कृषि संरचना में जाति और वर्ग
कृषि संरचना का अर्थ है खेती की ज़मीन का मालिक कौन है और उस पर काम कौन करता है। ज़्यादातर भारतीय गाँवों में यह एक सीढ़ी जैसा है:
- बड़े भूस्वामी (कम परिवार, बहुत ज़मीन);
- मध्यम और धनी किसान;
- छोटे और सीमांत किसान (लगभग 1 से 2 हेक्टेयर से कम);
- भूमिहीन खेतिहर मज़दूर (बहुत परिवार, कोई ज़मीन नहीं)।
जाति और वर्ग जुड़े हैं। बड़े भूस्वामी ज़्यादातर ऊँची जातियों या प्रबल जातियों (ज़मीन, संख्या और स्थानीय शक्ति वाली जातियाँ, जैसे जाट, रेड्डी, कम्मा, मराठा, वोक्कालिगा) के थे। भूमिहीन मज़दूर ज़्यादातर दलित और आदिवासी थे। महिलाएँ बहुत खेती करती थीं, फिर भी शायद ही ज़मीन की मालिक होती थीं।
औपनिवेशिक काल में ज़मींदारी जैसी व्यवस्थाओं ने राज्य और किसान के बीच बिचौलिए खड़े कर दिए, जिससे ढाँचा और असमान हो गया।
स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार
भूमि सुधारों ने ज़मीन के मालिकाने को न्यायपूर्ण बनाने की कोशिश की:
- ज़मींदारी उन्मूलन: लगान वसूलने वाले बड़े बिचौलियों को हटाया। यह सबसे सफल क़दम था।
- काश्तकारी सुधार: काश्तकारों को सुरक्षा या मालिकाना दिया और लगान सीमित किया।
- भूमि हदबंदी: एक परिवार अधिकतम कितनी ज़मीन रख सकता है यह तय किया; अतिरिक्त ज़मीन भूमिहीनों को मिलनी थी।
सीमाएँ: भूस्वामियों ने छेद ढूँढे: काग़ज़ पर ज़मीन रिश्तेदारों या नौकरों के नाम करना (बेनामी हस्तांतरण), कानून आने से पहले काश्तकारों को बेदख़ल करना, या ज़मीन को बाग़ बताना। बहुत-से काश्तकारों की ज़मीन छिन गई। केवल कुछ राज्यों, ख़ासकर केरल और पश्चिम बंगाल (ऑपरेशन बरगा), ने मज़बूत सुधार किए। फिर भी सुधारों से मध्यम जातियाँ और किसान आगे बढ़े।
हरित क्रांति और उसके प्रभाव
1960 के दशक के मध्य से हरित क्रांति में अधिक उपज वाले (HYV) बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और पक्की सिंचाई इस्तेमाल हुई, साथ में राज्य ने कर्ज़ और तय दामों से मदद की। यह सिंचाई वाले क्षेत्रों में शुरू हुई: पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तटीय आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ भाग। अनाज उत्पादन बढ़ा और भारत अनाज में आत्मनिर्भर हुआ।
सामाजिक प्रभाव
- किसानों में असमानता: बड़े और मध्यम किसान लागत ख़रीद सके और सबसे ज़्यादा लाभ पाए; छोटे किसानों ने अक्सर कर्ज़ लिया।
- काश्तकार बाहर: मालिकों ने मशीनों से ख़ुद खेती के लिए ज़मीन वापस ले ली।
- मज़दूर: पहले मज़दूरों की माँग बढ़ी, पर बाद में मशीनों ने काम घटाया; मज़दूरी अनाज से नकद में बदली।
- क्षेत्रीय अंतर: सिंचित क्षेत्र धनी हुए; सूखे क्षेत्र पीछे रह गए।
- पर्यावरण (दूसरी पीढ़ी की समस्याएँ): भूजल गिरना, थकी मिट्टी, कीटनाशकों का प्रयोग।
- प्रबल जातियाँ और धनी व राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हुईं।
स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण समाज में रूपांतरण
व्यापारिक खेती ने गाँव के संबंध बदल दिए:
- संरक्षक-आश्रित संबंधों से नकदी तक: पुराने संबंध जिनमें मज़दूर को जीवन भर की सेवा के बदले अनाज या फ़सल का हिस्सा मिलता था (कभी-कभी इसे जजमानी जैसा लेन-देन कहते हैं), उनकी जगह रोज़ की नकद मज़दूरी और छोटे अनुबंध आए। मज़दूरों को कुछ आज़ादी मिली पर सुरक्षा छिन गई।
- मशीनें: ट्रैक्टर, थ्रेशर और हार्वेस्टर से मज़दूरों की ज़रूरत घटी।
- नया धनी किसान वर्ग: प्रबल जाति के किसानों ने दुकानों, परिवहन, स्कूलों और व्यापार में पैसा लगाया और राजनीति में शक्तिशाली बने।
- बढ़ते संबंध: गाँव नगरों, बाज़ारों और राज्य से ज़्यादा जुड़ गए।
श्रम का संचार
बहुत-से ग़रीब ग्रामीण मज़दूरों को घर पर पूरा काम नहीं मिलता। वे एक मौसम के लिए काम वाली जगहों पर जाते हैं: धनी खेत, ईंट भट्ठे, निर्माण स्थल, खदानें। काम ख़त्म होने पर घर लौटते हैं और अगले मौसम फिर जाते हैं। इस आने-जाने को श्रम का संचार कहते हैं। समाजशास्त्री यान ब्रेमन ने ऐसे मज़दूरों को घुमक्कड़ (फ़ुटलूज़) मज़दूर कहा।
- धनी किसान अक्सर प्रवासी मज़दूर पसंद करते हैं क्योंकि वे स्थानीय मज़दूरों से सस्ते और आसानी से नियंत्रित होते हैं।
- प्रवासियों को ख़राब आवास, कम मज़दूरी, कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं और ठेकेदारों का कर्ज़ झेलना पड़ता है।
- कृषि श्रम का स्त्रीकरण: पुरुषों के बाहर जाने से खेती के काम में महिलाओं का हिस्सा बढ़ता है, आमतौर पर ज़मीन की मालिक बने बिना।
वैश्वीकरण, उदारीकरण और ग्रामीण समाज
1990 के दशक से भारतीय खेती विश्व बाज़ार से ज़्यादा जुड़ गई है:
- अनुबंध खेती: कंपनी किसानों को बताती है क्या उगाना है, बीज और लागत देती है, और तय दाम पर फ़सल ख़रीदने का वादा करती है। इससे सुरक्षा मिलती है पर किसान कंपनी पर निर्भर हो जाते हैं, और मिट्टी व खाद्य फ़सलों को नुक़सान हो सकता है।
- कृषि व्यवसाय: बड़ी कंपनियाँ बीज, उर्वरक और कीटनाशक बेचती हैं; स्थानीय एजेंट महँगी लागत बेचते हैं।
- दामों का उतार-चढ़ाव: फ़सल के दाम विश्व बाज़ार के साथ चलते हैं; कुछ क्षेत्रों में राज्य की मदद घटी है।
- कृषि संकट: महँगी लागत, फ़सल ख़राब होना, गिरते दाम और कर्ज़ से कुछ क्षेत्रों में किसान आत्महत्याएँ हुई हैं, ख़ासकर नकदी फ़सल उगाने वाले छोटे किसानों में।
परीक्षा कोना: इस इकाई के लगभग 10 अंक होते हैं। संभावित प्रश्न: प्रबल जाति की परिभाषा; भूमि सुधारों की सीमाएँ; हरित क्रांति के सामाजिक प्रभाव; श्रम का संचार; वैश्वीकरण का किसानों पर असर।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- कृषि संरचना: ज़मीन के मालिकाने और उस पर काम करने वालों का ढाँचा।
- प्रबल जाति: ज़मीन, संख्या और स्थानीय राजनीतिक शक्ति वाली जाति।
- भूमि सुधार: ज़मींदारी उन्मूलन, काश्तकारी सुधार, भूमि हदबंदी।
- बेनामी: हदबंदी से बचने के लिए किसी और के नाम ज़मीन।
- हरित क्रांति: HYV बीज + उर्वरक + सिंचाई (1960 के दशक का मध्य)।
- संरक्षक-आश्रित (जजमानी जैसे) संबंध → नकद मज़दूरी।
- श्रम का संचार: मज़दूरों का मौसमी आना-जाना।
- कृषि श्रम का स्त्रीकरण: खेती के काम में महिलाओं का हिस्सा बढ़ना।
- अनुबंध खेती: कंपनी पहले से फ़सल, लागत और दाम तय करती है।
हल किए गए उदाहरण
1. हम क्यों कहते हैं कि ग्रामीण भारत में जाति और वर्ग जुड़े हैं?
क्योंकि ज़मीन की सीढ़ी और जाति की सीढ़ी आमतौर पर मेल खाती हैं: बड़े भूस्वामी ज़्यादातर ऊँची या प्रबल जातियों के थे, जबकि भूमिहीन मज़दूर ज़्यादातर दलित और आदिवासी। इसलिए किसी की जाति से अक्सर उसकी ज़मीन (वर्ग) की स्थिति का अंदाज़ा लगता है, हालाँकि हमेशा नहीं।
2. 100 एकड़ वाले एक भूस्वामी को पता चलता है कि हदबंदी कानून प्रति परिवार केवल 30 एकड़ की छूट देगा। वह कैसे बच सकता है, और इससे भूमि सुधार के बारे में क्या पता चलता है?
वह 70 एकड़ काग़ज़ पर रिश्तेदारों या नौकरों के नाम कर सकता है (बेनामी हस्तांतरण), या कानून आने से पहले काश्तकारों को निकाल सकता है। नियंत्रण उसके पास रहता है जबकि रिकॉर्ड कानूनी दिखते हैं। इसीलिए ज़्यादातर राज्यों में भूमि सुधार आंशिक रूप से ही सफल हुए।
3. हरित क्रांति ने उत्पादन बढ़ाया। फिर असमानता क्यों बढ़ी?
नए तरीक़े में बीज, उर्वरक और पानी के लिए पैसा चाहिए था। बड़े किसान चुका सके और सबसे ज़्यादा लाभ पाया; छोटे किसानों ने कर्ज़ लिया या पिछड़ गए; मालिकों के ख़ुद खेती शुरू करने से काश्तकार बेदख़ल हुए; बिना सिंचाई वाले सूखे क्षेत्र पीछे रहे। उत्पादन बढ़ा पर लाभ असमान रहा।
4. झारखंड के एक गाँव के कई पुरुष हर कटाई पर पंजाब के खेतों में और बाक़ी साल दिल्ली के निर्माण स्थलों पर काम करते हैं। दो सामाजिक प्रभाव समझाइए।
यह श्रम का संचार है। पहला, प्रवासी नकद कमाते हैं पर बिना सुरक्षा, आवास या अधिकारों के रहते हैं। दूसरा, घर पर महिलाएँ खेती का काम सँभालती हैं (कृषि श्रम का स्त्रीकरण) और परिवार की भूमिकाएँ बदलती हैं।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि भूमि सुधारों से सब भूमिहीनों को ज़मीन मिल गई। छेदों और कमज़ोर अमल ने इन्हें सीमित किया; केवल कुछ राज्य सफल रहे।
- हरित क्रांति को सबके लिए अच्छा मानना। इससे सबसे ज़्यादा लाभ बड़े किसानों और सिंचित क्षेत्रों को मिला।
- श्रम के संचार को स्थायी प्रवास समझना। संचार करने वाले मज़दूर हर मौसम जाते और लौटते हैं।
- यह मानना कि वैश्वीकरण केवल शहरों को प्रभावित करता है। अनुबंध खेती, बीज कंपनियाँ और विश्व दाम गाँवों को गहराई से प्रभावित करते हैं।