जीवंत दस्तावेज़ क्यों?
संविधान 1949 में बना, पर समाज, तकनीक और ज़रूरतें बदलती रहती हैं। जो संविधान कभी न बदले वह टूट जाएगा; जो बहुत आसानी से बदले उसकी क़ीमत नहीं रहेगी। भारत का संविधान कठोरता और लचीलेपन का संतुलन है। यह संशोधनों (संसद द्वारा औपचारिक बदलाव), न्यायिक व्याख्या (अदालतों का इसे नए ढंग से पढ़ना) और राजनीतिक व्यवहार से बदलता है। क्योंकि यह अपना मूल बचाते हुए बढ़ता है, इसे जीवंत दस्तावेज़ कहते हैं।
संविधान में संशोधन कैसे होता है?
अनुच्छेद 368 प्रक्रिया बताता है। संशोधन केवल संसद शुरू कर सकती है; न जनमत-संग्रह होता है, न कोई अलग संस्था।
- साधारण बहुमत (सामान्य कानून की तरह; अनुच्छेद 368 का संशोधन नहीं माना जाता): जैसे नए राज्य बनाना या नाम और सीमा बदलना (अनुच्छेद 3), नागरिकता के नियम, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या।
- हर सदन में अलग-अलग विशेष बहुमत: (क) सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और (ख) उपस्थित और मतदान करने वालों का दो-तिहाई। मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्त्वों सहित ज़्यादातर हिस्से ऐसे बदलते हैं।
- विशेष बहुमत + कम से कम आधे राज्य विधानमंडलों का अनुमोदन (साधारण बहुमत से): संघीय हिस्सों के लिए, जैसे संघ-राज्यों में शक्तियों का बँटवारा, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व, सर्वोच्च और उच्च न्यायालय, और राष्ट्रपति का चुनाव।
राष्ट्रपति को स्वीकृति देनी ही होती है; कोई वीटो नहीं। संयुक्त बैठक का प्रयोग नहीं हो सकता।
विशेष बहुमत का हिसाब
लोकसभा की कुल संख्या = 543। नियम (क): 543 के आधे से ज़्यादा = कम से कम 272। नियम (ख): उपस्थित और मतदान करने वालों का दो-तिहाई।
- अगर 500 उपस्थित और मतदान कर रहे हैं: 2/3 × 500 = 333.3 → कम से कम 334। दोनों नियम पूरे हों, इसलिए 334 हाँ वोट चाहिए।
- अगर केवल 390 उपस्थित और मतदान कर रहे हैं: 2/3 × 390 = 260। पर नियम (क) 272 माँगता है, इसलिए 272 हाँ वोट चाहिए।
यानी ज़रूरी संख्या = 272 और उपस्थित के दो-तिहाई (ऊपर की ओर पूर्णांक) में जो बड़ा हो।
इतने संशोधन क्यों हुए?
1950 से 100 से ज़्यादा संशोधन हुए हैं। सुनने में बहुत लगता है, पर ज़्यादातर छोटे हैं:
- तकनीकी या प्रशासनिक बदलाव: जैसे 15वें संशोधन ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से 62 की; वेतन और पेंशन की बातें।
- अलग-अलग व्याख्या: संसद और अदालतें असहमत रहीं, जैसे भूमि सुधार और संपत्ति के अधिकार पर, और संसद ने अदालत के फ़ैसलों से पार पाने के लिए संशोधन किए।
- राजनीतिक सहमति: कई संशोधनों को लगभग सभी दलों का समर्थन था, जैसे 52वाँ (दल-बदल विरोधी, 1985), 61वाँ (मतदान आयु 21 → 18, 1989), 73वाँ और 74वाँ (पंचायत और नगरपालिका, 1992)।
विवादित संशोधन: 1970 से 1990 के बीच कुछ संशोधनों पर भारी बहस हुई। आपातकाल में पास 42वें संशोधन (1976) ने न्यायिक पुनरावलोकन सीमित करने और संसद का कार्यकाल बढ़ाने की कोशिश की। 44वें संशोधन (1978) ने इनमें से कई बदलाव पलट दिए।
मूल ढाँचा और संविधान का विकास
क्या संसद कुछ भी बदल सकती है? केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा: संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, पर उसके मूल ढाँचे को नुक़सान नहीं पहुँचा सकती। अदालत ने पूरी सूची नहीं दी, पर इसमें संविधान की सर्वोच्चता, लोकतंत्र और स्वतंत्र चुनाव, गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, शक्तियों का बँटवारा, न्यायिक पुनरावलोकन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और मूल मौलिक अधिकार शामिल माने गए हैं।
मिनर्वा मिल्स मामले (1980) में अदालत ने 42वें संशोधन के वे हिस्से रद्द किए जो संशोधनों को सवाल से परे बनाना चाहते थे। मूल ढाँचे का सिद्धांत ख़ुद न्यायिक व्याख्या से संविधान के विकास का उदाहरण है। यह बदलाव और निरंतरता में संतुलन रखता है: संविधान बढ़ सकता है, पर उसकी आत्मा सुरक्षित रहती है।
करके देखें: संशोधन पास कीजिए
मान लीजिए आपकी 40 विद्यार्थियों की कक्षा एक 'सदन' है। जिस दिन 33 उपस्थित हों और सब वोट दें, विशेष बहुमत के लिए कितने हाँ वोट चाहिए? (नियम क: 40 के आधे से ज़्यादा = 21। नियम ख: 33 का 2/3 = 22।) उत्तर 22 है। अब 3D के आख़िरी चरण में लोकसभा के लिए स्लाइडर चलाइए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अनुच्छेद 368: संशोधन की प्रक्रिया; केवल संसद शुरू करती है
- विशेष बहुमत = कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वालों का 2/3 (हर सदन में)
- लोकसभा: ज़रूरी हाँ वोट = max(272, ⌈2/3 × उपस्थित व मतदान⌉)
- संघीय प्रावधान: विशेष बहुमत + कम से कम आधे राज्य
- मूल ढाँचा: केशवानंद भारती (1973); मिनर्वा मिल्स (1980)
- मुख्य संशोधन: 42वाँ (1976), 44वाँ (1978), 52वाँ (1985), 61वाँ (1989), 73वाँ व 74वाँ (1992)
हल किए गए उदाहरण
1. लोकसभा: 450 सदस्य उपस्थित और मतदान कर रहे। विशेष बहुमत के लिए कितने हाँ वोट चाहिए?
नियम (क): 272। नियम (ख): 2/3 × 450 = 300। बड़ा = 300 हाँ वोट।
2. लोकसभा: 360 उपस्थित और मतदान कर रहे। कितने हाँ वोट?
नियम (ख): 2/3 × 360 = 240। नियम (क): 272। बड़ा = 272 हाँ वोट।
3. राज्यसभा में 245 सदस्य; 210 उपस्थित और मतदान कर रहे। कितने हाँ वोट?
नियम (क): 245 के आधे से ज़्यादा = 123। नियम (ख): 2/3 × 210 = 140। बड़ा = 140।
4. एक संशोधन राज्यसभा में राज्यों की सीटों का बँटवारा बदलता है। 28 राज्य हैं। कम से कम कितने राज्य विधानमंडलों की मंज़ूरी चाहिए?
28 का आधा = कम से कम 14 राज्य, साथ में दोनों सदनों में विशेष बहुमत।
5. एक प्रस्तावित संशोधन कहता है 'चुनाव 20 साल के लिए रद्द'। क्या यह अदालत में टिकेगा?
नहीं। लोकतंत्र और स्वतंत्र चुनाव मूल ढाँचे का हिस्सा हैं, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय इसे रद्द कर देगा।
6. नया राज्य बनाने के लिए कौन-सा बहुमत चाहिए?
संबंधित राज्य से राय लेने के बाद संसद में साधारण बहुमत (अनुच्छेद 3)। यह अनुच्छेद 368 का संशोधन नहीं है।
आम गलतियाँ
- सोचना कि विशेष बहुमत सिर्फ़ उपस्थित लोगों का दो-तिहाई है। कुल सदस्य संख्या का बहुमत भी चाहिए।
- सोचना कि हर संशोधन के लिए राज्यों की मंज़ूरी चाहिए। केवल संघीय प्रावधानों के लिए।
- कहना कि संसद कुछ भी बदल सकती है। वह मूल ढाँचा नष्ट नहीं कर सकती।
- सोचना कि राष्ट्रपति संविधान संशोधन पर हस्ताक्षर से मना कर सकते हैं। उन्हें स्वीकृति देनी होती है।