स्वतंत्र न्यायपालिका क्यों ज़रूरी है?
न्यायपालिका नागरिकों के बीच, नागरिक और सरकार के बीच, और सरकारों के बीच विवाद सुलझाती है। यह कानून के शासन, अधिकारों और संविधान की रक्षा भी करती है। इसके लिए उसे स्वतंत्र होना चाहिए: दूसरे अंग उसके फ़ैसलों में दख़ल न दें। स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि न्यायाधीश किसी के प्रति जवाबदेह नहीं; वे संविधान मानते हैं और दुर्व्यवहार पर हटाए जा सकते हैं।
स्वतंत्रता कैसे बचती है
- नियुक्ति: सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं, पर वरिष्ठ न्यायाधीशों के समूह कॉलेजियम की सिफ़ारिश पर (1990 के दशक से)। आम तौर पर सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश मुख्य न्यायाधीश बनते हैं। नेताओं की भूमिका नहीं, इसलिए राजनीति दूर रहती है।
- कार्यकाल की सुरक्षा: न्यायाधीश 65 (सर्वोच्च न्यायालय) या 62 (उच्च न्यायालय) वर्ष तक रहते हैं।
- हटाना बहुत कठिन: केवल सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता पर, संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत से (महाभियोग जैसा)। आज तक सर्वोच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश इस तरह नहीं हटाया गया।
- वित्तीय स्वतंत्रता: वेतन भारत की संचित निधि से मिलता है, संसद में उस पर मतदान नहीं होता, और उसे उनके नुक़सान में घटाया नहीं जा सकता।
- आलोचना से सुरक्षा: हटाने की प्रक्रिया के अलावा संसद में उनके आचरण पर चर्चा नहीं हो सकती, और अदालतें अदालत की अवमानना पर सज़ा दे सकती हैं।
न्यायपालिका की संरचना
भारत में एक ही एकीकृत न्यायपालिका है: कुछ संघीय देशों की तरह केंद्र और राज्यों की अलग अदालतें नहीं।
- सर्वोच्च न्यायालय: पूरे देश की सबसे ऊँची अदालत; इसके फ़ैसले सब अदालतों पर लागू; यह उच्च न्यायालयों के बीच मामले और न्यायाधीश स्थानांतरित कर सकता है।
- उच्च न्यायालय: हर राज्य या राज्यों के समूह के लिए एक; निचली अदालतों की अपील सुनते, रिट जारी करते और निचली अदालतों की देखरेख करते हैं।
- ज़िला न्यायालय: ज़िले के मामले देखते हैं, अधीनस्थ अदालतों की अपील सुनते हैं, गंभीर आपराधिक मामले चलाते हैं।
- अधीनस्थ न्यायालय: छोटे दीवानी और फ़ौजदारी मामलों के लिए।
मामले आम तौर पर निचली अदालतों से शुरू होकर अपील से ऊपर जाते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार
क्षेत्राधिकार यानी कोई अदालत किस तरह के मामले सुन सकती है।
- मूल क्षेत्राधिकार: संघ और राज्यों के बीच, या राज्यों के आपसी विवाद सीधे सर्वोच्च न्यायालय आते हैं। उदाहरण: दो सरकारों के बीच सीमा या शक्ति का विवाद।
- रिट क्षेत्राधिकार: जिसका मौलिक अधिकार छिना, वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है (अनुच्छेद 32); उच्च न्यायालय भी रिट जारी करते हैं (अनुच्छेद 226)।
- अपीलीय क्षेत्राधिकार: यह उच्च न्यायालयों से दीवानी, फ़ौजदारी और संवैधानिक मामलों की अपील सुनता है, अगर उच्च न्यायालय प्रमाणित करे या सर्वोच्च न्यायालय विशेष अनुमति दे।
- सलाहकारी क्षेत्राधिकार: राष्ट्रपति क़ानूनी या जनहित के प्रश्न पर इसकी राय माँग सकते हैं (अनुच्छेद 143)। सलाह मानना ज़रूरी नहीं।
- विशेष शक्तियाँ: यह अभिलेख न्यायालय है, अपने फ़ैसलों की समीक्षा कर सकता है और अवमानना पर सज़ा दे सकता है।
न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका
आम तौर पर केवल प्रभावित व्यक्ति ही अदालत जा सकता है। लगभग 1979-80 से सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका (PIL) की अनुमति दी: कोई भी व्यक्ति या समूह जनता के लिए, या उन लोगों के लिए जो अदालत नहीं पहुँच सकते (क़ैदी, बंधुआ मज़दूर, फ़ुटपाथ पर रहने वाले), मुक़दमा कर सकता है। अदालतों ने चिट्ठियों और अख़बार की ख़बरों को भी याचिका माना। इसे न्यायिक सक्रियता कहते हैं।
अच्छे असर: न्याय ग़रीबों तक पहुँचा; साफ़ हवा, जेलों की हालत और बाल श्रम जैसे मुद्दे उठे; सरकारें ज़्यादा जवाबदेह बनीं।
चिंताएँ: अदालतों पर बोझ बढ़ा; न्यायाधीश कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्र में जा सकते हैं (जैसे ट्रैफ़िक या प्रदूषण का प्रबंधन); अंगों के बीच संतुलन बिगड़ सकता है।
न्यायपालिका और अधिकार: न्यायिक पुनरावलोकन
न्यायपालिका दो मुख्य तरीकों से अधिकार बचाती है: छिने अधिकार को लौटाने के लिए रिट जारी करके, और न्यायिक पुनरावलोकन से: किसी भी कानून या कार्यकारी आदेश की जाँच करके, और संविधान के ख़िलाफ़ होने पर उसे अवैध घोषित करके। यह शब्द संविधान में नहीं लिखा, पर यह शक्ति अनुच्छेद 13, 32 और 226 से आती है।
न्यायपालिका और संसद
ख़ासकर संपत्ति के अधिकार और संशोधन की शक्ति पर तनाव रहा। केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, पर उसका मूल ढाँचा नहीं बदल सकती। अदालतों ने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) को सम्मान, आजीविका, स्वच्छ पर्यावरण और निजता तक फैलाया। आदर्श है संतुलन: हर अंग दूसरे की भूमिका का सम्मान करे।
करके देखें: एक मुक़दमे की यात्रा
मान लीजिए आपके शहर का एक दुकानदार किराए के विवाद में स्थानीय दीवानी अदालत में हार जाता है। अदालतों की वह सीढ़ी बनाइए जिस पर वह अपील से चढ़ सकता है। फिर ख़बरों से सर्वोच्च न्यायालय का कोई हाल का फ़ैसला चुनें और तय करें कि वह किस दरवाज़े (मूल, रिट, अपीलीय, सलाहकारी) से आया। 3D के आख़िरी चरण के मामले वाले खेल से ख़ुद को जाँचें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अदालतों का पिरामिड: सर्वोच्च न्यायालय → उच्च न्यायालय → ज़िला न्यायालय → अधीनस्थ न्यायालय
- सेवानिवृत्ति आयु: सर्वोच्च न्यायालय 65, उच्च न्यायालय 62
- हटाना: सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता पर दोनों सदनों का विशेष बहुमत
- सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार: मूल, रिट (अनु. 32), अपीलीय, सलाहकारी (अनु. 143)
- न्यायिक पुनरावलोकन: अदालतें संविधान-विरोधी कानून रद्द कर सकती हैं
- मूल ढाँचे का सिद्धांत: केशवानंद भारती मामला, 1973
हल किए गए उदाहरण
1. कर्नाटक और तमिलनाडु एक समझौते के तहत पानी बँटवारे पर असहमत हैं। कोई राज्य सीधे कहाँ जा सकता है?
सर्वोच्च न्यायालय, उसके मूल क्षेत्राधिकार में, जो राज्यों के आपसी विवाद देखता है। (जल विवाद अक्सर विशेष न्यायाधिकरण भी देखते हैं।)
2. राष्ट्रपति जानना चाहती हैं कि कोई प्रस्तावित कानून पास होने से पहले संवैधानिक है या नहीं। वे क्या कर सकती हैं?
सलाहकारी क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 143) में प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय को भेज सकती हैं। उसकी राय मानना ज़रूरी नहीं।
3. अख़बार में ख़बर है कि बच्चे एक ख़तरनाक कारख़ाने में काम कर रहे हैं। किसी बच्चे ने मुक़दमा नहीं किया। क्या अदालत कुछ कर सकती है?
हाँ। कोई सामाजिक कार्यकर्ता जनहित याचिका दे सकता है, या अदालत ख़बर के आधार पर ख़ुद मामला उठा सकती है।
4. न्यायाधीशों के वेतन पर हर साल संसद में मतदान क्यों नहीं होता?
ताकि संसद या सरकार नापसंद फ़ैसलों के लिए वेतन घटाकर न्यायाधीशों को सज़ा न दे सके। इससे वित्तीय स्वतंत्रता बचती है।
आम गलतियाँ
- सोचना कि न्यायाधीशों को अकेले प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं। राष्ट्रपति कॉलेजियम की सिफ़ारिश पर नियुक्त करते हैं।
- कहना कि सलाहकारी राय माननी ही पड़ती है। यह बाध्यकारी नहीं।
- सोचना कि भारत में अमेरिका की तरह अलग संघीय और राज्य अदालतें हैं। भारत में एक एकीकृत व्यवस्था है।
- सोचना कि स्वतंत्रता का मतलब न्यायाधीश कभी हटाए ही नहीं जा सकते। हटाए जा सकते हैं, पर कठिन विशेष प्रक्रिया से।