CBSE कक्षा 12 विधिक अध्ययन
अध्याय: 8
1. न्यायपालिका
न्यायपालिका
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2. भारत में वैकल्पिक विवाद समाधान
वैकल्पिक विवाद समाधान
- वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR): अदालत के बाहर विवाद सुलझाना – अदालतें या तो प्रतिकूल व्यवस्था (adversarial: दोनों पक्ष बहस करते हैं, जज तटस्थ अंपायर) अपनाती हैं या जाँच-प्रधान व्यवस्था (inquisitorial: जज खुद तथ्य खोजता है)। मुकदमे धीमे और महँगे हो सकते हैं, इसलिए वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) दूसरे रास्ते देता है: बातचीत, मध्यस्थता (तटस्थ व्यक्ति पक्षों को सहमति तक पहुँचने में मदद करता है), सुलह (तटस्थ व्यक्ति समझौते का प्रस्ताव भी दे सकता है), माध्यस्थम/पंचाट (चुना हुआ पंच बाध्यकारी अवार्ड देता है) और भारत में लोक अदालत (मुफ़्त, जल्दी, समझौते से, अपील नहीं)। इनसे अलग, ओम्बड्समैन, जैसे भारत में लोकपाल (केंद्र) और लोकायुक्त (राज्य), सरकारी अधिकारियों के भ्रष्टाचार या कुप्रशासन की शिकायतों की जाँच करते हैं।
3. विधि के विषय-1: व्यावसायिक विधियाँ
संविदा विधि · अपकृत्य विधि · संपत्ति विधि · बौद्धिक संपदा विधि
- अपकृत्य विधि: लापरवाही, उपद्रव और दायित्व – अपकृत्य (tort) एक दीवानी गलती है, जिसमें किसी का काम या लापरवाही दूसरे को नुकसान पहुँचाती है और दोनों के बीच कोई अनुबंध नहीं होता। पीड़ित (वादी) गलती करने वाले (प्रतिवादी) पर उपचार के लिए दावा कर सकता है, आम तौर पर पैसा जिसे हर्जाना कहते हैं। मुख्य अपकृत्य हैं: लापरवाही (कर्तव्य, उल्लंघन, कारण-संबंध और नुकसान चाहिए), अधिभोगी दायित्व, उपद्रव और ख़तरनाक रिसाव। नियोक्ता अपने कर्मचारियों के अपकृत्य के लिए भी ज़िम्मेदार हो सकता है (प्रतिनिधिक दायित्व)। अंशदायी लापरवाही और सहमति जैसे बचाव दायित्व घटा या खत्म कर सकते हैं।
- संपत्ति क़ानून: स्वामित्व और संपत्ति के अधिकार – स्वामित्व (ownership) किसी चीज़ पर सबसे मज़बूत अधिकार है। इसमें तीन शक्तियाँ होती हैं: चीज़ को अपने पास रखना (कब्ज़ा), उसका इस्तेमाल करना और उससे कमाना, और उसे बेचना, देना या बदलना (निपटान)। संपत्ति निजी, साझा, सहकारी या सार्वजनिक हो सकती है। क़ानून मालिक की रक्षा करता है, पर सीमाएँ भी हैं: दूसरों को नुक़सान नहीं पहुँचा सकते, और सार्वजनिक ज़रूरत के लिए राज्य उचित मुआवज़ा देकर संपत्ति ले सकता है।
4. विधि के विषय-2: सामान्य विधियाँ
विधि और सतत विकास · विधिक इकाइयों के रूप · भारत में आपराधिक विधियाँ
- पर्यावरण विधि और सतत विकास – सतत विकास का मतलब है: आज की ज़रूरतें ऐसे पूरी करो कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें। क़ानून अर्थव्यवस्था, समाज और पर्यावरण को संतुलन में रखने में मदद करता है। दुनिया के देशों ने स्टॉकहोम (1972), रियो (1992), क्योटो (1997) और पेरिस (2015) में मिलकर लक्ष्य तय किए, और 2015 में 17 सतत विकास लक्ष्य (SDGs) अपनाए। संविधान स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार और उसकी रक्षा का कर्तव्य देते हैं; भारत में अनुच्छेद 21, 48A और 51A(g)। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 एक छतरी क़ानून है, जिससे सरकार मानक तय करती है और प्रदूषकों पर कार्रवाई करती है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड उद्योगों की जाँच करते हैं, अनुमति देते हैं और बंदी का आदेश दे सकते हैं।
- विधिक इकाइयों के रूप: एकल स्वामित्व, साझेदारी, LLP और कंपनियाँ – कारोबार अलग-अलग क़ानूनी रूपों में चलाया जा सकता है। एकल स्वामित्व में एक मालिक होता है और कारोबार की अलग क़ानूनी पहचान नहीं होती, इसलिए दायित्व असीमित है। साझेदारी में दो या ज़्यादा साझेदार विलेख के अनुसार लाभ बाँटते हैं; दायित्व असीमित और संयुक्त है। सीमित दायित्व साझेदारी (LLP) अलग विधिक इकाई है, साझेदार सिर्फ़ अपना तय योगदान खो सकते हैं। कंपनी अलग विधिक व्यक्ति है जिसके मालिक शेयरधारक हैं: प्राइवेट कंपनी (भारत में 2 से 200 सदस्य, शेयर जनता को नहीं), पब्लिक कंपनी (कम से कम 7 सदस्य, शेयर बाज़ार में) और एक व्यक्ति कंपनी (एक सदस्य, सीमित दायित्व, नामिती ज़रूरी)। रूप चुनना जोखिम, पूँजी, नियंत्रण और काग़ज़ी काम पर निर्भर है।
- आपराधिक कानून (Criminal Law): अपराध और बचाव – आपराधिक कानून बताता है कि राज्य किन कामों को अपराध मानता है और उनकी सज़ा क्या है। ज़्यादातर अपराधों के दो हिस्से होते हैं: दोषी कार्य (actus reus) और दोषी मन (mens rea)। अपराध व्यक्ति के विरुद्ध (घातक जैसे हत्या; गैर-घातक जैसे हमला) या संपत्ति के विरुद्ध (चोरी, लूट, सेंधमारी, धोखाधड़ी, संपत्ति को नुकसान) हो सकते हैं। अपराध करने की कोशिश (प्रयास) भी अपराध है। आत्मरक्षा, दबाव, पागलपन या आपराधिक ज़िम्मेदारी की उम्र से कम होना जैसे बचाव दोष हटा या घटा सकते हैं। अभियुक्त निर्दोष माना जाता है; अभियोजन को उचित संदेह से परे दोष साबित करना होता है।
5. मानवाधिकार की अवधारणा
भारत में मानवाधिकार · शिकायत तंत्र
- मानव अधिकार: अर्थ, इतिहास, प्रकार और संरक्षण – मानव अधिकार वे मूल स्वतंत्रताएँ और सुरक्षाएँ हैं जो हर व्यक्ति को मनुष्य होने के कारण मिलती हैं। ये सार्वभौमिक, अविच्छेद्य, अविभाज्य और गरिमा पर आधारित हैं। मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948) ने सबके लिए एक साझा मानक बनाया, जिसे बाद में संधियों से बाध्यकारी बनाया गया। संविधान, न्यायालय, आयोग, संयुक्त राष्ट्र और नागरिक समाज इनकी रक्षा करते हैं, और केवल दूसरों की रक्षा के लिए बने उचित क़ानून ही इन्हें सीमित कर सकते हैं।
- मानवाधिकार उल्लंघन के लिए शिकायत तंत्र – किसी के मानवाधिकार टूटें तो वह अदालत जा सकता है, पर अदालतें धीमी और महँगी हो सकती हैं। इसलिए कई देश अर्ध-न्यायिक निकाय बनाते हैं: ऐसे आयोग जिनके पास अदालत जैसी कुछ शक्तियाँ हैं (गवाह बुलाना, दस्तावेज़ माँगना), पर प्रक्रिया आसान, सस्ती और तेज़ है। ज़्यादातर ये बाध्यकारी फ़ैसला नहीं, सिफ़ारिश देते हैं। भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (1993, मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम) शिकायत पर या स्वतः संज्ञान से जाँच करता है, जेलों का दौरा करता है और मुआवज़े व कार्रवाई की सिफ़ारिश करता है; राज्य आयोग राज्य स्तर पर यही करते हैं। ख़ास समूहों के लिए ख़ास आयोग हैं: महिला, अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और बच्चे। दुनिया भर में ऐसी संस्थाएँ संयुक्त राष्ट्र के पेरिस सिद्धांतों का पालन करती हैं।
6. अंतर्राष्ट्रीय विधि
अंतर्राष्ट्रीय विधि
- अंतर्राष्ट्रीय कानून: राज्य नियम कैसे बनाते और निभाते हैं – अंतर्राष्ट्रीय कानून वे नियम हैं जिन्हें राज्य (और अंतर्राष्ट्रीय संगठन) आपसी व्यवहार में बाध्यकारी मानते हैं। कोई विश्व संसद या विश्व पुलिस नहीं है, इसलिए राज्य खुद नियम बनाते हैं, मुख्य रूप से संधियों और रिवाजों से, साथ में कानून के सामान्य सिद्धांत; अदालती फ़ैसले और विद्वानों के लेख नियम समझने में मदद करते हैं। यह बराबर संप्रभु राज्यों के विचार (1648) से संयुक्त राष्ट्र (1945) और मानव अधिकार कानून (1948 से) तक बढ़ा। संयुक्त राष्ट्र और उसका अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय शांति बनाए रखने और विवाद सुलझाने में मदद करते हैं। राज्य बातचीत, मध्यस्थता, पंच निर्णय या अदालत से विवाद सुलझाते हैं। हर देश तय करता है कि संधि उसके अपने (नगरपालिका/राष्ट्रीय) कानून में कैसे आए: एकवादी देश सीधे लागू करते हैं; भारत और ब्रिटेन जैसे द्वैतवादी देशों में संसद का अधिनियम चाहिए।
7. भारत में विधिक व्यवसाय
विधिक व्यवसाय
- विधिक पेशा (वकालत) – वकील लोगों को कानून का इस्तेमाल करने में मदद करते हैं। वकील बनने के लिए कानून पढ़ो, फिर बार काउंसिल में नामांकन कराओ। वकील को नैतिकता माननी होती है: मुवक्किल, अदालत, सामने वाले पक्ष और समाज के प्रति कर्तव्य। वे ज़ोर-शोर से विज्ञापन नहीं कर सकते। आज कानून का काम दुनिया भर में फैला है, महिलाएँ बढ़ रही हैं, और अदालत के बाहर भी कई करियर हैं।
8. विधिक सेवाएँ
विधिक सेवाएँ
- विधिक सहायता: जो फ़ीस नहीं दे सकते, उनके लिए मुफ़्त कानूनी मदद – विधिक सहायता यानी उन लोगों को मुफ़्त कानूनी मदद जो वकील का ख़र्च नहीं उठा सकते। यह दान से शुरू होकर अधिकार बनी। फ़ौजदारी मामले में ग़रीब आरोपी को मुफ़्त वकील मिलना ही चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 39A और विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 ने NALSA से तालुका तक संस्थाएँ बनाईं, और लोक अदालतें जहाँ बिना फ़ीस समझौता होता है।