विकास को लेकर राजनीतिक मुक़ाबला
विकास का अर्थ है लोगों का बेहतर जीवन: ज़्यादा आय, भोजन, स्कूल, स्वास्थ्य और न्याय। 1950 के दशक में 'विकास' को अक्सर पश्चिम जैसा आधुनिक बनना माना जाता था, पर रास्ते पर मतभेद थे।
दो मॉडल
- पूँजीवादी (बाज़ार) मॉडल: निजी व्यापार तय करते हैं, जैसे अमेरिका।
- समाजवादी (राज्य-नीत) मॉडल: सरकार मालिक होती है और योजना बनाती है, जैसे सोवियत संघ।
भारत का चुनाव: मिश्रित अर्थव्यवस्था में नियोजन
लगभग सभी, यहाँ तक कि उद्योगपति भी, मानते थे कि सरकार योजना बनाए। 1944 में बड़े उद्योगपतियों ने बॉम्बे प्लान दिया, जिसमें सरकार से उद्योगों में निवेश की माँग थी। भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था चुनी: सार्वजनिक और निजी क्षेत्र साथ-साथ।
मुख्य बहसें
- कृषि बनाम उद्योग: पहले पैसा खेतों में जाए या कारख़ानों में?
- सार्वजनिक बनाम निजी क्षेत्र: वामपंथी आलोचक कहते थे योजना से बड़े व्यापारियों को फ़ायदा हुआ; दक्षिणपंथी कहते थे ज़्यादा सरकारी नियंत्रण से वृद्धि धीमी हुई।
- बड़ा बनाम छोटा: जे.सी. कुमारप्पा जैसे गांधीवादी विचारक ग्रामोद्योग और गाँवों पर ध्यान चाहते थे।
- विकास के फ़ैसले राजनीतिक होते हैं क्योंकि इनसे तय होता है किसे फ़ायदा और किसे नुक़सान; जैसे बाँध से गाँव उजड़ सकते हैं।
शुरुआती क़दम: योजना आयोग और पहली योजनाएँ
योजना आयोग (1950)
मार्च 1950 में एक साधारण सरकारी प्रस्ताव से बना (संविधान से नहीं)। अध्यक्ष प्रधानमंत्री थे। इसने पंचवर्षीय योजनाएँ बनाईं। 2015 में इसकी जगह नीति आयोग आया।
पहली पंचवर्षीय योजना (1951-56)
- युवा अर्थशास्त्री के.एन. राज की मदद से बनी।
- ज़ोर: कृषि, बाँध और सिंचाई (भाखड़ा नांगल), भूमि सुधार।
- विचार: शुरुआत धीमी, बचत बढ़ाना।
दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61)
- सांख्यिकीविद पी.सी. महालनोबिस के नेतृत्व में।
- ज़ोर: भारी उद्योग, इस्पात कारख़ाने, बिजली, मशीनें; सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी भूमिका।
- आयात पर कर लगाकर देशी उद्योग का संरक्षण। समस्या: विदेशी मुद्रा की कमी।
नतीजे
- नींव: बड़े बाँध, इस्पात कारख़ाने, सार्वजनिक उपक्रम और शोध संस्थान।
- भूमि सुधार: ज़मींदारी ख़त्म हुई, चकबंदी हुई; भूमि हदबंदी ज़्यादातर नाकाम रही क्योंकि ज़मींदार ताक़तवर थे।
- अनाज संकट और हरित क्रांति: 1960 के दशक के मध्य के सूखे के बाद कुछ इलाक़ों में अधिक उपज वाले बीज, खाद और सिंचाई आई। उपज बढ़ी, पर अमीर किसानों और कुछ इलाक़ों को ज़्यादा फ़ायदा हुआ; किसान एक मज़बूत राजनीतिक ताक़त बने।
- बाद का बदलाव: 1991 से भारत ज़्यादा निजी उद्यम की ओर बढ़ा (उदारीकरण)।
- केरल मॉडल: शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि सुधार और जन-नियोजन पर ज़ोर।
करके देखें
3D स्लाइडर से पैसा उद्योग और कृषि में बाँटिए। अनुमान लगाइए कि 80% उद्योग पर क्या होगा, फिर कैप्शन पढ़िए। घर पर पूछिए: क्या आपके गाँव या खेत को किसी बाँध, नहर या नए बीज से फ़ायदा हुआ?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- विकास = वृद्धि + सामाजिक न्याय
- मिश्रित अर्थव्यवस्था = सार्वजनिक क्षेत्र + निजी क्षेत्र
- बॉम्बे प्लान 1944 (उद्योगपति) → सरकार निवेश करे
- योजना आयोग: मार्च 1950, अध्यक्ष प्रधानमंत्री; 2015 में नीति आयोग
- पहली योजना 1951-56: कृषि (के.एन. राज)
- दूसरी योजना 1956-61: भारी उद्योग (पी.सी. महालनोबिस)
- हरित क्रांति: 1960 के दशक के मध्य, अधिक उपज वाले बीज
हल किए गए उदाहरण
1. पहली योजना ने कृषि पर ध्यान क्यों दिया?
विभाजन से खेती को बड़ा धक्का लगा था और अनाज की कमी थी। ज़्यादा अनाज उगाना और सिंचाई बनाना सबसे पहली ज़रूरत थी।
2. कृषि और उद्योग के बीच चुनाव राजनीतिक क्यों है?
इससे तय होता है कि पहले किसके हित पूरे होंगे: किसान और गाँव या उद्योग और शहर। अलग-अलग समूह और दल अपनी-अपनी तरफ़ से तर्क देते हैं।
3. हरित क्रांति का एक अच्छा और एक बुरा असर बताइए।
अच्छा: अनाज उत्पादन बढ़ा और आयात पर निर्भरता घटी। बुरा: अमीर किसानों और पंजाब जैसे इलाक़ों को ज़्यादा फ़ायदा हुआ, खाई बढ़ी।
आम गलतियाँ
- कहना कि योजना आयोग संविधान से बना। यह सरकारी प्रस्ताव से बना था।
- योजनाओं को मिला देना: पहली कृषि की (के.एन. राज), दूसरी उद्योग की (महालनोबिस)।
- यह मानना कि भारत ने सोवियत संघ की पूरी नक़ल की। भारत ने निजी क्षेत्र वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था चुनी।
- यह मानना कि भूमि सुधार पूरी तरह सफल रहे। ज़मींदारी ख़त्म हुई, पर हदबंदी ज़्यादातर नाकाम रही।