नियोजित औद्योगीकरण से उदारीकरण तक
औद्योगीकरण का मतलब है हाथ की जगह कारखानों में मशीनों से सामान बनाना। 1947 के बाद भारत ने नियोजित औद्योगीकरण चुना। सरकार ने पंचवर्षीय योजनाएँ बनाईं और सार्वजनिक क्षेत्र (सरकारी स्वामित्व) में इस्पात संयंत्र, बाँध और भारी उद्योग लगाए। निजी कंपनियों को शुरू करने या बढ़ने के लिए लाइसेंस चाहिए था। लक्ष्य था आत्मनिर्भरता और रोज़गार।
1991 में उदारीकरण शुरू हुआ, यानी सरकारी नियंत्रण कम करना। लाइसेंस घटे, निजी और विदेशी कंपनियाँ आईं। कुछ सरकारी कंपनियाँ निजी मालिकों को बेची गईं; इसे विनिवेश कहते हैं। काम भी बदला: स्थायी नौकरियाँ घटीं, ठेके और अस्थायी काम बढ़े।
संगठित और असंगठित क्षेत्र
संगठित (औपचारिक) क्षेत्र में पंजीकृत संस्थाएँ, तय वेतन, छुट्टी, पेंशन और सुरक्षा नियम होते हैं। असंगठित (अनौपचारिक) क्षेत्र में छोटी इकाइयाँ, दिहाड़ी या नग के हिसाब से भुगतान और बहुत कम सुरक्षा होती है। भारत में दस में से नौ से ज़्यादा मज़दूर असंगठित क्षेत्र में हैं।
लोगों को नौकरी कैसे मिलती है?
बहुत कम लोगों को खुले विज्ञापन, परीक्षा और साक्षात्कार से नौकरी मिलती है। ज़्यादातर मज़दूर जान-पहचान से काम पाते हैं: रिश्तेदार, गाँव का दोस्त, या जाति और क्षेत्र का नेटवर्क।
- पुरानी कपड़ा मिलों में जॉबर (अक्सर मज़दूरों के अपने इलाक़े का) नए मज़दूर भर्ती करता था; मज़दूर उसके एहसानमंद रहते थे।
- आज बहुत-से मज़दूर ठेकेदार के ज़रिए लगते हैं। वह उन्हें कारखाने, निर्माण स्थल या ईंट-भट्ठे पर ले जाता है। अक्सर वह पेशगी देता है, जिसे मज़दूर को काम करके चुकाना पड़ता है।
- बदली मज़दूर ग़ैरहाज़िर स्थायी मज़दूरों की जगह काम करते हैं; उनकी कोई पक्की नौकरी नहीं होती।
यानी नौकरी पाना सिर्फ़ हुनर की परीक्षा नहीं, एक सामाजिक प्रक्रिया है।
काम की प्रक्रिया और काम की दशाएँ
कार्य-प्रक्रिया यानी काम कैसे बँटता और नियंत्रित होता है। बड़े कारखाने में एक चीज़ बहुत-से छोटे कामों में बँटती है। हर मज़दूर असेंबली लाइन पर एक ही काम बार-बार करता है। फ़्रेडरिक टेलर के वैज्ञानिक प्रबंधन ने हर हरकत का समय नापा, ताकि गति मज़दूर नहीं, मैनेजर तय करें। कार्ल मार्क्स ने इसके नतीजे को अलगाव कहा: मज़दूर अपने बनाए सामान और अपने काम से कटा हुआ महसूस करता है।
काम की दशाएँ
- खदान: गर्मी, धूल, धँसने का ख़तरा, लंबी पाली; कई खनिक बिना सुरक्षा उपकरण के ठेका मज़दूर हैं।
- कारखाना: दोहराया काम, शोर, लक्ष्य पूरा करने का दबाव।
- आईटी और कॉल सेंटर: कुछ को अच्छा वेतन, पर लंबे और लचीले घंटे, रात की पाली और कड़ी निगरानी।
कारखाना अधिनियम और खान अधिनियम जैसे क़ानून घंटे सीमित करते हैं और सुरक्षा माँगते हैं, पर असंगठित क्षेत्र में अक्सर इनका पालन नहीं होता।
घर-आधारित काम
घर-आधारित काम यानी मज़दूर के अपने घर में किया गया कमाई वाला काम। जैसे बीड़ी बनाना, अगरबत्ती, पापड़, लेस, ज़री और कढ़ाई, छोटे पुर्ज़े जोड़ना।
एजेंट या बिचौलिया कच्चा माल लाता है और तैयार माल ले जाता है। भुगतान घंटे से नहीं, नग के हिसाब से होता है। ज़्यादातर काम महिलाएँ और बच्चे करते हैं। न छुट्टी, न इलाज की सुविधा, न यूनियन। घर ही कारख़ाना बन जाता है और घर का काम ऊपर से। कंपनी बिना कारख़ाना चलाए बड़ा मुनाफ़ा कमाती है।
हड़ताल और मज़दूर संघ
मज़दूर संघ (ट्रेड यूनियन) मज़दूरों का संगठन है जो मालिक से एक समूह के रूप में मोलभाव करता है। मिलकर मज़दूरों की ताक़त अकेले से ज़्यादा होती है। यूनियन उचित वेतन, तय घंटे, सुरक्षा और नौकरी की पक्की माँगती है।
हड़ताल में मज़दूर मिलकर काम रोकते हैं। तालाबंदी में मालिक दबाव डालने के लिए कार्यस्थल बंद करता है। हड़ताल आसान नहीं: वेतन कटता है और नौकरी भी जा सकती है।
उदाहरण: बंबई कपड़ा मिल हड़ताल
जनवरी 1982 में बंबई (अब मुंबई) के लगभग दो लाख कपड़ा मिल मज़दूर नेता दत्ता सामंत के नेतृत्व में हड़ताल पर गए। वे बेहतर वेतन और अपनी पसंद की यूनियन का हक़ माँग रहे थे। हड़ताल एक साल से ज़्यादा चली। कई मिलें फिर कभी नहीं खुलीं; उनकी ज़मीन पर बाद में दफ़्तर और मॉल बने, और बहुत-से मज़दूर अनौपचारिक काम में चले गए।
करके देखें: अपनी गली का काम
अपने जान-पहचान के पाँच कामकाजी लोगों की सूची बनाइए। हर एक के लिए लिखिए: नौकरी कैसे मिली? तय वेतन, छुट्टी और पेंशन मिलती है? घर पर काम करते हैं? फिर 3D के खुले खेल वाले चरण में स्लाइडर से अपनी सूची की तुलना पूरे भारत से कीजिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- नियोजित औद्योगीकरण: पंचवर्षीय योजनाओं और सार्वजनिक क्षेत्र से सरकार के नेतृत्व में विकास (1950–1980 का दशक)
- उदारीकरण (1991): कम लाइसेंस, ज़्यादा निजी और विदेशी कंपनियाँ, सरकारी कंपनियों का विनिवेश
- संगठित क्षेत्र: पंजीकृत, तय वेतन, छुट्टी, पेंशन, सुरक्षा क़ानून
- असंगठित क्षेत्र: छोटी इकाइयाँ, दिहाड़ी या नग का भुगतान, बहुत कम सुरक्षा (90% से ज़्यादा मज़दूर)
- जॉबर / ठेकेदार: मज़दूर भर्ती करने वाला बिचौलिया
- बदली मज़दूर: ग़ैरहाज़िर स्थायी मज़दूर की जगह काम करने वाला
- वैज्ञानिक प्रबंधन (टेलरवाद): मैनेजर काम का समय नापकर नियंत्रित करते हैं
- अलगाव (मार्क्स): मज़दूर अपने उत्पाद और काम से कटा हुआ
- पीस रेट: हर बनी चीज़ के हिसाब से भुगतान
- हड़ताल: मज़दूर काम रोकते हैं; तालाबंदी: मालिक कार्यस्थल बंद करता है
हल किए गए उदाहरण
1. रवि एक डिलीवरी ऐप के लिए गाड़ी चलाता है। उसे हर डिलीवरी का पैसा मिलता है, न छुट्टी, न पेंशन। उसकी नौकरी औपचारिक है या अनौपचारिक? क्यों?
अनौपचारिक। औपचारिक नौकरी में तय वेतन, सवेतन छुट्टी, पेंशन और क़ानूनी सुरक्षा होती है। रवि को काम के हिसाब से पैसा मिलता है और इनमें से कुछ नहीं।
2. 1960 के दशक में सरकार का बनाया इस्पात संयंत्र 2000 में आंशिक रूप से निजी कंपनी को बेचा गया। यह औद्योगिक परिवर्तन के कौन-से दो दौर दिखाता है?
संयंत्र नियोजित औद्योगीकरण (सार्वजनिक क्षेत्र) के दौर का है। उसे बेचना विनिवेश है, जो 1991 के बाद के उदारीकरण का हिस्सा है।
3. निर्माण मज़दूरों पर ठेकेदार की इतनी ताक़त क्यों होती है?
ठेकेदार तय करता है कि किस दिन किसे काम मिलेगा, वह पेशगी देकर मज़दूर को बाँध लेता है, और मज़दूर के पास न लिखित अनुबंध है, न यूनियन। इसलिए मज़दूर उस पर निर्भर रहता है।
4. मीना एक एजेंट के लिए घर पर रोज़ 1,000 बीड़ियाँ बनाती है। दो कारण बताइए कि क़ानून से उसकी रक्षा करना मुश्किल क्यों है।
1) उसका कार्यस्थल उसका घर है, इसलिए निरीक्षक वहाँ नहीं जाते। 2) उसे एजेंट के ज़रिए नग के हिसाब से पैसा मिलता है, इसलिए कंपनी कह सकती है कि वह उसकी कर्मचारी नहीं है। उसकी कोई यूनियन भी नहीं है।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि उदारीकरण में सरकार ने सारे उद्योग बंद कर दिए। नियंत्रण घटे और कुछ कंपनियाँ बिकीं; बहुत-सी सरकारी कंपनियाँ आज भी चलती हैं।
- हर कारख़ाना मज़दूर को 'संगठित' मानना। बड़े कारख़ाने के अंदर ठेका मज़दूर भी अनौपचारिक है, अगर उसके पास तय वेतन, छुट्टी या सुरक्षा नहीं।
- हड़ताल और तालाबंदी में उलझना: हड़ताल मज़दूर करते हैं, तालाबंदी मालिक।
- घर-आधारित काम को 'बस घर का काम' समझना। यह बाज़ार के लिए कमाई वाला उत्पादन है, बस घर पर होता है।