South 고등학교 2학년 East Asian History Journey
अध्याय: 4
1. Setting out on an East Asian history journey
Inquiry through history travel · Nomadic and farming worlds
- ऐतिहासिक चिंतन: इतिहासकार कैसे काम करते हैं – इतिहास साक्ष्य के सहारे अतीत का अध्ययन है। घटनाओं को समय-रेखा पर क्रम से रखिए और उनके संदर्भ में पढ़िए। प्राथमिक स्रोत (उसी समय बने) और द्वितीयक स्रोत (बाद में बने) दोनों का उपयोग कीजिए। हर स्रोत को परखिए: किसने, कब, क्यों बनाया और क्या छूट गया। घटनाओं के कई कारण होते हैं: धीमे दीर्घकालिक कारण और एक तात्कालिक कारण। परिवर्तन और निरंतरता दोनों देखिए, महत्व तय कीजिए और साक्ष्य के साथ तर्क दीजिए।
- पूर्वी एशिया का इतिहास: चीन, कोरिया और जापान ने एक-दूसरे को कैसे बदला – पूर्वी एशिया (चीन, कोरिया, जापान, मंगोलिया और वियतनाम जैसे पास के इलाक़े) का इतिहास आपस में जुड़ा है। स्टेपी के पशुपालक और नदी मैदानों के किसान मिले भी और लड़े भी। शुरुआती राज्य साम्राज्य बने। नज़राना व्यवस्था, चीनी लिपि, कन्फ़्यूशियस के विचार, बौद्ध धर्म और क़ानून संहिताओं ने पूरे क्षेत्र को जोड़ा। व्यापार, मंगोल विजय और 1590–1640 के युद्धों ने इसे बदला, फिर छिंग, जोसॉन और एदो का दौर आया।
2. Sites of exchange and conflict
Exchange between regions · Religion and thought · Mongol expansion and 17th-century order · Islamic and European traders
- पूर्वी एशिया का इतिहास: चीन, कोरिया और जापान ने एक-दूसरे को कैसे बदला – पूर्वी एशिया (चीन, कोरिया, जापान, मंगोलिया और वियतनाम जैसे पास के इलाक़े) का इतिहास आपस में जुड़ा है। स्टेपी के पशुपालक और नदी मैदानों के किसान मिले भी और लड़े भी। शुरुआती राज्य साम्राज्य बने। नज़राना व्यवस्था, चीनी लिपि, कन्फ़्यूशियस के विचार, बौद्ध धर्म और क़ानून संहिताओं ने पूरे क्षेत्र को जोड़ा। व्यापार, मंगोल विजय और 1590–1640 के युद्धों ने इसे बदला, फिर छिंग, जोसॉन और एदो का दौर आया।
- दुनिया के व्यापार नेटवर्क, लगभग 1200–1450 – लगभग 1200 से 1450 के बीच तीन बड़े नेटवर्क अफ़्रीका, एशिया और यूरोप को जोड़ते थे: ज़मीन पर रेशम मार्ग, समुद्र में हिंद महासागर के रास्ते, और रेगिस्तान में सहारा पार के ऊँट-मार्ग। व्यापार इसलिए बढ़ा क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों के पास अलग चीज़ें थीं, नई तकनीक ने सफ़र सुरक्षित और सस्ता किया, और ताक़तवर राज्यों (चीन के सोंग और मिंग, मंगोल साम्राज्य, माली, स्वाहिली शहर-राज्य और मुस्लिम सल्तनतें) ने व्यापारियों की रक्षा की। इन रास्तों पर रेशम, मसाले, सोना और नमक ही नहीं, धर्म, तकनीक, फ़सलें और बीमारी भी चलीं। साथ ही पूर्वी एशिया, इस्लामी दुनिया, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ़्रीका, यूरोप और अमेरिका में राज्य अपने-अपने ढंग से बढ़े।
3. Sites of invasion and resistance
Imperialist expansion · Asia-Pacific War and resistance · Impact of war on people
- साम्राज्यवाद: साम्राज्य क्यों फैले और लोगों ने कैसे विरोध किया – साम्राज्यवाद तब होता है जब एक ताक़तवर राज्य युद्ध, संधि या पैसे से दूसरी भूमि और लोगों पर नियंत्रण कर लेता है। उपनिवेशवाद इसका एक रूप है: उपनिवेश पर सीधा शासन। लगभग 1870 से 1914 तक ('नव साम्राज्यवाद') औद्योगिक देशों में अफ़्रीका, एशिया और प्रशांत में उपनिवेशों की होड़ लगी। उन्हें कच्चा माल, बाज़ार, पूँजी लगाने की जगह, बंदरगाह और रुतबा चाहिए था, और इसे नस्लवादी विचारों से सही ठहराया गया। नियंत्रण व्यापार चौकी से असमान संधि और फिर पूरे उपनिवेश तक बढ़ा। उपनिवेशों का धन बाहर गया: कच्चा माल सस्ते में गया, मशीनी माल लौटा, स्थानीय उद्योग गिरे। लोगों ने विद्रोह, सुधार और जन आंदोलनों से विरोध किया, और 1970 के दशक तक ज़्यादातर उपनिवेश स्वतंत्र हो गए। पीछे छूटी सीमाएँ और असमानता आज भी दुनिया को प्रभावित करती हैं।
- दोनों विश्व युद्ध: कारण, नुक़सान और नई विश्व व्यवस्था – प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) सैन्यवाद, गुटबंदी, साम्राज्यवादी होड़ और राष्ट्रवाद से पैदा हुआ, और 1914 की एक हत्या ने चिंगारी लगाई। उसकी शांति संधि, महामंदी और तानाशाहों के उदय से द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) हुआ। दोनों संपूर्ण युद्ध थे, जिनमें पूरी अर्थव्यवस्था और नई तकनीक लगी। दूसरे युद्ध में लगभग चार गुना लोग मरे, आधे से ज़्यादा आम नागरिक, जिनमें होलोकॉस्ट में मारे गए साठ लाख यहूदी भी हैं। पहले युद्ध के बाद राष्ट्र संघ असफल रहा; दूसरे के बाद संयुक्त राष्ट्र, मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948) और उपनिवेशों की आज़ादी ने दुनिया बदल दी।
- मानव अधिकार: अर्थ, इतिहास, प्रकार और संरक्षण – मानव अधिकार वे मूल स्वतंत्रताएँ और सुरक्षाएँ हैं जो हर व्यक्ति को मनुष्य होने के कारण मिलती हैं। ये सार्वभौमिक, अविच्छेद्य, अविभाज्य और गरिमा पर आधारित हैं। मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948) ने सबके लिए एक साझा मानक बनाया, जिसे बाद में संधियों से बाध्यकारी बनाया गया। संविधान, न्यायालय, आयोग, संयुक्त राष्ट्र और नागरिक समाज इनकी रक्षा करते हैं, और केवल दूसरों की रक्षा के लिए बने उचित क़ानून ही इन्हें सीमित कर सकते हैं।
4. Sites of peace and coexistence
Cold War in East Asia · Economic and pop-culture exchange · Historical disputes and new cooperation
- शीत युद्ध (1945–1991) – शीत युद्ध (1945–1991) दो महाशक्तियों के बीच लंबी होड़ थी: पश्चिमी साथियों के साथ अमेरिका (पूँजीवाद, बहुदलीय चुनाव) और पूर्वी साथियों के साथ सोवियत संघ (साम्यवाद, एक दल का शासन)। दोनों आपस में सीधे कभी नहीं लड़े। उन्होंने विरोधी गुट बनाए (नाटो, वारसा संधि), परमाणु हथियार और अंतरिक्ष की होड़ की, छद्म युद्धों में उलटे पक्षों का साथ दिया (कोरिया, वियतनाम, अफ़ग़ानिस्तान) और 1962 में क्यूबा में परमाणु युद्ध के करीब पहुँचे। भारत जैसे कई नए देश गुटनिरपेक्ष रहे। 1970 के दशक में तनाव-शैथिल्य आया। सोवियत सुधार, बर्लिन दीवार का गिरना (1989) और सोवियत संघ का विघटन (1991) इसका अंत बने।
- वैश्वीकरण और वैश्विक शासन – वैश्वीकरण यानी सामान, पूँजी, सूचना और श्रम के प्रवाह का बढ़ना, जो जगहों को आपस में जोड़ता है। तकनीक, परिवहन और व्यापार समझौते इसे चलाते हैं। प्रवाह असमान हैं: अमीर देशों के पास ज़्यादा ताक़त है, ग़रीब देशों की बाज़ार तक पहुँच कमज़ोर है। TNC एक ही चीज़ को कई जगह बनवाती हैं। UN, WTO, IMF और विश्व बैंक जैसी संस्थाएँ इन प्रवाहों को संभालने की कोशिश करती हैं, और संधियाँ अंटार्कटिका जैसे साझा क्षेत्रों को बचाती हैं। वैश्वीकरण विकास और सस्ता सामान लाता है, पर असमानता, टकराव और पर्यावरण का नुक़सान भी।
- शांति शिक्षा: लोग स्थायी शांति कैसे बनाते हैं – शांति का मतलब सिर्फ़ 'युद्ध नहीं' नहीं है। नकारात्मक शांति = लड़ाई नहीं। सकारात्मक शांति = सबके लिए न्याय, भरोसा और अच्छा जीवन। हिंसा तीन तरह की होती है: प्रत्यक्ष (मारना, युद्ध), संरचनात्मक (अन्यायी नियम जो लोगों को गरीब रखें) और सांस्कृतिक (ऐसे विचार जो नुकसान को सामान्य दिखाएँ)। विचारकों ने रास्ते दिए: मोज़ी ने सबसे बराबर प्रेम और हमलावर युद्ध का विरोध सिखाया; कांट ने कहा न्यायपूर्ण सरकारें, आज़ाद देशों का संघ और मेहमानों से अच्छा बर्ताव शांति को स्थायी बनाते हैं; गांधी ने अहिंसक विरोध दिखाया। टकराव क़दम-दर-क़दम सुलझता है: शांत हों, सुनें, ज़रूरत खोजें, उपाय सोचें, समझौता करें। बँटवारे या युद्ध के बाद मेल-मिलाप पुल की तरह बनता है: बातचीत, सच, माफ़ी, व्यापार, परिवार मिलन और साझा काम। जर्मनी (1990) और दक्षिण अफ़्रीका का सत्य आयोग इसके उदाहरण हैं; कोरियाई प्रायद्वीप जैसे बँटे लोग आज भी शांतिपूर्ण एकीकरण पर चर्चा करते हैं।