा जाता है, ताकि सबसे गंदे उद्योगों की सबसे कड़ी जाँच हो।
हरित अदालतें
भारत का राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT, 2010) पर्यावरण के मामले जल्दी सुनता है और मुआवज़े का आदेश दे सकता है। कई देशों में ऐसी पर्यावरण अदालतें हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सतत विकास = आज की ज़रूरतें + भविष्य की ज़रूरतों की रक्षा
- तीन खंभे: अर्थव्यवस्था + समाज + पर्यावरण (संतुलन में)
- प्रदूषक भुगतान करे: सफ़ाई का ख़र्च + मुआवज़ा → प्रदूषक देगा
- एहतियाती सिद्धांत: गंभीर ख़तरा + अधूरा विज्ञान → पहले रोको
- भारत: अनु. 21 (अधिकार) · अनु. 48A (राज्य का कर्तव्य) · अनु. 51A(g) (नागरिक का कर्तव्य)
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 = हवा, पानी, ज़मीन पर छतरी क़ानून
- बोर्ड: स्थापना की अनुमति → संचालन की अनुमति → निरीक्षण → नोटिस → बंदी
हल किए गए उदाहरण
1. एक होटल शहर की झील में कचरा डाल रहा है। नागरिक किन अनुच्छेदों का सहारा ले सकते हैं?
वे अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय (या अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय) जा सकते हैं और कह सकते हैं कि अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार में साफ़ पर्यावरण शामिल है। वे अनुच्छेद 48A में राज्य का कर्तव्य भी बता सकते हैं। ख़ुद नागरिकों का भी 51A(g) में झील बचाने का कर्तव्य है।
2. एक रसायन फ़ैक्टरी 80 इकाई गंदा पानी छोड़ती है, सीमा 50 है। राज्य बोर्ड क्रम से क्या करेगा?
1) निरीक्षण करके नमूने लेगा। 2) तय समय में सुधार का नोटिस देगा। 3) न सुधरे तो संचालन की अनुमति नवीनीकृत नहीं करेगा। 4) बंदी या बिजली-पानी काटने का आदेश देगा। 5) प्रदूषक भुगतान सिद्धांत से सफ़ाई का ख़र्च फ़ैक्टरी से लिया जा सकता है।
3. पेरिस समझौते को 'नीचे से ऊपर' और क्योटो को 'ऊपर से नीचे' क्यों कहते हैं?
क्योटो में अमीर देशों की कटौती ऊपर से तय की गई थी। पेरिस में हर देश अपना लक्ष्य (राष्ट्रीय योगदान) ख़ुद तय करता है और प्रगति बताता है। इसी वजह से लगभग सब देश जुड़ गए।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि अनुच्छेद 21 में 'पर्यावरण' शब्द लिखा है। नहीं लिखा; अदालतों ने जीवन के अधिकार में इसे पढ़ा है।
- 48A और 51A(g) को उलट देना। 48A राज्य का कर्तव्य है; 51A(g) हर नागरिक का।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 को सिर्फ़ हवा का क़ानून समझना। यह हवा, पानी, ज़मीन सबका छतरी क़ानून है।
- प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अदालत समझना। बोर्ड नियामक है: अनुमति, निरीक्षण, आदेश; विवाद अदालतें और अधिकरण तय करते हैं।