National Year 13 Law
अध्याय: 3
1. 3.3 Tort
Rules and theory of tort · Negligence · Occupiers' liability · Nuisance and dangerous escapes · Vicarious liability, defences and remedies
- अपकृत्य विधि: लापरवाही, उपद्रव और दायित्व – अपकृत्य (tort) एक दीवानी गलती है, जिसमें किसी का काम या लापरवाही दूसरे को नुकसान पहुँचाती है और दोनों के बीच कोई अनुबंध नहीं होता। पीड़ित (वादी) गलती करने वाले (प्रतिवादी) पर उपचार के लिए दावा कर सकता है, आम तौर पर पैसा जिसे हर्जाना कहते हैं। मुख्य अपकृत्य हैं: लापरवाही (कर्तव्य, उल्लंघन, कारण-संबंध और नुकसान चाहिए), अधिभोगी दायित्व, उपद्रव और ख़तरनाक रिसाव। नियोक्ता अपने कर्मचारियों के अपकृत्य के लिए भी ज़िम्मेदार हो सकता है (प्रतिनिधिक दायित्व)। अंशदायी लापरवाही और सहमति जैसे बचाव दायित्व घटा या खत्म कर सकते हैं।
2. 3.4 Law of contract (Paper 3 option - choose contract OR human rights)
Rules and theory of contract · Formation of a contract · Contract terms · Vitiating factors · Discharge and remedies
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3. 3.5 Human rights (Paper 3 option)
Human rights law and theory · Key Convention rights · Restrictions, enforcement and reform
- अधिकार: हमारी गरिमा की रक्षा करने वाले दावे – अधिकार एक उचित दावा है: समाज इसे गरिमा के जीवन के लिए ज़रूरी मानता है और दूसरों को इसका सम्मान करना होता है। हर इच्छा अधिकार नहीं। पुराने विचारकों ने प्रकृति या ईश्वर से मिले प्राकृतिक अधिकारों (जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति) की बात की; आज हम मानवाधिकारों की बात करते हैं जो हर व्यक्ति के पास केवल इंसान होने से हैं, गरिमा के आधार पर। संविधान और कानूनों में लिखे जाने पर अधिकार कानूनी अधिकार बनते हैं जिनकी रक्षा अदालतें करती हैं; वे राज्य को सीमित करते हैं और उससे काम भी माँगते हैं, जैसे शिक्षा देना। अधिकार कई प्रकार के हैं: राजनीतिक-नागरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक। अधिकारों के साथ ज़िम्मेदारियाँ आती हैं: दूसरों के अधिकारों का सम्मान, साझा चीज़ों की रक्षा, टकराव में संतुलन, और सरकार द्वारा अधिकारों में अनुचित कटौती पर सजगता।
- मानव अधिकार: अर्थ, इतिहास, प्रकार और संरक्षण – मानव अधिकार वे मूल स्वतंत्रताएँ और सुरक्षाएँ हैं जो हर व्यक्ति को मनुष्य होने के कारण मिलती हैं। ये सार्वभौमिक, अविच्छेद्य, अविभाज्य और गरिमा पर आधारित हैं। मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948) ने सबके लिए एक साझा मानक बनाया, जिसे बाद में संधियों से बाध्यकारी बनाया गया। संविधान, न्यायालय, आयोग, संयुक्त राष्ट्र और नागरिक समाज इनकी रक्षा करते हैं, और केवल दूसरों की रक्षा के लिए बने उचित क़ानून ही इन्हें सीमित कर सकते हैं।