कानून-व्यवस्था की संस्थाएँ क्या हैं?
कानून तभी काम के हैं जब कोई यह देखे कि वे माने जा रहे हैं। यह काम करने वाली संस्थाओं को कानून-व्यवस्था की संस्थाएँ या "न्याय-व्यवस्था" कहते हैं। मुख्य तीन हैं: पुलिस, अभियोजन और अदालतें। हर एक का काम अलग है, और हर एक दूसरे पर नज़र रखती है।
पुलिस
पुलिस सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखती है और अपराध से लड़ती है। अपराध होने पर वह:
- पीड़ित से रिपोर्ट लेती है,
- सबूत जुटाती है, जैसे तस्वीरें, चीज़ें और गवाहों की बातें,
- संदिग्ध को खोजती है और कानून की अनुमति हो तो हिरासत में लेती है।
पुलिस को भी कानून मानना होता है। संदिग्ध के अधिकार हैं: कारण जानना, वकील से बात करना और सम्मान से व्यवहार पाना। पुलिस यह तय नहीं कर सकती कि कोई दोषी है।
अभियोजन
अभियोजन (सरकारी वकील का कार्यालय) देखता है कि जाँच कानून के अनुसार हुई और सबूत काफ़ी हैं या नहीं। अगर हैं, तो अभियोजक आरोप रखता है और अदालत में राज्य की ओर से बोलता है। कई देशों में अभियोजक यह भी देखता है कि अधिकारी कानून मान रहे हैं। कमज़ोर सबूत दिखे तो अभियोजक को मामला आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।
अदालतें
अदालत वह जगह है जहाँ दोष तय होता है। जज स्वतंत्र होना चाहिए: न पुलिस, न अभियोजक, न सरकार का आदेश माने। जज:
- अभियोजक और बचाव पक्ष (आरोपी और उसके वकील) को सुनता है,
- सबूत देखता है,
- फ़ैसला सुनाता है: दोषी या निर्दोष, और दोषी हो तो सज़ा।
अदालतें दीवानी मामले भी तय करती हैं, जैसे हर्जाना। कई स्तर होते हैं। नाख़ुश पक्ष ऊपर की अदालत में अपील कर सकता है। जब तक अदालत न कहे, व्यक्ति निर्दोष माना जाता है।
तीन अलग संस्थाएँ क्यों?
अगर एक ही संस्था जाँच करे, आरोप लगाए और फ़ैसला भी दे, तो वह किसी को भी सज़ा दे सकती है। काम बाँटने से हर संस्था दूसरी की जाँच करती है: अभियोजक पुलिस की, और जज दोनों की। इसी से निष्पक्षता बचती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पुलिस = जाँच, सबूत जुटाना, संदिग्ध को पकड़ना
- अभियोजन = मामला जाँचना, आरोप रखना, राज्य की ओर से बोलना
- अदालत = दोनों पक्ष सुनना, दोष तय करना, फ़ैसला देना
- आपराधिक मामले का क्रम: अपराध, पुलिस, अभियोजक, अदालत, फ़ैसला, (अपील)
हल किए गए उदाहरण
1. फ़ोन चोरी हुआ। कैमरे की रिकॉर्डिंग देखकर चोर को कौन खोजता है?
पुलिस। सबूत जुटाना और संदिग्ध को खोजना उसका काम है।
2. चोर दोषी है या नहीं, यह कौन तय करता है?
अदालत। जज दोनों पक्ष सुनकर फ़ैसला देता है। न पुलिस और न अभियोजक दोष तय करता है।
3. चोर को लगता है कि फ़ैसला ग़लत है। आगे क्या हो सकता है?
चोर ऊपर की अदालत में अपील कर सकता है, जो पहले फ़ैसले की जाँच करती है।
आम गलतियाँ
- सोचना कि पुलिस दोष तय करती है। केवल अदालत करती है।
- अभियोजक को जज समझना। अभियोजक राज्य की ओर से बोलता है; फ़ैसला जज देता है।
- सोचना कि आरोपी के कोई अधिकार नहीं। उसे वकील, सुनवाई और निष्पक्ष व्यवहार का अधिकार है।
- सोचना कि जल्दी के लिए सब काम एक संस्था करे। काम बाँटना निष्पक्षता बचाता है।