समानता क्यों ज़रूरी है?
समानता का विचार कहता है कि सब इंसानों का मूल्य और गरिमा बराबर है। इसलिए जन्म, जाति, नस्ल, लिंग, धर्म या धन के कारण किसी को नीचा न माना जाए।
- हमारा संविधान कानून के सामने समानता का वादा करता है और भेदभाव व छुआछूत पर रोक लगाता है।
- जाति-प्रथा के विरुद्ध संघर्ष से लेकर दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष तक, कई लड़ाइयाँ समानता के लिए लड़ी गईं।
समानता एकरूपता नहीं है। लोगों की प्रतिभा, मेहनत और पसंद अलग है, और इनाम में कुछ अंतर उचित हैं। अनुचित वह अंतर है जो सामाजिक व्यवस्था से बने: गरीब या दबाई गई जाति में जन्मा बच्चा जिसे कभी असली मौका न मिले। अवसर की समानता = सबको उचित शुरुआत।
प्राकृतिक बनाम सामाजिक असमानता: प्राकृतिक अंतर जन्म से (कद, क्षमताएँ); सामाजिक असमानता समाज ने बनाई (जाति, वर्ग)। सामाजिक असमानता हटानी है, और प्राकृतिक अंतर को बुरे बर्ताव का बहाना नहीं बनने देना है।
समानता के तीन आयाम
- राजनीतिक समानता: बराबर नागरिकता, वोट देने, चुनाव लड़ने, बोलने और संगठन बनाने का बराबर अधिकार। ज़रूरी है, पर अकेले गहरे अंतर नहीं मिटाती।
- सामाजिक समानता: स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार और सम्मान में बराबर अवसर; जाति और लिंग की रुकावटें हटाना। सबके लिए न्यूनतम भोजन, पानी, घर भी।
- आर्थिक समानता: समूहों के बीच धन और आय में बहुत बड़ा अंतर न हो; सब आगे बढ़ सकें। सबकी आय बिल्कुल बराबर करना लक्ष्य नहीं; बड़े, स्थायी अंतर समस्या हैं।
नारीवाद और समाजवाद
नारीवाद स्त्री और पुरुष के बराबर अधिकारों के पक्ष में है। नारीवादी कहते हैं कि स्त्री-पुरुष की शक्ति में ज़्यादातर अंतर समाज ने बनाया है, जिसे पितृसत्ता कहते हैं, प्रकृति ने नहीं। जैसे महिलाओं को कम वेतन, बिना वेतन का घरेलू काम, सार्वजनिक जीवन से दूर रखना। 'लिंग' (जैविक) और 'जेंडर' (सामाजिक भूमिका) का अंतर समझना ज़रूरी है।
समाजवाद कहता है कि असमानता का मुख्य कारण संपत्ति और ज़मीन, कारख़ानों जैसे मुख्य संसाधनों का असमान स्वामित्व है। समाजवादी चाहते हैं कि ये सबकी भलाई में लगें, सार्वजनिक स्वामित्व या राज्य के नियंत्रण और कल्याण से। कार्ल मार्क्स ने उत्पादन के साधनों पर निजी नियंत्रण ख़त्म करने की बात की। भारत में राम मनोहर लोहिया ने कई असमानताओं की एक साथ बात की: स्त्री-पुरुष, जाति और रंग पर आधारित, अमीर-गरीब देशों के बीच; उन्होंने छोटे पैमाने की तकनीक पर ज़ोर दिया।
उदारवादी अलग सोचते हैं: वे उचित नियमों वाली प्रतियोगिता चाहते हैं, और राज्य की मदद मुख्यतः न्यूनतम सुविधा और बराबर अवसर के लिए।
समानता को कैसे बढ़ाएँ?
- औपचारिक समानता: सबके लिए एक जैसे कानून और अधिकार; जन्म से कोई विशेषाधिकार नहीं। संविधान धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव रोकता है।
- भिन्न बर्ताव: बराबर मौका देने के लिए अलग बर्ताव, जैसे व्हीलचेयर के लिए रैंप या महिलाओं को मातृत्व अवकाश।
- सकारात्मक कार्रवाई: पुराने और आज के अन्याय को ठीक करने के विशेष कदम, जैसे शिक्षा और नौकरी में आरक्षण, छात्रवृत्ति, छात्रावास। इसका लक्ष्य समानता लाना है, और यह सच में ज़रूरतमंद तक पहुँचे।
परीक्षा टिप्स
स्वतंत्रता और समानता मिलकर लगभग 12 अंक। आम सवाल: समानता एकरूपता क्यों नहीं, तीन आयाम उदाहरण सहित, नारीवादी और समाजवादी दृष्टिकोण, 'एक जैसा बर्ताव बनाम भिन्न बर्ताव' वाला प्रसंग। समझाने के लिए बाड़ और डिब्बों वाला चित्र काम आता है।
घर पर करके देखें
अलग-अलग कद के तीन सदस्यों को सोफ़े के पीछे खड़ा करें और सबको एक-एक गद्दी दें। क्या सब ऊपर से देख पाते हैं? अब ज़रूरत के हिसाब से गद्दियाँ दें। दो पंक्ति में लिखें क्या बदला। यही 'एक जैसा बर्ताव' और 'बराबर अवसर' का अंतर है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समानता: सबका बराबर मूल्य; जन्म, जाति, लिंग, धर्म या धन से अनुचित रुकावट नहीं।
- अवसर की समानता: सबको उचित शुरुआत।
- राजनीतिक समानता: बराबर नागरिकता और वोट।
- सामाजिक समानता: शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार में बराबर अवसर; जाति-लिंग की रुकावट नहीं।
- आर्थिक समानता: धन और आय में बहुत बड़ा अंतर नहीं।
- पितृसत्ता: वह सामाजिक व्यवस्था जो पुरुषों को ज़्यादा शक्ति देती है।
- सकारात्मक कार्रवाई: अन्याय ठीक करने के विशेष कदम, जैसे आरक्षण।
हल किए गए उदाहरण
1. एक कंपनी एक जैसे काम के लिए महिलाओं को पुरुषों से कम वेतन देती है। कौन सा आयाम टूटा और कौन सा सिद्धांत इस पर बोलता है?
आर्थिक (और सामाजिक) समानता टूटी। नारीवाद इस पर बोलता है: यह अंतर समाज (पितृसत्ता) का बनाया है, क्षमता का नहीं। कानून बराबर काम के लिए बराबर वेतन माँगता है।
2. भारत में हर वयस्क का एक वोट है। क्या इससे भारत पूरी तरह समान हो गया?
नहीं। इससे राजनीतिक समानता मिली। पर सामाजिक और आर्थिक अंतर (जाति, गरीबी) बाकी हैं, इसलिए और कदम चाहिए।
3. व्हीलचेयर वालों के लिए रैंप दूसरों के साथ अन्याय क्यों नहीं?
यह भिन्न बर्ताव है जो इमारत में जाने का बराबर मौका देता है। इससे दूसरों का कुछ नहीं छिनता।
4. बाड़ वाले उदाहरण से समझाइए कि एक जैसा बर्ताव असमान क्यों हो सकता है।
अलग कद के तीन बच्चों को एक-एक डिब्बा दें तो सबसे छोटा फिर भी बाड़ के पार नहीं देख पाता। ज़रूरत के हिसाब से डिब्बे दें तो सब देखते हैं। बराबर मौके के लिए ज़रूरत के अनुसार मदद चाहिए।
5. गरीबी घटाने के लिए समाजवादी और उदारवादी क्या सुझाएँगे?
समाजवादी मुख्य संसाधनों पर सार्वजनिक स्वामित्व या कड़ा नियंत्रण और व्यापक कल्याण चाहेगा। उदारवादी उचित प्रतियोगिता और सुरक्षा जाल चाहेगा: मुफ़्त शिक्षा, स्वास्थ्य और न्यूनतम आय।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि समानता का मतलब सब एक जैसे हों या सबकी आय बिल्कुल बराबर हो।
- यह मानना कि राजनीतिक समानता (एक वोट) सारी असमानता मिटा देती है।
- आरक्षण को 'समानता के विरुद्ध' कहना। यह असली अवसर की समानता लाने का औज़ार है।
- नारीवादी तर्क में लिंग (जैविक) और जेंडर (सामाजिक भूमिका) को मिला देना।