राजनीतिक दल क्या है?
राजनीतिक दल ऐसे लोगों का समूह है जो चुनाव लड़ने और सरकार में सत्ता पाने के लिए साथ आते हैं। वे समाज के भले के लिए कुछ नीतियों और कार्यक्रमों पर सहमत होते हैं।
दल एक पक्ष की बात करता है, इसलिए यह पक्षधर होता है। इसके तीन हिस्से: नेता, सक्रिय सदस्य और अनुयायी (समर्थक)।
राजनीतिक दलों के कार्य
- चुनाव लड़ना: दल उम्मीदवार चुनते हैं। भारत में आम तौर पर बड़े नेता चुनते हैं।
- नीतियाँ और कार्यक्रम रखना: मतदाता अलग-अलग कार्यक्रमों में से चुनते हैं।
- कानून बनाना: विधायिका में सदस्य आम तौर पर दल के फ़ैसले मानते हैं।
- सरकार बनाना और चलाना: दल मंत्री चुनते हैं और सरकार चलाते हैं।
- विपक्ष की भूमिका: हारे हुए दल सरकार की आलोचना करते और उसे जवाबदेह रखते हैं।
- जनमत बनाना: दल मुद्दे उठाते और आंदोलन चलाते हैं।
- सरकारी योजनाओं तक पहुँच: स्थानीय कार्यकर्ता लोगों को योजनाओं से जोड़ते हैं।
दलों की ज़रूरत क्यों?
दल न हों तो हर उम्मीदवार निर्दलीय होगा। कोई बड़े नीतिगत बदलाव का वादा नहीं कर पाएगा और देश चलाने की ज़िम्मेदारी किसी की नहीं होगी। दल प्रतिनिधि लोकतंत्र को चलाते हैं।
दलीय व्यवस्थाएँ
- एकदलीय व्यवस्था: सिर्फ़ एक दल को सरकार चलाने की अनुमति (जैसे चीन)। यह लोकतांत्रिक विकल्प नहीं, क्योंकि मतदाता के पास दूसरा रास्ता नहीं।
- द्विदलीय व्यवस्था: सत्ता आम तौर पर दो बड़े दलों में बदलती है (अमेरिका, ब्रिटेन)।
- बहुदलीय व्यवस्था: कई दल होड़ करते हैं और दो से ज़्यादा के पास अकेले या गठबंधन में सत्ता का मौका होता है (भारत)।
जब कई दल मिलकर चुनाव लड़ें और सत्ता पाएँ, तो इसे गठबंधन या मोर्चा कहते हैं। कौन-सी व्यवस्था अच्छी है, यह समाज, इतिहास और चुनाव प्रणाली पर निर्भर है।
राष्ट्रीय और राज्य दल
भारत में हर दल को चुनाव आयोग में पंजीकरण कराना होता है। बड़े दलों को 'मान्यता' और अलग चुनाव चिह्न मिलता है।
- राज्य दल: राज्य विधानसभा चुनाव में कम से कम 6% वोट और कम से कम 2 सीटें (आम भाषा में क्षेत्रीय दल)।
- राष्ट्रीय दल: 4 राज्यों के लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कुल वोटों का कम से कम 6% और लोकसभा में कम से कम 4 सीटें।
1990 के दशक से राज्य दल बढ़े और गठबंधनों के ज़रिए केंद्र सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभाने लगे। इससे संघवाद और लोकतंत्र मज़बूत हुए।
राजनीतिक दलों की चुनौतियाँ
- अंदरूनी लोकतंत्र की कमी: ताकत एक या कुछ बड़े नेताओं के पास; सदस्यों से सलाह नहीं, दल के अंदर चुनाव कम।
- वंशवाद (परिवारवाद): बड़े पद नेताओं के परिवार वालों को।
- धन और बाहुबल: अमीरों या आपराधिक रिकॉर्ड वालों को टिकट, क्योंकि वे जीत सकते हैं।
- सार्थक विकल्प की कमी: बड़े दलों की सोच एक जैसी हो गई, मतदाता के पास असली विकल्प कम।
दलों में सुधार कैसे हों?
जो कदम उठाए गए
- दल-बदल विरोधी कानून: चुना हुआ विधायक या सांसद दल बदले तो सीट जा सकती है।
- उम्मीदवारों को संपत्ति और आपराधिक मामलों का शपथपत्र देना होता है।
- चुनाव आयोग ने दलों के लिए अंदरूनी चुनाव और आयकर रिटर्न ज़रूरी किया।
और सुझाव
- दलों के अंदरूनी कामकाज का कानून: सदस्यों का रजिस्टर और खुले चुनाव।
- महिलाओं को तय हिस्सा (जैसे एक-तिहाई) टिकट।
- चुनाव का सरकारी खर्च, जैसे दलों को ईंधन, कागज़, फ़ोन देना।
- जनता, मीडिया और आंदोलनों का दबाव; अच्छे नागरिकों का दलों से जुड़ना।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- राजनीतिक दल: चुनाव लड़ने और तय नीतियाँ लागू करने के लिए सत्ता चाहने वाला समूह।
- दल के तीन हिस्से: नेता, सक्रिय सदस्य, अनुयायी।
- दलीय व्यवस्थाएँ: एकदलीय, द्विदलीय, बहुदलीय।
- गठबंधन/मोर्चा: कई दलों का मिलकर चुनाव लड़ना और सरकार बनाना।
- राज्य दल: राज्य विधानसभा में 6% वोट + 2 सीटें।
- राष्ट्रीय दल: 4 राज्यों में 6% वोट + 4 लोकसभा सीटें।
- दल-बदल: चुने जाने के बाद दल बदलना; दल-बदल विरोधी कानून इसे रोकता है।
हल किए गए उदाहरण
1. चुनाव हारने वाला दल भी क्यों ज़रूरी है?
वह विपक्ष बनता है। सरकार से सवाल पूछता और आलोचना करता है, जिससे सरकार जवाबदेह रहती है।
2. एक दल को एक राज्य के विधानसभा चुनाव में 7% वोट और 3 सीटें मिलीं। उसे कौन-सा दर्जा मिल सकता है?
यह राज्य दल की शर्त (कम से कम 6% वोट और 2 सीटें) पूरी करता है, इसलिए राज्य दल बन सकता है।
3. दल A से चुना विधायक दल B में चला जाए तो दल-बदल कानून में क्या होगा?
उसकी विधानसभा सीट जा सकती है।
4. भारत में बहुदलीय व्यवस्था क्यों है?
भारत में बहुत सामाजिक और क्षेत्रीय विविधता है; कई समूहों को अपनी आवाज़ चाहिए, बहुदलीय व्यवस्था यह देती है।
5. शपथपत्र से मतदाता को क्या मदद मिलती है?
उम्मीदवार की संपत्ति और आपराधिक मामलों की जानकारी मिलती है, जिससे समझदारी से वोट दे सके।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि एकदलीय व्यवस्था लोकतांत्रिक हो सकती है। असली विकल्प न हो तो मतदाता की आज़ाद पसंद नहीं रहती।
- हर क्षेत्रीय दल को राष्ट्रीय दल कहना। दर्जा कई राज्यों में वोट और सीटों पर निर्भर है।
- यह मानना कि दल-बदल कानून ने सब ठीक कर दिया। दल-बदल घटा, पर दल के नेताओं की ताकत बढ़ी।
- विपक्ष को दलों का कार्य न मानना। हारे हुए दल भी अहम भूमिका निभाते हैं।