लैंगिक मसले और राजनीति
सार्वजनिक और निजी का बँटवारा
लैंगिक श्रम-विभाजन यानी समाज घर और बच्चों का काम औरतों को और बाहर का वेतन वाला काम मर्दों को सौंपता है। यह प्राकृतिक नहीं, सामाजिक सोच है। औरतें खेतों और कारख़ानों में भी काम करती हैं, पर घर का काम बिना वेतन का और कम आँका जाता है।
इसलिए सार्वजनिक जीवन में औरतों की भूमिका कम रही। बराबर मताधिकार, शिक्षा और नौकरी के लिए आंदोलन हुए। जो मानते हैं कि औरत-मर्द को बराबर अधिकार और मौके मिलें, वे नारीवादी कहलाते हैं। नारीवादी आंदोलन परिवार और निजी जीवन में भी बराबरी चाहता है।
भारत में महिलाओं की मुश्किलें
- महिलाओं में साक्षरता पुरुषों से कम (पुरानी जनगणना में लगभग 54% बनाम 76%)।
- ऊँचे वेतन वाले पदों पर कम महिलाएँ; कानून बराबर वेतन कहता है, फिर भी कम वेतन।
- बेटे की चाह से कुछ इलाकों में बाल लिंग अनुपात (1000 लड़कों पर लड़कियाँ) गिरा।
- घर और बाहर हिंसा व उत्पीड़न। पितृसत्ता यानी ऐसी व्यवस्था जो पुरुषों को ज़्यादा महत्व और ताकत दे।
महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व
2019 में लोकसभा में लगभग 14% महिलाएँ थीं। स्थानीय निकायों में एक-तिहाई सीटें आरक्षित हैं, इसलिए 10 लाख से ज़्यादा महिलाएँ चुनी गई प्रतिनिधि हैं। 2023 के महिला आरक्षण कानून से अगले परिसीमन के बाद लोकसभा और विधानसभाओं में भी एक-तिहाई सीटें आरक्षित होंगी।
धर्म, सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्ष राज्य
धर्म और राजनीति का मेल ठीक भी हो सकता है। गांधीजी कहते थे कि राजनीति सभी धर्मों के नैतिक मूल्यों से चले। महिला संगठन चाहते हैं कि पारिवारिक कानून औरतों के साथ न्याय करें। कोई धार्मिक समूह अपनी ज़रूरतें राजनीति में उठा सकता है, बशर्ते सबसे बराबर व्यवहार हो।
सांप्रदायिकता क्या है?
सांप्रदायिकता तब शुरू होती है जब एक धर्म को श्रेष्ठ माना जाए, एक धर्म के सब लोगों के हित एक जैसे माने जाएँ और उन्हें दूसरों के हितों के विरोधी समझा जाए। इसके रूप:
- रोज़ की सोच: दूसरे धर्मों के बारे में पूर्वाग्रह और रूढ़ छवियाँ।
- अपने धार्मिक समुदाय का राजनीतिक दबदबा चाहना।
- धर्म के आधार पर राजनीतिक गोलबंदी: वोट के लिए धार्मिक प्रतीकों और नेताओं का इस्तेमाल।
- सांप्रदायिक हिंसा और दंगे, जैसे विभाजन के समय।
धर्मनिरपेक्ष राज्य
संविधान निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्ष राज्य चुना:
- भारतीय राज्य का कोई राजकीय धर्म नहीं।
- सबको कोई भी धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने या कोई धर्म न मानने की आज़ादी।
- धर्म के आधार पर भेदभाव पर रोक।
- बराबरी के लिए राज्य धार्मिक मामलों में दख़ल दे सकता है, जैसे छुआछूत पर रोक।
जाति और राजनीति
जाति व्यवस्था में एक जाति के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही काम करते, जाति में ही शादी करते और दूसरों के साथ खाना नहीं खाते थे। कुछ समूहों के साथ छुआछूत होती थी। जोतिबा फुले, गांधीजी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और पेरियार ने इसके ख़िलाफ़ काम किया।
शहरीकरण (लोगों का शहरों में जाना), साक्षरता, नौकरियों से जाति और काम का रिश्ता कमज़ोर हुआ। संविधान जातिगत भेदभाव पर रोक लगाता है। फिर भी ज़्यादातर शादियाँ जाति में ही होती हैं और औसतन 'ऊँची' जातियाँ शिक्षा और संपत्ति में आगे हैं।
राजनीति में जाति
- दल उम्मीदवार चुनते और सरकार बनाते समय जाति का ध्यान रखते हैं।
- दल समर्थन के लिए जातिगत भावनाएँ उभारते हैं।
- सबको वोट का अधिकार मिलने से पहले दबाई गई जातियों को ताकत मिली।
पर चुनाव सिर्फ़ जाति पर नहीं टिके: किसी क्षेत्र में एक जाति का साफ़ बहुमत नहीं, कोई दल एक जाति के सारे वोट नहीं पाता, मतदाता अक्सर अपनी जाति के उम्मीदवार के ख़िलाफ़ भी वोट देते हैं और सरकार का काम देखते हैं। राजनीति भी जाति को बदलती है: जातियाँ मिलकर बड़े समूह बनाती हैं। सिर्फ़ जाति पर ध्यान गरीबी जैसे मुद्दों से भटकाता है और तनाव बढ़ा सकता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- लैंगिक श्रम-विभाजन: समाज द्वारा घर का काम औरतों को और बाहर का वेतन वाला काम मर्दों को।
- नारीवादी: जो औरत-मर्द के बराबर अधिकार और मौकों में विश्वास करे।
- पितृसत्ता: पुरुषों को ज़्यादा महत्व और ताकत देने वाली व्यवस्था।
- सांप्रदायिकता: एक धर्म को श्रेष्ठ और उसके लोगों को दूसरों का विरोधी मानना।
- धर्मनिरपेक्ष राज्य: कोई राजकीय धर्म नहीं; धर्म की आज़ादी; धार्मिक भेदभाव नहीं।
- जातिगत पदानुक्रम: जन्म के आधार पर 'ऊँच' से 'नीच' तक जातियों की सीढ़ी।
- शहरीकरण: गाँवों से शहरों की ओर लोगों का जाना।
हल किए गए उदाहरण
1. लैंगिक श्रम-विभाजन को सामाजिक क्यों कहते हैं, प्राकृतिक क्यों नहीं?
मर्द खाना बना सकते हैं और औरतें बाहर कमा सकती हैं। कौन क्या करे, यह समाज की सोच और आदत तय करती है, शरीर नहीं।
2. पंचायतों में महिलाओं का हिस्सा लोकसभा से ज़्यादा क्यों है?
कानून से स्थानीय निकायों में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। लोकसभा में हाल तक ऐसा आरक्षण नहीं था।
3. एक नेता कहता है 'अपने धर्म की रक्षा के लिए मुझे वोट दो'। यह सांप्रदायिकता का कौन-सा रूप है?
धर्म के आधार पर राजनीतिक गोलबंदी: वोट के लिए धर्म का इस्तेमाल।
4. धर्मनिरपेक्ष होते हुए भी राज्य छुआछूत पर रोक क्यों लगा सकता है?
भारतीय धर्मनिरपेक्षता में सबकी बराबरी और गरिमा के लिए राज्य धार्मिक प्रथाओं में दख़ल दे सकता है।
5. कोई दल सिर्फ़ जाति के वोट से क्यों नहीं जीत सकता?
किसी क्षेत्र में एक जाति का साफ़ बहुमत नहीं होता और एक जाति के मतदाता बँटे होते हैं तथा काम भी देखते हैं।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि धर्मनिरपेक्ष राज्य धर्म-विरोधी है। इसका मतलब है राज्य सब धर्मों से बराबर व्यवहार करे और उसका अपना कोई धर्म न हो।
- राजनीति में धर्म की हर बात को सांप्रदायिकता कहना। यह तभी सांप्रदायिकता है जब एक धर्म को श्रेष्ठ और दूसरों का विरोधी माना जाए।
- यह मानना कि हर चुनाव जाति से तय होता है। काम, नेता और मुद्दे भी मायने रखते हैं।
- यह मानना कि औरतें कम काम करती हैं। वे औसतन ज़्यादा घंटे काम करती हैं, पर बहुत-सा काम बिना वेतन का है।