चुनाव प्रणालियों की तुलना
चुनाव प्रणाली वह नियम है जो वोटों को सीटों में बदलता है।
- FPTP (सबसे ज़्यादा वोट वाला जीते): हर क्षेत्र से एक सदस्य; सबसे ज़्यादा वोट वाला जीतता है, 50% ज़रूरी नहीं। आसान और स्थानीय जुड़ाव, पर सीटें अक्सर वोटों से मेल नहीं खातीं।
- निर्वाचक मंडल (विजेता सब ले): हर राज्य के निर्वाचक वोट होते हैं; राज्य जीतने वाला आम तौर पर सारे ले जाता है। राष्ट्रपति को निर्वाचक वोटों का बहुमत चाहिए, इसलिए कम कुल वोट से भी जीत संभव है।
- पार्टी-सूची PR: सीटें वोट के अनुपात में। छोटे दलों के लिए न्यायपूर्ण, पर लोग दल चुनते हैं, व्यक्ति नहीं।
- AMS (अतिरिक्त सदस्य प्रणाली): मेल: कुछ सीटें FPTP से, बाक़ी सूची से ताकि नतीजा न्यायपूर्ण बने।
- STV (एकल संक्रमणीय मत): बहु-सदस्य क्षेत्रों में मतदाता उम्मीदवारों को 1, 2, 3 क्रम देते हैं; अतिरिक्त वोट आगे जाते हैं।
- पूरक / दो-दौर प्रणाली: किसी को 50% न मिले तो दूसरी गिनती या पहले दो के बीच दोबारा मतदान।
चुनाव भी अलग होते हैं: तय कार्यकाल बनाम लचीली तारीख़, प्राइमरी बनाम दल द्वारा चयन।
दो-दलीय और बहुदलीय व्यवस्था
दल प्रणाली बताती है कि कितने दलों को सत्ता का असली मौक़ा है।
- दो-दलीय: दो दल लगभग सारी सीटें जीतते हैं और बारी-बारी सत्ता में आते हैं (अमेरिका)।
- बहुदलीय: दो बड़े दल और छोटे दल भी सीटें जीतते हैं और कभी सरकार में शामिल होते हैं (भारत, ज़्यादातर यूरोप, कभी-कभी ब्रिटेन)।
अमेरिका में दो-दलीय व्यवस्था क्यों:
- FPTP और "विजेता सब ले" सिर्फ़ पहले स्थान को इनाम देते हैं (इसे ड्यूवर्जे का नियम कहते हैं)।
- मतदाता बेकार वोट से डरकर रणनीतिक वोट देते हैं।
- मतपत्र पर नाम, बहस में जगह और प्रचार के ख़र्च के नियम बड़े दो दलों के पक्ष में हैं।
- दोनों बड़े दल "बड़े तंबू" हैं जो नए आंदोलनों को अपने अंदर ले लेते हैं।
दल की एकता, तीसरे दल और नीतियाँ
अंदरूनी एकता: ब्रिटेन जैसी संसदीय व्यवस्था में मज़बूत व्हिप और सरकार बचाने की ज़रूरत सदस्यों को साथ वोट दिलाती है। अमेरिका में शक्तियों का बँटवारा और प्राइमरी सदस्यों को ज़्यादा आज़ादी देते हैं, फिर भी ध्रुवीकरण से दल-आधारित वोटिंग बढ़ी है।
तीसरे दल और निर्दलीय: ब्रिटेन में ये अमेरिका से ज़्यादा सीटें जीतते हैं (जैसे स्कॉटलैंड और वेल्स के क्षेत्रीय दल, लिबरल डेमोक्रेट) और क्षेत्रीय सरकारें भी चलाते हैं। अमेरिका में ये ज़्यादातर मुद्दे उठाते हैं या स्पॉइलर बनते हैं।
नीतियाँ: दलों की तुलना अर्थव्यवस्था, कल्याण, स्वास्थ्य, आप्रवासन और पर्यावरण पर करो। मध्य-वाम दल आम तौर पर ज़्यादा सरकारी ख़र्च, मध्य-दक्षिण दल कम टैक्स चाहते हैं। दो देशों में एक ही "तरफ़" के दल भी अलग हो सकते हैं।
प्रचार और पैसा
प्रचार के लिए विज्ञापन, कर्मचारी और यात्रा पर पैसा चाहिए।
- कड़ी सीमा (जैसे ब्रिटेन और भारत): हर उम्मीदवार और दल के खर्च की सीमा, पेड टीवी राजनीतिक विज्ञापन पर रोक या सीमा। समर्थक कहते हैं इससे चुनाव न्यायपूर्ण रहते हैं।
- कम सीमा (जैसे अमेरिका, बड़े अदालती फ़ैसलों के बाद): बाहरी समूह बड़ी रक़म ख़र्च कर सकते हैं। समर्थक कहते हैं पैसा ख़र्च करना भी अभिव्यक्ति है; आलोचक कहते हैं अमीर दानदाताओं का असर बहुत बढ़ता है।
- दूसरी बहसें: चंदे की पारदर्शिता, डिजिटल विज्ञापन और झूठी ख़बरें।
करके देखो: सीटें गिनो
5 नक़ली क्षेत्र लो। हर क्षेत्र में तीन दलों का वोट प्रतिशत लिखो। हर सीट सबसे ऊपर वाले दल को दो (FPTP)। फिर 5 सीटें कुल वोट के हिस्से से बाँटो (PR)। दोनों नतीजों की तुलना करो, फिर 3D स्लाइडर से जाँचो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- FPTP: क्षेत्र में सबसे ज़्यादा वोट वाला सीट जीतता है
- PR सीटें ≈ वोट का हिस्सा × कुल सीटें
- विजेता सब ले: राज्य जीतने वाले को उसके सारे निर्वाचक वोट
- बहुमत = कुल सीटों या निर्वाचक वोटों के आधे से ज़्यादा
हल किए गए उदाहरण
1. 100 सीटों वाली PR संसद में एक दल को 20% वोट मिले। लगभग कितनी सीटें?
20% × 100 = 20 सीटें।
2. पाँच FPTP क्षेत्रों में दल A चार में 38–45% वोट से पहले नंबर पर है। उसे कितना सीटों का हिस्सा मिला?
5 में से 4 = 80% सीटें, सिर्फ़ लगभग 40% वोट से।
3. निर्वाचक मंडल में 538 वोट हैं। जीतने के लिए कितने चाहिए?
आधे से ज़्यादा: 538 ÷ 2 = 269, तो 270 वोट।
आम गलतियाँ
- कहना कि FPTP में जीतने के लिए 50% चाहिए। बस बाक़ी सबसे ज़्यादा वोट चाहिए।
- मानना कि निर्वाचक मंडल में कुल वोट जीतने वाला हमेशा जीतता है। "विजेता सब ले" अलग नतीजा दे सकता है।
- कहना कि PR से हमेशा कमज़ोर सरकार बनती है। कई PR देशों में स्थिर गठबंधन हैं।
- मान लेना कि एक जैसे नाम वाले दलों की हर देश में एक जैसी नीतियाँ हैं।