लोकतंत्र को कैसे परखें?
लोकतंत्र दूसरी व्यवस्थाओं से बेहतर है क्योंकि यह बराबरी बढ़ाता है, फ़ैसलों की गुणवत्ता सुधारता है, झगड़े सुलझाने का रास्ता देता है और ग़लतियाँ सुधारने देता है। पर इसे इसके परिणामों से परखना चाहिए: असल में यह क्या देता है।
लोकतंत्र जादू नहीं है। यह हालात बनाता है और नागरिकों को उनका फ़ायदा उठाना होता है। इसलिए इसकी तुलना किसी आदर्श सपने से नहीं, वाजिब उम्मीदों से करें।
जवाबदेह, उत्तरदायी और वैध सरकार
- जवाबदेह: सरकार जनता को जवाब देती है। नागरिक वोट से उसे हटा सकते हैं।
- पारदर्शी: नागरिक जान सकते हैं कि फ़ैसला कैसे और क्यों हुआ, जैसे सूचना के अधिकार (RTI) से।
- उत्तरदायी: जनता की ज़रूरतें सुनती है। लोकतंत्र इसमें हमेशा अच्छा नहीं, पर गैर-लोकतंत्र से बेहतर है।
- वैध: जनता की अपनी चुनी सरकार। धीमी हो, फिर भी स्वीकार्य।
लोकतंत्र में बहस और मोलभाव से फ़ैसले देर से होते हैं, पर ज़्यादा स्वीकार्य और असरदार होते हैं। यहाँ नियमित, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, खुली बहस और सूचना का अधिकार होता है।
आर्थिक वृद्धि और विकास
लगभग 1950 से 2000 के आँकड़ों में तानाशाही देशों की औसत आर्थिक वृद्धि दर (लगभग 4.4%) लोकतंत्रों (लगभग 3.9%) से थोड़ी ज़्यादा रही। अंतर छोटा है।
वृद्धि कई बातों पर निर्भर है: आबादी, दुनिया की आर्थिक हालत, दूसरे देशों से सहयोग और देश की प्राथमिकताएँ। इसलिए अकेला लोकतंत्र वृद्धि की गारंटी नहीं। फिर भी इसके कई अच्छे नतीजे हैं, इसलिए यह बेहतर है।
असमानता और गरीबी
लोकतंत्र राजनीतिक बराबरी पर टिका है: हर वोट का वज़न बराबर। पर आर्थिक असमानता बहुत है। कई देशों में सबसे अमीर 20% लोगों के पास आमदनी का बड़ा हिस्सा है और सबसे गरीबों के पास बहुत कम। गरीब मतदाताओं का बड़ा हिस्सा हैं, फिर भी सरकारों ने गरीबी हटाने पर काफ़ी ध्यान नहीं दिया। यह असली कमज़ोरी है।
सामाजिक विविधता में सामंजस्य
लोकतंत्र समूहों की होड़ सँभालने के तरीके बनाता है, जिससे तनाव के हिंसा बनने का ख़तरा घटता है। कोई समाज टकराव पूरी तरह ख़त्म नहीं कर सकता, पर लोकतंत्र इसे सबसे अच्छे से सँभालता है।
दो शर्तें ज़रूरी हैं:
- लोकतंत्र सिर्फ़ बहुमत की राय का शासन नहीं। बहुमत को अल्पमत के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि सरकार सबकी बात रखे।
- बहुमत का शासन किसी एक धर्म, नस्ल या भाषा-समूह का शासन न बने। हर फ़ैसले या चुनाव में बहुमत बदल सके, ताकि हर किसी को मौका मिले।
नागरिकों की गरिमा और आज़ादी
इसमें लोकतंत्र किसी भी दूसरी शासन-व्यवस्था से बहुत आगे है। हर इंसान दूसरों से सम्मान चाहता है; लोकतंत्र इसे मानता है।
- महिलाएँ: सम्मान और बराबर व्यवहार के लिए महिलाओं के लंबे संघर्ष को लोकतंत्र से कानूनी और नैतिक समर्थन मिला।
- जाति: लोकतंत्र ने वंचित और भेदभाव झेलने वाली जातियों के बराबर दर्जे और अवसर के दावे को मज़बूत किया। भेदभाव अब भी होता है, पर उसे कानूनी या नैतिक समर्थन नहीं।
लोग लोकतंत्र की शिकायत करते हैं, यह भी उसकी सफलता है: लोग जागरूक हुए और ज़्यादा चाहते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- जवाबदेह सरकार: अपने कामों के लिए जनता को जवाब देती है।
- उत्तरदायी सरकार: जनता की ज़रूरतों और माँगों पर काम करती है।
- वैध सरकार: जनता की अपनी, सही मानी जाने वाली सरकार।
- पारदर्शिता: फ़ैसले कैसे हुए यह जाँचने का हक़ और साधन (जैसे RTI)।
- तानाशाही: बिना स्वतंत्र चुनाव के एक व्यक्ति या समूह का शासन।
- आर्थिक असमानता: लोगों की आमदनी और संपत्ति में बड़ा अंतर।
- रिपोर्ट कार्ड: जवाबदेही और गरिमा मज़बूत; वृद्धि बराबर; असमानता कमज़ोर।
हल किए गए उदाहरण
1. लोकतंत्र में फ़ैसले धीमे क्यों होते हैं? क्या यह बुरा है?
फ़ैसलों में बहस और सहमति चाहिए। वे धीमे, पर ज़्यादा स्वीकार्य और असरदार होते हैं, इसलिए यह ठीक क़ीमत है।
2. वृद्धि: लोकतंत्र लगभग 3.9%, तानाशाही लगभग 4.4%। अंतर कितना है?
4.4 − 3.9 = 0.5 प्रतिशत अंक: छोटा अंतर।
3. भारत में पारदर्शिता का एक उदाहरण दीजिए।
सूचना का अधिकार कानून से नागरिक सरकारी दफ़्तर से पूछ सकता है कि योजना का पैसा कैसे ख़र्च हुआ।
4. विविधता सँभालने के लिए बहुमत का बदलते रहना क्यों ज़रूरी है?
अगर एक ही समूह हमेशा बहुमत में रहे तो बाकी हमेशा बाहर रहेंगे और असुरक्षित महसूस करेंगे। बदलता बहुमत सबको मौका देता है।
5. लोकतंत्र में लोग बहुत शिकायत करते हैं। क्या लोकतंत्र असफल है?
नहीं। शिकायतें बताती हैं कि लोग जागरूक हैं और ज़्यादा चाहते हैं, यह ख़ुद लोकतंत्र की सफलता है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि लोकतंत्र तेज़ आर्थिक वृद्धि की गारंटी है। वृद्धि कई बातों पर निर्भर है।
- यह मानना कि बहुमत का शासन यानी एक समुदाय का हमेशा राज। लोकतंत्र में बदलता बहुमत चाहिए जिसमें सब हों।
- यह सोचना कि लोकतंत्र ने असमानता ख़त्म कर दी। राजनीतिक बराबरी है, पर आर्थिक असमानता बड़ी है।
- जनता की शिकायतों को असफलता का सबूत मानना। ये जागरूकता और आज़ादी की निशानी हैं।