CBSE कक्षा 11 राजनीति विज्ञान
अध्याय: 2
1. भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार
संविधान: क्यों और कैसे? · भारतीय संविधान में अधिकार · चुनाव और प्रतिनिधित्व · कार्यपालिका · विधायिका · न्यायपालिका · संघवाद · स्थानीय शासन · संविधान: एक जीवंत दस्तावेज़ · संविधान का राजनीतिक दर्शन
- संविधान: क्यों और कैसे? – संविधान किसी देश की बुनियादी नियम-पुस्तिका है। यह भरोसा बनाता है, बताता है कि शक्ति किसके पास है, उस शक्ति पर सीमा लगाता है और लोगों की आकांक्षाएँ बताता है। भारत का संविधान 1946 से 1949 तक संविधान सभा ने खुली बहस से लिखा और दूसरे संविधानों से अच्छे विचार लेकर उन्हें भारत के अनुसार ढाला।
- भारतीय संविधान में अधिकार – अधिकार वे दावे हैं जिन्हें समाज मानता है और कानून बचाता है। भारत के संविधान में छह मौलिक अधिकार हैं जिन्हें अदालतें लागू कराती हैं, जिनमें अदालत जाने (रिट) का अधिकार भी है। नीति-निर्देशक तत्त्व सरकार के लक्ष्य हैं जिन्हें अदालत लागू नहीं कराती। अधिकार सरकार को रोकते हैं; नीति-निर्देशक तत्त्व उसे दिशा देते हैं। दोनों मिलकर स्वतंत्र और न्यायपूर्ण समाज चाहते हैं।
- चुनाव और प्रतिनिधित्व – बड़े लोकतंत्र में लोग चुनाव से प्रतिनिधि चुनते हैं। भारत 'सर्वाधिक वोट से जीत' (FPTP) प्रणाली अपनाता है: हर निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला जीतता है। कुछ सीटें SC और ST उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। स्वतंत्र चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराता है, और सुधार चुनावों को और साफ़-सुथरा बनाने की कोशिश करते हैं।
- कार्यपालिका – कार्यपालिका सरकार का वह अंग है जो कानूनों और नीतियों को लागू करता है। देशों में अध्यक्षात्मक, संसदीय या अर्ध-अध्यक्षात्मक कार्यपालिका होती है। भारत में संसदीय कार्यपालिका है: राष्ट्रपति औपचारिक प्रमुख हैं, जबकि असली शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास है, जो तभी तक रहते हैं जब तक लोकसभा का समर्थन है। सिविल सेवक (नौकरशाही) स्थायी कार्यपालिका हैं।
- विधायिका – संसद वह जगह है जहाँ चुने हुए प्रतिनिधि कानून बनाते हैं, मुद्दों पर बहस करते हैं, बजट पास करते हैं और सरकार को जवाबदेह रखते हैं। भारत की संसद के दो सदन हैं: जनता द्वारा चुनी लोकसभा और राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली राज्यसभा। विधेयक वाचन, समिति की जाँच और दोनों सदनों के मतदान से गुज़रकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से कानून बनता है। समितियाँ बारीक काम करती हैं और दल-बदल विरोधी कानून जैसे नियम संसद में अनुशासन रखते हैं।
- न्यायपालिका – न्यायपालिका विवाद सुलझाती है और संविधान व हमारे अधिकारों की रक्षा करती है। निष्पक्ष रहने के लिए उसे सरकार और संसद से स्वतंत्र होना चाहिए। भारत में एक एकीकृत न्याय व्यवस्था है, जिसमें सबसे ऊपर सर्वोच्च न्यायालय है। सर्वोच्च न्यायालय के पास मूल, रिट, अपीलीय और सलाहकारी क्षेत्राधिकार हैं। न्यायिक पुनरावलोकन और जनहित याचिका से अदालतें अधिकार बचाती हैं, पर उन्हें दूसरे अंगों की भूमिका के साथ संतुलन भी रखना होता है।
- संघवाद – संघवाद का अर्थ है कि शक्ति केंद्र सरकार और राज्य सरकारों में बँटी हो, और दोनों की शक्तियाँ संविधान में लिखी हों। भारत मज़बूत केंद्र वाला संघ है, क्योंकि निर्माता एकता और विकास चाहते थे। इससे राज्यपाल की भूमिका, राष्ट्रपति शासन, स्वायत्तता और राज्यों के आपसी विवादों पर टकराव हुए। कुछ राज्यों को उनके इतिहास, संस्कृति और ज़मीन की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान भी मिले हैं।
- स्थानीय शासन – स्थानीय शासन लोकतंत्र को गाँव और शहर के स्तर तक लाता है, जहाँ लोग अपनी समस्याएँ सबसे अच्छी तरह जानते हैं। भारत में स्थानीय निकाय 1882 से थे, पर दशकों तक कमज़ोर रहे। 1992 के 73वें (ग्रामीण) और 74वें (शहरी) संशोधनों ने पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा, नियमित चुनाव, महिलाओं, SC और ST के लिए आरक्षण, और विषयों की सूची व धन दिया।
- संविधान: एक जीवंत दस्तावेज़ – भारत का संविधान समय के साथ बदल सकता है और अपना मूल भी बचाए रखता है। अनुच्छेद 368 के तहत कुछ हिस्से साधारण बहुमत से, ज़्यादातर दोनों सदनों के विशेष बहुमत से, और संघीय हिस्से आधे राज्यों की मंज़ूरी से भी बदलते हैं। 100 से ज़्यादा संशोधन हुए हैं, ज़्यादातर तकनीकी सुधार या सब दलों की सहमति वाले बदलाव। सर्वोच्च न्यायालय का मूल ढाँचे का सिद्धांत संशोधनों को संविधान का मूल नष्ट करने से रोकता है।
- संविधान का राजनीतिक दर्शन – संविधान का दर्शन यानी वे मूल्य और विचार जिन पर इसके नियम टिके हैं: स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुत्व, विविधता और अल्पसंख्यक अधिकारों का सम्मान, धर्मनिरपेक्षता, सार्वभौमिक मताधिकार, संघवाद और साझी राष्ट्रीय पहचान। खुली बहस और सहमति से बनने के कारण इसे वैधता मिली है। इसकी आलोचना भारी-भरकम, प्रतिनिधि नहीं और पराया कहकर हुई है, और इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं, पर इसकी नैतिक दृष्टि आज भी भारत को राह दिखाती है।
2. राजनीतिक सिद्धांत
राजनीतिक सिद्धांत: एक परिचय · स्वतंत्रता · समानता · सामाजिक न्याय · अधिकार · नागरिकता · राष्ट्रवाद · धर्मनिरपेक्षता
- राजनीतिक सिद्धांत: एक परिचय – राजनीति यानी लोगों का मिलकर फ़ैसले करना: किसे क्या मिले, नियम कौन बनाए और कैसे। यह घर, स्कूल और पूरे देश में होती है, केवल दलों में नहीं। राजनीतिक सिद्धांत इसके पीछे के बड़े विचारों को पढ़ता है: स्वतंत्रता, समानता, न्याय, अधिकार, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता। यह पूछता है कि हर विचार का अर्थ क्या है और वह क्यों ज़रूरी है। ये विचार संविधान और कानूनों में गए हैं और रोज़ के जीवन को बदलते हैं। हम इसे इसलिए पढ़ते हैं ताकि अपनी राय परख सकें, दूसरों को समझ सकें, तर्क से बात करें और समझदार नागरिक बनें।
- स्वतंत्रता: इसका अर्थ और इसकी सीमा – स्वतंत्रता का अर्थ है हमारे फ़ैसलों पर बाहरी रोक कम होना और अपनी क्षमता बढ़ाने का असली मौका मिलना। प्रतिबंध बल (शासक या सरकार), सामाजिक रीतियों (जाति, लिंग के नियम) और गरीबी से आते हैं। साथ रहने के लिए कुछ सीमाएँ ज़रूरी हैं, पर वे उचित हों। जे. एस. मिल का हानि सिद्धांत कहता है कि राज्य किसी की स्वतंत्रता तभी सीमित करे जब दूसरों को हानि रोकनी हो; केवल स्वयं से जुड़े काम आज़ाद रहें, और छोटी हानि पर केवल सामाजिक नाराज़गी काफ़ी है। नकारात्मक स्वतंत्रता = दख़ल से मुक्ति; सकारात्मक स्वतंत्रता = बढ़ने की आज़ादी, जिसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बुनियादी है, पर उसकी उचित सीमाएँ हैं।
- समानता: बराबर मूल्य, उचित अवसर – समानता का अर्थ है हर व्यक्ति का मूल्य बराबर है और जन्म, जाति, लिंग, धर्म या धन के कारण उसके रास्ते में अनुचित रुकावट न हो। इसका मतलब यह नहीं कि सब बिल्कुल एक जैसे हों या सबको बिल्कुल एक जैसा मिले; प्रतिभा और मेहनत के अंतर स्वीकार हैं, पर अनुचित सामाजिक व्यवस्था से बने अंतर हटाने हैं। समानता के तीन आयाम हैं: राजनीतिक (बराबर नागरिकता और वोट), सामाजिक (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार में बराबर अवसर) और आर्थिक (धन में बहुत बड़ा अंतर न हो)। नारीवाद पितृसत्ता से बनी लैंगिक असमानता से लड़ता है; समाजवाद असमानता को संपत्ति के असमान स्वामित्व से जोड़ता है। समानता औपचारिक समानता, भिन्न बर्ताव और आरक्षण जैसी सकारात्मक कार्रवाई से बढ़ती है।
- सामाजिक न्याय: सबको उचित हिस्सा – न्याय = हर व्यक्ति को उसका उचित हक़ देना। सामाजिक न्याय समाज में चीज़ों, सेवाओं और अवसरों के उचित बँटवारे के बारे में है। तीन सिद्धांत मार्गदर्शन करते हैं: बराबर वालों से बराबर बर्ताव, मेहनत और कौशल के अनुपात में इनाम, और विशेष ज़रूरत पर अतिरिक्त मदद। इनमें संतुलन चाहिए। जॉन रॉल्स ने कहा कि समाज के नियम 'अज्ञानता के पर्दे' के पीछे से चुनें, यानी यह जाने बिना कि हमें कौन सी जगह मिलेगी; तब समझदार व्यक्ति सबसे कमज़ोर की रक्षा करेगा। सामाजिक न्याय की शुरुआत सबकी बुनियादी ज़रूरतें (भोजन, पानी, घर, स्वास्थ्य, शिक्षा, न्यूनतम मज़दूरी) पूरी करने से होती है। तरीके पर मतभेद है: मुक्त बाज़ार वाले खुली प्रतियोगिता और छोटा राज्य चाहते हैं; दूसरे राज्य से कल्याण चाहते हैं। भारत दोनों मिलाता है।
- अधिकार: हमारी गरिमा की रक्षा करने वाले दावे – अधिकार एक उचित दावा है: समाज इसे गरिमा के जीवन के लिए ज़रूरी मानता है और दूसरों को इसका सम्मान करना होता है। हर इच्छा अधिकार नहीं। पुराने विचारकों ने प्रकृति या ईश्वर से मिले प्राकृतिक अधिकारों (जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति) की बात की; आज हम मानवाधिकारों की बात करते हैं जो हर व्यक्ति के पास केवल इंसान होने से हैं, गरिमा के आधार पर। संविधान और कानूनों में लिखे जाने पर अधिकार कानूनी अधिकार बनते हैं जिनकी रक्षा अदालतें करती हैं; वे राज्य को सीमित करते हैं और उससे काम भी माँगते हैं, जैसे शिक्षा देना। अधिकार कई प्रकार के हैं: राजनीतिक-नागरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक। अधिकारों के साथ ज़िम्मेदारियाँ आती हैं: दूसरों के अधिकारों का सम्मान, साझा चीज़ों की रक्षा, टकराव में संतुलन, और सरकार द्वारा अधिकारों में अनुचित कटौती पर सजगता।
- नागरिकता: पूर्ण और समान सदस्यता – नागरिकता किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता है। नागरिकों को वोट, सुरक्षा और सार्वजनिक सेवाओं जैसे बराबर अधिकार मिलते हैं और वे कर्तव्य बाँटते हैं। इतिहास बताता है कि बराबर अधिकार मज़दूरों, महिलाओं, अश्वेत अमेरिकियों और दूसरे समूहों के संघर्ष से मिले; आज भी गरीब प्रवासी, झुग्गीवासी और आदिवासी अपने अधिकारों के पूरे उपयोग के लिए संघर्ष करते हैं। नागरिकता राष्ट्र से जुड़ी है: हर राज्य तय करता है कि नागरिक कौन है। भारत जन्म, वंश, पंजीकरण या देशीयकरण से नागरिकता देता है, धर्म, जाति या भाषा से नहीं। सार्वभौमिक नागरिकता का आदर्श है कि हर व्यक्ति कहीं का पूरा सदस्य हो, जो राज्यविहीन लोगों और शरणार्थियों के पास अभी नहीं है। विश्व नागरिकता पूरी मानवता की परवाह सिखाती है, जबकि राष्ट्रीय नागरिकता अब भी हमारे अधिकारों की रक्षा करती है।
- राष्ट्रवाद: राष्ट्र, आत्म-निर्णय और बहुलवाद – राष्ट्रवाद एक ताक़तवर शक्ति है: इसने छोटे राज्यों को जोड़ा, भारत जैसे स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरणा दी, और साम्राज्य भी तोड़े व टकराव भी कराए। राष्ट्र कोई भौतिक चीज़ नहीं; यह ऐसा समुदाय है जो इसलिए है क्योंकि उसके सदस्य मानते हैं कि वे एक-दूसरे के हैं। राष्ट्र साझा विश्वास, इतिहास की साझी समझ, मातृभूमि से जुड़ाव, साझे राजनीतिक आदर्श और साझी राजनीतिक पहचान पर टिका है; एक धर्म या भाषा ज़रूरी नहीं। राष्ट्रीय आत्म-निर्णय किसी समूह का स्वयं शासन का दावा है; उपनिवेशवाद के बाद इससे कई नए राज्य बने, पर हर समूह का अलग राज्य असंभव है, इसलिए आज यह अक्सर लोकतांत्रिक राज्य के अंदर अधिकारों और स्वायत्तता से पूरा होता है। जब राष्ट्र सब समूहों की पहचान का सम्मान और अल्पसंख्यकों की रक्षा करता है, तो राष्ट्रवाद और बहुलवाद साथ चल सकते हैं।
- धर्मनिरपेक्षता: सबका बराबर सम्मान, कोई वर्चस्व नहीं – धर्मनिरपेक्षता दो तरह के धार्मिक वर्चस्व का विरोध करती है: अंतर-धार्मिक वर्चस्व (एक धार्मिक समूह का दूसरे पर हावी होना) और अंतः-धार्मिक वर्चस्व (एक ही धर्म के अंदर कुछ सदस्यों का दूसरों पर हावी होना, जैसे जाति या लिंग के नियमों से)। धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी धर्म से नहीं चलता, उसका कोई राजकीय धर्म नहीं और वह किसी धर्म का पक्ष नहीं लेता। पश्चिमी मॉडल, ख़ासकर अमेरिका में, कड़ी अलगाव की दीवार है और ध्यान व्यक्ति की आज़ादी पर है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता सैद्धांतिक दूरी रखती है: राज्य धर्म से दूर रहता है पर छुआछूत जैसे अन्याय को ख़त्म करने के लिए दख़ल दे सकता है और सब धर्मों की बराबर मदद कर सकता है; यह व्यक्ति और अल्पसंख्यक समुदाय दोनों के अधिकार बचाती है। आलोचक इसे धर्म-विरोधी, पश्चिमी आयात, अल्पसंख्यकवाद, हस्तक्षेपकारी और वोट बैंक राजनीति कहते हैं; हर आलोचना का उत्तर है।