मानव अधिकार क्या हैं?
मानव अधिकार वे मूल स्वतंत्रताएँ और सुरक्षाएँ हैं जो हर व्यक्ति को केवल मनुष्य होने के कारण मिलती हैं। ये राष्ट्रीयता, लिंग, धर्म, जाति, रंग, भाषा, विकलांगता या धन पर निर्भर नहीं करते।
मुख्य विशेषताएँ:
- सार्वभौमिक: हर जगह, हर किसी के लिए।
- अविच्छेद्य: छीने नहीं जा सकते, सिवाय उचित क़ानूनी तरीक़े के (जैसे निष्पक्ष सुनवाई के बाद जेल की सज़ा आने-जाने की आज़ादी सीमित करती है)।
- अविभाज्य और परस्पर निर्भर: अधिकार एक-दूसरे को सहारा देते हैं। शिक्षा और जानकारी के बिना वोट का अधिकार अधूरा है।
- गरिमा और समानता पर आधारित: हर जीवन का मूल्य बराबर है।
क़ानूनी अधिकार किसी देश के क़ानून में लिखे अधिकार हैं; मानव अधिकार वह बड़ा नैतिक मानक है जिस पर उन क़ानूनों को खरा उतरना चाहिए। अधिकार के विचार के लिए देखें अधिकार।
मानव अधिकार क़ानून का विकास
- प्राचीन और धार्मिक परंपराएँ: कई संस्कृतियों ने न्याय, कमज़ोर की देखभाल और शासक पर सीमा सिखाई।
- 1215, मैग्ना कार्टा (इंग्लैंड): राजा को भी क़ानून मानना होगा।
- 1689, बिल ऑफ़ राइट्स (इंग्लैंड): राजसत्ता पर सीमा, संसद के अधिकार।
- 1776 और 1789: अमेरिकी और फ़्रांसीसी घोषणाओं ने कहा कि लोग अधिकारों के साथ जन्म लेते हैं।
- 1948, मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR): द्वितीय विश्व युद्ध की भयावहता के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपनाई। इसके 30 अनुच्छेद सब लोगों के लिए साझा मानक हैं। एलेनोर रूज़वेल्ट मसौदा समूह की अध्यक्ष थीं, और भारत की हंसा मेहता ने "all men" को "all human beings" करवाने में मदद की।
- 1966, दो प्रसंविदाएँ (covenants): एक नागरिक-राजनीतिक अधिकारों पर, एक आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकारों पर। UDHR के साथ ये "अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार विधेयक" बनाती हैं।
- बाद की संधियाँ: नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध (1965), महिलाओं के लिए (1979), यातना के विरुद्ध (1984), बच्चों के लिए (1989), दिव्यांगजनों के लिए (2006), और मूलनिवासी लोगों के अधिकारों की घोषणा (2007)।
फिर कई देशों ने अपने संविधान या अधिकार-पत्र में अधिकार लिखे और मानव अधिकार क़ानून बनाए।
मानव अधिकारों के प्रकार
अधिकारों को अक्सर तीन "पीढ़ियों" या परिवारों में बाँटा जाता है:
- नागरिक और राजनीतिक अधिकार: जीवन, स्वतंत्रता, यातना और दासता से मुक्ति, क़ानून के सामने समानता, निष्पक्ष सुनवाई, बोलने, धर्म, सभा और संगठन की आज़ादी, वोट और शासन में भागीदारी। ये मुख्यतः राज्य शक्ति के दुरुपयोग से बचाते हैं।
- आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार: काम और उचित वेतन, शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, आवास, सामाजिक सुरक्षा, सांस्कृतिक जीवन में भागीदारी। इनके लिए राज्य को काम और ख़र्च करना पड़ता है।
- सामूहिक अधिकार: आत्मनिर्णय, विकास, शांति, स्वस्थ पर्यावरण, और मूलनिवासी लोगों व अल्पसंख्यकों के ज़मीन, भाषा और संस्कृति के अधिकार।
कुछ समूहों को विशेष सुरक्षा मिलती है: बच्चे, महिलाएँ, शरणार्थी, दिव्यांगजन, मूलनिवासी लोग और अल्पसंख्यक।
मानव अधिकारों का संरक्षण कैसे होता है
- संविधान और अधिकार-पत्र: कई देश अपने सर्वोच्च क़ानून में अधिकार लिखते हैं, जैसे भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार (देखें मौलिक अधिकार) या कोई अधिकार और स्वतंत्रता चार्टर।
- स्वतंत्र न्यायालय: अधिकार टूटने पर लोग अदालत जा सकते हैं। न्यायालय अनुचित क़ानून रद्द कर सकते हैं (न्यायिक पुनरावलोकन)। ऐतिहासिक मुक़दमे तय करते हैं कि किसी अधिकार का अर्थ क्या है।
- मानव अधिकार आयोग और लोकपाल: शिकायतें सुनने और जाँच करने वाली संस्थाएँ, जैसे भारत का राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (1993 में बना)।
- भेदभाव-विरोधी और समानता क़ानून: नौकरी, आवास और सेवाओं में।
- अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ: संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद, देशों की रिपोर्ट जाँचने वाली संधि समितियाँ, और क्षेत्रीय मानव अधिकार न्यायालय। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय सबसे गंभीर अपराधों के लिए व्यक्तियों पर मुक़दमा चलाता है।
- नागरिक समाज: NGO, पत्रकार, वकील और आम नागरिक जो उल्लंघन की सूचना देते हैं और बदलाव के लिए अभियान चलाते हैं।
सीमाएँ, टकराव और कर्तव्य
ज़्यादातर अधिकार पूर्ण (absolute) नहीं हैं। राज्य किसी अधिकार को तभी सीमित कर सकता है जब सीमा:
- क़ानून में लिखी हो,
- उचित उद्देश्य के लिए हो (दूसरों के अधिकार, सार्वजनिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, व्यवस्था), और
- ज़रूरी और आनुपातिक हो: ज़रूरत से ज़्यादा नहीं।
उदाहरण: बोलने की आज़ादी किसी समूह के विरुद्ध हिंसा भड़काने वाली बात को नहीं बचाती। कुछ अधिकार पूर्ण हैं और कभी सीमित नहीं होते, जैसे यातना और दासता से मुक्ति।
अधिकार आपस में टकरा भी सकते हैं: निजता बनाम स्वतंत्र प्रेस, या धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता। न्यायालय हर मामले में तौलते हैं। हर अधिकार के साथ दूसरों के वही अधिकार मानने का कर्तव्य आता है।
आज के उल्लंघन और चुनौतियाँ
कई जगह आज भी मानव अधिकार टूटते हैं। आम समस्याएँ:
- बाल श्रम और मानव तस्करी; बँधुआ मज़दूरी।
- लिंग, जाति, नस्ल, धर्म या विकलांगता के आधार पर भेदभाव।
- यातना, बिना सुनवाई हिरासत, और पत्रकारों पर हमले।
- ग़रीबी, भूख, और साफ़ पानी, इलाज या स्कूल की कमी।
- मूलनिवासी लोगों की ज़मीन, भाषा और संस्कृति का खोना।
- युद्ध से भागते शरणार्थी, और ऑनलाइन निजता व निगरानी जैसे नए मुद्दे।
अधिकारों के रास्ते की बाधाएँ: ग़रीबी, जानकारी की कमी, कमज़ोर संस्थाएँ, धीमे न्यायालय और सामाजिक पूर्वाग्रह। समाधान: शिक्षा, मज़बूत और स्वतंत्र संस्थाएँ, न्यायपूर्ण क़ानून और जागरूक नागरिक।
करके देखें: अधिकार जाँच
अपने स्कूल या मोहल्ले में घूमिए। तीन चीज़ें लिखिए जो लोगों को कोई अधिकार पाने में मदद करती हैं (व्हीलचेयर के लिए रैंप, मुफ़्त पुस्तकालय, शिकायत पेटी)। एक चीज़ लिखिए जो इसे कठिन बनाती है। हर एक किस अधिकार परिवार की है? फिर 3D फ़्री-प्ले की पाँच स्थितियों से अपने उत्तर जाँचिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य शब्द: सार्वभौमिक = हर जगह, हर किसी के लिए
- मुख्य शब्द: अविच्छेद्य = उचित क़ानूनी कारण के बिना छीना नहीं जा सकता
- मुख्य शब्द: UDHR (1948) = मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 30 अनुच्छेद
- उचित सीमा की जाँच: क़ानून में लिखी + उचित उद्देश्य + ज़रूरी और आनुपातिक
हल किए गए उदाहरण
1. वर्गीकृत करें: (क) वोट का अधिकार, (ख) शिक्षा का अधिकार, (ग) स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार।
(क) नागरिक और राजनीतिक। (ख) आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक। (ग) सामूहिक अधिकार।
2. किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार कर महीनों तक जेल में रखा गया, न आरोप बताया गया, न न्यायाधीश के सामने लाया गया। कौन से अधिकार टूटे?
स्वतंत्रता का अधिकार और निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार (आरोप जानना और स्वतंत्र अदालत में सुनवाई)। ये नागरिक-राजनीतिक अधिकार हैं।
3. UDHR शुरू में संधि नहीं थी, फिर भी "सार्वभौमिक" क्यों कहलाती है?
इसने सब देशों के सब लोगों के लिए एक साझा मानक बनाया। इसके कई विचार बाद में संधियों और संविधानों से बाध्यकारी बने।
4. अचानक हिंसा के गंभीर ख़तरे के कारण शहर एक जुलूस रोकता है और अगले हफ़्ते अनुमति देता है। क्या यह उचित सीमा है?
हो सकती है: सीमा क़ानून से है, उद्देश्य सार्वजनिक सुरक्षा है, और यह अस्थायी व आनुपातिक है, इसलिए सभा का अधिकार ख़त्म नहीं होता।
आम गलतियाँ
- सोचना कि मानव अधिकार केवल नागरिकों के हैं। ये हर मनुष्य के हैं, शरणार्थी और विदेशी भी।
- कहना कि हर अधिकार पूर्ण है। ज़्यादातर उचित क़ानून से सीमित हो सकते हैं; केवल कुछ (जैसे यातना से मुक्ति) पूर्ण हैं।
- UDHR (1948 की घोषणा) को बाद की बाध्यकारी संधियों, जैसे 1966 की प्रसंविदाओं, से मिला देना।
- कर्तव्य भूलना: अपने अधिकार माँगना पर दूसरों के वही अधिकार अनदेखे करना।