विधिक सहायता क्या है और क्यों ज़रूरी है?
विधिक सहायता (legal aid) यानी मुफ़्त कानूनी मदद: सलाह, काग़ज़ लिखना, और अदालत में वकील, उनके लिए जो पैसे नहीं दे सकते। इसके बिना सिर्फ़ अमीर ही अदालत का इस्तेमाल कर पाते।
सोच है समान न्याय: कानून सबके लिए एक है, तो सब उस तक पहुँच भी सकें। यह सामाजिक न्याय का हिस्सा है, यानी समाज के कमज़ोर वर्गों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार।
विधिक सहायता का छोटा इतिहास
- पुराना समय: मदद दान के रूप में मिलती थी, दयालु वकीलों या धार्मिक संस्थाओं से। सब कुछ सद्भावना पर टिका था।
- 20वीं सदी: कई देशों (जैसे 1949 में UK) ने इसे राज्य के पैसे से चलने वाली सरकारी सेवा बनाया।
- भारत, 1950–1970: समितियों और जजों (जैसे न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती, न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर) ने राज्य द्वारा सहायता की माँग की।
- 1976: संविधान में अनुच्छेद 39A जुड़ा: राज्य मुफ़्त विधिक सहायता दे ताकि ग़रीबी के कारण कोई न्याय से वंचित न रहे।
- 1980: राष्ट्रीय समिति ने विधिक सहायता शिविर और लोक अदालतें शुरू कीं।
- 1987: विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम पास हुआ। यह 1995 में लागू हुआ और NALSA ने काम शुरू किया।
फ़ौजदारी मामलों में मुफ़्त विधिक सहायता
फ़ौजदारी मामले में व्यक्ति की आज़ादी छिन सकती है। इसलिए यहाँ सबसे मज़बूत सुरक्षा है।
- भारत की अदालतों ने कहा है कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21) में निष्पक्ष सुनवाई शामिल है, और निष्पक्ष सुनवाई के लिए वकील चाहिए।
- अगर आरोपी वकील नहीं रख सकता, तो अदालत को राज्य के ख़र्च पर वकील देना होगा, और आरोपी को इस अधिकार के बारे में बताना भी होगा।
- दंड प्रक्रिया कानून के अनुसार सत्र न्यायालय की सुनवाई में ग़रीब आरोपी को राज्य के ख़र्च पर वकील मिलता है।
दूसरे देशों में भी ऐसा नियम है। जैसे USA में गंभीर फ़ौजदारी मामलों में ग़रीब आरोपी को वकील मिलता है (पब्लिक डिफ़ेंडर)।
विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 और NALSA
इस कानून ने संस्थाओं की सीढ़ी बनाई:
- NALSA (राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण): नीति बनाता है और पैसा देता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश इसके मुख्य संरक्षक हैं।
- राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण
- ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण
- तालुका विधिक सेवा समिति
मुफ़्त सहायता कौन ले सकता है (धारा 12)
- महिलाएँ और बच्चे
- अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्य
- दिव्यांग व्यक्ति
- मानव तस्करी, आपदा, जातीय हिंसा या अत्याचार के पीड़ित
- औद्योगिक मज़दूर
- हिरासत में रहने वाले (जेल, सुरक्षा गृह)
- जिनकी सालाना आय सरकार की तय सीमा से कम है
लोक अदालत
लोक अदालत दोनों पक्षों को समझौते तक पहुँचाती है। कोई अदालत फ़ीस नहीं (पहले दी गई फ़ीस लौटा दी जाती है), फ़ैसला अंतिम है, उसके ख़िलाफ़ अपील नहीं। इससे लंबित मामलों का ढेर घटता है।
खुद करो
छठे कदम में पात्रता जाँचने वाला बटन इस्तेमाल करो। फिर अपने नज़दीकी ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण का पता लगाओ (ज़्यादातर की हेल्पलाइन है, और NALSA की राष्ट्रीय हेल्पलाइन 15100 है)। वहाँ मिलने वाली दो तरह की मदद लिखो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- विधिक सहायता = जो फ़ीस नहीं दे सकते उन्हें मुफ़्त सलाह और वकील
- अनुच्छेद 39A = राज्य मुफ़्त विधिक सहायता और समान न्याय दे
- अनुच्छेद 21 = जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार; इसमें वकील के साथ निष्पक्ष सुनवाई शामिल
- NALSA = राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (1987 के कानून से बना)
- लोक अदालत = समझौते से मामले सुलझाने वाली अदालत; फ़ीस नहीं, अपील नहीं
- संस्थाओं का क्रम: राष्ट्रीय → राज्य → ज़िला → तालुका
हल किए गए उदाहरण
1. रमेश गिरफ़्तार है और वकील नहीं रख सकता। मजिस्ट्रेट उसे मुफ़्त सहायता के बारे में बताए बिना सुनवाई शुरू कर देता है। क्या यह सही है?
नहीं। अदालत को बताना होगा कि उसे मुफ़्त वकील मिल सकता है, और वकील देना होगा। इसके बिना सुनवाई अनुच्छेद 21 के अनुसार अनुचित है।
2. अच्छी तनख़्वाह वाली एक महिला संपत्ति विवाद में मुफ़्त सहायता चाहती है। क्या वह पात्र है?
हाँ। 1987 के कानून की धारा 12 के अनुसार महिलाएँ आय चाहे जो हो, पात्र हैं।
3. दो पड़ोसी लोक अदालत में सीमा विवाद सुलझाते हैं। बाद में एक अपील करना चाहता है। क्या कर सकता है?
नहीं। लोक अदालत का फ़ैसला अंतिम और बाध्यकारी है; उसके ख़िलाफ़ अपील नहीं होती।
4. क्रम लगाओ: अनुच्छेद 39A, विधिक सेवा कानून पास, कानून लागू।
1976 अनुच्छेद 39A → 1987 कानून पास → 1995 कानून लागू।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि विधिक सहायता सिर्फ़ फ़ौजदारी मामलों के लिए है। दीवानी, परिवार और मज़दूरी के मामले भी शामिल हैं।
- यह सोचना कि सिर्फ़ बहुत ग़रीब लोग पात्र हैं। महिलाएँ, बच्चे, SC/ST और कुछ अन्य आय से परे पात्र हैं।
- यह सोचना कि लोक अदालत के फ़ैसले पर अपील हो सकती है। वह अंतिम है।
- 1987 (कानून पास) और 1995 (कानून लागू) को आपस में मिला देना।