संविधान का अर्थ और इतिहास
संविधान देश का मूल और सर्वोच्च कानून है। यह बताता है कि कानून कौन बनाएगा, सरकार कौन चलाएगा, विवाद कौन सुलझाएगा, उनकी सीमाएँ क्या हैं, और लोगों के अधिकार क्या हैं।
इतिहास: संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई। डॉ. भीमराव आंबेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे और डॉ. राजेंद्र प्रसाद सभा के अध्यक्ष। लगभग तीन साल (2 साल, 11 महीने, 18 दिन) लगे। संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया (अब संविधान दिवस) और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ (गणतंत्र दिवस)। इसने भारत सरकार अधिनियम 1935 और ब्रिटेन, अमेरिका, आयरलैंड, कनाडा आदि से विचार लिए, पर उन्हें भारत के अनुसार ढाला।
शुरू में 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 8 अनुसूचियाँ थीं; आज लगभग 470 अनुच्छेद, 25 भाग और 12 अनुसूचियाँ हैं। यह दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है।
प्रस्तावना
प्रस्तावना परिचय है। यह कहती है कि शक्ति "हम, भारत के लोग" से आती है। यह भारत को घोषित करती है:
- संप्रभु: अपने मामले ख़ुद तय करने को स्वतंत्र।
- समाजवादी: असमानता घटाने का लक्ष्य।
- पंथनिरपेक्ष: राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं, सब धर्मों से समान व्यवहार।
- लोकतांत्रिक: लोग सरकार चुनते हैं।
- गणराज्य: राष्ट्राध्यक्ष (राष्ट्रपति) चुना जाता है, वंश से नहीं।
यह वादा करती है न्याय (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक), स्वतंत्रता (विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की), समता (प्रतिष्ठा और अवसर की) और बंधुता (व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता)। "समाजवादी", "पंथनिरपेक्ष" और "अखंडता" 1976 में 42वें संशोधन से जोड़े गए।
अधिकार, नीति-निदेशक तत्व और कर्तव्य
- मौलिक अधिकार (भाग III): छह समूह: समता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार, और संवैधानिक उपचार। ये वाद-योग्य हैं: उल्लंघन हो तो अदालत जा सकते हैं (अनुच्छेद 32 से सर्वोच्च न्यायालय)।
- राज्य के नीति-निदेशक तत्व (भाग IV): पर्याप्त आजीविका, समान काम का समान वेतन, निःशुल्क शिक्षा, ग्राम पंचायतें और पर्यावरण रक्षा जैसे लक्ष्य। ये वाद-योग्य नहीं हैं, पर कानून बनाने में मार्गदर्शन करते हैं।
- मौलिक कर्तव्य (भाग IVA, अनुच्छेद 51A): 1976 में जोड़े गए; अब 11 हैं, जैसे संविधान का सम्मान, पर्यावरण की रक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास।
संघीय ढाँचा, केंद्र-राज्य संबंध और आपातकाल
भारत एक संघ है (संविधान इसे "राज्यों का संघ" कहता है): सरकार के दो स्तर, लिखित संविधान, शक्तियों का बँटवारा, और विवाद सुलझाने को स्वतंत्र न्यायपालिका। सातवीं अनुसूची शक्तियों को तीन सूचियों में बाँटती है:
- संघ सूची (लगभग 100 विषय): रक्षा, विदेश मामले, रेलवे, मुद्रा। केवल संसद कानून बनाती है।
- राज्य सूची (लगभग 60): पुलिस, जन स्वास्थ्य, कृषि। राज्य विधानमंडल कानून बनाते हैं।
- समवर्ती सूची (लगभग 50): शिक्षा, वन, विवाह। दोनों बना सकते हैं; टकराव हो तो संघ का कानून मान्य।
बचे हुए (अवशिष्ट) विषय संघ के पास हैं। केंद्र कई संघों से ज़्यादा मज़बूत है (एक संविधान, केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल, अखिल भारतीय सेवाएँ), इसलिए भारत को "एकात्मक झुकाव वाला संघ" या अर्ध-संघीय कहते हैं।
आपातकालीन प्रावधान: राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352: युद्ध, बाहरी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह), राज्य आपातकाल या राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356: राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल) और वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360)। आपातकाल में व्यवस्था लगभग एकात्मक हो जाती है।
न्यायपालिका, वयस्क मताधिकार, एकल नागरिकता और संसदीय शासन
- स्वतंत्र और एकीकृत न्यायपालिका: एक ही क्रम, सबसे ऊपर सर्वोच्च न्यायालय, फिर उच्च न्यायालय और निचली अदालतें। न्यायाधीशों का कार्यकाल और वेतन सुरक्षित; वे असंवैधानिक कानून रद्द कर सकते हैं (न्यायिक पुनरावलोकन)।
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार: 18 साल या ज़्यादा का हर नागरिक, धर्म, जाति, लिंग, धन या शिक्षा के भेद बिना, वोट दे सकता है। 61वें संशोधन (1988, 1989 से लागू) से पहले यह आयु 21 थी।
- एकल नागरिकता: हर भारतीय केवल भारत का नागरिक है, किसी अलग राज्य का नहीं (अमेरिका में दोहरी नागरिकता है)।
- संसदीय शासन: कार्यपालिका (प्रधानमंत्री और मंत्री) चुनी हुई लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है; राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख हैं।
संशोधन और अनुसूचियाँ
अनुच्छेद 368 तीन तरीकों से संशोधन की अनुमति देता है, इसलिए संविधान कुछ लचीला, कुछ कठोर है:
- संसद का साधारण बहुमत (कुछ अनुच्छेदों के लिए, जैसे नए राज्य बनाना)।
- विशेष बहुमत: हर सदन में कुल सदस्यों का बहुमत और उपस्थित व मत देने वालों का दो-तिहाई (ज़्यादातर प्रावधान, जैसे मौलिक अधिकार)।
- विशेष बहुमत + कम से कम आधे राज्य विधानमंडलों की मंज़ूरी (संघीय प्रावधान, जैसे सूचियाँ या राष्ट्रपति का चुनाव)।
सर्वोच्च न्यायालय ने (केशवानंद भारती मामला, 1973) कहा कि संसद मूल ढाँचा नष्ट नहीं कर सकती।
अनुसूचियाँ अंत में जुड़ी तालिकाएँ हैं। अभी 12 हैं, जैसे: पहली (राज्य और केंद्रशासित प्रदेश), तीसरी (शपथ), चौथी (राज्यसभा की सीटें), सातवीं (तीन सूचियाँ), आठवीं (22 भाषाएँ), दसवीं (दल-बदल विरोधी)।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अपनाया 26 नवंबर 1949; लागू 26 जनवरी 1950
- प्रस्तावना: संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य; न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता
- अधिकार (वाद-योग्य) + नीति-निदेशक तत्व (वाद-योग्य नहीं) + कर्तव्य (11)
- सातवीं अनुसूची: संघ, राज्य, समवर्ती सूची
- आपातकाल: अनु. 352 (राष्ट्रीय), 356 (राज्य), 360 (वित्तीय)
- संशोधन (अनु. 368): साधारण, विशेष, विशेष + आधे राज्य
हल किए गए उदाहरण
1. एक राज्य पुलिस पर कानून बनाना चाहता है। कौन-सी सूची? क्या संसद सामान्यतः बना सकती है?
पुलिस राज्य सूची में है, तो राज्य विधानमंडल कानून बनाएगा। संसद सामान्यतः नहीं, केवल राष्ट्रीय आपातकाल जैसी विशेष स्थितियों में।
2. संसद और एक राज्य दोनों शिक्षा पर कानून बनाते हैं और वे टकराते हैं। कौन-सा मान्य?
शिक्षा समवर्ती सूची में है। टकराव में सामान्यतः संघ का कानून मान्य होता है।
3. संसद राष्ट्रपति के चुनाव का तरीका बदलना चाहती है। क्या चाहिए?
दोनों सदनों में विशेष बहुमत और कम से कम आधे राज्य विधानमंडलों की मंज़ूरी, क्योंकि यह संघीय प्रावधान है।
4. भारत को "एकात्मक झुकाव वाला संघ" क्यों कहते हैं?
यह संघ और राज्यों में शक्ति बाँटता है, पर संघ के पास ज़्यादा शक्तियाँ हैं: अवशिष्ट विषय, राज्यपाल की नियुक्ति, समवर्ती सूची में प्रधानता और आपातकाल में नियंत्रण।
आम गलतियाँ
- तारीख़ें मिलाना: अपनाया 26 नवंबर 1949, लागू 26 जनवरी 1950।
- यह मानना कि नीति-निदेशक तत्व अदालत में लागू हो सकते हैं। नहीं; मौलिक अधिकार हो सकते हैं।
- यह मानना कि भारत में अमेरिका जैसी दोहरी नागरिकता है। यहाँ एकल नागरिकता है।
- यह मानना कि हर संशोधन में राज्यों की मंज़ूरी चाहिए। केवल संघीय प्रावधानों में।