बच्चे और बड़ों के बीच तीन बंधन
अवयस्क (नाबालिग) वह है जो वयस्कता की उम्र से छोटा है, आमतौर पर 18 वर्ष। नाबालिग ज़्यादातर कानूनी फ़ैसले अकेले नहीं ले सकता, इसलिए कानून उसे तीन तरह से बड़ों से जोड़ता है:
- अभिरक्षा (कस्टडी): शारीरिक देखभाल। बच्चा किसके साथ रहे और रोज़ की ज़रूरतें कौन पूरी करे।
- संरक्षकता: कानूनी अधिकार। पढ़ाई, इलाज, धर्म, यात्रा के फ़ैसले कौन ले, और बच्चे की संपत्ति कौन संभाले।
- कानूनी माता-पिता: कानून किसे माँ-बाप मानता है, नाम, विरासत और पारिवारिक रिश्तों के लिए।
आम परिवार में तीनों माता-पिता के पास होते हैं। कानून तभी बीच में आता है जब कुछ बदलता है। करके देखो: 3D में हर स्थिति में तीनों रंगीन डोरियाँ कहाँ जाती हैं, देखो।
कस्टडी: बच्चा किसके साथ रहे
माता-पिता अलग हों या तलाक हो, तो अदालत कस्टडी तय करती है। प्रकार:
- एकल (शारीरिक) कस्टडी: बच्चा एक के साथ रहता है; दूसरे को मुलाकात (visitation) का हक़ मिलता है।
- संयुक्त कस्टडी: बच्चा दोनों के साथ समय बिताता है, फ़ैसले दोनों मिलकर लेते हैं।
- कानूनी कस्टडी: बड़े फ़ैसले लेने का हक़। यह शारीरिक कस्टडी एक के पास होने पर भी साझा रह सकती है।
कसौटी हमेशा बच्चे का सर्वोत्तम हित (कल्याण) है: सुरक्षा, स्वास्थ्य, पढ़ाई, भावनात्मक लगाव, स्थिरता, और बड़ा हो तो बच्चे की अपनी इच्छा। यह नहीं कि कौन ज़्यादा कमाता है या कौन "जीतता" है। दोनों माता-पिता को बच्चे का खर्च (भरण-पोषण) देना होता है।
संरक्षकता: बच्चे के लिए फ़ैसले कौन ले
संरक्षक वह वयस्क है जिसके पास नाबालिग के व्यक्ति (शरीर, परवरिश) और/या संपत्ति (पैसा, ज़मीन) की देखभाल का कानूनी अधिकार है। प्रकार:
- प्राकृतिक संरक्षक: माता-पिता। आधुनिक कानून माँ और पिता दोनों को बराबर संरक्षक मानते हैं।
- वसीयती संरक्षक: माता या पिता अपनी वसीयत में नाम लिखें, जो उनकी मृत्यु के बाद काम करे।
- अदालत द्वारा नियुक्त संरक्षक: जब माता-पिता न हों या अयोग्य हों, अदालत चुनती है। भारत में यह संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम 1890 के तहत है।
- वास्तविक (de facto) संरक्षक: जो बिना कानूनी नियुक्ति के असल में बच्चे की देखभाल कर रहा है, जैसे मौसी। इनके कानूनी अधिकार सीमित हैं।
संरक्षकता कर्तव्य है, मालिकाना हक़ नहीं। संरक्षक को बच्चे के भले के लिए काम करना है, संपत्ति का हिसाब रखना है, और अदालत की अनुमति के बिना उसे बेच नहीं सकता। यह 18 वर्ष पर खत्म होती है। संरक्षक कानूनी माता-पिता नहीं बनता।
फ़ॉस्टर देखभाल और दत्तक ग्रहण
फ़ॉस्टर (पालक) देखभाल: जाँचा-परखा परिवार कुछ समय के लिए बच्चे को रखता है, जब तक जन्म का परिवार नहीं रख सकता। बच्चा घर लौट सकता है।
दत्तक ग्रहण (गोद लेना) एक कानूनी प्रक्रिया है जो माता-पिता के सारे अधिकार और कर्तव्य हमेशा के लिए जन्म के माता-पिता से दत्तक माता-पिता को दे देती है। गोद लिए बच्चे को जन्म वाले बच्चे जैसे सारे हक़ मिलते हैं, नाम और विरासत समेत, और कानून में जन्म के परिवार से रिश्ता खत्म होता है।
गोद लेने की आम प्रक्रिया (देश के हिसाब से थोड़ी बदलती है):
- जाँच के बाद बच्चे को कानूनी रूप से गोद लेने के लिए मुक्त घोषित किया जाता है (अनाथ, छोड़ा गया या सौंपा गया)।
- इच्छुक माता-पिता मान्यता प्राप्त संस्था में पंजीकरण कराते हैं।
- गृह अध्ययन (home study): परिवार का स्वास्थ्य, आय, घर और कारण जाँचे जाते हैं।
- बच्चे और परिवार का मिलान; बच्चा बड़ा हो तो उसकी सहमति।
- अदालत (या प्राधिकरण) का आदेश गोद लेने को पक्का करता है; बाद में मुलाकातें होती हैं कि बच्चा ठीक है।
बाल तस्करी और बच्चों की "खरीद" रोकने के लिए सिर्फ़ मान्यता प्राप्त संस्थाओं से गोद लिया जा सकता है। भारत में गोद लेना हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम 1956 या किशोर न्याय अधिनियम 2015 के तहत होता है, और केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) इसे देखता है। दूसरे देश से गोद लेने के लिए हेग दत्तक ग्रहण अभिसमय (1993) है, जो कहता है कि विदेश में गोद देना तभी हो जब बच्चे के अपने देश में उपयुक्त परिवार न मिले। कुछ कानूनी व्यवस्थाओं में कफ़ाला है: जीवन भर देखभाल, पर बच्चे का पारिवारिक नाम और विरासत नहीं बदलती।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अवयस्क (नाबालिग): वयस्कता की उम्र (आमतौर पर 18) से कम
- कस्टडी = रोज़ की देखभाल; संरक्षकता = व्यक्ति और संपत्ति के कानूनी फ़ैसले
- प्राकृतिक, वसीयती, अदालत द्वारा नियुक्त, वास्तविक संरक्षक
- फ़ॉस्टर देखभाल = अस्थायी; दत्तक ग्रहण = स्थायी और पूरा
- बच्चे का सर्वोत्तम हित (कल्याण): मुख्य कसौटी
- हेग दत्तक ग्रहण अभिसमय 1993: देशों के बीच गोद लेने के नियम
हल किए गए उदाहरण
1. आशा के माता-पिता का तलाक हुआ। वह पिता के साथ रहती है और हर सप्ताहांत माँ से मिलती है। कस्टडी किसके पास है, संरक्षक कौन है?
पिता के पास शारीरिक कस्टडी है; माँ के पास मुलाकात का हक़। दोनों उसके प्राकृतिक संरक्षक और कानूनी माता-पिता हैं, इसलिए बड़े फ़ैसले आमतौर पर साझा होते हैं।
2. एक विधवा अपनी वसीयत में लिखती है कि उसकी मृत्यु पर उसकी बहन 10 साल के बेटे की देखभाल करे। बहन क्या कहलाएगी, और क्या वह कानूनन माँ बन जाएगी?
वह वसीयती संरक्षक है। उसे 18 वर्ष तक कस्टडी और फ़ैसलों का अधिकार मिलेगा, पर वह कानूनी माँ नहीं बनेगी। यह सिर्फ़ गोद लेने से होता।
3. एक दंपति अस्पताल के कर्मचारी को पैसे देकर नवजात बच्चा लेता है और इसे गोद लेना कहता है। क्या यह मान्य है?
नहीं। गोद लेना मान्यता प्राप्त संस्था और अदालत या प्राधिकरण के आदेश से ही होता है। बच्चे के लिए पैसे देना तस्करी है, अपराध है।
आम गलतियाँ
- कस्टडी और संरक्षकता को एक समझना। कस्टडी रोज़ की देखभाल है; संरक्षकता कानूनी फ़ैसले, संपत्ति समेत।
- यह सोचना कि संरक्षक बच्चे की संपत्ति का मालिक है। वह बच्चे के लिए सिर्फ़ संभालता है और बेचने के लिए अदालत की अनुमति चाहिए।
- फ़ॉस्टर देखभाल को गोद लेना समझना। फ़ॉस्टर अस्थायी है; गोद लेना स्थायी है और पूरे अधिकार देता है।
- यह सोचना कि ज़्यादा कमाने वाले को ही कस्टडी मिलती है। अदालत बच्चे का सर्वोत्तम हित देखती है, सिर्फ़ आय नहीं।