अंतर्राष्ट्रीय कानून क्या है?
अंतर्राष्ट्रीय कानून (अंतर्राष्ट्रीय विधि, 'राष्ट्रों का कानून') वे नियम हैं जिन्हें राज्य एक-दूसरे पर बाध्यकारी मानते हैं। यह संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों पर और अब व्यक्तियों के अधिकारों-कर्तव्यों पर भी लागू होता है।
यह राष्ट्रीय (नगरपालिका) कानून से अलग है, जिसे देश की अपनी संसद अपने लोगों के लिए बनाती है।
- कोई विश्व संसद नहीं: राज्य सहमति से नियम बनाते हैं।
- कोई विश्व पुलिस नहीं: पारस्परिकता (मैं वादा निभाऊँ तो तुम भी निभाओ), साख, प्रतिबंध, अदालतें और गंभीर मामलों में UN सुरक्षा परिषद नियम लागू कराते हैं।
- राज्य संप्रभु हैं (अपना शासन खुद करते हैं) और उनमें संप्रभु समानता है: बड़ा हो या छोटा, कानूनी अधिकार बराबर।
क्षेत्रीय कानून इससे आगे जा सकता है। राज्यों के किसी क्षेत्रीय संघ (जैसे यूरोपीय संघ) में साझा संस्थाएँ ऐसे नियम बनाती हैं जो सदस्य देशों में सीधे लागू होते हैं और उन विषयों में राष्ट्रीय कानून से ऊपर होते हैं।
संक्षिप्त इतिहास
- प्राचीन काल: प्राचीन भारत, मेसोपोटामिया, मिस्र, यूनान, रोम और चीन में संधियाँ और दूतों के नियम थे। भारतीय ग्रंथों में युद्ध के उचित आचरण और दूत की सुरक्षा की बात है।
- 1625: डच विद्वान ह्यूगो ग्रोशियस ने युद्ध और शांति के कानून पर प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।
- 1648: यूरोप में वेस्टफ़ेलिया की शांति ने बराबर, संप्रभु राज्यों का विचार दिया।
- 1864–1907: पहला जिनेवा अभिसमय (घायलों की देखभाल) और हेग सम्मेलन (युद्ध के नियम, शांतिपूर्ण समाधान)।
- 1919: राष्ट्र संघ, शांति के लिए पहली विश्व संस्था; यह दूसरा विश्व युद्ध नहीं रोक पाया।
- 1945: UN चार्टर: आत्मरक्षा या सुरक्षा परिषद की कार्रवाई के सिवा बल प्रयोग मना; अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय बना।
- 1948 के बाद: मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 1949 के जिनेवा अभिसमय, उपनिवेशों की आज़ादी, समुद्री कानून (1982), अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (1998)।
अंतर्राष्ट्रीय कानून के स्रोत
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की संविधि (अनुच्छेद 38) स्रोत बताती है:
- संधियाँ (अभिसमय, चार्टर, समझौते): राज्यों के लिखित वादे। ये केवल उन्हीं राज्यों पर लागू होती हैं जो सहमत हों। चरण: बातचीत → हस्ताक्षर → अनुसमर्थन (देश में औपचारिक मंज़ूरी) → लागू। मूल नियम pacta sunt servanda: समझौते निभाए जाने चाहिए।
- अंतर्राष्ट्रीय रिवाज: (क) राज्यों का लगातार, आम व्यवहार और (ख) opinio juris, यानी यह विश्वास कि ऐसा करना कानूनी कर्तव्य है। रिवाज लगभग सभी राज्यों पर लागू होता है, संधि के बिना भी। जैसे राजनयिक उन्मुक्ति।
- कानून के सामान्य सिद्धांत, जो ज़्यादातर कानूनी व्यवस्थाओं में हैं: सद्भावना, निष्पक्षता, नुकसान करने वाला भरपाई करे।
- सहायक साधन: अदालती फ़ैसले और प्रमुख विद्वानों के लेख, जो नियम ढूँढने और समझाने में मदद करते हैं।
कुछ नियम इतने बुनियादी हैं कि कोई संधि भी उन्हें नहीं तोड़ सकती, इन्हें jus cogens कहते हैं (जैसे नरसंहार, दासता और यातना पर रोक)। UN महासभा के प्रस्ताव आम तौर पर बाध्यकारी नहीं होते, पर रिवाज बनने में मदद कर सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय और मानव अधिकार
संयुक्त राष्ट्र (1945, 193 सदस्य) का लक्ष्य शांति बनाए रखना, मैत्री बढ़ाना और मानव अधिकारों की रक्षा है।
- महासभा: हर सदस्य का एक वोट।
- सुरक्षा परिषद: 15 सदस्य (5 स्थायी, वीटो सहित)। शांति के ख़तरे पर बाध्यकारी फ़ैसले, जैसे प्रतिबंध, ले सकती है।
- अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ): हेग में, 15 न्यायाधीश। उन राज्यों के विवाद सुलझाता है जो उसका क्षेत्राधिकार मानें, और सलाहकारी राय देता है।
अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार कानून हर व्यक्ति को राज्य के अत्याचार से बचाता है: सार्वभौमिक घोषणा (1948), और बाध्यकारी संधियाँ जैसे 1966 की दो प्रसंविदाएँ (नागरिक-राजनीतिक तथा आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकार), बाल अधिकार, यातना-विरोधी और भेदभाव-विरोधी अभिसमय।
अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून (सशस्त्र संघर्ष का कानून, मुख्यतः जिनेवा अभिसमय) युद्ध की सीमाएँ तय करता है: नागरिकों, घायलों और बंदियों की रक्षा; बेवजह पीड़ा देने वाले हथियार नहीं। अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय नरसंहार, मानवता के विरुद्ध अपराध और युद्ध अपराधों के लिए व्यक्तियों पर मुक़दमा चला सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय विवादों का समाधान
UN चार्टर कहता है कि राज्य विवाद शांतिपूर्वक सुलझाएँ। मुख्य तरीके, कम से ज़्यादा औपचारिक:
- बातचीत (वार्ता): राज्य सीधे बात करते हैं।
- सत्प्रयास और मध्यस्थता: कोई तीसरा पक्ष बात कराने में मदद करता है या हल सुझाता है।
- जाँच और सुलह: विशेषज्ञ तथ्य ढूँढते हैं या शर्तें सुझाते हैं।
- पंच निर्णय (मध्यस्थ निर्णय/आर्बिट्रेशन): राज्य खुद निर्णायक चुनते हैं और फ़ैसला (अवार्ड) मानने पर सहमत होते हैं।
- न्यायिक समाधान: स्थायी अदालत, जैसे ICJ या समुद्री कानून न्यायाधिकरण, बाध्यकारी निर्णय देती है।
क्षेत्रीय संस्थाएँ और विश्व व्यापार संगठन (व्यापार विवादों के लिए) भी मदद करते हैं। बल प्रयोग केवल सशस्त्र हमले के विरुद्ध आत्मरक्षा में या सुरक्षा परिषद की मंज़ूरी से हो सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय कानून और राष्ट्रीय (नगरपालिका) कानून; भारत
संधि देश के अपने कानून का हिस्सा कैसे बनती है?
- एकवाद (मोनिज़्म): अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय कानून एक ही व्यवस्था हैं। अनुसमर्थित संधि सीधे अदालत में लागू होती है (जैसे नीदरलैंड)।
- द्वैतवाद (ड्यूअलिज़्म): दोनों अलग व्यवस्थाएँ हैं। देश के अंदर लागू होने के लिए संधि पर राष्ट्रीय कानून चाहिए (जैसे ब्रिटेन और भारत)।
भारत: संविधान का अनुच्छेद 51 राज्य से अंतर्राष्ट्रीय शांति बढ़ाने और अंतर्राष्ट्रीय कानून व संधियों का आदर करने को कहता है। अनुच्छेद 253 संसद को संधियाँ लागू करने के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है, राज्य सूची के विषयों पर भी। जब टकराव न हो, भारतीय अदालतें भारतीय कानून को अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुरूप पढ़ती हैं और मानव अधिकार संधियों से कमियाँ भरती रही हैं। भारत UN का संस्थापक सदस्य है, कई बार सुरक्षा परिषद में रहा है और UN शांति सेना में सबसे ज़्यादा सैनिक भेजने वालों में है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य स्रोत: संधियाँ, रिवाज, सामान्य सिद्धांत; सहायक: अदालती फ़ैसले, विद्वानों के लेख
- रिवाज = राज्य व्यवहार + opinio juris (कानूनी कर्तव्य का भाव)
- Pacta sunt servanda: संधियाँ निभाई जाएँ
- संधि के चरण: बातचीत → हस्ताक्षर → अनुसमर्थन → लागू
- विवाद: बातचीत → मध्यस्थता → पंच निर्णय → अदालत
- एकवाद: संधि सीधे लागू; द्वैतवाद: राष्ट्रीय अधिनियम चाहिए
हल किए गए उदाहरण
1. दो पड़ोसी राज्यों में मछली पकड़ने के अधिकार पर विवाद है। वे एक सम्मानित तीसरे राज्य से बात कराने को कहते हैं। यह कौन-सा तरीका है?
मध्यस्थता (या सत्प्रयास)। तीसरा पक्ष मदद करता है, पर उसके सुझाव बाध्यकारी नहीं हैं।
2. सदियों से सभी राज्य विदेशी राजदूतों को गिरफ़्तार नहीं करते, यह मानकर कि ऐसा नहीं करना चाहिए। यह किस स्रोत का नियम है?
अंतर्राष्ट्रीय रिवाज: लंबा राज्य व्यवहार + opinio juris। बाद में इसे 1961 के वियना राजनयिक संबंध अभिसमय में लिखा गया।
3. राज्य A ने एक ख़ास जाल पर रोक लगाने वाली संधि पर कभी हस्ताक्षर नहीं किए। क्या वह उस संधि से बँधा है?
नहीं, संधि केवल पक्षकारों को बाँधती है। पर अगर वही नियम रिवाज बन चुका है, तो A रिवाज से बँध सकता है।
4. भारत समुद्र की रक्षा की एक संधि का अनुसमर्थन करता है। क्या भारतीय अदालत उसी से सीधे किसी प्रदूषक को सज़ा दे सकती है?
भारत मुख्यतः द्वैतवादी है, इसलिए सज़ा के नियम के लिए आम तौर पर संसद का अधिनियम चाहिए (अनुच्छेद 253)। अदालतें फिर भी संधि की मदद से भारतीय कानून की व्याख्या कर सकती हैं।
आम गलतियाँ
- संयुक्त राष्ट्र को विश्व सरकार समझना। वह सब लोगों के लिए कानून नहीं बनाता; राज्य संप्रभु रहते हैं।
- यह मानना कि संधि हर राज्य पर लागू होती है। वह केवल सहमत राज्यों पर लागू होती है (रिवाज ज़्यादा व्यापक है)।
- ICJ और अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय को एक समझना। ICJ राज्यों के विवाद सुलझाता है; ICC व्यक्तियों पर गंभीर अपराधों का मुक़दमा चलाता है।
- यह सोचना कि विश्व पुलिस न होने से अंतर्राष्ट्रीय कानून बेकार है। पारस्परिकता, साख और व्यापार के कारण ज़्यादातर राज्य ज़्यादातर नियम मानते हैं।