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जाति, धर्म और लैंगिक मसले

लिंग, धर्म और जाति के सामाजिक अंतर राजनीति में दिखते हैं। राजनीति अन्याय से लड़ने में मदद कर सकती है, जैसे महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें। पर जब धर्म या जाति से लोगों को बाँटा जाता है, जैसे सांप्रदायिकता में, तो लोकतंत्र को नुकसान होता है। हमारा संविधान राज्य को धर्मनिरपेक्ष बनाता है और भेदभाव रोकता है।

🎬 कदम-दर-कदम कहानी

  1. दो ढेर देखिए। समाज अक्सर कहता है कि घर का काम 'औरतों का काम' है। औरतें कई घंटे बिना वेतन का काम करती हैं, जिसे कोई गिनता नहीं। यह समाज की सोच है, प्रकृति की नहीं।
  2. खंभे बढ़ते देखिए। भारत में आधी आबादी महिलाएँ, पर लोकसभा में सिर्फ़ लगभग 14%। पंचायतों में एक-तिहाई सीटें आरक्षित हैं, इसलिए वहाँ बहुत ज़्यादा महिलाएँ नेता हैं।
  3. दो समूह अलग धर्म मानते हैं। राजनीति में अपनी ज़रूरतें उठाना ठीक है। पर सांप्रदायिकता कहती है कि एक धर्म श्रेष्ठ है। देखिए, यह लोगों के बीच दीवार खड़ी करती है।
  4. भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य है। कोई राजकीय धर्म नहीं। हर किसी को कोई भी धर्म मानने की आज़ादी है, और धर्म के कारण किसी से भेदभाव नहीं हो सकता।
  5. ऊपर-नीचे रखे ब्लॉक मिलते देखिए। पहले जाति जन्म से काम तय करती थी। शहर, स्कूल, नौकरी और कानूनों ने लोगों को मिलाया, पर असमानता पूरी तरह नहीं गई।
  6. अब आपकी बारी। स्लाइडर से बदलिए कि महिलाएँ कितनी सीटें जीतती हैं। ढूँढिए कब महिलाएँ एक-तिहाई हैं।

टिप: 3D दृश्य को घुमाने के लिए खींचें। ज़ूम के लिए दो उंगलियाँ इस्तेमाल करें।

🤔 आम शंकाएँ और उनके जवाब

क्या घर का काम असली काम नहीं है?

है, पर बिना वेतन और गिनती के, इसलिए कम महत्व का लगता है।

महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें क्यों चाहिए?

इनके बिना महिलाओं का हिस्सा बहुत कम रहता है; आरक्षण से पंचायतों में यह बहुत बढ़ा।

क्या राजनीति में धर्म की बात हमेशा बुरी है?

नहीं। नुकसान तब है जब एक धर्म को श्रेष्ठ और दूसरों का विरोधी माना जाए।

क्या धर्मनिरपेक्ष का मतलब धर्म-विरोधी है?

नहीं। राज्य सब धर्मों से बराबर व्यवहार करता है और उसका अपना धर्म नहीं।

क्या शहरों में जाति ख़त्म हो गई?

कमज़ोर हुई है, पर जाति में शादी और असमानता जारी हैं।

20 में से एक-तिहाई कितनी सीटें?

लगभग 7 (6.67)। स्लाइडर से आज़माइए।

लैंगिक मसले और राजनीति

सार्वजनिक और निजी का बँटवारा

लैंगिक श्रम-विभाजन यानी समाज घर और बच्चों का काम औरतों को और बाहर का वेतन वाला काम मर्दों को सौंपता है। यह प्राकृतिक नहीं, सामाजिक सोच है। औरतें खेतों और कारख़ानों में भी काम करती हैं, पर घर का काम बिना वेतन का और कम आँका जाता है।

इसलिए सार्वजनिक जीवन में औरतों की भूमिका कम रही। बराबर मताधिकार, शिक्षा और नौकरी के लिए आंदोलन हुए। जो मानते हैं कि औरत-मर्द को बराबर अधिकार और मौके मिलें, वे नारीवादी कहलाते हैं। नारीवादी आंदोलन परिवार और निजी जीवन में भी बराबरी चाहता है।

भारत में महिलाओं की मुश्किलें

महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व

2019 में लोकसभा में लगभग 14% महिलाएँ थीं। स्थानीय निकायों में एक-तिहाई सीटें आरक्षित हैं, इसलिए 10 लाख से ज़्यादा महिलाएँ चुनी गई प्रतिनिधि हैं। 2023 के महिला आरक्षण कानून से अगले परिसीमन के बाद लोकसभा और विधानसभाओं में भी एक-तिहाई सीटें आरक्षित होंगी।

धर्म, सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्ष राज्य

धर्म और राजनीति का मेल ठीक भी हो सकता है। गांधीजी कहते थे कि राजनीति सभी धर्मों के नैतिक मूल्यों से चले। महिला संगठन चाहते हैं कि पारिवारिक कानून औरतों के साथ न्याय करें। कोई धार्मिक समूह अपनी ज़रूरतें राजनीति में उठा सकता है, बशर्ते सबसे बराबर व्यवहार हो।

सांप्रदायिकता क्या है?

सांप्रदायिकता तब शुरू होती है जब एक धर्म को श्रेष्ठ माना जाए, एक धर्म के सब लोगों के हित एक जैसे माने जाएँ और उन्हें दूसरों के हितों के विरोधी समझा जाए। इसके रूप:

धर्मनिरपेक्ष राज्य

संविधान निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्ष राज्य चुना:

जाति और राजनीति

जाति व्यवस्था में एक जाति के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही काम करते, जाति में ही शादी करते और दूसरों के साथ खाना नहीं खाते थे। कुछ समूहों के साथ छुआछूत होती थी। जोतिबा फुले, गांधीजी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और पेरियार ने इसके ख़िलाफ़ काम किया।

शहरीकरण (लोगों का शहरों में जाना), साक्षरता, नौकरियों से जाति और काम का रिश्ता कमज़ोर हुआ। संविधान जातिगत भेदभाव पर रोक लगाता है। फिर भी ज़्यादातर शादियाँ जाति में ही होती हैं और औसतन 'ऊँची' जातियाँ शिक्षा और संपत्ति में आगे हैं।

राजनीति में जाति

पर चुनाव सिर्फ़ जाति पर नहीं टिके: किसी क्षेत्र में एक जाति का साफ़ बहुमत नहीं, कोई दल एक जाति के सारे वोट नहीं पाता, मतदाता अक्सर अपनी जाति के उम्मीदवार के ख़िलाफ़ भी वोट देते हैं और सरकार का काम देखते हैं। राजनीति भी जाति को बदलती है: जातियाँ मिलकर बड़े समूह बनाती हैं। सिर्फ़ जाति पर ध्यान गरीबी जैसे मुद्दों से भटकाता है और तनाव बढ़ा सकता है।

मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ

हल किए गए उदाहरण

1. लैंगिक श्रम-विभाजन को सामाजिक क्यों कहते हैं, प्राकृतिक क्यों नहीं?

मर्द खाना बना सकते हैं और औरतें बाहर कमा सकती हैं। कौन क्या करे, यह समाज की सोच और आदत तय करती है, शरीर नहीं।

2. पंचायतों में महिलाओं का हिस्सा लोकसभा से ज़्यादा क्यों है?

कानून से स्थानीय निकायों में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। लोकसभा में हाल तक ऐसा आरक्षण नहीं था।

3. एक नेता कहता है 'अपने धर्म की रक्षा के लिए मुझे वोट दो'। यह सांप्रदायिकता का कौन-सा रूप है?

धर्म के आधार पर राजनीतिक गोलबंदी: वोट के लिए धर्म का इस्तेमाल।

4. धर्मनिरपेक्ष होते हुए भी राज्य छुआछूत पर रोक क्यों लगा सकता है?

भारतीय धर्मनिरपेक्षता में सबकी बराबरी और गरिमा के लिए राज्य धार्मिक प्रथाओं में दख़ल दे सकता है।

5. कोई दल सिर्फ़ जाति के वोट से क्यों नहीं जीत सकता?

किसी क्षेत्र में एक जाति का साफ़ बहुमत नहीं होता और एक जाति के मतदाता बँटे होते हैं तथा काम भी देखते हैं।

आम गलतियाँ

अभ्यास क्विज़

1. औरत-मर्द के बराबर अधिकारों में विश्वास कहलाता है:
2. पंचायतों में महिलाओं के लिए कितनी सीटें आरक्षित हैं?
3. इनमें से कौन भारत के धर्मनिरपेक्ष राज्य की विशेषता नहीं है?
4. विभाजन के समय धार्मिक समूहों में हिंसा किसका उदाहरण है?
5. गाँवों से शहरों की ओर जाना कहलाता है:

अभ्यास: खुद जवाब दो

अपना जवाब लिखो या चुनो, फिर जाँचें दबाओ। अटको तो संकेत देखो; जवाब देने के बाद पूरा हल दिखेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सांप्रदायिकता आसान शब्दों में क्या है?

धर्म के नाम पर लोगों को बाँटना, एक धर्म को श्रेष्ठ और उसके मानने वालों को दूसरों का विरोधी बताना।

लैंगिक श्रम-विभाजन क्या है?

घर का काम औरतों को और बाहर का वेतन वाला काम मर्दों को देने की सामाजिक आदत।

क्या भारतीय राजनीति में जाति अब भी अहम है?

हाँ, दल जाति का ध्यान रखते हैं, पर चुनाव काम, नेता और मुद्दों से भी तय होते हैं।

यह कहाँ पढ़ाया जाता है

सीबीएसई (भारत)कक्षा 10राजनीति विज्ञान: लोकतांत्रिक राजनीति – II

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